रविवार, 19 जून 2016

दिखावा और मजबूरी है इनकी शालीनता और गांभीर्य - डॉ. दीपक आचार्य

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मनुष्य का सर्वांग मूल्यांकन केवल चिकनी-चुपड़ी वाणी, वाग्विलास, तारीफ के पुलिन्दे बांधने की क्षमता, स्वार्थजनित विनम्रता अथवा चापलुसी से लवरेज भाषा से नहीं होता बल्कि मन, कर्म और वचन सभी से होता है।  

कोई इंसान कितना ही मीठा-मीठा, प्रिय-प्रिय और लुभाने वाला बोलता रहे, किसी के भी प्रति चाहे कितना ही कृत्रिम आदर-सम्मान और श्रद्धा जताता रहे, उसका कोई अर्थ नहीं है यदि वह मन में श्रद्धाहीनता बनाए रखता है।

मस्तिष्क और हृदय से पाक-साफ लोग जो कुछ कहना होता है उसे सीधी, सपाट और अक्खड़ भाषा शैली में कह देने का माद्दा रखते हैं। और उनकी वाणी इसलिए प्रभावी असर डालती है क्योंकि इसमें स्वार्थ या संबंधों की मिलावट नहीं होती।

ये शब्द और वाक्य हृदय से निकल कर सीधे बाहर आते हैं और पूरे के पूरे शुद्ध होते हैं। जबकि जो शब्द बौद्धिक धरातल पर अपनी स्वार्थ और लाभ-हानि की छलनियों से छनकर बाहर आते हैं वे अपने भीतर पूरी कृत्रिमता और मिलावट लिए हुए होते हैं।

दुनिया में सज्जन और अच्छे इंसान जो कुछ कहना चाहते हैं वे कह डालते हैं, जो कुछ कहते हैं वह सत्य और यथार्थ से भरा होता है। चाहे वह किसी को अच्छा लगे या बुरा।

सत्य और यथार्थ वही लोग कह-लिख और पढ़ सकते हैं जिनके तन-मन और मस्तिष्क में पवित्रता हो। मलीन मन और मैला भरे हुए दिमाग वाले लोग जीवन में कभी सच बोल ही नहीं सकते। चाहते हुए भी इनके मुख से यथार्थ का स्फुरण नहीं हो सकता क्योंकि इनकी मलीनता, स्वार्थ, पद-कद और मद की मोहांधता इतना अधिक प्रदूषण फैलाए रखती है कि इनके भीतर न मौलिकता होती है, न वास्तविकता।

फिर जिन लोगों का शरीर, खून, हाड़-माँस और सब कुछ पराये द्रव्यों से परिपुष्ट होता है उन लोगों की सोच भी शुद्ध नहीं रह सकती क्योंकि विजातीय द्रव्यों से बने पुतलों से इंसानी गंध का सृजन कभी संभव है ही नहीं।

यही कारण है कि बहुत से लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनकी आत्मा मरी हुई है, जमीर तक नहीं रहा। यहाँ आत्मा से तात्पर्य उस घनीभूत शक्ति से है जिसे इंसानियत का केन्द्र माना जाता है।

सीधी सी बात यह है कि जो लोग भीतर से जितने अधिक शुद्ध और पवित्र हैं उनकी अभिव्यक्ति मौलिकता लिए हुए होती है और इसमें किसी भी प्रकार की कोई मिलावट नहीं होती इसलिए जो कुछ बाहर निकलता है वह सत्य के रस में पग कर निकलता है। 

यह सत्य हर युग का अपना शाश्वत सत्य है लेकिन उन लोगों को पच नहीं पाता जो लोग झूठे, सिद्धान्तहीन, षड़यंत्रकारी और चाटुखोर हैं क्योंकि इन लोगों को उच्छिष्ट खुरचन और मुफतिया माल की गंध ही पसंद आती है और वहीं लपकते-झपटते रहते हैं जहाँ यह गंध अक्सर पसरी रहती है।

बहुत सारे लोग हैं जो अपने आपको धीर-गंभीर, भारी, मननशील, विनम्र और शालीन समझते हैं और हमेशा शालीनता के लबादे ओढ़े रहकर औरों को शालीन रहने और गंभीरता बरतने के उपदेश देते रहते हैं। इन लोगों की शालीनता और गांभीर्य अपने आप में वह मजबूरी है जिसे  न रखें तो इनकी कलई खुलते देर न लगे।

कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अन्तर रखने वाले लोगों के लिए जिन्दगी भर की यह परम विवशता रहती है कि भीतर चाहे कैसे भी रहें, जमाने भर में अपनी छवि को साफ-सुथरा और शालीन-गंभीर बनाए रखने के लिए हरचन्द कोशिश करते रहें।

अपनी तमाम मौलिकताओं को ध्वस्त कर ओढ़ी हुई शालीनता और गांभीर्य में जीने वाले लोग एक समय ऎसा आता है कि जब चौबीसों घण्टों अत्यन्त गंभीर बने रहते हैं। एक तो गांभीर्य ऊपर से इनके भीतर और आस-पास लहराते रहने वाला अहंकार का सागर, दोनों मिल जाते हैं तब ये लोग आत्म गंभीर होकर ऎसे दिखने लगते हैं जैसे कि बरसों से असाध्य रोगों के कोई मरीज ही हों या कि दुनिया भर के संचालन का ठेका इन्हें ही मिल गया हो।

इन लोगों के चेहरों से मुस्कुराने का क्षण दुर्लभ ही हो जाता है और जब कभी कृत्रिम तौर पर मुस्कराने का अवसर आता है तब साफ-साफ लग जाता है कि ये कुटिल मुस्कान बिखेर कर जताना चाह रहे हैं उन्हें भी हँसना आता है।

बड़े-बड़े और महान लोग जिनके बारे में सुना जाता है कि वे बड़े ही शालीन, ईमानदार, धीर-गंभीर, विद्वत्तापूर्ण, विनम्र,  ब्रिलिएन्ट, विकासशील और नवाचारों को अपनाकर समाज एवं देश का भला करने वाले दिखाई दिया करते थे लेकिन जब समय आता है तब सारी कलई खुल जाती है।

इस समय यह तथ्य उद्घाटित होता है कि लोग जैसे हैं वैसे दिखते नहीं, और जैसे नहीं दिखते उससे कहीं अधिक भ्रष्ट, बेईमान, नकारात्मक, आदतन शिकायती, रिश्वतखोर और विध्वंसक हैं और उनके जीवन में विनम्रता, ईमानदारी, नवाचारों और लोक कल्याण की सारी बातें केवल उनके मैले आभामण्डल को ढंकने और इसकी आड़ में सारे गलत-सलत धंधों को छिपाने की कलाबाजी से अधिक कुछ नहीं होता।

बडे-बड़े लोग जिन्हें बहुत से लोग आदर्श, अनुकरणीय और साथी मानते रहे,  हकीकत सामने आने के बाद आज वे सारे कहाँ हैं, इस बारे में किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है।  ये सारे के सारे महान उपदेशक रहे हैं और जिनके वाक्यों को हैडलाईन मिलती रही है, जिनके छायाचित्राेंं को प्रमुखता से स्थान मिलता रहा है।

जानना होगा कि आज उनकी असलियत क्या है और वे किस हाल में जी रहे हैं। जो कुछ कहें-करें, लिखें-परोसें,  सत्य, धर्म और न्याय का आश्रय पाकर ही यह सब करें।

जो लोग खुद चोर-उचक्के, बेईमान, रिश्वतखोर, भ्रष्ट और परायी मुफतिया झूठन पर पलने वाले हैं उन लोगों को कोई अधिकार नहीं है कि वे दूसरों के लिए उपदेश दें, टिप्पणी करें। क्या अजीब चलन चल पड़ा है मेंढ़कों की दाढ़ें निकल आयी हैं, श्वान ऎरावतों पर भूँकने लगे हैं और सूअर इत्र का प्रचार कर रहे हैं।

काजल की कोठरी और शीशे के मकानों में रहने वाले भोगी-विलासी, भिखारियों, औरों की झूठन चाटने वालों और ढोंगियों को ऋषि-मुनियों, संन्यासियों और नैष्ठिक सज्जनों पर टीका-टिप्पणी से बचना चाहिए अन्यथा हवाओं का रुख बदल देने की ताकत अगर किसी में है तो वह निरपेक्ष, निष्काम और निःस्वार्थ इंसानों में ही है और उसके लिए ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, एक दृढ़ संकल्प ही काफी है।

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