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July 2016
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शोध आलेख

कबीर और सामाजिक सरोकार

डॉ. शगुन अग्रवाल

बीर, मध्ययुगीन हिंदी निर्गुण काव्यधारा के प्रवर्तक संत कवि के रूप में प्रख्यात हैं. संत काव्य का मूल सरोकार था 'सामान्य मानव हित साधन'. तत्कालीन विषय- राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितयों को देखते हुए तमाम विषमताओं, विडम्बनाओं और कुरूतियों को चुनौती देनेवाला यह सामाजिक प्रतिरोध का काव्य है जो हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर मानव मात्र के लिए बराबरी तथा न्याय की मांग करता है. संत काव्य अपनी सहजता, सरलता, जीवन दर्शन की गंभीरता के कारण अत्यंत प्रभावशाली है. संतों की मानवतावादी दृष्टि के मूल में स्वतंत्र चिंतन, स्वानुभव और आचरित सत्य प्रमुख थे. प्रायः सभी संत कवि सदगृहस्थ थे और उनका व्यवसाय धर्मोपदेशक का नहीं था. जीविका के लिए प्रायः सभी संत अपने पारम्परिक व्यवसायों से जुड़े थे. कबीर जुलाहे थे और उनकी रचनाओं में कपडे बुनने के व्यवसाय का वर्णन है. वस्तुतः आस्तिकता, सच्चरित्रता, परदुःख-कातरता, करुणा, प्रेम, भक्ति और विनय ही संतों के आर्दश थे.

कबीर का मूल स्वर विद्रोह का है. वे एक प्रखर स्पष्ट वक्ता, निरभिमानी, साहसी, तेजस्वी और निर्भीक स्वभाव के व्यक्ति थे. पाखंड और अंधविश्वास का खंडन, पक्षपात विहीन होकर सामाजिक कुरूतियों पर प्रहार उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है. हिन्दू और मुस्लिम दोनों को वह समान दृष्टि से देखते थे. दोनों मजहबों की कट्टरता और संकीर्णता पर जमकर प्रहार करते थे. लेकिन संत की मर्यादा के भीतर रहकर ही. उन्होंने वर्णाश्रम व्यवस्था पर तीव्र प्रहार करके मनुष्य की उच्चता और नीचता का मानदण्ड आचरण को माना, वर्ण को नहीं. अतः रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में-

"इसके साथ ही मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्मगौरव का भाव जगाया और भक्ति के ऊंचे से ऊंचे सोपान की ओर बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया.''1 कबीर मैं और तू की क्षुद्रता से ऊपर उठने उठाने का प्रयत्न करते हैं. वे सारे विश्व को एक आध्यात्मिक बंधुत्व में बंधा देखते है. वर्ण भेद मिथ्या है. ब्राह्मण और शूद्र दोनों एक हैं, दोनों मनुष्य हैं. इसलिए वे ब्राह्मण को फटकारते हुए कहते हैं-

''जो तू बांभन बंभनी जाया, आज बात ह्वे क्यों नहीं आया.''2 अपने समय और समाज की कुत्साओं और आवश्यकताओं से कबीर इतने परिचित थे कि उनका ध्यान उनसे हटता ही न था. कबीर के लोक कल्याण की साधना में हिन्दू मुस्लिम एकता का भी प्रमुख स्थान था. कबीर इस आन्दोलन के बड़े भारी समर्थक थे. भारतीय जीवन में कबीर का यह प्रयत्न एक ऐतिहासिक महत्व रखता है. मंदिर और मस्जिद दोनों के सम्बन्ध में फैले भ्रम के विरुद्ध वे लिखते हैं-

''अल्लह एक मसीति बसतु हैं अवर मुलकु किसु केरा.

हिन्दू मूरति नाम निवासी, दुहमती तत्तु न हेरा.''3

कबीर किसी अपराधी को क्षमा कर सकते हैं, किन्तु मिथ्याचार को नहीं. ये उसके पीछे पड़ते हैं, उसे नष्ट करने का भरकस प्रयत्न करते हैं और इसी प्रयत्न में मुल्ला, पांडे और काजी को खरी खरी बातें सुननी पड़ती हैं. पांडे वेद पढ़ता है, किन्तु उस पर कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता. यह देखकर कबीर क्षुब्ध हो उठते हैं-

''पांडे कौन कुमति तोहि लागी,

तूं राम न जपहि अभागी.

वेद पढ़यां का यह फल पांडे,

सब घटि देखें रामां.''

''जीव बधत अरु धरम कहत है, अधरम कहां है भाई.

आपन तौ मुनि जन है बैठे, का सनि कहौ कसाई.''4 इस प्रकार अन्याय और पाखंड के कारण उत्पन्न हुई जीवन की विषमताओं की कबीर ने बड़ी कटु आलोचना की जिसमें उनके अंतर की तीव्र व्याकुलता फूट पड़ी. कबीर का लक्ष्य केवल आलोचना करना नहीं था, बुराइयों को मिटाना था. निर्दोष समाज में ही कबीर के आदर्श समाज की कल्पना निहित थी. कबीर की वाणी के मूल में लोक मंगल की भावना निहित है.

सन्दर्भ-

1 हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचन्द्र शुक्लः पृष्ठ 36, तेइसवां संस्करण

2 कबीर ग्रंथावलीः पृष्ठ 104

3 कबीर ग्रंथावलीः पृष्ठ 267

4 कबीर ग्रन्थावलीः पृष्ठ 101

सम्पर्कः (असोसिएट प्रोफेसर) 5, अनुपम अपार्टमेंट, वसुंधरा एन्क्लेव, दिल्ली- 110096

यहां वहां की

वृक्षारोपण होने न होने के बीच

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दिनेश बैस

'दिल हूम-हूम करे' और न जाने क्या-क्या करे. 'आज मदाहोष हुआ जाये रे, मेरा मन-मेरा मन.' यह जुलाई का महीना होता ही कुछ ऐसा है कि दिल बेकाबू होने लगता है. दिल मचलने लगता है और अनेक मामलों में दहलने भी लगता है. मई और जून की गर्मी के गर्म तवे पर पानी की कुछ खेपें बरस जाती हैं, छन्न से. शहर के नदी-तालाब भले ही तरस रहे हों भरने के लिये. मगर नालियां आवारा लड़कियों की तरह उमड़ने लगती हैं. साल भर सफाई के लिये तरसती नालियों की जवानी सड़कों पर उछलने लगती हैं. सड़कों के गड्ढे उफनने लगते हैं. मच्छर उनमें अवतार लेने लगते हैं. शहर हरा-भरा सा लगने लगता है. महसूस होता है कि शहर में स्वीमिंग पूल्स की संस्कृति विकसित हो गई है. वे पूल्स भले ही आदमियों के लिये न हों मेंढकों के लिये हों. मेंढकी समाज को छूट रहती है कि वे उनमें टू पीस बिकनी में गोते लगायें या वैसे ही डूबती उतराती रहें. आखिर मेंढक समाज को भी सनी लियोनी प्रेरणादायक ही लगती हैं. उनके एक संकेत पर वे अपने चरित्र का सर्वस्व त्यागने के लिये तत्पर रहते हैं. आदमी चाहे तो उन गड्ढों के सहयोग से आत्महत्या करने की योजना बना सकता है. सड़कों में गड्ढे, गड्ढों में बरसात का, देष की मिट्टी में रचा-बसा पानी- मां तुझे प्रणाम- पानी में उमड़ते-घुमड़ते मच्छर-मेंढक. बस और क्या चाहिये एक दुर्घटना अनुकूल आदर्ष सड़क बनने के लिये. ऐसे अवसरों के लिये ही सम्भवतः दुष्यंत कुमार ने कहा है-

'हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,

शौक से डूबे जिसे भी डूबना हो.'

देश के हर उत्पातकालीन नागरिक की भांति आप स्वतंत्र हैं. आप जिस संदर्भ में लें. कवि साधारण सी घटना पर मिसाइल छोड़ जाता है. सुनने-पढ़ने वाले अपनी-अपनी तरह से उसके मतलब निकालते रह जाते हैं. चतुर सयाने इन्हीं पर पी एच डी वगैरह फटकार लाते हैं. फिर शिक्षा के बुलडोजर पर सवार होकर ज्ञान को ध्वस्त करने में जुट जाते हैं. आदिकाल से अब तक यही सिलसिला चल रहा है. क्रौंच की बोली समझ कर वाल्मीकि आदि कवि माने जाने लगे. दिवंगत मुकुट बिहारी सरोज ने हाथ पर बैठे मच्छर की सरेआम हत्या कर दी. फिर उसकी शोक स्मृति में लिखा- उसने काटा/मैंने मारा/मेरा हाथ रंगा था अपने ही खून से- गुण ग्राहकों ने इसे क्रान्तिकारी जनवादी कविता स्वीकार कर लिया. हालांकि निर्विवाद है कि एक तुच्छ प्राणी, मनुष्य द्वारा किसी मच्छर की हत्या कर देना एक क्रान्तिकारी परिघटना ही होती है.

लेकिन जुलाई का महीना बरसात के पानी से सड़कों पर उमड़ती नालियों, सड़कों पर बने गड्ढों, उनमें भरा गंदा बरसाती पानी, उसमें किल्लोल करते मच्छर-मेंढक, गिरते पड़ते लोगों के लिये ही सुखद नहीं होता है. अन्य कारणों से भी इस महीने की प्रतीक्षा रहती है.

मेरे जैसे हमेशा इस संदेह में गर्मी झेलते रहते हैं कि पता नहीं जुलाई आयेगा या नहीं आयेगा. जुलाई नहीं आयेगा तो राष्ट्र वृक्षारोपण के प्रति जागरूक कैसे होगा. वृक्षारोपण नहीं होगा तो प्रकृति हमें वृक्ष हनन के पाप से मुक्त कैसे करेगी. हमारे अंधेपन के लिये हमें माफ कैसे करेगी. साल भर हम वृक्ष काटते रहते हैं. किसी की कुछ नहीं सुनते हैं. कम से कम जुलाई के महीने में तो हमें धूमधाम से वृक्ष लगाने का अवसर मिले. हम पाप करने और फिर उससे मुक्त होने में विश्वास करते हैं. पाप करना हमारा कर्म है. पापमुक्त होना हमारा धर्म है. कर्म हम चुपचाप करते रहते हैं. धर्म धूमधाम से सम्पन्न करते हैं. साल भर में भरपूर पाप करते हैं. गंगा दशहरा पर उन्हें गंगा में बहा आते हैं- नमामि गंगे- ग्यारह महीने भरपूर वृक्ष काटते हैं. जुलाई के महीने में हमारा कुम्भकर्ण वृक्ष लगाने के लिये भड़भड़ा कर जाग जाता है. इसलिये जुलाई का महीना आता है. नहीं आता है तो उसे जबर्दस्ती ले आया जाता है. खींच कर ले आया जाता है.

गये सालों में मेरे क्षेत्र में जुलाई आया. बरसात नहीं आयी. हम तड़पते रहे 'कारे मेघा कारे मेघा पानी तो बरसाओ'. गाना गाने से पानी आता तो दुनिया का कोई नल सूखा नहीं रह पाता. गाने के झांसे में हमारे यहां बरसात भी नहीं आयी- पानी नहीं बरसा- पानी नहीं बरसा, मगर वृक्षारोपण धूमधाम से हुआ. संतुलित कार्य करने की नीति के अंतर्गत एक ओर सूखा पैकेज घोषित हो रहे थे. दूसरी ओर वृक्ष लगाने के लक्ष्य निर्धारित किये जा रहे थे. एक-एक विभाग के पास इतने-इतने वृक्ष लगाने के लक्ष्य थे कि डर लगने लगा कि अगर सचमुच इतने वृक्ष लग गये तो...तो जंगल राज आने से कौन रोक सकेगा? हमारे देश पर भगवान की ऐसी कृपा है कि लक्ष्य भी भगवान की तरह हो जाते हैं. वे घोषित होते हैं मगर पूरे कभी नहीं होते हैं. इसी कार्य संस्कृति के अंतर्गत वृक्षारोपण कार्यक्रम भी सम्पन्न होते हैं.

यह नीति हमारा मनोबल बहुमंजिला भवन की तरह बढ़ाये रहती है. हमें किसी प्रकार के जोश या मस्ती जैसी औषधियां लेने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है. वह जापान की हो या हिन्दुस्तान की.

जुलाई आते ही वृक्षारोपण की तैयारियां आरम्भ हो जाती हैं. प्रतिष्ठानों का चापलूस समुदाय अचानक सक्रिय हो उठता है. वह कन्विंस करने में जुट जाता है कि सर किस एंगल से पेड़ के बगल में खड़े होकर स्माइल देंगे तो फोटो धांसू आयेगी. जाहिर है, इस अवसर को यादगार बनाने के लिये मैम तो बगल में होंगी ही. आलिंगन करते हुये. नहीं-नहीं, सर को नहीं, वष्क्ष को. डॉन्ट वरी, सर. मीडिया में अपने लायजन हैं. वह हम पर छोड़ दिया जाये. हां, उन्हें थोड़ा इंटरटेन करना होगा. प्रबंध कुशल कर्मचारी चाय समोसों का बजट पास करवाने में जुट जाते हैं. चपरासीनुमा लोगों पर सबसे बड़ा दायित्व रहता है. वृक्षारोपण समारोह के अवसर पर साहबों और राजपुरुषों के कुत्तों-बच्चों की रक्षा का दायित्व उन्हीं के कंधों पर होता है. अकाउंट और ऑडिट जियो और जीने दो के सद्भावनापूर्ण विचार से वृक्षारोपण होने न होने के अंतर को समाप्त करने की विधियां विकसित करने बैठ जाते हैं.

जुलाई का महीना बेहद रंगीन होता है. लग चुके या लगाये जाने वाले वृक्षों से नहीं, उन्हें लगाये जाने के समारोहों में रोपित नर-नारियों के कारण. कैसी-कैसी सुगंध और कैसे-कैसे रंग वातावरण में बरस रहे होते हैं. यह गंध फूल पत्तियों की न सही, खटिया की अदवायन की तरह कसी हुई ब्यूटीपार्लित देहों पर बरसे डीओज की हों, रंग लिपिस्टक्स के अनेकानेक शेड्स के हों. ठीक है कि हर देह और हर ओंठ तक आपकी पहुंच नहीं हो सकती है. तो पेड़ ही लग जाते तो क्या हर पेड़ पर आप चढ़कर बैठ जाते?

सम्पर्कः 3-गुरुद्वारा, नगरा, झांसी-28003

मो. 08004271503

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साक्षात्कार

"व्यंग्य बहुत समर्पण मांगता है, यह आसान विधा नहीं है"

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(सुभाष चंदर से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत के अंश)

सुभाष चंदर हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकार हैं. व्यंग्य कथाओं के क्षेत्र में विशेष रूप से ख्याति अर्जित करने वाले इस व्यंग्यकार ने निबंध और उपन्यास के अलावा व्यंग्यालोचना पर भी महत्वपूर्ण काम किया है. ''हिन्दी व्यंग्य का इतिहास'' जैसा विशाल ग्रन्थ इसका प्रमाण है. उनके खाते में जहां व्यंग्य की ग्यारह पुस्तकें हैं, वहीं कुल पुस्तकों की संख्या इकतालीस तक पहुंच गयी है. इस पुस्तक में विलान, राजभाषा, बाल साहित्य, जीवनी आदि अनेक विविध विषयों की कृतियां शामिल हैं. इसके अलावा उन्होंने टी.वी. एवं रेडियो के लिए अस्सी धारावाहिक भी लिखे हैं. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार, भारत सरकार, डॉ. मेघनाथ साहा पुरस्कार, शरद जोशी पुरस्कार, अट्टहास पुरस्कार, सर्जना पुरस्कार जैसे अनेक पुरस्कार उन्हें मिल चुके है. हाल ही में उन्हें व्यंग्य का सर्वोच्च पुरस्कार 'व्यंग्य श्री' प्राप्त हुआ है. उनसे व्यंग्य और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर डॉ. भावना शुक्ल की एक बेबाक बातचीत यहां प्रस्तुत हैः

डॉ. भावना शुक्लः व्यंग्य को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

सुभाष चंदरः मेरी दृष्टि में व्यंग्य वह गंभीर रचना है जिसमें व्यंग्यकार विसंगति की तह में जाकर उस पर विट, आयरनी आदि भाषा शक्तियों के माध्यम से प्रहार करता है. उसका लक्ष्य पाठक को गुदगुदाना न होकर उससे करुणा, खीज अथवा आक्रोश की पावती लेना होता है. इस प्रक्रिया में हास्य का

सावधानी से प्रयोग किया जाना जरूरी है, ताकि वह रचना की पठनीयता में वृद्धि करके, उसकी ग्राह्यता को तो बढ़ाए पर उसके प्रहार के लक्ष्य को विचलित न करे. वैसे मैं व्यक्तिगत रूप में व्यंग्य में हास्य के संतुलित प्रयोग को पसंद करता हूं?

डॉ. भावना शुक्लः लेखन शौक कैसे जागृत हुआ? इतना सुंदर लेखन कैसे लिखते हैं, विचार कैसे आते हैं?

सुभाष चंदरः घर में शुरू से ही लिखने पढ़ने का माहौल था. दादाजी पं. उमाशंकर शर्मा पढ़ने के बहुत शौकीन थे. घर में दुनिया भर की पत्रिकाएं और किताबें आती थीं, विशेषकर

धार्मिक साहित्य. धीरे-धीरे ये शौक मुझमें भी आ गया और अब तो यह व्यसन बन चुका है, बिना पढ़े नींद ही नहीं आती. मेरे पास आज भी हजारों की तादाद में किताबें हैं. लिखना शुरू होने की भी मजेदार कहानी है. एक बार माता जी ने किसी शरारत पर मेरी पिटाई कर दी. बस आंसुओं के साथ ही कविता फूट पड़ी, कविता के बोल थे- मम्मी तुमने मारा क्यों? आगे चलकर बिना पिटे भी लेखन चल निकला. जहां तक बात लेखन के लिए विचारों की है तो समाज में इतनी विसंगतियां, अव्यवस्थाएं बिखरी पड़ी हैं कि व्यंग्य लिखने के लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता. राजनीति, समाज, बाजार, साहित्य, संस्कृति आदि हर क्षेत्र में इतने गड़बड़झाले हैं कि व्यंग्यकार को बस अपने आंख-कान खुले रखने पड़ते हैं. बाकी काम शिल्प संभाल लेता है. हां, बड़े काम जैसे उपन्यास वगैरह के लिए जरूर पहले से लम्बी तैयारी करनी पड़ती है.

