शनिवार, 18 जून 2016

व्यंग्य-राग (२१) / टी वी टी टुट टुट / डा. सुरेन्द्र वर्मा

चिड़िया, जैसा कि हम सभी जानते हैं, एक पंखयुक्त उड़ने वाला प्राणी है. इसीलिए इसे पखेरू, पक्षी और परिंदा भी कहते है. पंख होने के नाते अधिकतर चिड़ियां उड़ान भरती हैं. पर कितनी त्रासदी है कि कुछ ऐसी भी चिड़ियां हैं जो पंख होने के बावजूद उड़ नहीं पातीं | चिड़िया का दूध एक असंभव बात है. लेकिन हां, एक चिड़िया ऐसी भी है जो स्तनधारी है, अर्थात् उल्लू. हमारे समाज में उल्लू से दो अलग अलग संस्कृतियां विकसित हुई हैं. एक ने उल्लू को निरा उल्लू समझा और दूसरी ने उल्लू को प्रज्ञा के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया.

ज़रा सोचिए, अगर चिड़िया न हों तो हमारे जीवन में कितना सन्नाटा छा जाए. चिड़िया है तो चहचहाहट है, टी वी टी टुट टुट है, उमंग और आनंद है. चिड़िया गाती है, चिड़िया वाचाल है. चिड़ियों का निरीक्षण अपने आप में आनंददायी होता है. चिड़ियां सदैव ही मानव मन में एक आकर्षण का केंद्र रही हैं.

एक समय था जब हमारे आंगन में फुदकती प्यारी सी चिड़िया, गौरैया, खेत खलियानों से लेकर हर जगह अटखेलियां करती दिख जाती थी. गौरैया के झुंड के झुंड सार्वजनिक स्थलों से लेकर हमारे घर की खिड़कियों, चबूतरों, यहां तक कि कमरों के अंदर तक घुस आते थे. यह एक ऐसी चिड़िया थी जो हर स्थान को अपने अनुकूल बना लेती थी. आज हम इसी चिड़िया को देखने के लिए तरस रहे हैं. आधुनिक युग में रहन-सहन और वातावरण में आए परिवर्तनों के चलते आज चिड़ियों, विशेषकर गौरैया जैसी घरेलू चिड़ियों. के वजूद पर कई तरह के खतरे मंडराने लगे हैं. अब घरों में आंगन होते ही नहीं और मोबाइल फोन से निकलने वाली तरंगों से चिड़ियां रास्ता भटकने लगी हैं. बेचारी जाएं तो जाएं कहां. यहां उनके दर्द भरे दिल की दास्तां समझने वाला कोई रहा ही नहीं. न जाने कितने अत्याचार उसने चिड़ियों पर किए हैं और अब हाल यह है कि चिड़ियों के लाले पड़ने लगे हैं पेड़ों को काटकर चिड़ियों की रिहाइश समाप्त करने का मानों आदमी ने बीड़ा ही उठा लिया है | लुप्त होने की कगार पर है चिड़िया !

चिड़िया को देखकर ही आदमी ने अपनी कल्पना की उड़ान भरी और हवाई जहाज़ बना डाला. उसने चिड़िया से विहंगम दृष्टि चुराई और चिड़िया की आंख से अपने लक्ष्य पर निशाना केंद्रित किया. उसे जहां भी सोने की चिड़िया दिखी, उसे फांसने के लिए वह हथकंडे ढूंढने लगा. किसी भी खूबसूरत चिड़िया को फांसना उसने अपने सद्कर्मों में शामिल कर लिया. वाह रे आदमी !

हमारी सभ्यता का एक पहलू यह भी है कि उसने आदमी को चिड़ी-मार बना दिया. चिड़ी -मार होना शायद बहुत सरल है. चिड़िया-सी जान को मारने में आदमी को कोई खास ज़हमत नहीं उठाने पड़ती. गुलेल ली और मार दी चिड़िया ! खेल का खेल और खाने के लिए भोजन सो अलग ! चिड़िया तो चिड़िया आदमी ने न जाने कितने मुर्गे तक उदरस्थ कर लिए होंगे. वैसे भी मुर्गों की तो वह तलाश में ही रहता है. वह तो इंसानों में भी मुर्ग़े ढूंढता है. आदमी तीतर लड़ाता है, मुर्ग़े लड़ाता है और अपनी ताक़त के झंडे गाड़ देता है. परिदों को पिजड़े में बंद करके खुद खुली हवा में उड़ने के सपने देखता है.

एक चिड़िया थी जो हमारे आंगन में फुदकती थी और एक चिड़िया हमारे मन में थी जो हमारी आत्मा को कचोटती थी. अब दोनों ही विलुप्त हो गईं हैं – कम से कम विलुप्त होने की कगार पर तो हैं हीं. कितनी अजीब बात है कि हमारी आत्मा में बैठी चिड़िया अब हमें ग़लत काम करते हुए कचोटती नहीं, हमारी सुप्त नैतिक बुद्धि को अब यह जाग्रत नहीं करती. हमें एक अच्छा इंसान बनाने के लिए फड़फड़ाती नहीं. हमारी अंतरात्मा की नन्हीं आवाज़ आखिर क्यों चुप हो गई? बड़े-बड़े बुद्धिमान और बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े साधु और बड़े-बड़े संत, जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तुच्छ से तुच्छ हरकतें क्यों करने लगे? क्या सचमुच उनकी अंतरात्मा में बसी चिड़िया की टुट-टुट उन्हें सुनाई नहीं देती.

-सुरेंद्र वर्मा (मो) ९६२१२२२७७८

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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