डॉ. भावना शुक्लः आपने व्यंग्य, आलोचना और बाल साहित्य जैसी कई विधाओं में काम किया है. एक साथ तीनों पर काम करना कितना आसान है?

सुभाष चंदरः यह मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है. जब किसी विसंगति से टकराता हूं, कुछ होंट करता है तो व्यंग्य लिखा जाता है, जब मन शरारती होता है तो हास्य कहानियां उतरती हैं और जब दिमाग बिलकुल खाली होता है तो आलोचना. हां, बाल साहित्य की सारी किताबें आने के पीछे का कारण मेरे छोटे बेटे की रोज कहानियां सुनने की लत रही. उसे रात को कहानियां सुनाता था. सुबह उनमें से जो याद आता था, उसे कागज पर उतार लेता था. बाकी रहा टी.वी. और रेडियो का पटकथा लेखन तो यह अधिकांशत मजबूरी में किया या किसी निर्माता मित्र ने जबर्दस्ती करा लिया. आपको आश्चर्य होगा कि मैंने आज तक अपना लिखा कोई भी सीरियल देखा-सुना नहीं है. मेरी आत्मा तो मुद्रित अक्षर में बसती है.

डॉ. भावना शुक्लः आप ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत कविताओं से की. फिर यकायक आपकी गाड़ी व्यंग्य के स्टेशन पर कैसे मुड़ गयी?

सुभाष चंदरः यह सच है कि शुरुआती दौर में मैंने कविताएं ही लिखीं, बल्कि कभी-कभी अब भी लिखता हूं. पर नियमित रूप से नहीं. रही बात व्यंग्य के क्षेत्र में आने की तो आज समाज में इतनी विसंगतियां, इतने विद्रूप हैं कि आप व्यंग्य से बच नहीं सकते. व्यंग्य इनसे लड़ने के लिए आपको हाथ में हथियार की तरह है. यही कारण है कि कविता हो या कहानी, नाटक हो या उपन्यास, उसमें आपको कहीं ना कहीं व्यंग्य दिख ही जाता है. खांटी व्यंग्यकार होने के लिए आपको विसंगति की सही समझ, उपयुक्त भाषा का चुनाव, शैलीय उपकरणों का प्रयोग और प्रहारात्मकता की आवश्यकता होती है. वैसे भी व्यंग्य की प्रवृत्ति मनुष्य के अंदर होती है. अगर वह आसपास की विसंगतियों पर गहरी दृष्टि रखता है, उनके खिलाफ लड़ने के लिए अन्दर से कसमसाता है और इस बैचैनी को व्यक्त करने की भूख उसके अंदर है, अपने अन्दर खौलते हुए उस ''कुछ'' को शब्द देने की क्षमता उसके अन्दर है तो उसे व्यंग्यकार बनना ही पड़ेगा. मुझे भी जल्द ही लग गया था कि बाकी मेरे अंदर कुछ हो ना हो, वह बैचैनी और उसे व्यक्त करने की छटपटाहट तो जरूर है, सो मैंने केन्द्रीय विधा के रूप में व्यंग्य को चुन लिया.

डॉ. भावना शुक्लः आपको सर्वाधिक ख्याति अपनी आलोचना कृति ''हिन्दी व्यंग्य के इतिहास'' से मिली. आप स्वयं को व्यंग्य में अधिक सहज पाते हैं या आलोचना में?

सुभाष चंदरः देखो भावना, व्यंग्य मेरे मन की चीज है. उसने मुझे सर्जना का सम्पूर्ण सुख मिलता है. मानता हूं कि मैंने आलोचना कर्म भी किया है. इसके पीछे का एकमात्र सच यह है कि चूंकि व्यंग्य में आलोचना को लेकर, उसके इतिहास को लेकर व्यवस्थित काम नहीं हुआ था. व्यंग्य के बारे में जानने को उत्सुक लोग, शोधार्थी आदि के लिए, एक ऐसे ग्रन्थ की आवश्यकता थी जहां उन्हें एक ही स्थान पर गद्य व्यंग्य की प्रवृतियों से लेकर क्रमबद्ध इतिहास तक सब मिल जाए. फिर किसी न किसी को तो यह काम करना था, मैंने कर दिया. मेरी इतनी ही गलती है हा...हा..., तुम्हारे प्रश्न का अन्तिम हिस्सा टूट गया. मै स्वयं को सचमुच सहज व्यंग्य लेखन में ही पाता हूं. व्यंग्य मैं अपने मन से लिखता हूं और आलोचना मेरी विवशता मान सकती हो.

डॉ. भावना शुक्लः आपने व्यंग्य और हास्य दोनों में ही प्रचुर मात्रा में लेखन किया है. व्यंग्य छटपटाहट की अभिव्यक्ति है और हास्य मन की गुदगुदाहट दोनों के बीच संतुलन कैसे बैठा लेते हैं?

सुभाष चंदरः इस प्रश्न का उत्तर तो आपने ही दे दिया. बेचैनी होगी तो व्यंग्य और मस्ती होगी तो हास्य! हिन्दी में हास्य लेखन को वैसे भी बहुत गंभीर रचनाकर्म नहीं माना जाता. एक समय था जब हमारे वरिष्ठ रचनाकारों ने हास्य लेखन पर भी महत्वपूर्ण काम किया था. अन्नपूर्णानन्द वर्मा, जी.पी. श्रीवास्तव, श्री नारायण चतुर्वेदी, गोपाल प्रसाद व्यास आदि की ख्याति उनके हास्य लेखन को लेकर अधिक थी. बाद में केशवचंद्र, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी आदि ने व्यंग्य के साथ-साथ सुरुचिपूर्ण हास्य लेखन को भी समृद्ध किया. उसके बाद हमारे समय के महान व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने भी हास्य लेखन को उसकी खोई गरिमा दिलाने की कोशिश की. हरीश नवल, श्रवण कुमार उर्मलिया आदि के खाते में भी कुछ अच्छी हास्य रचनाएं हैं. लेकिन यह संख्या बहुत कम है. व्यक्तिगत स्तर पर मुझे हास्य कहानियां लिखने में मजा आता है. आपको आश्चर्य होगा कि हास्य कहानियों की मेरी किताब ''थोड़ा हंस ले यार'' से पहले तीसियों वर्षों तक हिन्दी में हास्य कहानियों की किताब ही नहीं थी. हास्य को दोयम दर्जे का समझने की यह प्रवृति सिर्फ हिन्दी में है, अन्य भाषाओं में ऐसा नहीं है.

डॉ. भावना शुक्लः एक प्रश्न और यह देखा गया है कि आज के अधिकांश व्यंग्यकारों के संग्रहों में व्यंग्य लेखों की बहुतायत है. बहुत से रचनाकार तो ऐसे हैं जो जानते हैं कि वे व्यंग्य कथा लिख ही नहीं सकते. जबकि आपके जितने संग्रह मैंने देखे हैं, उनमें व्यंग्य कथाओं की तादाद ज्यादा है, इसका क्या कारण है?

सुभाष चंदरः दरअसल कहानी से मेरा लगाव बचपन से है. मेरी दादीजी हमें बचपन में रोज कहानियां सुनाती थी. कहानियां सुने बिना हम सोते ही नहीं थे. आगे जाकर जब पढ़ने का संस्कार बना तो कहानी और फिर उपन्यास आकर्षण का केन्द्र बने. लिखते समय भी इसी कहानी ने फिर से आकर्षित किया. वैसे भी मेरा मानना है कि कथा के माध्यम से आप व्यंग्य को कहीं सहज अभिव्यक्ति दे पाते हैं. पाठक तक उनका

साधारणीकरण आसानी से हो जाता है. वैसे व्यंग्य कथा लिखने के पीछे का एक सच यह भी है कि हम जब भी शाश्वत व्यंग्य की बात करते हैं तो उसमें कहानी सबसे ऊपर आती है. परसाई हों या शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी हों या गोपाल चतुर्वेदी हो, जब भी उनकी श्रेष्ठ रचनाओं की बात आती है तो हम उनकी व्यंग्य कथाओं को ही गिनाने लगते हैं. परसाई की भोलाराम का जीव, इन्सपेक्टर मातादीन चांद पर, शरद जोशी की जीप पर सवार इल्लियां, वर्जीनिया वुल्फ से कौन डरता है, रवीन्द्रनाथ त्यागी की चन्द्रमा की सच्ची कथा, गोपाल चतुर्वेदी की पुल के नीचे की धरती इसका सशक्त उदाहरण हैं. मैं अपने बारे में भी यह मानता हूं कि मेरी यूएसबी तो मेरी व्यंग्य कथाएं ही हैं. निबंध मैं लिख लेता हूं पर मुझे जो आनंद ''कबूतर की घर वापसी'', ''काफिर और म्लेच्छ की कहानी'', ''सच्ची-मुच्ची की प्रेम कहानी'', ''अकाल भोज'', ''थाने में बयान'' जैसी व्यंग्य कथाएं लिखकर मिला, वह आनंद व्यंग्य निबंध में कभी नहीं आया. इसे आप मेरी कमजोरी मान सकती हैं.

डॉ. भावना शुक्लः पिछले दिनों आपका व्यंग्य उपन्यास अक्कड़-बक्कड़ बहुत चर्चा में रहा. एक डेढ़ साल में उसके कई संस्करण भी आये. उस पर कई आरोप भी लगे कि उसकी भाषा भदेस है, उसके कुछ प्रसंगों को अश्लील भी माना गया. इन आरोपों पर कुछ कहना चाहेंगे?

सुभाष चंदरः हम्म...यह सच है. ये आरोप काफी हद तक सही हैं. होता क्या है कि हम कई बार वास्तविकता को सामने लाने और सहज वातावरण निर्मित करने के चक्कर में कुछ छूट ले लेते हैं. पात्रों के मुंह से अवसरों के अनुकूल भाषा भी देते हैं, इससे सहजता आती है, देशकाल के हिसाब से वास्तविकता भी आती है, पर कहीं-कहीं शुचिता के समर्थक पाठकों को यह खलता भी है. जहां तक अक्कड़-बक्कड़ की बात है. यह एक गांव के कुछ बिगड़े हुए बेरोजगार युवकों की कथा है जो येन-केन प्रकारेण अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं. प्रेम से लेकर नौकरी तक सब में उनका सही दृष्टिकोण चलता है. उनकी भाषा भदेस तो होनी ही थी. फिर ब्रज क्षेत्र के ग्रामों में अगर आप जायें तो देखेंगे कि एक अलग किस्म की मस्ती, भदेसपन, गालियां वहां की मिट्टी में घुली हुई है. फिर भी मैं मानता हूं कि मुझे थोड़ा संगत होना चाहिए था. साथ ही मैं यह भी मानता हूं कि अगर मेरे अगले उपन्यास के पात्रों और उनके चरित्र की मांग होगी तो शायद मैं यही गलती फिर दोहराऊंगा. अपने पात्रों के साथ अन्याय करने की मुझमें हिम्मत नहीं है. हां, आरोप जो झेलने ही पड़ेंगे, उनके लिए हमेशा तैयार हूं.

डॉ. भावना शुक्लः युवा व्यंग्यकारों के लेखन से आप संतुष्ट हैं? क्या आपको लगता है कि वे व्यंग्यधर्मिता के साथ न्याय कर रहे हैं?

सुभाष चंदरः इस संबंध में मेरी प्रतिक्रिया सामान्यीकृत हो सकती है. युवा रचनाकारों में ऐसे बहुत से लोग हैं जो व्यंग्य के प्रति पूर्ण समर्पित हैं. वे अपने सरोकारों के प्रति गंभीर है, उनके प्रयोग करने की क्षमता है, जो शैली के यथेष्ट प्रयोग को लेकर बहुत सजग हैं, जिन्हें विषयों की अच्छी समझ है, जो बहुत तैयारी के बाद, बहुत अध्ययन के बाद इस क्षेत्र में आये हैं. वे व्यंग्य के सुनहरे भविष्य के लिए आशान्वित करते हैं. वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो राजनीति पर चटखारेदार टिप्पणियों को व्यंग्य समझ लेते हैं जिन्होंने ना अपने वरिष्ठों को पढ़ा है ना समकालीनों को. उनसे मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि व्यंग्य बहुत समर्पण मांगता है, यह आसान विधा नहीं है. ठीक है आज तुम येन केन प्रकारेण अखबारों के स्तंभों में जगह पा लोगे, पर इतिहास तुम्हें कभी याद नहीं रखेगा. सो व्यंग्य में आओ तो तैयारी के साथ. सौ पढ़ो, दस गुनो, तब एक लिखो का सिद्धान्त हर विधा के साथ-साथ व्यंग्य के लिए भी जरूरी हैं.

डॉ. भावना शुक्लः आप हमारे पाठकों और नये व्यंग्य रचनाकारों को क्या सन्देश देना कहेंगे?

सुभाष चंदरः मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा की साहित्य हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसी के माध्यम से हम सभी स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं. पाठकों का स्नेह ही हम रचनाकारों का पारिश्रमिक है. और युवा व्यंग्य रचनाकारों को हमेशा अध्ययनशील होना चाहिए. जितना अध्ययन वे करेंगे उतना ही बेहतर वे अभिव्यक्त भी कर पाएंगे.

संपर्कः सह संपादक प्राची

डब्ल्यू जेड 21, हरिसिंह पार्क, मुल्तान नगर,

पष्चिम विहार, नई दिल्ली- 110056

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ईमेलः bhavanasharma30@gmail-com

 

काव्य जगत

अभिनव अरूण की दो ग़ज़लें

एक

इश्क न हो तो ये जहां भी क्या.
गुलिस्तां क्या है कहकशां भी क्या.

पीर पिछले जनम के आशिक थे ,
यूं खुदा होता मेहरबां भी क्या.

औघड़ी फांक ले मसानों की,
देख फिर जीस्त का गुमां भी क्या.

बेल बूटे खिले हैं खंडर में,
खूब पुरखों का है निशां भी क्या.

खुशबू लोबान की हवा में है,
अब अगर खत्म हो धुआं भी क्या.

मां का आंचल जहां वहीँ जन्नत,
इस जमीं पर है आसमां भी क्या.

खूब चर्चा में है वेलेन्टाइन,
इश्क तेरी सजी दुकां भी क्या.

उनकी नजरें हुईं जिगर के पार,
तीर को चाहिए कमां भी क्या.

मुझको शहरे गजल घुमा लायी,
खूब उर्दू जुबां जुबां भी क्या.

यूं लगे है खुदा बुलाता है,
इन मीनारों से है अजां भी क्या.


दो

अक्षरों में खुदा दिखाई दे.
अब मुझे ऐसी रोशनाई दे.

बाप के हौसलों का दे बिस्तर,
मां के आशीष की रजाई दे.

हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूं,
सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे.

रोशनी हर चिराग में भर दूं,
कोई ऐसी दियासलाई दे.

मां के हाथों का स्वाद हो जिसमें,
ले ले सबकुछ वही मिठाई दे.

धूप तो शहर वाली दे दी है,
गांव वाली बरफ मलाई दे.

बेटियों को दे खूब आजादी,
साथ थोड़ी उन्हें हयाई दे.

तल्ख लहजा तमाम लोगों को,
मीर दे मीर की रुबाई दे.

दर्द होरी सा दे रहा है तो,
साथ धनिया सी एक लुगाई दे.

घूस के सौ दहेज से बेहतर,
अपने हाथों बनी चटाई दे.


सम्पर्कः बी-12, शीतल कुंज, लेन-10,
निराला नगर, महमूरगंज,
वाराणसी-221010, (उ.प्र.)
मोबाइलः 9415678748

e mail  - arunkrpnd@gmail-com


एक पिता ये भी
कोमल सोमड़वाल

 

शून्य के किसी क्षितिज ने कर लिया है हरण,
या शायद जिल्द से विलग कर लिया है आवरण,
लावारिस सी पुस्तक ने या शायद गर्द हो हटी,
वे गीले प्रभंजन से और स्पष्ट हुई ये प्रतीति,
छल की वेदी पर जिस तन्मयता से आत्मा की बलि चढ़ाई है,
आघात कर के प्रेम पर जो विश्वासों की अर्थी सजाई है,
धन की सेज पर इंसानियत की जो चिता जलाई है,
वाह! पुत्री त्याग कर पितृत्व की बखूबी रीत निभाई है..
तुम्हारे जीवित होने पर भी मृत कहलाना मुझे अधिक स्वीकार्य है,
अंश तुम्हारा कहलाने से,
अनाथ कहलाना मुझे अधिक परिहार्य है...
स्वाथरें के व्याघ्र से लांघ चुके जो मानवता की देहरी,
अस्त है मिहिर वक्त का जल्द आएगा बन अहेरी,
स्वाथरें की लत में न भूल हर भूशायी का निश्चित मरण है,
जीवन तो है कर्म भूमि, मृत्युपरांत वास्तविक रण है,
भूल न कर दो पल खुशी के बिताकर, इतिहास तो अनिमेष है,
प्रवंचनाओं, छल, असि का कब हर्ष बचा शेष है?

सम्पर्कः बाफना सदन, पारीकों का नया बास
लाडनू-341306, जिला-पाली (राजस्थान)


यूनुस अदीब

कतआत

कौन किसको संभालता है यहां
रास्ते रब निकालता है यहां
किसको मालूम कब, कहां, कैसे
आफतें कौन टालता है यहां
हम सिवा मार्फत के कुछ भी नहीं
पालने वाला पालता है यहां.

तेरे हर फेअल पे उसकी नजर है
खबर तुझको नहीं वो बाखबर है
एक अंधी मां भी ये कहती है सबसे
मेरा बेटा मेरा नूरे नजर है.

जुल्मत की बादशाही को ऐसे मिटा के चल
इल्मो अदब का जेह्न में सूरज उगा के चल
सर को उठाके देख तू महलों को शौक से
ये दर फकीर का है यहां सर झुका के चल.

पनघट भी, खेत भी, ये परिन्दे भी, नाव भी
रहने लगी उदास ये पीपल की छांव भी
जब से शहर की आबो-हवा इसमें घुल गई
बेरंग हो गया मेरा छोटा सा गांव भी.

सम्पर्कः 2898, स्टेट बैंक के सामने, गढ़ा बाजार,
जबलपुर (म.प्र.) 482003
मो. 9826647735

पापा
डॉ. दिवा मेहता

वे अक्सर हमारी ख्वाहिशों पर
उंगली उठाते हैं.
पर वे ही तो अक्सर उनके लिए
हद से गुजर जाते हैं.
वे कभी हमें डांटते हैं
और कभी नहीं मानते हैं.
पर वे ही तो हमारे लिए
जहां भर से लड़ जाते हैं.
वे खत्म होता हुआ टूथपेस्ट
हर सुबह हमारे ब्रश पर लगाते हैं.
पर वे तो हमारी खुशी के लिए
खुद लुट भी जाते हैं.
वे अक्सर हमें अपने
जीने के अंदाज से सताते हैं.
पर वे ही तो अपने अंदाज में
हमें जीना हमें सिखाते हैं.
वे कभी-कभी हमारे ज्ञान और अनुभव का
मजाक उड़ाते हैं.
पर सच है वे आज भी
हर क्षेत्र में सब को हराते हैं.
वे कभी राई का पहाड़ बना कर
रिश्ते गर्माते हैं.
पर कभी हंसी-हंसी में ही
सब को अपना बनाते हैं.
वे हमारे लिए शक्तिपुंज,
लौह-स्तम्भ से खड़े रहते हैं.
पर ये भी सच है वे हमारी खुशी और गम में
आंसू बहते हैं.
वे कितना प्यार हम से करते हैं,
कभी नहीं जताते हैं.
और हम भी तो उन्हें बस मान कर चलते जाते हैं.
हम पास रहकर उन्हें यह कभी नहीं बताते हैं.
पर दूर रह कर वे सच में बहुत याद आते हैं.

सम्पर्कः शुभ रतन, 109-अभयगढ़,
रातानाडा-जोधपुर 342011
diva.mehta@gmail.com


हे मेघा मेरे आंगन में
शिवकुमार कश्यप

हे मेघा मेरे आंगन में
कुछ बूंदें बरसा देना...
पिय की पाती, घर ना आती,
कोई बात ना मन को भाती
मेरी जीवन की बगिया में
कुछ कलियां देना...
जब मेरे आंगन से जाओ
गरज के मुझको तुम बतलाओ
पिय को संदेशा दूंगी मैं
तुम उन तक पहुंचा देना...
रात डंसे नागिन सी काली
मैं व्याकुल बैठी मतवाली
तुम तो मेरी पीर समझकर
जीवन-रस छलका देना...
दिल पर बैठा प्रीतिका पहरा
पिय-पिय बोले रात पपीहरा
समझाना उस निर्मोही को
घर की राह बता देना...
कहना तेरी याद में पागल
जीवन का पी रही हलाहल
इस पागल को गले लगाके
घूंघट-पट सरका देना...

सम्पर्कः 15-बी, पौर्णमी अपार्टमेंट
पांच पाखाड़ी- नामदेव वाड़ी, ठाणे
पिन- 400602, (महाराष्ट्र)

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तलाश

दीपिका जौहर

वो जिसकी तलाश हूं मैं

वो जिसकी आस हूं मैं

निशा के अंधकार में

ढूंढ़ता जो उजास को

वो जिसकी प्रयास हूं मैं

वो जिसकी आभास हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

स्वर्ग से वैभव में भी

ढूंढ़ता जो मन का सुख है

वो जिसकी प्यास हूं मैं

वो जिसकी खास हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

मधुवन की खूबसूरती मैं

ढूंढ़ता जो आलौकिक सौन्दर्य

वो जिसकी आत्मा का सार हूं मैं

वो जिसकी अभिसार हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

नदी के दो किनारों में

ढूंढ़ता जो प्यार को

वो जिसकी एतबार हूं मैं

वो जिसकी इजहार हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

मृत्यु की बेड़ियो में जकड़ा

ढूंढ़ता जो जिन्दगी को

मोह के बन्धन से परे

प्रेम के महायुध्द में लड़ता

वो जिसकी जीत हूं मैं

वो जिसकी हार हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

सम्पर्कः जौहर कम्युनिकेशन, देहरादून रोड, दोइवाला (क्व्प्ॅ।स्।) उतराखंड पिन-248001

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पिता

डॉ. भावना शुक्ल

मेरे लिये पिता

जीवन मूल्य हैं.

मैं उनकी बिटिया

उनके लिये अमूल्य हूं.

पिता संबल हैं, शक्ति हैं

निर्माण की अभिव्यक्ति हैं.

पिता धीर हैं,

गंभीर हैं.

मेरे लिये अधीर हैं.

पिता संस्कारों की खान हैं

मुझमें बसती जान है

मुझे जिंदगी जीना सिखाया.

संघर्षों का सामना

करना सिखाया.

प्रेम से चलाते

परिवार का प्रशासन

हमें सिखाया अनुशासन.

मुझे अपने पिता पर नाज है

वे साहित्य के सरताज हैं.

हैं उनके बहुत से मित्र

नाम है उनका सुमित्र

हमारे लिये वे

भगवान की मूरत हैं

माता-पिता दोनों की

हमें जरूरत है

सम्पर्कः सह संपादक प्राची

डब्ल्यू जेड 21 हरिसिंह पार्क, मुल्तान नगर पश्चिम विहार

नई दिल्ली-110056

मोबाइल- 09278720311

ईमेलः bhavanasharma30@gmail-com

व्यंग्य

एक सड़ी हुई बिल्ली

राधाकृष्ण

हां चारों ओर ईमानदारी, तत्परता और हित-कामनाएं बहुत हैं. पड़ोसियां से भी अच्छे संबंध बनाए जा रहे हैं. आज सवेरे उठकर देखा कि कोई पड़ोसी अपने घर से मरी हुई बिल्ली लाकर मेरे दरवाजे पर डाल गया है. सबसे पहले उसे नौकरानी ने देखा और नाम-भौं सिकोड़ती हुई आकर बोली, 'मैं झाड़ू-बुहारू कर सकती हैं, मगर बिल्ली फेंकने का काम मेरा नहीं हैं.'

पत्नी से पूछने पर भी इस बात की सच्चाई साबित हुई. नौकरानी की ड्यूटी चार्ट में कहीं भी मरी हुई बिल्ली को फेंकने का काम सम्मिलित नहीं था. मरी हुई बिल्ली कौन फेंके? उसकी लाश से बड़ी बुरी बास आ रही थी. मैंने पत्नी से कहा कि क्या हर्ज है, तुम्हीं उठाकर फेंक दो और डिटोल से हाथ धो लो. इस पर वे तमक गयीं और कहने लगीं, 'वाह जी, बड़े आए हैं कहां के हुक्म चलानेवाले! मेरे पिताजी ने मुझे तुम्हारे यहां इसलिए नहीं भेजा है कि मैं सड़ी-गली बिल्ली उठाती फिरूं और फेंकती चलूं. कायस्थ की लड़की हूं, कोई डोमिन नहीं हूं.'

तब मैं स्वयं फेंकने को तैयार हो गया, मगर इस पर भी आपत्ति उठायी गयी. मुझसे बतलाया गया कि मेरी जाति भी कायस्थ ही है. अतएव मुझे डोम का काम करने की अनुमति नहीं मिल सकती. इसके अलावा मैं एक संपादक भी हूं. संपादक को अधिकार है कि वह किसी गरीब लेखक की रचना को उठाकर फेंक दे, लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं देखा गया है कि संपादक मरी हुई बिल्ली को भी उठाकर फेंक रहा है. पत्रकार कला के इतिहास में भी इस प्रकार का उल्लेख नहीं मिलता. आप गांधी जी भी नहीं हैं कि आपका फोटो खींचा जाएगा और अखबारों में छपेगा कि महाशयजी मरी हुई बिल्ली फेंककर एक महान आदर्श स्थापित कर रहे हैं. अतएव आप अपना काम कीजिए और जिसका काम बिल्ली फेंकने का है, उसे मरी हुई बिल्ली फेंकने दीजिए.

मगर इस बात की चिंता तो करनी ही होगी कि मरी हुई बिल्ली की फेंकने का काम किसका है? लोगों ने बतालाया कि यह साफ-साफ म्युनिसिपैलिटी का काम है. म्युनिसिपैलिटी में खबर कर दीजिए. वहां से कोई आएगा और मरी हुई बिल्ली को उठाकर ले जाएगा. तब म्युनिसिपैलिटी में फोन किया. उधर से उत्तर आया कि आपके आदेश पर हम बिल्ली नहीं उठा सकते. इसके लिए चेयरमैन का आदेश प्राप्त करना होगा. आप चैयरमैन से अनुरोध करें.

चेयरमैन को फोन किया तो उधर से बोले -''नौस्ते जी....आप बिल्ली जी...जी, मरी हुई बिल्ली...अजी भाई जी, मरी हुई बिल्ली दुर्गन्धि नहीं देगी तो क्या सुगंधि फेंकेगी...जी, जहां तक उसे फेंकने का सवाल है उसके विषय में विचार करना होगा...आप जरा आ जाइए तो मैं आपसे बातें कर लूं...जी, मैं म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर में तो कभी जाता नहीं...अपने पास कोटा, परमिट, लाइसेंस के बहुत सारे काम हैं...सो दफ्तर ही मेरे यहां आ जाता है...आप आ जाइए तो बात हो...''

तब पिचहतर पैसे खर्च हुए और मैं चेयरमैन के यहां पहुंचा. उन्होंने कहा, ''अच्छा जी, आप आ गए. मैंने भी सोचा था बिल्ली की गंध के कारण आप तुरंत आ जाएंगे. अभी ही तो म्नुनिसिपैलिटी के बड़े बाबू यहां से गए हैं. वे कह रहे थे कि आपके मकान से बिल्ली उठाने की ड्यूटी मेरी नहीं है.''

मैं आसमान से टपक पड़ा. चकित होकर पूछा, ''ऐसा क्यों.''

''आपका मामला टेक्निकल मामला है, साहब!'' चेयरमैन ने कहा, ''आपको याद होगा कि जब आपने अपना मकान बनवाने का नक्शा म्युनिसिपैलिटी में दाखिल किया था, तो इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट ने आपत्ति उठायी कि मकान का नक्शा पास करने का और अनुमति देने का अधिकार चेयरमैन को नहीं, इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट को है. मैंने हजार कहा, मगर मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई. आपको मकान बनवाने की अनुमति इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट से ही प्राप्त हुई थी. अब आपके मकान में कोई मरी हुई बिल्ली फेंक देता है तो मैं आपके लिए सिरदर्द क्यों लूं? आप इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट में जाइए. मैं कोई सरकारी मुलाजिम तो हूं नहीं, जो किसी का मुंह देखकर काम करूं. पब्लिक का आदमी हूं और खरा काम जानता हूं. जिसने आपको मकान बनवाने की अनुमति दी है, उसी से बिल्ली फेंकने के लिए कहिए.''

मैंने कहा, ''मगर होल्ंिडग-टैक्स तो मैं आपको देता हूं.''

''वह म्युनिसिपल-टैक्स है, जनाब!'' चेयरमैन ने कहा, ''वह तो आपको हर हालत में देना ही होगा. मगर जब मैंने आपको मकान बनाने की अनुमति नहीं दी, तो मैं उस मकान से बिल्ली भी नहीं फेंक सकता. साफ बात है. आप इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट के पास जाइए. बिल्ली वहीं फेकेंगे.''

टका-सा जवाब पाकर मैं इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट में पहुंचा. वहां कार्यालय के लोग बड़े प्रेम से मिले और मीठी-मीठी बातें कीं. जब उन्हें मालूम हुआ कि मैं बिल्ली फेंकने का अनुरोध लेकर आया हूं तो बिदक गए और रुखाई से पेश आने लगे. बोले, ''यह सब काम हमारा नहीं. हम लोग मकान बनाने की अनुमति देते हैं, मकान का नक्शा पास करते हैं, मगर बिल्ली नहीं फेंकते. यह म्युनिसिपैलिटी का काम है. आप वहीं जाइए.''

मैंने कहा, ''मैं म्युनिसिपैलिटी से ही आ रहा हूं. चेयरमैन ने मुझे बतलाया है कि मेरे घर से बिल्ली को इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट ही फेंकेगा.''

''ऐसा क्यों?''

''ऐसा इसलिए कि मकान बनाने की अनुमति मुझे चेयरमैन ने नहीं दी, मुझे आप लोगों ने मकान बनाने की अनुमति दी है. चेयरमैन का कहना है कि जिसने मकान बनाने की अनुमति दी है, वही आपके मकान से मरी हुई बिल्ली फेंकेगा.''

''अजीब बात हैं!'' इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट के बड़े बाबू ने कहा, ''अगर ऐसी बात है तो आप हमारे इंजीनियर साहब से बातें कर लें. मगर जहां तक मेरा ख्याल है, वे आपकी कोई मदद नहीं कर सकेंगे, क्योंकि हम लोगों के पास मरी हुई बिल्ली फेंकने का कोई इन्तजाम नहीं है.''

तब मैं वहां से उठ गया और उधर जाकर देखने लगा जिस ओर इंजीनियर लोग बैठते थे. एक मकानों के इंजीनियर थे, एक नालियों के इंजीनियर थे, एक सेप्टिक टैंकवाले पाखानों के इंजीनियर थे, एक पार्कों के इंजीनियर थे, एक सड़कों और गलियों के इंजीनियर थे और सब के परली ओर चीफ इंजीनियर बैठते थे. मेरे लिए यह स्वाभाविक था कि मैं मकानों में इंजीनियरों से मिलता. वे एक गंजे सिरवाले आदमी थे और बड़ी मोटी चुरुट मुंह में डाले हुए बैठे थे. मुझे देखकर वे बड़ी शालीनता से मुस्कराये और मेरे आने का कारण पूछा. मैंने उन्हें अपना बिल्ली-वृत्तान्त बतलाया और कहा कि कृपा करके उस सड़ी हुई बिल्ली को फेंकवा दें. मेरी बात उन्होंने पूरी तरह सुनी भी नहीं और आगबबूला हो गए. आवेश में आकर उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेज का थपथपाना और सिर हिलाना शुरू किया. आंखें तरेरकर कहने लगे, ''भला देखिए...देखिए...तमाशा...यह भी कोई बात है. बिल्ली फिंकवाने के लिए आ गए हैं...मेरा काम बिल्ली फेंकने का है? मेरा...मेरा...इसी की ट्रेनिंग के लिए मुझे अमेरिका भेजा गया था कि मैं आपके मकान की मरी हुई बिल्ली को उठाकर फेंक दूं...वाह जी, क्या कहने हैं!...अजी साहब, आप आदमी हैं या पजामा? आपका दिमाग सही है या उसमें कोई कसर है?...मुझसे कहने आ गए कि मैं आपके मकान से मरी हुई बिल्ली फेंक दूं?''

मैंने कहा, ''आपसे फेंकने के लिए कौन कहता है? मैं तो आपके पास यही अनुरोध लेकर आया हूं कि यदि आपके पास इस बात का इंतजाम हो और आपके द्वारा संभव हो, तो कृपा करके बिल्ली फेंकने का आदेश दे दें.''

उन्होंने तेज आवाज में कहा, ''आप मेरा दिमाग न चाटिए, यहां से जाइए. यह काम म्युनिसिपैलिटी का है. वहां जाकर चेयरमैन से मिलिए.''

''मिल चुका हूं.''

''तो फिर दुबारा जाकर मिलिए. उनसे जाकर कह दीजिए कि यह काम इन्प्रूवमेंट-ट्रस्ट का नहीं. आप तो चेयरमैनी झाड़ेंगे और अपना काम भी ठीक से नहीं करेंगे.''

''चेयरमैन ने इंकार कर दिया है, इसीलिए मैं आपके पास आया हूं. वे कहते हैं कि जो मकान बनवाने की अनुमति देता है उसी का काम है कि वह बिल्ली को भी फेंके.''

''उन्हें जाकर सुना दीजिए कि इम्प्रूवमेंट-ट्रस्टवाले भी इंकार कर रहे हैं. देखना है कि वे क्या कर लेते है.''

''मगर इससे मेरा क्या लाभ होगा?''

''मैं नहीं जानता साहब, मैं आपको भी नहीं जानता, आपकी मरी हुई बिल्ली को भी नहीं जानता. आपकी जहां खुशी हो वहां जाइए, जिससे इच्छा हो उससे मिलिए.''

''क्या मैं आपके चीफ इंजीनियर से मिल लूं.''

मेरी नाक में उस मरी हुई बिल्ली की बदबू आने लगी. मैंने सोचा कि वह आदमी तो उस मरी हुई बिल्ली से भी ज्यादा मरा हुआ और बदबूदार है. तब मैं चीफ इंजीनियर के पास पहुंचा. वे काला कोट पहने चुपचाप बैठे हुए थे. चेहरे पर कोई भाव नहीं. मालूम होता था कि समस्त कामनाओं और मनोभावनाओं को पीकर निर्विकार हो गए हैं. मैं कहता जा रहा था और वे सुनते जा रहे थे. मालूम होता था जैसे वे पत्थर के बने कोई देवता हैं जिनके सामने मैं मरी हुई बिल्ली के लिए स्तुति कर रहा हूं. उनका सिर भी नहीं हिलता था, उनकी पलकें भी नहीं झपकती थीं. काले पत्थर की मूर्ति की तरह वे चुपचाप सुन रहे थे. मेरी सारी बात सुनकर उन्होंने निर्लिप्त भाव से कहा, ''महाशयजी, अब आप ही बतलाइए कि मैं इस प्रसंग में आपकी क्या मदद कर सकता हूं?''

मैंने सीधी बात की, ''मेरे घर से बिल्ली उठाकर फेंक दी जाए बस!''

उन्होंने कहा, ''मुझे खेद है कि इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट आपकी यह सेवा करने में असमर्थ हैं.''

मैं और भी कुछ कहने जा रहा था कि उन्होंने हाथ जोड़कर मुझे प्रणाम किया और दाहिनी ओर पड़ी हुई फाइलों की ओर सिर घुमाकर देखा. स्पष्ट था कि मुझसे जाने के लिए कह दिया गया है. फाइलों की ओर देखते हुए मानों उन्होंने बताया कि मेरे पास और भी बहुत काम हैं. मैं उठ गया और अभिवादन करता हुआ जाने लगा. मुझे वहां भी मरी हुई बिल्ली की बदबू-जैसी मालूम हुई. जाते-जाते मैं रुक गया और पूछा, ''इस ट्रस्ट के चेयरमैन कौन हैं?''

उन्होंने उसी प्रकार निर्विकार चित्त से कहा, ''यहां के जिलाधीश महोदय से मिल लीजिए. वही हमारे चेयरमैन हैं.''

मैं मरी हुई बिल्ली से और उसकी बदबू से निस्तार पाना चाहता था. सोचा कि चलो, उनसे भी मिल लिया जाए. जिलाधीश महोदय का कार्यालय वहां से निकट ही था. वहां पहुंचने पर पता चला कि जिलाधीश महोदय की तबीयत कुछ ऐसी-वैसी है, वे बंगले पर ही काम रहे है. आप वहीं चले जाइए. यह सूचना मुझे यहां के चपरासी ने दी और मेरी ओर इस भाव से देखा मानो उसने कोई बहुत बड़ी खबर सुनाई है, जिसके द्वारा मेरा महान उपकार हो जाएगा. और इसके लिए उस चपरासी को कुछ पुरस्कार मिलना नितान्त उचित है.

तब जिलाधीश के बंगले पर पहुंचने में आधा घंटा लग गया. उसके बाद प्रतीक्षा करने में इतनी देर हो गयी कि मैं प्रायः भूलने लगा कि मैं यहां किस प्रयोजन से आया हूं. बड़ी देर के बाद उन्होंने साक्षात्कार के लिए बुलाया. वे पैंतीस-सैंतीस साल के सुदर्शन आई.ए.एस. थे. चेहरे पर हल्की-सी तेजस्विता और हल्की-सी पाउडर की परत थी. उनके शरीर की ओर से किसी अपरिचित सेंट की भीनी-भीनी खुशबू भी आ रही थी. ऐसी सज-धज के साथ बैठे हुए थे मानो शासन-सेवा में नियुक्त न होकर हनीमून के लिए प्रस्तुत हैं. उन्होंने सिर उठाकर मेरी ओर देखा और मुसकराने की असफल चेष्टा की.

''कहिए.'' उन्होंने इस तरह कहा मानों वे बलिदान होने के लिए प्रस्तुत हैं, मानों निश्चय ही उनका बलिदान होगा और न जाने कितनी देर तक व्यर्थ ही वह बलिकर्म चलता रहेगा.

तब मैं उनके सम्मुख अपना बिल्ली-वृत्तान्त सुनाने लगा. वे सुन रहे थे, कभी अपना सिर खुजला रहे थे और कभी विचित्र दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे. एक बार तो ऐसा लगा जैसे उठकर वे वहां से भाग जाएंगे. उन्हें अपने आपको संयत करना कठिन हो रहा था. फिर भी उन्होंने आदि से अंत तक मेरी बात सुनी. उसके बाद उन्होंने निष्कृति की सांस ली और कहने लगे, ''चेयरमैन साहब को देखिए. जनता के प्रतिनिधियों की ओर से ऐसे-ऐसे अड़ंगे आते हैं कि जी झल्ला उठता है. मुझे दुःख है कि आपको खामख्वाह सताया जा रहा है. उस मरी हुई बिल्ली को फेंकना म्युनिसिपैलिटी का ही काम है.''

मैंने कहा, ''यही बात जरा उन्हें बुलाकर समझा दें या टेलीफोन पर कह दें.''

उनका हाथ टेलीफोन की ओर बढ़ा, फिर रुक गया. बोले, ''यह बात चेयरमैन से ट्रस्ट के इंजीनियर कहते तो दूसरी बात होती. मेरा कहना ठीक नहीं होगा. चेयरमैन अपने को समझते हैं तो मैं भी क्यों न अपने को लगाऊं. मैं उनसे कुछ नहीं कहूंगा. यह टेक्निकल मामला है और इसे नियमपूर्वक ही हल होना चाहिए. आप एक बार लोकल-सेल्फ मिनिस्टर से मिलकर कह दीजिए.''

तब लोकल-सेल्फ मिनिस्टर...

एक घंटे के बाद लोकल-सेल्फ मिनिस्टर पान चबाते हुए मेरी ओर कुतूहल से देख रहे थे और मैं अपना बिल्ली-वृतान्त उनके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा था. उनके चेचक के चिह्नवाले खुरदरे चेहरे पर हास्य, करुणा, वीर, रौद्र आदि भाव एक-एक करके प्रकट होकर विलुप्त होते जा रहे थे.

जब मेरी बात समाप्त हो गयी तब उनके चेहरे पर एक ऐसा भाव दिखलाई दिया जिससे मैं नितान्त अपरिचित था. ऐसा लगा जैसे उन्हें कुछ मिनटों तक लोकल-सेल्फ मिनिस्टर की गद्दी से उतार दिया गया था. और अब उन्हें फिर से यथास्थान स्थापित कर दिया गया हो. उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मेरी ओर देखा और कहा, ''मुझे आपके लिए दुःख है. मगर मैं कर ही क्या सकता हूं. चेयरमैन दूसरे दल के आदमी हैं. अगर अपने आदमी होते तो कर देता. और एक बात आप जानते हैं? वह चैयरमैन कायस्थ हैं. ये कायस्थ लोग...खैर, नहीं.''

अब मैं उनसे यह बात कैसे कहूं कि मैं भी कायस्थ हूं और मेरे साथ ही ऐसी बात उठ आयी है. मगर मैं चुप रहा और उनकी बात सुनता रहा. वे कह रहे थे. ''आप सोचते होंगे कि यह लोकल-सेल्फ का मिनिस्टर है. यह चेयरमैन को कुछ भी कह सकता है. मगर ऐसी बात नहीं. अब युग बहुत बदल गया. हर बात के लिए सवाल होते हैं, हर बात के लिए विधानसभा में जवाब देना पड़ता है. हम मंत्रियों के समान दयनीय संसार में कोई नहीं. मैं चेयरमैन को कुछ भी नहीं कह सकता. सिर्फ उनके लिए सहायता की रकम मंजूर कर सकता हूं और दे सकता हूं. आप ही कहिए कि इसके अलावा मेरा अधिकार क्या है?''

मंत्री बड़े दयनीय और अशक्त होते हैं भगवान मुझे भी वैसा ही दयनीय और अशक्त बना देता तो मुझे कितनी प्रसन्नता होती. मुझे यह सुनकर भी आश्चर्य हुआ कि ये म्युनिसिपैलिटी को रुपये दे सकते हैं, लेकिन उनसे उनका काम करने के लिए नहीं कह सकते. मैं इस संबंध में सवाल करने वाला ही था कि उन्होंने कहा, ''इसके अलावा बिल्ली फेंकनेवाली बात मेरे पोर्टफोलियों में आती भी नहीं. यह विषय पब्लिक-हेल्थ से संबंध रखता है. आप जन-स्वास्थ्य मंत्री से मिलकर बिल्लीवाली बात कहें. चेयरमैन खुद भीगी बिल्ली बन जाएंगे और आपके घर की बिल्ली को उठवाकर तुरंत फिंकवा देंगे.''

अब जाकर बात बनी. जन-स्वास्थ्य मंत्री महोदय के पास पहुंचा. मालूम हुआ कि उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख्याल भी जनता के स्वास्थ्य के समान ही रहता है. अभी डॉज पर चढ़कर टहलने के लिए निकले हैं. थोड़ी देर के बाद आ जाएंगे तो बातें कर लीजिएगा. तब मैं थोड़ी देर ठहरने के बदले बहुत देर ठहर गया. उसके बाद जन-स्वास्थ्य मंत्री के दर्शन हुए. जन-स्वास्थ्य मंत्री का स्वास्थ्य अद्भुत था. वे अपने शरीर के द्वारा, तोंद के द्वारा, हाथ और पैर के द्वारा, एक विशाल और प्रकाण्ड स्वास्थ्य का प्रदर्शन कर रहे थे. कम से कम तीन क्विंटल उनका वजन होगा. ऐसे भारी-भरकम स्वास्थ्य-मंत्री को देखकर मेरा हृदय पुलकित हो गया और उनसे मैंने अपना बिल्ली-वृत्तान्त बतलाना शुरू कर दिया. सुनते-सुनते उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और खर्राटा लेने लगे. यह देखकर मैंने बिल्ली-वृत्तान्त बंद कर दिया और चुप ही रहा. तब उन्होंने अपनी आंखें बंद किए हुए ही कहा, ''आप कहते जाइए, मैं सब सुन रहा हूं.''

उनकी ऐसी तत्परता और जन-स्वाथ्य के संबंध में ऐसी करुणा देखकर मेरा मन संतुष्ट हो गया और मैं मरी हुई बिल्ली की सारी कहानी सुना गया. उसके बाद देखता हूं कि वे अचेत के समान आरामकुर्सी पर पड़े हुए हैं और खर्राटे ले रहे हैं.

सुविधा के लिए उन्होंने अपना मुंह इस तरह खोल दिया है मानों वे मेरी बात को कान से नहीं, अपने मुंह से ही सुन रहे हैं. मगर जब मेरी बात का उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया तब मैंने सोचा कि ये नींद में गाफिल हो गए. मैंने डरते-डरते कहा, ''मेरी बात का कोई उत्तर नहीं मिला?''

तब उन्होंने बड़े कष्ट से अपनी आंखें खोलीं. मेरी ओर कठोर दृष्टि से देखते हुए कहा, ''जनता के स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ करने का अधिकार चेयरमैन को नहीं है.''

मैंने उनका यह वक्तव्य सुना और सोचने लगा कि इसके बाद क्या कहा जाने वाला है. मगर यह वक्तव्य किसी इशारे के समान था जिसे सुनते ही उनके प्राइवेट सेक्रेटरी तुरंत वहां प्रकट हो गये. वे इस तरह वहां पहुंचे मानों वक्तव्य के द्वारा उन्हें यहां आने के लिए कहा गया तो और वे जानते हों कि उन्हें आगे क्या करना है. एक बार उन्होंने टेलीफोन की ओर देखा, फिर मंत्रीजी की ओर देखने लगे. मंत्रीजी ने कहा चेयरमैन को फोन करके कहो कि नगीना बाबू के घर में जो मरी हुई बिल्ली पड़ी है उसे उठाकर फौरन फेंकवा दें. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे और शहर में हैजा या प्लेग फैल गया तो वे उसके जिम्मेवार होंगे?

प्राइवेट सेक्रेटरी ने टेलीफोन कर दिया. उधर से भी कुछ जवाब आया जिसे मैं सुन नहीं सका. टेलीफोन की बातचीत समाप्त करके प्राइवेट सेक्रेटरी ने कहा, ''चेयरमैन का कहना है कि इनके मकान से बिल्ली फेंकने का मामला टेक्निकल मामला है. वे कहते हैं कि इस बात को कानूनी रूप से ही हल किया जा सकता है.''

मंत्रीजी ने पूछा, ''वे क्या कहते हैं?''

प्राइवेट सेक्रेटरी बोले, ''वे कह रहे हैं कि वे बिल्ली नहीं फेंकेगे. इस बात में उन्हें खतरा महसूस हो रहा है.''

''उन्हें अभी यहां बुला भेजिए.''

प्रााइवेट सेक्रेटरी ने कहा, ''वे खुद ही यहां आ रहे हैं.''

मंत्रीजी ने मेरी और देखकर कहा, ''चेयरमैन यहीं आ रहे हैं. मैं अभी उनसे बिल्ली फेंकने के लिए कह देता हूं तब तक यहीं आराम करें.''

यह कहकर वे स्वयं आराम करने लगे. आरामकुर्सी पर टांगें फैला दीं, आंखें बंद कीं और तत्काल खर्राटा लेने लगे. जब चैयरमैन वहां मुस्कराते हुए पहुंचे तो प्राइवेट सेक्रेटरी ने उन्हें जगाया. मंत्रीजी ने आंखें खोलते ही पूछा, ''चेयरमैन साहब, यह मैं क्या सुन रहा हू? इनके घर पर मरी हुई बिल्ली पड़ी हुई है और आप उसे उठाने से इंकार कर रहे हैं? मान लीजिए कि अगर हैजा फैल गया तो क्या होगा?''

चेयरमैन ने कहा, ''हैजे की बात पीछे होगी, पहले इस बात का फैसला कर लिया जाए कि इनके मकान से मैं बिल्ली उठवा सकता हूं या नहीं. इनके मकान का नक्शा मैंने पास नहीं किया है, इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट ने पास किया. अब मैं उस मकान से बिल्ली फेंकनेवाला कौन होता हूं? आप ही कहिए? किस न्याय से मैं इनके यहां की बिल्ली उठवाऊं?''

मंत्री महोदय कुछ कहने ही जा रहे थे कि चेयरमैन ने फिर कहा, ''मान लीजिए कि इनके घर में कोई मरी हुई बिल्ली फेंक गया है. जब इनके घर में बिल्ली है, तो अब वह इनकी संपत्ति है जिस पर इनका पूरा अधिकार है. अब मान लीजिए कि मैं इनके यहां अपने आदमियों को बिल्ली उठवाने के लिए भेजता हूं और ये हम पर ट्रेसपास का मुकदमा चला देते हैं, तब क्या होगा? ऐसी अवस्था में आप मेरी क्या मदद कर सकते हैं? मैं आप लोगों से बाहर नहीं हूं मगर कायदे के साथ काम होना चाहिए. यह बात आप भी पंसद करेंगे. इनके यहां से बिल्ली फिंकवाने के लिए मुझे पुलिस-फोर्स चाहिए. पुलिस की एक टुकड़ी लेकर हमारे आदमी जायेंगे और इनके यहां से मरी हुई बिल्ली निकालकर फेंक देंगे.

मंत्रीजी ने कहा, ''पुलिस के अधिकारियों से आप पांच आदमियों का फोर्स मांग लें.''

चेयरमैन ने कहा, ''मैं पुलिस के पास प्रार्थना करने के लिए क्यों जाऊं. आप मुझे पुलिस-फोर्स दें तो मैं अभी उनके यहां से बिल्ली को हटवा दूं.''

जन-स्वाथ्य मंत्री ने कहा, ''मगर फोर्स तो पुलिस मंत्री ही दे सकते हैं. नगीना बाबू आप पुलिस मंत्री से मिलकर पांच सिपाहियों की टुकड़ी एक जमादार के साथ मांग ले अैर उसके बाद चेयरमैन साहब से मिलिए. मगर ठहरिए पुलिस मंत्री अभी टूर में गए हैं वे चार-पांच दिन के बाद आएंगे, तब तक...''

तब तक मैं अपनी सारी उम्मीदें खो चुका था. मैंने उत्साहपूर्वक कहा, ''कोई बात नहीं हुजूर, आप आराम करें. मैं बिल्ली का इंतजाम खुद किए लेता हूं.''

और मैं वहां से सीधे घर आ गया. मुझे वहां बिल्ली तो दिखलाई नहीं दी, परन्तु अभी तक उसकी गंध आ रही थी. मैंने पत्नी से पूछा, ''मरी हुई बिल्ली की गंध अभी तक क्यों आ रही है?''

पत्नी ने कहा, ''तुम यहां से गए, उसके तुरंत बाद मैंने दस पैसे देकर एक छोकरे से बिल्ली फेंकवा दी. अब गंध कहां?''

मगर मैं मरी हुई बिल्ली की गंध महसूस करता ही रहा. आज उस बात को कई सप्ताह हो गये हैं, फिर भी मरी हुई बिल्ली की गंध मेरी नाक में आती ही रहती है. घर, बाहरजहां कहीं भी मैं जाता हूं, मेरी नाक में, मरी हुई बिल्ली की गंध आती रहती है. सड़कों पर, गली में, भीड़ में, एकान्त में, म्युनिसिपैलिटी में, सरकारी दफ्तरों में, सभा में समिति मेंसब जगह मुझे मरी हुई बिल्ली की गंध मिलती रहती है. जहां शासक और अधिकारी दिखलाई देते हैं वहां मुझसे नाक नहीं दी जाती. वहां की गंध ऐसे असहनीय मालूम होने लगती है कि जैसे मेरा गला घुट जायेगा, जैसे मैं बेहोश होकर गिर जाऊंगा.

पता नहीं कि इस सड़ी हुई बिल्ली की गंध से मुझे कब निस्तार मिलेगा.

हास्य-व्यंग्य

धारावाहिक उपन्यास

एक गधे की वापसी

कृश्न चन्दर

तीसरी किस्तः

सम्मिलित होना महालक्ष्मी की रेस में घोड़ों के साथ, और मजाक करना देखकर गधे को लोगों का, और बयान घुड़दौड़ के आर्श्चयजनक परिणाम का...

रुस्तम सेठ घनी मूंछों वाले आदमी और डॉक्टर को एक ओर ले गया. दोनों में देर तक कुछ खुसर-पुसर होती रही. उसके पश्चात् डॉक्टर और घनी मूंछों वाला आदमी दोनों कहीं चले गए और सेठ खेमजी को लेकर खुशी से मुस्कराता हुआ मेरे पास आया और बोला-

''सब ठीक हो गया है. कल से तुमको महालक्ष्मी के रेसकोर्स अस्तबल में भेज दिया जाएगा.''

''महालक्ष्मी के रेसकोर्स में! क्यों?''

''वहां एक मास पश्चात् तुम्हें क्रिसमस कपवाली रेस की प्रतियोगिता में सम्मिलित किया जाएगा.''

''मैं...?...एक गधा होकर घोड़ों की रेस में भाग लूंगा?''

मैंने आश्चर्य से कहा, ''आप लोगों की अक्ल तो ठीक है? आज तक कहीं कोई गधा किसी घोड़े से तेज दौड़ा है?''

रुस्तम सेठ ने मुस्कराकर कहा, ''तुम्हारा पीछा किया था और तुम पुलिस की जीप और दूसरी तीव्र गति वाली गाड़ियों से भी तेज भागते हुए माहिम से वर्ली के बीच तक चले आए थे. यदि तुम उस गति की तीन-चौथाई गति से भी रेस में दौड़े तो तुम सब घोड़ों को पीछे छोड़ जाओगे.''

मैंने आश्चर्य से कहा, ''सेठ, तो जिस दिन तुमने मेरी जान बचाई थी क्या उसी दिन तुमने इसका अनुमान लगा लिया था!''

सेठ हंसकर बोला, ''अनुमान मैंने पहले लगा लिया था, जान बाद में बचाई थी.''

''तो यह बात थी! इसलिए सेठ ने मेरी जान बचाई थी! मैं एक गधा...! घोड़ों की रेस में स्मगल किया जाऊंगा. अरे मारिया, जरा सोचो तो, यह स्मगलिंग कहां-कहां नहीं है!'' मैंने कुछ उदास और परेशान होकर मारिया से कहा, ''मेरा जी नहीं चाहता कि मैं इस रेस में भाग लूं.''

''सेठ ने तुम्हारी जान बचाई है. उसने तुम्हारे इलाज पर हजारों रुपये व्यय किए हैं.'' मारिया ने प्रश्न किया, ''क्या इतने बड़े अहसान करने वाले का तुम पर कोई अधिकार नहीं है! क्या तुम उनके अहसान का बदला नहीं चुकाओगे?''

''किन्तु इसका क्या भरोसा है कि मैं जरूर यह रेस जीत जाऊंगा. जिस स्पीड की सेठ बात करते हैं, उस समय की बात कुछ और थी. उस समय मेरे लिए जीवन और मृत्यु का प्रश्न था. ऐसे अवसर पर तो गधा भी एक घोड़े से तेज भाग सकता है...नहीं मारिया, मैं रेस में भाग नहीं लूंगा.''

''अच्छी तरह सोच लो,'' मारिया बोली, ''इतिहास में ऐसी घटना कभी घटित नहीं हुई, जब गधा घोड़ों की रेस में शामिल हुआ हो. तुम पहले गधे होगे! अपनी जाति के प्रथम प्रतिनिधि!!'' फिर कुछ रुककर बोली, ''तुम यदि इस रेस में शामिल नहीं होगे तो मारिया बेचारी की रोटी समाप्त हो जाएगी.''

''तुम्हारी रोटी?'' मैंने आश्चर्य से पूछा.

''तो तुम क्या समझते हो? सेठ ने मुझे अब तक कोई नौकर रखा हुआ है?'' मारिया मेरी गर्दन पर हाथ रखकर बोली, ''डियर डंकी, क्या तुम मेरे लिए रेस में भाग नहीं ले सकते?''

''तुम्हारे लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकता हूं.'' मैंने निर्णयात्मक स्वर में कहा, ''यदि तुम्हारा मामला बीच में है तो समझ लो कि यह गधा इस रेस में अवश्य दौड़ेगा! न केवल दौड़ेगा, बल्कि रेस जीतने के लिए जान की बाजी भी लगा देगा!''

''डार्लिंग...'' मारिया ने खुश होकर मेरी गर्दन पर एक चुंबन लिया, ''मुझे तुमसे यही आशा थी?''

फिर रेस का दिन आ गया. कुछ समय पहले मुझे महालक्ष्मी के अस्तबल में भेज दिया गया था. किंतु भेद खुलने के भय से मुझे दूसरों घोड़ों के पृथक रखा गया था और किसी फोटोग्राफर को फोटो लेने की अनुमति न दी गई थी. रेस से कई घंटे पहले मारिया ने मुझे डटकर ठर्रा पिलाया और एक डॉक्टर ने मुझे एक इंजेक्शन दिया. मेरे शरीर में तीर की-सी सनसनाहट महसूस होने लगी.

रेसकोर्स के स्टैण्ड हजारों खिलाड़ियों से भरे हुए थे. जब लोगों ने मुझे देखा तो आश्चर्य से उनकी चीखें निकल गईं और दर्शकों के झुंड के झुंड ठट्ठा मारकर हंसने लगे. वे सब लोग मुझ पर हंस रहे थे.

मारे क्रोध के मेरे मुंह से झाग निकलने लगे. मैंने दांत पीसे. किंतु चुप रहा. ऑनर्स-गैलरी में मारिया सेठ रुस्तम के पास खड़ी थी और अपना गुलाबी रूमाल हिला-हिलाकर मेरा साहस बढ़ा रही थी.

दर्शकों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप मैं कुछ खिन्नमन हो गया था. किंतु मारिया को देखते ही मेरा दिल निश्चय के बल से भर गया और मैं रेस के घोड़ों की पंक्ति में सबसे अंत में खड़ा हो गया.

रेस के आरंभ होते समय भी सबसे अंत में था.

रेस के पहले चक्कर में भी सबसे अंत में था. जिधर-जिधर से मैं गुजरता गया, दर्शक मुझ पर हंसते थे.

'अरे यह गधा है गधा! इस इस्पानवी घोड़े से तो गधे भी तेज दौड़ते होंगे!''

किसी भी दर्शक ने मुझ पर एक रुपया भी लगाने का साहस न किया था. मारिया का चेहरा उड़ा हुआ था और रुस्तम सेठ का चेहरा पीला पड़ गया था.

मारिया के चेहरे को देखकर मेरे मन में जोश और उत्साह की एक लहर-सी उठी. मैंने दांत पीसकर एक ऐसी चौकड़ी भरी कि आधे फर्लांग में तीन घोड़ों से आगे निकल गया. फिर चौथे घोड़े से! फिर पांचवें घोड़े से! फिर छठें घोड़े से! फिर सातवें घोड़े से!

''बक अप गोल्डन स्टार!'' मारिया अत्यन्त प्रसन्नता से चिल्लाई.

सारे स्टैण्ड में केवल उसकी आवाज गूंजी, क्योंकि और किसी दर्शक ने मुझ पर दांव नहीं लगाया था. सब आश्चर्य से मुंह खोले खड़े थे.

अब मेरे आगे केवल दो घोड़े थे और विनिंट पोस्ट केवल एक फर्लांग की दूरी पर था.

''बक अप 'सुबह का तारा'!''

हजारों दर्शक 'सुबह का तारा' के लिए चिल्लाए, जो हम सबसे आगे था, जिस पर हजारों दर्शकों ने दांव लगाया था.

''बक अप 'माहपारा'!''

दूसरे दर्शकों ने 'माहपारा' के पक्ष में पुकारा, क्योंकि उन्होंने उस पर दांव लगाए थे और जिसका इस समय नंबर दो था.

''बक अप माई डार्लिंग गोल्डन स्टार!'' मारिया और जोर से चिल्लाई और उसकी आवाज सुनते ही मैं आंखें बंद करके अपने शरीर की पूरी शक्ति से दौड़ा और एक तीर की भांति सनसनाता हुआ, दोनों घोड़ों को पचास गज पीछे छोड़ता हुआ विनिंग पोस्ट, से आगे निकल गया.

बंबई रेसकोर्स के इतिहास में ऐसी घटना कभी नहीं घटी थी. 'गोल्डन स्टार' ने एक पर नब्बे का भाव दिया था. टिकट केवल 'गोल्डन स्टार' पर लगाए गए जो सबके सब रुस्तम सेठ के अपने आदमियों ने खरीदे थे. मारिया ने मुझ पर दो सौ रुपये लगाए थे, उसे अट्ठारह हजार मिले.

रुस्तम सेठ ने विभिन्न 'बुकियों' के हाथ भारी रकमें लगाई थीं. कुछ दूसरे घोड़ों पर भी दांव लगाए थे. हार-जीत सब कट-कटाकर उसने जो अनुमान लगाया तो उसे पता लगा कि उसने 'गोल्डन स्टार' पर दांव लगाने में कोई गलती नहीं की. दो 'बुकी' अवश्य फेल हो गए. किंतु सेठ ने ढाई लाख रुपये एक रेस से ही समेट लिए.

गोल्डन स्टार!

रेस समाप्त होने के पश्चात् मुझे कुछ ही घंटों में महालक्ष्मी के अस्तबल से सेठ के अस्तबल में भेज दिया गया. सेठ ने खूब-खूब मेरी पीठ ठोकी. मारिया ने मुझे प्यार किया. खेमजी ने, जो मेरा 'जाकी' था, मुझे गर्दन पर कई बार थपथपाया.

रात को मारिया ने मुझे अपने हाथ से केवड़े से सुगंधित हरी-हरी घास खिलाई और मुझे असली स्कॉच ह्निसकी पहली बार चखने को मिली. मैं प्रसन्नता के प्रवाह में दोनों बोतलें समाप्त कर गया. स्कॉच पीते ही मुझे गहरी नींद आ गई और मैं खाट की मसहरी पर लंबी तान लेकर सो गया.

आधी रात के समय अचानक मेरी आंखें खुल गईं. मेरे अस्तबल के बाहर कुछ खुसर-फुसर हो रही थी. मैंने लकड़ी की दीवार से कान लगा दिया.

सेठ की आवाज आई, ''इस मामले की गहरी खोज होगी. दूसरी रेस का 'रिस्क' लेना ठीक न होगा.''

खेमजी 'जाकी' बोला, ''पर सेठ 'गोल्डन स्टार' ने तो कमाल कर दिया आज!''

''तुम नहीं समझते हो,'' सेठ बोला ''हम 'रिस्क' नहीं ले सकते. जब छानबीन शुरू होगी तो यह अवश्य पता चल जाएगा कि हमने एक गधे को घोड़ों की रेस में शामिल किया है. उस स्थिति में न केवल मेरे अस्तबल को रेसकोर्स से बाहर कर दिया जाएगा, बल्कि हो सकता है कि मुझे जेल भी हो जाए. 'गोल्डन स्टार' को खत्म कर देना होगा.''

''वह कैसे?'' खेम जी 'जाकी' ने पूछा.

''तुम इसे किसी बहाने से यहां से निकाल समुद्र के किनारे ले जाओ. पर यह गधा है शहर का पला हुआ. इसे इस तरह न मारना चाहिए. इससे कह दो यहां तुम्हारी जान को खतरा है. यहां से निकालकर इसे समुद्र के किनारे ले जाओ और पिस्तौल से इसे मारकर समुद्र में इसकी लाश को धकेल दो. क्यों मारिया?''

''हां, यह ठीक है,'' मारिया की आवाज आई, ''न गधे की लाश मिलेगी, न छानबीन का कोई परिणाम निकलेगा.''

पहले तो मैं भय से कांप रहा था. मारिया की बात सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए. तो यह है मेरे प्रेम का परिणाम!

खेमजी 'जाकी' बोला, ''कुछ अच्छा नहीं लगता सेठ. जिस जानवर से मैंने लाखों रुपये एक ही दांव में कमा लिए हों, उसे इस प्रकार समाप्त कर देना किसी तरह अच्छा नहीं मालूम होगा.''

''मूर्ख न बनो,'' सेठ ने आज्ञा-भरे स्वर में कहा, ''जब किसी गधे से और किसी लाभ की आशा न हो तो उसे खत्म कर देना ही अच्छा है.''

फिर खुसर-पुसर बंद हो गई और देर तक सन्नाटा रहा और रात को मौत एक खंजर बनकर मेरे सीने पर लटकती रही.

फिर धीरे से अस्तबल का द्वार किसी ने खोला और एक धुंधली छाया ने अंदर प्रवेश किया.

मैंने भय से कांपती हुई आवाज से पूछा, ''कौन है?''

अचानक किसी ने दीवार पर हाथ फेरकर स्विच दबा दिया. अस्तबल में प्रकाश हो गया. सामने खेमजी खड़ा था.

''क्या है?''

''उल्टे चलो बाहर.''

''कहां?''

''समुद्र के किनारे.''

''क्यों?''

''टहलेंगे, तुमसे बात करेंगे.''

''यहां पर बात क्यों नहीं हो सकती?'' मैंने पूछा.

''यहां बहुत गर्मी है, और संभव है कोई सुन ले. दीवार के भी कान होते है!'' खेमजी 'जाकी' बोला, ''समुद्र के किनारे टहलेंगे और तुमसे दूसरी रेस के बारे में बातें करेंगे.''

मैंने अपने मन में कहा- 'तुम! तुम मुझसे उस रेस के बारे में क्या बातें करोगे जो मेरी मृत्यु तक जाती है!' किंतु मैं चुप रहा. खेमजी ने मेरी गर्दन में एक रस्सी बांधी और मुझे अस्तबल से निकालकर समुद्र के किनारे ले चला.

रास्ते में अंधेरा था. नारियल के पेड़ कोर्टमाशल के सिपाहियों के समान अपने काले तने रायफल के समान उठाए खड़े थे. समुद्र की लहरें तक भयानक शोर के साथ तट से टकरा रही थीं. चारों तरफ आदमी न आदमजात!

बस, एक गधा और एक आदमी!

एक हत्यारा और एक मरने वाला!

समुद्र के तट पर ले जाकर खेमजी ने मुझे खड़ा कर दिया और मुझे विचित्र-सी दृष्टि से देखकर बोला, ''जानते हो, मैं तुम्हें यहां क्यों लाया हूं?''

''हां,'' मैंने उदास स्वर में कहा, ''तुम मेरी जान लेने के लिए मुझे यहां लाए हो.''

खेमजी ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाल लिया. जिस पर मैंने इस जोर से दुलत्ती झाड़ी, वह चकराकर मुंह के बल गिर पड़ा और मैं सरपट भाग निकला.

फिर अचानक कई गोलियों के चलने की आवाज आई और कई गोलियां मेरे समीप से सनसनाती हुई गुजर गईं.

फिर एक गोली पीछे से आई और मेरी पिछली दाहिनी टांग को छेदती हुई गुजर गई.

मैं चकराकर गिरने को ही था किंतु मैंने अपने-आपको संभाल लिया और दौड़ता-दौड़ता-दौड़ता चला गया! बाजार...सड़क...मोड़...नुक्कड़ मुझे कुछ याद न रहा. मैं अपने जीवन को बचाने के लिए भाग रहा था.

भागते-भागते मैं एक लेन में घुसकर एक गली में घुस गया. वह गली अंदर से बंद भी. मैं दौड़ता हुआ गली के अंत तक चला गया, जहां एक पांच मंजिल की बिल्डिंग खड़ी थी.

एक क्षण के लिए मैंने सोचा और फिर कुछ सोचे बिना बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़कर दौड़ता हुआ अंदर एक बड़े खुले हुए ड्राइंगरूम में दाखिल हो गया. मुझे देखते ही एक धोती पहने हुए आदमी जोर से चिल्लाया-

''गुरुजी, गुरुजी आ गए!'' वह धोती पहनने वाला आदमी आगे बढ़ा और आगे पाकर मेरे पांव पर गिरकर प्रसन्नता से रोने लगा, ''गुरुजी...आप कहां चले गए थे? कब से आपको ढूंढ़ रहा था, आप किधर अलोप हो गए थे...धन्य भाग मेरे...ऐ कुरमाया...बिजारिया...दामोरिया!...कहां मर गए सब? जल्दी से मुनीम जी को बुलाओ!''

मेरे पांव छूकर जब वह उठा और नौकरों को बुलाने लगा तब मैंने उसे पहचाना. वह सेठ भूरीमल था, जिसने माहिम में मुझसे सट्टे का नंबर पूछा था. सेठ भूरीमल खुशी से हाथ नचाते हुए मुझसे बोला-

''उस दिन योगीराज, आपने जो नंबर दिया उससे मैंने सट्टे में तीन लाख कमा लिए! यह बिल्डिंग उसी दिन खड़ी की है- भूरी महल!''

वह फिर जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ''ए कोड़िया....मजूरियादामोरिया! जाओ, साथ वाले कमरे और बाथरूम को गुरुजी के लिए साफ करो. ये आज से हमारे यहां रहेंगे.''

क्रमशः....

अगले अंक में.....

पब्लिसिटी होना गधे का, और घेर लेना सट्टेबाजों का उसको, और बयान गधे की चालाकी का...

कहानी

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तरुण कु. सोनी तन्वीर

बेटे, उस दिन जब मैं तुम्हारे यहां शहर आया था, तब एक कमजोर बुड्ढा और बेबस बाप बन कर आया था. अपने ही पुत्र से मदद की आषा लेकर, लेकिन बेटे तुमने मुझे जीवन के इस मोड़ पर भी मुझे जीने का सही रास्ता बता दिया. तुमने मेरे अन्दर के स्वाभिमान और खुद्दारी को जगा दिया. तुम्हारे ससुर के षब्दों से ज्यादा मुझे बेटे तुम्हारी खामोषी और तुम्हारा व्यवहार चोट कर गया था, इसलिए मैं तुमसे बिना मिले ही सुबह वापस लौट आया. मैंने तुम्हारे ही दिए रुपये अपने पसीने की कमाई के दस रुपये के साथ तुम्हें वापिस लौटा दिए. आज तेरा भेजा मनी आर्डर भी लौटा दिया. बेटे मुझे क्षमा करना. बेटे तेरे दिए 500 रुपये तेरे ससुर की कमाई के थे. उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं था. सो मैंने उसे अपनी खुषी से अपने पोते को दे दिए.

राधो काका

 

तरुण कु. सोनी तन्वीर

25 बरस पहले राधो काका की बीवी नैना काकी स्वर्ग सिधार गई थी, तब से काका गांव में अकेले ही रहते हैं. बेटा बरसों पहले शहर कमाने गया तो वही रच बस गया. शादी भी कर ली और अपने ससुर करोड़पति सेठ गंगा प्रसाद का घर दामाद भी बन गया. करोड़ों की सम्पति का मालिक. शुरू-शुरू में बेटा अपने पिता को मनी आर्डर से कुछ रुपये खर्चे के लिए गांव भेजता रहा. लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसने पैसे भेजना बंद कर दिया. इधर 65 बसंत देख चुके राधो काका की बुड्ढी हड्डियों में भी इतनी ताकत नहीं थी कि वो मेहनत मजूरी कर गुजर बस कर सके. ले-दे के एक पच्चीस गुना पंद्रह का छोटा सा झोंपड़ेनुमा खपरैल से बना पुश्तैनी मकान था.

सुबह जल्दी उठ के मंदिर को साफ करना, कबूतरों को दाना डालने के चबूतरे पर झाड़ू बुहार कर दाना डालना, कबूतरों के लिए पानी के बर्तनों में पानी डालना और राहगीरों के लिए ठंडे पानी के मटके भरके उसी चबूतरे पर रखना...राधो काका का रोज का काम था.

फिर घर आकर खाना बनाकर-खाकर कर उसी चबूतरे पर चले जाते. आते जाते राहगीरों से बतिया लेते. गांव के अपने ही हमजोली बुजुर्ग संगी साथियों से मिल बैठ के सुख दुःख की बातें करके अपना दिन व्यतीत कर लेते. काका तो कभी कभार ही खाना बनाते हैं. बाकी अक्सर आस पड़ोस में रहने वाले विषना काका और रामू काका के घर से उनके लिए खाना बन के आ जाता दोनों समय.

विषना काका और रामू काका, दोनों राधो काका के बचपन के दोस्त और रिश्ते में भाई भी लगते थे. इसलिए दोनों परिवार के सदस्य राधो काका का अच्छा ख्याल रखते थे. और दोनों के भरे-पूरे परिवार के बच्चों में मन लगा रहता. राधो काका की जिन्दगी अकेलेपन के बावजूद बड़े मजे से गुजर रही थी. बेटा हर महीने जो तीन-चार सौ रुपये भेजता है, उसमें से कबूतरों का दाना और अपने लिए चाय-बीड़ी और दवा पर खर्च कर देते थे.

लेकिन पिछले काफी दिनों से काका बहुत परेषान से हैं. हर दिन डाकघर का एक चक्कर तो लगा ही आते. तीन चार महीनों से बेटे का मनीआर्डर नहीं मिला था. जिससे कबूतरों का दाना और दवा का काफी उधार हो चुका था. जेब में रुपये भी नहीं बचे थे. राधो काका के बार बार खत लिखने पर भी कोई जवाब नहीं मिल रहा था बेटे का.

आज फिर जैसे ही वे डाकघर पहुंचे, डाक बाबू ने उन्हें दूर से देख लिया. पास आने पर राधो काका कुछ बोलते, उससे पहले ही डाक बाबू ने कहा, "अरे राधो काका, राम राम. आज आप फिर आ गये. मैंने आपको कहा ना कि जैसे ही आपकी चिट्ठी या मनी आर्डर आएगा, मैं सबसे पहले आपको ही लाकर दूंगा."

"राम राम डाक बाबू जी, काफी दिनों से श्रवण की खैर खबर नहीं आई जिससे मन में तरह तरह के ख्याल आते हैं और पैसे भी नहीं आ रहे, जिससे उधार भी काफी हो गया है. कबूतरों का दाना भी बराबर नहीं दे पा रहा हूं, इसी लिए मैं चला आया...ठीक है...चलता हूं." रुआंसे से हो गए कहते कहते.

वहां से चलते चलते राधो काका ने शहर जाकर बेटे से मिलने का विचार किया. घर लौट आये. फिर शाम को विषना काका के घर खाना खाते-खाते विषना काका के मंझले बेटे से कहने लगे- "अरे श्यामू, बहू से कहना कि सुबह के लिए भी दो-चार रोटी ज्यादा अभी ही बना देना."

विषना काका बोल उठे, "क्यों राधो, क्या बात है, कहां जाना सुबह सुबह जो अभी ही रोटियां बनवा रहे हो?"

"मुझे शहर जाना है बेटे के पास. तीन चार महीनों से खैर खबर नहीं आई तो सोचा जाकर मिल आऊं और कुछ दिन वहां रह भी लूंगा. सुबह जल्दी निकलूंगा. रास्ता लम्बा है तो भूख भी लगेगी, तब खा लूंगा. बहू को बोल देना जब तक मैं वापस ना आऊं, तब तक मेरे लिए खाना मत बनाए.''

"चलो ठीक है, बबुआ को मेरा भी शुभाशीष देना." पीछे से रामू काका ने आते हुए कहा.

"आ रामू आ, तेरा ही इंतजार हो रहा था. चल आ जा खाना खा ले." विषना काका बोले.

राधो ने कहा, "हां रामू, जरूर बोलूंगा. चल आ बैठ, खाना खा ले." हाथ पकड़ कर बैठाते हुए राधो काका ने कहा.

"लो चूरमे के लड्डू भी खाओ." कहते हुए अपने हाथ में पकड़े बर्तन से रामू काका ने 3-4 लड्डू थाली में परोस दिए.

विषना काका ने आगे कहा, "शहर जाओ तो श्रवण के लिए बढ़िया घी, मक्खन और चने लेते जाना राधू..."

बात आगे बढ़ाते हुए रामू काका बोले, "आज घर पर बहू ने ये चूरमे के लड्डू बनाये हैं. मैं अभी डब्बे में डलवा देता हूं. साथ ले जाना. श्रवण को बहुत पसंद है ना..." रामू काका ने कहा.

"ठीक है, पहले खाना तो खा लो. बाकी काम बाद में..."

खाना खाकर तीनों खाट बिछाकर सो गए.

सवेरे जल्दी उठ कर अपना सामान और घी, चने, मक्खन और लड्डू लेकर राधो काका शहर को रवाना हो गए.

शाम को जब राधो काका बेटे के बंगले पहुंचे तो वहां बहुत रोशनी और चहल-पहल थी. बाहर कारों का काफिला खड़ा था. बैंड बाजे भी बज रहे थे.

काका थोड़ी हिम्मत करके बंगले के गेट में दाखिल हुए. अन्दर कोई पार्टी चल रही थी. सूट बूट में सजे-धजे लोग खाने-पीने का लुत्फ उठा रहे थे. कुछ सोच कर राधो काका के कदम वही ठिठक कर रुक गए.

उन्होंने वहां खड़े दरबान से पूछा- "यहां क्या हो रहा है भाई?"

दरबान ने बताया- "हमारे सेठजी के दोहिते का जन्मदिन मनाया जा रहा है."

"श्रवण ठाकुर यही रहते हैं ना?" काका ने दरबान से पूछा.

"हां जी! यही रहते हैं. श्रवण ठाकुर ही हमारे बड़े सेठजी के दामाद हैं. आज उनके ही बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही है." दरबान ने बताया

श्रवण के बेटे का जन्मदिन...सुनते ही राधो काका के माथे पर सलवटें पड़ने लगीं. झुर्रियों भरा चेहरा एकदम से सोच में डूब गया...श्रवण ने शादी भी कर ली, बेटा भी हो गया और उसे बताया भी नहीं.

तभी उनकी आंखों में कुछ चमक सी आती है और दरबान के पास जाकर पूछते हैं.

''क्या श्रवण का बेटा है वो?'' राधो काका ने केक काटते बच्चे की ओर इशारा करके पूछा.

दरबान ने कहा- ''हां! ये हमारे श्रवण साहब के ही बेटे हैं.''

इतना सुनते ही दिन भर के सफर का दर्द और सारी बातें भूल दादा बनने की खुशी में चहकते हुए अपने पोते को गले लगाने के लिए काका ने अन्दर जाने को कदम बढाया ही था कि तभी ससुर के साथ खड़े बेटे की नजर अपने पिता पर पड़ी. वह झट से साथ खड़े लोगों को "एक्सक्युज मी, आई कम बैक इन टू मिनट्स." बोल कर अपने पिता की ओर लपका.

पास आते ही पिता का हाथ पकड कर एक तरफ ले जाते हुए धीरे से बोला- "आप यहां क्यों आये हो? अभी आप यहां से जाओ, कल सुबह आना, नहीं तो ये मेहमान क्या सोचेंगे. आपको मेरी इज्जत की जरा भी परवाह नहीं हैं?''

राधो काका गंभीरता से अपने बेटे का चेहरा देखते हुए

धीरे से बोले- ''श्रवण बेटा, पिछले कई महीनों से तुमने खर्च के रुपये नहीं भेजे. घर में आटा दाल नहीं है. ना ही कबूतरों का और ना मेरी मेरी दवा का खर्च. उधार काफी हो गया है. मैंने सोचा, तुम काम में व्यस्त होने से भूल गए होंगे. इसलिए लेने आ गया.''

तभी बेटा तुनक कर बोला- ''तो खत लिख देते. यहां मेरी इज्जत का फलूदा करने क्यों आये?''

काका बोले- ''बेटा पिछले 9 महीनों में 15-20 खत भेजे मैंने. एक का भी जवाब नहीं आया, न ही रुपये मिले.''

तभी नौकर ने आकर कहा, ''सर आपको बड़े सेठजी बुला रहे हैं.''

बेटे ने कहा, ''तुम जाकर पिताजी को बोलो अभी दो मिनट में आ रहा हूं.'' फिर तेजी से घूमकर अपनी जेब से पर्स निकाला और 500 का नोट बाहर निकलते हुए कहने लगा- ''ये लो 500 रुपये. अब जल्दी से यहां से वापिस गांव चले जाओ.''

''पर र र बेटा...'' कहते कहते गला रुंध सा गया काका का. शब्द गले में ही अटक गए हों जैसे.

''हां! बोलिए अब क्या कहना चाहते हैं?'' बेटा बोला.

''एक बार बहू और अपने पोते से मिलना चाहता हूं. पोते को गोद में खिलाना चाहता हूं.'' कहते कहते राधो काका की आंखों से आंसू बहने लगे.

''कोई जरूरत नहीं अभी मिलने की. आप कल सुबह आना, मैं मिलवा दूंगा...पर अभी जाओ...जल्दी से...किसी ने देख लिया तो लोग क्या सोचेंगे?'' बेटे ने कहा

''पर बेटा, इतनी रात को मैं कहा जाऊंगा. मैं तो यहां किसी को जानता भी नहीं हूं.'' काका बोले.

''यहां वहां कहीं पर भी आप आज की रात गुजार लो, कुछ ही घंटों की तो बात है...आप एक काम करो...वो सामने फुटपाथ है. आप वही सो जाओ. कल सुबह मैं आपको सबसे मिलवाकर गांव भिजवा दूंगा.''

आगे कुछ बोलता, उससे पहले ही उसके ससुर की आवाज आई, ''श्रवण बेटा, वहां क्या कर रहे हो, जल्दी से यहां आओ! सभी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.''

ससुर को अपनी तरफ आता देख राधो काका को बोला, ''अब आप जल्दी से निकलो यहां से...'' कह कर अपने ससुर की तरफ कहते हुए बढ़ा- ''आया पिताजी!"

ससुर ने पूछा, ''कौन था वो बुड्ढा जिससे तुम बातें कर रहे थे?''

हड़बड़ाते हुए श्रवण बोला- ''वो मेरे गांव के रहने वाले

राधो काका हैं. आज शहर आये थे तो जेब कट गयी. कुछ मदद के लिए मेरे पास आ गए. मैंने उनको कुछ रुपये देकर भेज दिया.''

''अरे बेटा! तुम इतने भोले न रहा करो! ये गांवों के लोग बड़े होशियार होते हैं. झूठ-मूठ की कहानियां गढ़ कर रुपये ऐंठ ले जाते हैं.'' ससुर ने दामाद को समझाते हुए कहा.

बेटा ससुर की बातों को सुन सर हिलाकर चलने लगा और फिर से पार्टी में मेहमानों से मिलने में व्यस्त हो गया.

इधर बेटे और उसके ससुर की बातें सुनकर राधो काका आंखों में आंसू लिए सड़क की तरफ चलने लगे. गेट के पास पहुंचते ही उन्होंने अपनी मुट्ठी में पकड़ा 500 का नोट और अपनी जेब में रखे सिकुड़े हुए 10-10 के दो नोटों में से एक नोट निकाल कर दरबान के हाथों में देते हुए दरबान से बोले, ''भाई, ये 510 रुपये तुम्हारे सेठ को जाकर दे दो...साथ ही साथ कांधे पर लटका झोला देते हुए बोले, ''ये सामान भी ले जाकर दे दो. बोलना उनके बेटे के जन्मदिन पर राधो काका की तरफ से छोटी-सी भेंट...'' कहते कहते राधो काका की आंखें भर आईं और वह झट से वहां से आगे निकल गए.

दरबान काफी देर से श्रवण साहब और राधो काका को दूर से बातें करते देख रहा था. उसे अपने 60 साल के अनुभव से समझने में देर न लगी की हो ना हो ये ही श्रवण साहब के असली पिता हैं. लेकिन नौकरी न छिन जाए, इस डर से चुप रहना उचित समझा. वह रुपये ले जाकर श्रवण साहब और उनके ससुर जी के हाथों में नोट थमाते हुए कहा- ''साहब, अभी अभी आप जिन बुजुर्ग से बात कर रहे थे, उन्होंने छोटे बाबा के जन्मदिन पर ये 510 रुपये और यह कुछ सामान भेंट भेजी है...और कहा है कि कहना 'राधो काका की ओर से छोटे बाबा के लिए छोटी सी भेंट.'''

इतना सुनते ही श्रवण अपने ससुर की तरफ देखने लगा. श्रवण को वो रुपये उसके गाल पर एक पिता की खुद्दारी और स्वाभिमान की थप्पड़ की तरह लगे. वह विवश खड़ा ससुर की आंखों में आंखें डाले देख रहा था. आंखों ही आंखों में दोनों के बीच मौन संवाद हुआ.

उसने दरबान से रुपये लेकर कहा, ''ठीक है सामान वहां एक तरफ रख दो और तुम जाओ.'' रुपये जेब में रख श्रवण पार्टी में मेहमानों को खाना खिलाने में व्यस्त हो गया.

रात काफी हो गई थी. भूखे प्यासे राधो काका के पास बेटे के बंगले के सामने बने फुटपाथ पर सोने के अलावा कोई दूसरा ठिकाना भी नहीं था. बंगले से कुछ दुरी पर एक तरफ जगह देख कर सर की पगड़ी उतार कर तकिये की जगह रख के फुटपाथ पर सोये भिखारियों की लाइन में लेट गए. पर आंखों में नींद कहां थी. वह रात भर जागते रहे. सोचते रहे और रोशनी में छुपी कालिख को देखते रहे.

इधर पार्टी के सारे मेहमानों को विदा करने में रात के 2-3 बज गए. तभी श्रवण ने जेब से कुछ निकलने के लिए हाथ डाला. कुछ हाथ से छूते ही वह रुक गया. धीरे से उसने जेब से हाथ निकाला तो वो दरबान के हाथों राधो काका के भेजे रुपये थे. उसकी नजर जब मैले कुचले सलवटें पड़े 10 के नोट पर पड़ी तो उसे अपने दिए 500 का नोट भी बौना नजर आने लगा. तभी सामने पड़े थैले पर उसकी नजर पड़ी, वह भाग कर थैले के पास गया और खोल के देखने लगा. उसमे देशी घी से भरा डिब्बा, मक्खन से भरा टिफिन और पोटली में बंधे उसके मनपसन्द चटपटे चने.

उसे शर्म आने लगी खुद पर कि आज वह अपने पिता को पिता का दर्जा नहीं दे सका. उसे वह दिन याद आने लगा जब उसे बचपन में मलेरिया में जकड़ लिया तो कैसे एक पिता ने अपने पुत्र के लिए पूरे 9 दिन रात जाग कर गुजारी. उसका पूरा ख्याल रखा. डॉक्टरों के पैर भी पकड़े उसको जल्दी ठीक करने के लिए...और आज भी वह उसका कितना ख्याल करते हैं...और एक मैं हूं जो अपने पिता के घर आने पर भी खाना खिलाना तो दूर अन्दर आने को भी नहीं कह सका...यह सोच सोच कर उसकी आंखों से आंसू झरने लगे.

उसके कदम फुटपाथ पर सोये अपने पिता को लाने के लिए आगे बढ़ने ही वाले थे कि सामने बीवी और ससुर को अपनी ओर आते देख ठिठक गए.

पास आते ही श्रवण से उसके ससुर बोले, ''बेटा रात काफी हो गयी है. अब तुम दोनों जाकर सो जाओ. सुबह जल्दी ऑफिस भी जाना है. लन्दन से मि. जोसेफ आ रहे हैं अपनी कम्पनी को देखने और 5 करोड़ के आर्डर देने.''

ससुर कुछ आगे बोलते, उससे पहले ही श्रवण की बीवी बीच में बोली, ''हां, चलो श्रवण! सोने चलो, आज काफी थक गयी हूं. मुझे तो नींद आ रही है.'' फिर अपने पिता की ओर घूमकर बोली- ''पापा, आप भी अब जल्दी से सो जाओ, रात काफी हो गयी है...अपनी दवा लेना मत भूलना.''

कहते हुए श्रवण का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बेडरूम की ओर ले गयी. श्रवण अपने मन के विपरीत चुपचाप बीवी के पीछे जाने लगा. यह सोचकर कि सुबह जल्दी उठा कर अपने पिता से मिल लेगा.

सुबह रीना की आवाज के साथ श्रवण की नींद टूटी, ''श्रवण उठो! नौ बज गए हैं! ऑफिस के लिए तैयार हो जाओ. नीचे पापा तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.''

सामने टंगी दीवार घडी पर नजर डालते हुए श्रवण बोला, ''रीना कम से कम मुझे थोड़ा जल्दी तो उठा देती...मुझे...'' इससे आगे कुछ बोलने से पहले ही रीना ने कहा, ''रात को सोये भी तीन बजे थे. पापा ने कहा- कुछ देर और सोने दो...अब जल्दी से नहा धोकर तैयार हो जाओ. मैंने नाश्ता बना दिया है. खाना बना कर टिफिन पैक कर देती हूं. क्या पता आप मीटिंग की वजह से दिन में घर आप पाओ या नहीं.''

''ओके डिअर!'' कहते हुए श्रवण बाथरूम की ओर लपका.

कुछ ही देर में तैयार होकर श्रवण नीचे आते ही बीवी से बोला, ''रीना तुम नाश्ता टेबल पर लगाओ, मैं एक मिनट में आता हूं.'' कहते हुए तेज कदमों से गेट की तरफ बढ़ने लगा. कुछ क्षणों में गेट से बाहर फुटपाथ के पास पहुंच कर किसी को ढूंढ़ने लगा.

तभी पीछे से आकर दरबान ने कहा, ''किसे खोज रहे हैं साहब!''

''किसी को भी नहीं!'' सकपकाते हुए श्रवण बोला.

अपने पिता को उधर ना पाकर श्रवण वापिस अनमने भाव से गेट की ओर मुड़ा. अचानक वापिस दरबान की ओर मुड़ कर दरबान से पूछा, ''दरबान काका, क्या आपने रात को राधो काका को कहीं देखा क्या?''

''कौन से राधो काका साहब! वही जो कल शाम को आये थे और जिन्होंने छोटे बाबा के लिए रुपये और सामान मेरे साथ भेजे थे?'' दरबान ने पूछा

''हां, हां, वहीं, कहा हैं वो?'' श्रवण ने उत्सुकता से पूछा.

''साहब! वो तो अपने गांव चले गए वापिस, आज सुबह जब 6 बजे मैं गेट खोलकर में दूध लेने सामने फुटपाथ के पास गया तब वो गाड़ी में बैठ कर अपने गांव जा रहे थे. उन्होंने आपको देने के लिए एक पोटली दी थी मुझे. कहा था कि श्रवण साहब को यह बहुत पसंद है, उन्हें दे देना.'' दरबान ने कहा.

''कहां है वो पोटली जल्दी लाओ?'' श्रवण ने कहा

''अभी लाता हूं.'' कहकर दरबान पोटली लाने अपने चेंबर की और मुड़ा. श्रवण गुमसुम सा खड़ा रास्ते की ओर देखने लगा.तभी दरबान ने पोटली लाकर श्रवण के हाथ में रख दी. मैली कुचैली थैली की पोटली को हाथों में पकड़ते ही महसूस किया.आहा! ये तो बाबा के हाथ के सत्तू हैं.

वही खड़े खड़े वह पोटली की गांठों को खोलने लगा. तभी पीछे से आवाज आई, ''श्रवण! नाश्ता ठंडा हो रहा है, जल्दी आओ! ऑफिस से भी तुम्हारे लिए फोन आया है.'' पीछे रीना खड़ी आवाज दे रही थी.

पोटली को हाथों में थामे ही बंगले की ओर बढ़ने लगा. फिर वह गैरेज की ओर मुड़ा और कार का गेट खोल कर उसने अन्दर वह पोटली छुपा कर रख दी. बंगले में पहुंच कर आधा अधूरा नाश्ता कर कार लेकर ऑफिस के लिए रवाना हो गया. पूरे रास्ते राधो काका के बारे में सोचता रहा. ऑफिस कब आया पता भी नहीं चला.

तभी पोस्टमैन डाक देने आया तो श्रवण की नजर उस पर पड़ी. उसने पोस्टमैन को अपने केबिन में बुलाया और मनी आर्डर करने का लास्ट ऑफिस टाइम पूछा. पोस्टमैन ने बताया- ''सर, 2 बजे तक ऑफिस में मनी आर्डर बुक होते हैं.''

तभी घड़ी की तरफ देखते हुए उसने कुछ मन ही मन सोचा. 1 बजे ऑफिस का लंच होते ही श्रवण अपने केबिन से निकला और रिसेप्शन से कहा, ''मालती! कोई पूछे तो बोलना किसी अजेंट काम से कहीं गए हैं. अभी 15-20 मिनट में आते हैं." ''ओके सर!" मालती ने संक्षिप्त जवाब दिया.

श्रवण जल्दी से कार निकाल कर बाहर निकल गया. सड़क पर सरपट दौड़ती कार बैंक के एटीएम के सामने रुकी. एटीएम से कुछ रुपये निकाले. फिर वह पोस्ट ऑफिस गया और 5000 रुपये का मनीआर्डर कर बाहर निकला.

उसने अपने मन में कुछ राहत महसूस की कि अब बाबा के खर्चो में कोई कमी नहीं आयेगी और वह हमेशा अब समय पर रुपये गांव भेजता रहेगा.

श्रवण कार की तरफ बढ़ा. कार में बैठते ही श्रवण को भूख लगी थी जोर से...तो उसने वह पोटली निकाली और उसे खोल कर देखा. उसमें देशी घी में बने चूरमे के लड्डू निकले. और एक कागज में लिपटे तीन सत्तू. उसे अपने बाबा के हाथ के सत्तू बहुत पसंद थे. वह लड्डू और सत्तू खाने लगा. सत्तू खाकर उसकी आंखों में पानी भर आया. आज श्रवण को मां भी बहुत याद आ रही थी.

फिर आंखें पोंछ कर वह ऑफिस लौट आया. अब उसके मन पर सुबह की तरह कोई बोझ नहीं था. उसने मनी आर्डर भेज दिया है. अब बाबा के दिन भी आराम से गुजरेंगे. आगे से उन्हें किसी तरह की कमी नहीं आने दूंगा...यही सोचते-सोचते कब ऑफिस आ गया, पता भी नहीं चला.

शाम को घर पंहुचा तो उसने रीना को चूरमे के लड्डू और सत्तू देकर कहा, ''लो रीना, कुछ स्पेशल...असली घी में बने सत्तू और चूरमे के लड्डू.''

पोटली को हाथ में लेते हुए रीना बोली, ''कौन लाया इन्हें?'' और झट से पोटली से सत्तू और लड्डू निकाल कर टेस्ट करने लगी.

''गांव से राधो काका आये थे वो लाये थे.'' श्रवण ने बताया.

वह बोली, ''अरे वाह! ये तो बहुत टेस्टी हैं. मैंने कभी नहीं खाए.''

''तो अब टेस्ट कर लो.'' मुस्कुराते हुए श्रवण ने कहा.

बेडरूम में पलंग पर लेटे लेटे श्रवण सोचने लगा कि उसने अपनी जिन्दगी में आज ही सही निर्णय लिया है...अपनी जिम्मेदारियों का पालन करके. सोचकर उसे काफी राहत महसूस हो रही थी...

पांच दिन बीत गए. हमेशा की तरह श्रवण ऑफिस में काम कर रहा था, तभी पोस्टमैन आया. ''सर आपका भेजा ये मनी आर्डर रिटर्न हो गया है. प्राप्तकर्ता ने लेने से मना कर दिया है. प्लीज आप यहां हस्ताक्षर कीजिये.'' कह कर मनी आर्डर फॉर्म श्रवण के सामने कर दिया.

पोस्टमैन की बात सुनकर श्रवण को गहरा धक्का लगा. उसे लगने लगा कि उसके गालों पर उसके बाबा की खुद्दारी और स्वाभिमान के हाथों की मार पड़ रही है. उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा. अपने आपको संभालते हुए पोस्टमैन की बताई जगह पर हस्ताक्षर करने लगा. पोस्टमैन ने 5000 रुपये गिन कर श्रवण के हाथों में रख दिए. साथ में एक चिट्ठी भी दी और चला गया.

रुपये एक तरफ रख कर श्रवण ने चिट्ठी को खोलकर देखा. वह राधो काका की ही चिट्ठी थी. श्रवण ने भारी मन से पढ़ना शुरू किया. एक एक शब्द उसके गाल पर तमाचे की तरह पड़ रहे थे.

''प्यारे बेटे,

सदा खुष रहो.

बेटे, उस दिन जब मैं तुम्हारे यहां शहर आया था, तब एक कमजोर बुड्ढा और बेबस बाप बन कर आया था. अपने ही पुत्र से मदद की आशा लेकर, लेकिन बेटे तुमने मुझे जीवन के इस मोड़ पर भी मुझे जीने का सही रास्ता बता दिया. तुमने मेरे अन्दर के स्वाभिमान और खुद्दारी को जगा दिया. तुम्हारे ससुर के शब्दों से ज्यादा मुझे बेटे तुम्हारी खामोशी और तुम्हारा व्यवहार चोट कर गया था, इसलिए मैं तुमसे बिना मिले ही सुबह वापस लौट आया. मैंने तुम्हारे ही दिए रुपये अपने पसीने की कमाई के दस रुपये के साथ तुम्हें वापिस लौटा दिए. आज तेरा भेजा मनी आर्डर भी लौटा दिया. बेटे मुझे क्षमा करना. बेटे तेरे दिए 500 रुपये तेरे ससुर की कमाई के थे. उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं था. सो मैंने उसे अपनी खुशी से अपने पोते को दे दिए.

''बेटे ये कभी मत सोचना के मै तुमसे नाराज हूं, या गुस्सा हूं. मैं तो आज भी वैसा ही हूं, जैसा उस वक्त था, जब तुझे

कंधे पर बिठाकर घूमता था. तुझे खेल खिलाता था. तेरी हर जिद पूरी करता था, क्योंकि तू ही मेरी आंखों का तारा है. बेटा! मुझे गांव में खेतों की निगरानी का काम मिल गया है. दिन भर सो लेता हूं और रात को कुछ घंटे निगरानी कर लेता हूं. बदले में गांव वाले मेरी सारी आवश्यकताओं को पूरा कर देते हैं. इसलिए अब बेटा, मुझे रुपये मत भेजना. बल्कि उन रुपये से मेरे पोते के भविष्य को सुधारना...उसे अच्छा नागरिक बनाना.

''और वैसे भी मुझे क्या चाहिए...दो वक्त की रोटी, दो वक्त की चाय. मेरे लिए इतना काफी है. वैसे भी विषना और रामू और उनका परिवार तो है ही न मेरी देख रेख करने के लिए...हमेषा वही से रोटी-सब्जी बन कर आती है. मैं नहीं बना पाता ना अब...इसलिए. वही हम तीनों दोस्त मिल बैठ कर खा लेते हैं...अब कोई दुःख नहीं. बेटा! ईश्वर ने मेरी सुन ली. मुझे चांद सा पोता दे दिया... ठाकुर वंष को चिराग मिल गया, अब और मुझे क्या चाहिए. तूने मुझे जीवन की बेशकीमती दौलत पोते के रूप में दे दी. मेरा जीवन सफल हो गया. मेरे वंश का उद्धार हो गया.

''बेटा अपना, बहू का और मेरे पोते का ख्याल रखना. उसे पढ़ा लिखा कर अच्छा इंसान बनाना. जुग-जुग जियो बेटा. सदा सुखी रहो...सदा हंसते-खेलते रहो. खूब अन्नवान-धनवान बनो...बेटा. मेरी एक अंतिम इच्छा है. पूरी करोगे क्या? मैं चाहता हूं कि जब मैं मर जाऊं तो मेरी चिता को मुखाग्नि मेरा पोता दे...बोलो बेटा...क्या तुम मेरी ये अंतिम इच्छा पूरी करोगे...या...

तुम्हारा बाबा

चिट्ठी पढ़ते पढ़ते श्रवण की आंखों से आंसू झरने लगे. कुछ बूदें चिट्ठी पर गिरने लगीं...जिससे बाबा के लिखे अक्षर भीगकर उभरने लगे...मानो बाबा उसकी तरफ हाथ बढ़ा रहे हो...और उसे बुला रहे हों...श्रवण बेटा...

 

कहानी

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डॉ. कुंवर प्रेमिल

इस 'तो' के आगे उसका दिमाग घूम गया...

उसे होश तब आया जब किसी की नरम-नरम नाजुक अंगुलियां उसके पैर दबा रही थीं. यह उसकी नववधू ही थी. पुत्र जतिन उसका माथा सहला रहा था, यह वह जान गई थी.

''अरे, मेरे पैर क्यों छुए बहू, अभी देवी-देवताओं की पूजा कहां हुई है? यह तो अपशकुन हो गया है.'' वह बीमार किंतु सधे स्वर में अपनी बहू से मुखातिब हुई थी.

नामः डॉ. कुंवरपाल सिंह भाटी

जन्मः 31 मार्च, 1947

प्रकाशनः देश की सभी जानी-मानी पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन, लघुकथा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य, अनियतकालीन ककुभ का लंबे समय तक संपादन, प्रतिनिधि लघुकथायें वार्षिकी का नियमित रूप से संपादन/प्रकाशन

पुस्तक प्रकाशनः चिनम्मा, अनुवांशिकी, पांचवां बूढ़ा, आशंकाओं के नागपाश, प्रदक्षिणा, अंततः, आम आदमी नीम आदमी, कुंवर प्रेमिल की 61 लघुकथायें, शैलपर्ण की शैला आदि पुस्तकों का प्रकाशन. लघुकथा संग्रह 'हंसीराम हंसा' शीघ्र प्रकाश्य.

पुरस्कार/सम्मानः अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित

प्रसारणः जबलपुर, छतरपुर आकाशवाणी से कहानियां एवं कवितायें प्रसारित

सम्प्रतिः स्वतंत्र लेखन

सम्पर्कः एम.आई.जी-8, विजय नगर, जबलपुर-482002 (म.प्र.)

मोः 09301822782, 09301123958

 

आशंकाओं के नागपाश

डॉ. कुंवर प्रेमिल

सुनीता आज ऐसी सोई कि उसे तनिक भी होश शेष नहीं रहा. कितने ही दिनों से जाग रही थी वह. आखिर उसके बेटे जतिन का ब्याह जो था. उस घर में उसके सिवाय और कौन था, जो यह जिम्मेदारी निभाता भला!

एक-दो दिन नहीं बल्कि पूरे सप्ताह भर के कार्यक्रम उसने अपनी अकेले दम से निबटाये थे. केवल रिश्ते की एक मीरा भाभी ही थीं जो बीच-बीच में उसकी मदद कर जातीं, हिम्मत बंधा जातीं.

कहने को तो देवरानी जेठानी, ननदें सभी थीं, पर ये सभी मेहमान थीं. भला मेहमान किसी काम के होते हैं क्या? ये सब मूक दर्शक बनी रहतीं, दूर से ही उसकी दौड़म-भागम देखती रहतीं.

उसकी दिनचर्या मेहमानों को गरम पानी मुहैया कराने से प्रारंभ होती. चाय-नाश्ता, दोपहर का खाना सब कुछ समय पर चाहिए होता. दिन भर जुगाली करने को पान की दरकार होती. हर आधा एक घंटे में चाय बेचारी करती रहती हाय-हाय.

रात के खाने के बाद ही उसका टेंशन कम होता. महाराजन तो कब की आजिज आ चुकी थी, उसके अनुरोध पर ही सबको जैसे-जैसे झेल रही थी.

बच्चों का धमाल अलग से था. शोर-शराबा, हल्ला-गुल्ला, लड़ाई-झगड़ा उनका दिन-दिन भर चलता रहता. उनके मां-बाप बेफिक्र थे, आंखें-कान दोनों बंद किये रहते. इन सबके लिये सुनीता थी ही जो लस्त-पस्त होती रहती.

''बच्चे तो शोरगुल करेंगे ही.'' देवरानी मुंह फुलाकर कहती और अपने कमरे में बंद हो जाती.

''शादी-ब्याह के मौके पर बच्चे मस्ती नहीं करेंगे तो क्या बूढे करेंगे?'' जेठानी ही अपने साथ लाये नाती-नातिनों का पक्ष लेतीं और अपने बंद कमरे में पसर जातीं.

ननदों को अलग कमरे नहीं मिलने से वे अलग कसमसा रही थीं. हाल में गुजारा करती हुई गुस्से में फूल-पिचक रही थीं. मिठाइयां खाकर भी उनकी जुबानें कड़वाहट से भरी पड़ी थीं.

सुनीता बराबर सबका ध्यान रखती, पर पीठ पीछे खुराफात करती ननदें, देवरानी, जेठानी कोई न कोई शिकायत से उसका संबंध जोड़ लेतीं. कोई न कोई उलाहना उनके पास सदैव तैयार मिलता. वे सब उसके प्रति नृशंस थीं. रात बारह बजे के बाद ही वह बिस्तरे में जा पाती.

आज घर-बाराती सभी निकल गये थे घर से, वधू को ब्याहने. महिलायें पिकनिक स्पॉट देखने चली गई थीं. जैसे-तैसे उसने दो-चार निवाले निगलकर ही बिस्तरा पकड़ लिया था, फिर नींद ने जो उसे दबोचा तो उसे तनिक भी होश शेष नहीं रहा. बड़े दिनों के बाद आज वह चैन की नींद सो रही थी.

सच पूछा जाये तो वह वर्षों से उनींदी थी. पूरी नींद सो कहां पाती थी. नींद उड़न छू हो गई थी मानो. आंखें बंद होते ही डरावने सपने उसे घेर लेते. आशंकाओं-कुशंकाओं के बीच झूलती रहती वह. आंसू बहाना ही उसकी नियति हो गई थी.

पति की मृत्यु के बाद नन्हें जतिन को मां-बाप दोनों ही थी वह. उसके वैधब्य के बीते उन सालों में उसे रोशनी की एक किरण भी कहां दिखाई देती थी. ऐसे में एक मीरा भाभी ही आकाश का वह तारा थीं जो उसके धुंध भरे रास्ते पर जीर्ण-शीर्ण प्रकाश बिखेरकर उसका पथ आलोकित करने का यत्न कर रही थीं.

उसके ससुराल वाले उससे पूरी दुश्मनी निभाते रहे. उसके खिलाफ तरह-तरह के दांव-पेंच आजमाते रहे. इन सबकी तह में उसका प्रेम विवाह ही था. नितिन के साथ उसने कुछ रंगीन सपने देखे, फिर वे हमसफर बन गये. उनका प्रेम, प्रेम कहानी और प्रेम विवाह जहां उसकी ससुराल पक्ष के लिए नफरत के केंद्र बने, वहीं उससे तरह-तरह के इल्जाम लगाकर बदनामी के शिखर से ढकेल दिया. उन्हें भर बरसात में घर से निकाल दिया गया.

उसके विवाह में दोनों ही पक्ष के लोग शामिल नहीं हुए और वे उनके आशीर्वाद के बिना ही पति-पत्नी के बंधन में बंध गये. उनका प्रेम विवाह किसी को रास नहीं आ रहा था, इसलिए उनके पथ में कांटों का छिड़काव बखूबी किया जा रहा था.

तब से अब तक वह कांटों की सेज पर सो रही थी. खुशियों के मायने वह भूल गई थी. खोई हुई आज भी वह अतीत के गली कूचों में अपना पथ, अपना भविष्य तलाश रही थी.

वह और न जाने कब तक बेहाल, बेचैन भटकती कि मीरा भाभी ने उसे झिंझोड़कर जगा दिया.

''अरे उठो न, गधे-घोड़े बेचकर सो रही हो क्या?'' मीरा भाभी पल भर को आवाज लगाती हुई आईं और फिर अन्तर्धान हो गईं.

उसे उठना तो पड़ेगा ही, बारात के लौटने पर कई काम उसे ही निबटाने होंगे. यह अतीत उससे इस तरह जोंक की नाई चिपक जायेगा, उसने कभी ऐसा सोचा ही नहीं था.

नितिन आज उसे बेहद याद आ रहे थे. वह होते तो स्वयं देखते कि उनका सपना उसने नितिन को इंजीनियर बनाकर पूरा कर दिया है. वह देखते कि कैसे उसने अपनी जिंदगी का रथ एक चक्के के बल पर ही हांक दिया था और मंजिल भी प्राप्त कर ली है.

नितिन की डेडबॉडी की अकेले दम पर रखवाली करना मीरा भाभी जैसे जीवट वाली स्त्री का ही काम है. उसे तो अपने तन-बदन का होश नहीं था. कई दिनों से जाग रही मीरा भाभी को एक पल की झपकी क्या आई कि गजब हो गया.

न जाने कब जतिन बिस्तर से उठकर चुपचाप नितिन की मृतदेह के साथ सो गया. मीरा भाभी की चीख ने उसे पूरी तरह हिलाकर रख दिया था. उसका कलेजा अंदर तक कांपकर रह गया था.

उस दिन के बाद वह जतिन की मां, पिता, बाडीगार्ड सब कुछ थी. वह एक क्षण के लिए भी जतिन से दूर नहीं थी. उसने अपनी जिन्दगी जतिन के नाम कर दी थी.

जतिन हंसता तो वह हंसती, उसके रोने पर वह रोती, घर-बाहर पूरा जतिनमय हो गया था. मूर्त्त और अमूर्त्त के बीच उसका संसार विभक्त होकर रह गया था.

सुनीता की ननदें, जेठानी, देवरानी उसकी नौकरी लगने के बाद उसके घर पहुंचीं. घर की एक-एक चीज को वे बड़ी बारीकी से देखतीं. ऊपरी मन से उसके बेटे पर प्यार लुटाने का नाटक भी करतीं. ''देखो न, कितनी साहसी है सुनीता, अपनी अकेली दम पर लड़के को पढ़ा-लिखा कर इंजीनियर बना दिया, यह क्या कम गौरव की बात है.'' ननद की आंखों में स्कूटर बस रहा था.

मीरा भाभी उसे पहले ही चेता गई थीं. जब स्कूटर मिलने की संभावना नहीं रही तो उन्होंने अपना गिरगिटी रंग बदल लिया. वे उस पर तरह-तरह के आक्षेप भी लगाने लगीं.

बड़ी मुश्किल से सुनीता उन्हें अपने घर से खदेड़ पाई थी.

सुनीता अभी और न जाने कितने-कितने दृश्य बिंबों से एकाकार करती, न जाने कितनीे देर तक इस तरह अतीत में विचरती कि मीरा भाभी दोबारा आ धमकीं.

''अरे अब उठो भी, वर-वधू दरवाजे तक आ पहुंचे हैं और तुम अभी तक जस की तस बैठी हुई हो. क्यों?''

वह बुरी तरह हड़बड़ाई- ''मैया री! यह कैसी मुर्दनी मुझ पर है छाई. मैं क्यों अपने आपको अपनी आप बीती सुना रही हूं?''

कहते हैं अपना शत्रु, अपना मित्र, आदमी स्वयं होता है. जमाने वाले बाद में शत्रुता-मित्रता निभाते हैं. आज जिन्दगी के पृष्ठ उसके सामने एक-एक कर खुल रहे थे. वह उनमें स्वयं को खोज रही थी. जमाने ने उनके साथ ऐसा बर्ताव किया कि दिनों-दिन वह शंकित और कुंठाग्रस्त होती चली गई थी.

एक बार तो नन्हें जतिन के अपहरण की कोशिश भी की गई थी, पर यहां भी मीरा भाभी उसकी ढाल बनीं और जतिन बाल-बाल बच गया था.

दरवाजे पर का शोर-गुल, बैंड की आवाजें उसे वर्तमान में खींच रही थीं. उसे कुछ समय के बाद ही बहू-बेटे की अगवानी करनी थी. चौक पूर कर पूजा की थाली सजानी थी. उस घर की मालकिन घर के दरवाजे पर खड़ी होकर उसकी अनुमति की प्रतीक्षा कर रही थी.

उसे यह खयाल अच्छा लगा, सहानुभूति भी हुई, पर आजकल की बहुओं के कारनामें उसे डरा रहे थे. अपनी अंगुलियों पर सास को नचाती बहुओं के किस्से आम थे और वह उनमें लाचार सास की तस्वीरें साफ देख रही थी.

दादा-दादी वृद्धाश्रम भेजे जा रहे थे या अपने घर से जबरिया बाहर किये जा रहे थे. कहीं उसके साथ भी ऐसा ही हुआ तो...उसकी बहू ने भी बवाल मचा दिया तो...कहीं वह भी बेबस होकर वृद्धाश्रम खदेड़ दी गई तो...

इस 'तो' के आगे उसका दिमाग घूम गया और वह लहराकर बिस्तर पर आ गिरी. उसका होशोहवास खो गया, बेहोशी उसके अंग-अंग में पसरती चली गई.

उसे होश तब आया जब किसी की नरम-नरम नाजुक अंगुलियां उसके पैर दबा रही थीं. यह उसकी नववधू ही थी. पुत्र जतिन उसका माथा सहला रहा था, यह वह जान गई थी.

''अरे, मेरे पैर क्यों छुए बहू, अभी देवी-देवताओं की पूजा कहां हुई है? यह तो अपशकुन हो गया है.'' वह बीमार किंतु

सधे स्वर में अपनी बहू से मुखातिब हुई थी.

''आपके पैर ही तो सगुन हैं माताजी! देवी-देवता किसने देखे हैं? आप तो जीती-जागती देवी हैं...हमारी कुल देवी हैं.''

ये वीणा के तार थे या नववधू के हृदयोद्गार, उसके मन की ग्रंथियां नववधू की वाणी से क्यों टूटती हुई सी महसूस हो रही थीं. वह कितनी भयाक्रांत थी. यहां तक कि उसने अपनी नववधू पर भी शक किया था. बेशक उसने अपनी नववधू को भी संदेहों के दायरे में ला खड़ा किया था. एक बड़ा पाप हो गया था उससे!

उसकी कुंठा और अविश्वास बहू की विनम्रता के सामने बौने हो चले थे. उसे बहू की शालीनता आश्वस्त करती प्रतीत हो रही थी.

अब आशंकाओं-कुशंकाओं के नागपाश ढीले पड़ रहे थे. उसमें विश्वास जग रहा था. बहू को गले लगाने के लिए वह अधीर हो रही थी.

अपनी बहू के बांहों के हार उसके गले में सुशोभित हो रहे थे और वह बहू के गले में सोने का हार पहनाती हुई फूली नहीं समा रही थी.

 

बंगला कहानी

अंत में उन्होंने लिखा था-

'आज एक बात कहूंगा, नाराज मत होइयेगा. एक दिन आपने कहा था, लक्ष्मी जी को लोगों के सिर पर पैर रखकर रौंदते हुए चलने की आदत है. उनके चरणों को आपने रास्ते की धूल में उतारने की बात कही थी. लेकिन आपने तो उन चरणों को खींच कर अपने ही माथे पर रख लिया. आप लज्जित न हों, ये चरण कमल हैं ही इतने लुभावने कि अपने सर पर रखे बिना चैन ही नहीं मिलता. क्या आपके सर पर भी देवी जी के रजत रथ के उपयुक्त रास्ता तैयार हो गया है! समझे या नहीं, गंजापन आया है, या नहीं!'

नुटू मोख्तार का सवाल

ताराशंकर बंद्योपाध्याय

न्द्रप्रस्थ में राजसूर्य यज्ञ के समारोह के समय ही कुरूक्षेत्र के युद्ध की भूमिका तैयार हुई थी. त्रेता में लंकाकाण्ड की भूमिका भी रामचन्द्र के युवराज्याभिषेक समारोह में बनी थी. फूल की पंखुड़ियों के अदंर जिस तरह कीड़ा छुपा रहता है, उसी तरह किसी-किसी समारोह के आनन्द-उत्सव की ओट में भावी अशांति की संभावना छिपी रहती है. कंकणा ग्राम में भी एक ऐसी ही घटना हो गई. कंकणा ग्राम के रईस निवासियों के दान व सहायता से एक खैराती दवाखाने की स्थापना हुई. उसी के उद्घाटन अनुष्ठान के समारोह में नुटू मोख्तार के साथ कंकणा के जमींदारों का झगड़ा शुरू हो गया.

कंकणा काफी बड़ा व मशहूर ग्राम है. कंकणा गांव की समृद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है. दूर से कंकणा की ओर देखने से वह एक देहात नहीं मालूम पड़ता. ऐसा लगता है मानो वह किसी अच्छे शहर का एक रईस मुहल्ला है. बहुत दिनों से यह कहावत चली आ रही है कि धन की देवी लक्ष्मी कंकणा से बंधी हुई है. कहते हैं कि अतीत में कभी देवी लक्ष्मी उस रास्ते से जा रही थीं. एकाएक उनके हाथ का कंगन खुलकर कहीं रास्ते में गिर पड़ा. उस कंगन की ममता से बंधी आज भी वह कंकणा ग्राम में घूम रही हैं. कंगन (कंकण) से ही ग्राम का नाम कंकणा पड़ा है.

कहावत हमेशा कहावत ही होती है, लेकिन किसी कहावत के चलने के पीछे हमेशा कोई कारण होता है, यहां भी एक कारण है. कंकणा ग्राम का मुखर्जी परिवार बंगाल का बड़ा ख्याति प्राप्त धनी परिवार है. बंगाल के अनेक स्थानों में उनका धन बिखरा पड़ा है. अनेक जमींदार परिवार मुखर्जी के कर्ज में डूबे हैं. और फिर मुखर्जी लोग खुद भी जमींदार हैं.

मुखर्जी परिवार के सदस्यों की संख्या अब बहुत बढ़ गई है, फिर भी उससे उनके धन में कोई कमी नहीं आई है. सन्तति वृद्धि के साथ-साथ ब्याज की रकम भी समान रूप से बढ़ती जा रही है. कहते हैं कि मुखर्जी परिवार के संदूक में रुपयों के भी बच्चे पैदा होते हैं लेकिन यह भी कहावत ही है. कंकणा के बाबुओं के ब्याज का व्यापार लाखों रुपये का है.

लेकिन आश्चर्य की बात है कि ऐसे अमीरों के गांव में न तो एक स्कूल है, न दवाखाना, यहां तक कि हाट-बाजार भी नहीं है. होने को है तो सही, दो-एक मिठाई की दुकानें, लेकिन उनमें भी लाई-गट्टा और बताशे के सिवाय और कुछ नहीं मिलता. दूसरी मिठाई रखने के लिए बाबू लोगों की मनाही है, इसलिये दुकानदार भी कोई नहीं रखते.

बाबू लोगों का कहना है कि मिठाई रहने से बच्चे जरूर खायेंगे, और मिठाई खाने से उनके पेट में केचुए पैदा होंगे.

हलवाई कहते हैं, बिक्री बट्टा तो सब उधार में चलता है, मिठाई रखने से क्या फायदा. मालगुजारी में से कितना कटाया जा सकता है? और फिर, हमारी दुकान में बकाया बढ़ने के साथ ही साथ बाबू लोगों के बही-खाते में हम पर ब्याज की रकम बढ़ने लगेगी.

हाट की बात उठने पर कंकणा के बाबू लोग कहते हैं- हाट का मतलब तो लक्ष्मी को लेकर व्यापार, उससे तो लक्ष्मी देवी चंचल हो जाएंगी. स्कूल की बात से वे चौंक उठते हैं, कहते हैं, 'अरे राम! मां लक्ष्मी की सौत को घर लाएं? लड़के बाहर जाकर पढ़-लिख आवें, कोई हर्ज नहीं, लेकिन कंकणा में सरस्वती जी का आसन नहीं बिछाया जाएगा.'

दवाखाने के बारे में भी ऐसे ही तर्क अवश्य उठाये होंगे, परन्तु जिला मजिस्ट्रेट साहब के सामने यह तर्क नहीं चल सका. साहब के आदेश पर बाबुओं के चन्दे से एक खैराती दवाखाना की स्थापना हुई.

उसी खैराती दवाखाने के उद्घाटन का दिन था. बड़े धूम-धाम से कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. दवाखाने की नई इमारत के सामने शामियाना लगाकर देवदार की पत्तियों और रंग-बिरंगी झंडियों से मंडप सजाया गया था. थाने के जमादार बाबू से लेकर जिले के जज-मजिस्ट्रेट तक सभी पधारे थे. सदर व महकमे के वकील-मोख्तार लोगों में भी अनेक लोग उपस्थित थे. भालकुटी ग्राम के मोचियों का अंग्रेजी बाजा तक किराये पर लाया गया था. आवाहन, वरण, पुष्प वर्षा, माल्यदान, प्रार्थना-गान खत्म होते-होते तालियों की गड़गड़ाहट के असर से कार्यक्रम खूब जम उठा था. सभा मंडप में एक तरफ शेरवानी, पगड़ी, अंगूठी, घड़ी, सोने की जंजीर से सजे-धजे मुखर्जी बाबू लोग बैठे थे. उनमें कुछ नौजवान उम्र वालों ने हैट, कोट, टाई पहन रखा था. उनकी आंखों पर चश्मे थे. बाबू लोग हर कार्यक्रम के अन्त में सर हिलाकर हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे थे.

इसके बाद भाषण का मौका आया. किंतु अब सभा मुरझा सी गई. ऐसा लगने लगा कि आयोजन में सिर्फ तालियां बजाने वाले लोग ही हैं- भाषण देने वाला कोई नहीं. आखिरकार फौजदारी अदालत के एक वकील साहब उठे और उन्होंने लक्ष्मी देवी के आश्रित उस वंश की तुलना कल्पतरु के साथ करते हुए कुछ देर तक बोलकर सभा की इज्जत बचाई. उनका भाषण खत्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से सारा मंडप गूंज उठा.

इसके बाद सभा में फिर वही पहले जैसी चुप्पी छा गई. सभापति थे जिला के जज साहब. उन्होंने चारों ओर देखकर पुकारा, 'आइए, कोई कुछ बोलिये!'

किसी ने जवाब नहीं दिया.

सभापति जी ने फिर कहा, 'बोलिये, बोलिये, कोई अगर कुछ बोलना चाहें तो बोलें.'

रामपुर महकमे के बुद्ध मुन्सिफ साहब ने अबकी बार नुटू बाबू से अनुरोध किया, 'नुटू बाबू, आप कुछ बोलिये?'

नूटू बाबू-नुटबिहारी बंद्योपाध्याय, रामपुर महकमे के मोख्तार हैं. मुन्सिफ साहब उनके हमउम्र न थे, फिर भी दोनों में काफी घनिष्ठता थी. नुटू बाबू ने हाथ जोड़कर कहा, 'मुझे माफ करें.'

लेकिन सभापति जी ने उन्हें माफ नहीं किया. उन्होंने अनुरोध करते हुए कहा, 'नहीं-नहीं, आप कुछ बोलिये न.'

अब नुटू बाबू ने अपने दो मोटे सूती चद्दर कुर्सी पर रखे और उठ खड़े हुए. उन्होंने बोलना शुरू किया, 'सभापति महोदय, और सज्जन वृन्द, शायद आप सभी जानते हैं कि बच्चा पैदा होने के बाद उसके मुंह में सबसे पहले शहद दिया जाता है. कहते हैं कि मेरी मां ने मुझे नीम के फूल का शहद दिया था. मेरी बातें बहुत कड़वी होती हैं. इसीलिए मैं कुछ बोलना नहीं चाहता था. लेकिन भरोसा इसी बात का है कि सब्जियों में करेले का भी एक स्थान है, शरीर में रस की मात्रा बढ़ जाने पर कड़वी चीज खाने का नियम है. इसी वजह से बसंत के मौसम में नीम की पत्ती खायी जाती है. कंकणा ग्राम में हमारे धनी मुखर्जी परिवार के दान से खैराती दवाखाने की स्थापना हुई, यह बड़ी खुशी की बात है, आनन्द की बात है- इसे अच्छा काम अवश्य कहा जा सकता है. लेकिन मुझे बार-बार यही प्रतीत हो रहा है कि गाय मारकर जूता दान हो रहा है और जूता भी उस मरी हुई गाय के चमड़े से ही बना है. इन्हीं बाबुओं के इस इलाके की सिंचाई के लिए तालाब का पानी बंद कर दिया है. इसकी वजह से फसल नहीं पैदा हो पाती, जिससे भूख से मरता किसान कमजोर और रोग का सहज शिकार बन गया है. ब्याज का ब्याज- उसका भी ब्याज उनसे वसूलकर, उन्हें पूरी तरह तबाह कर...'

सारी सभा में खलबली मच गई. सभा में उपस्थित मुखर्जी बाबू लोग बैठे-बैठे पसीने से तर होने लगे. उनकी मुस्कुराहट गायब हो चुकी थी. एक-दूसरे का मुंह ताकते हुए वे पत्थर की मूर्ति की तरह निश्चल होकर बैठे थे. उनकी ओर देखकर सभा की भद्र मण्डली एक अजीब परेशानी का अनुभव करने लगी.

नुटू बाबू तब तक काफी आगे बढ़ चुके थे. वे कह रह थे, 'मुझसे पहले के वक्ता ने कल्पतरु के साथ उनकी तुलना की है. मुझे लगता है कि उन सज्जन ने इनके साथ थोड़ी ठिठोली की है, क्योंकि वास्तविक संसार में कल्पतरु काल्पनिक वस्तु है- आकाश-कुसुम की पुष्पांजलि के समान ही वह मजाक की चीज है. सच्चाई से उसका कोई वास्ता नहीं है. मेरे ख्याल से इनकी तुलना सिर्फ खजूर के पेड़ से की जा सकती है- मेसोपोटेमिया के खजूर का पेड़ नहीं, हमारे बंगाल के निखालिस गुठलीदार खजूर के पेड़ के साथ. उस पेड़ के नीचे बैठकर कभी किसी को छाया नहीं मिल सकती, फल वह भी सिर्फ गुठली ही है, और उस पेड़ का आलिंगन करने जाएं तो बाप रे बाप. एकदम श्रमाया ही है. इनके ब्याज का दर चक्रवृद्धि की रफ्तार से चलता है. इनके रियायों के लिए निर्दिष्ट दुकान का अधेले का चबेना, अधेला का बताशा- यह कोटा बंधा है. अगर ब्याज माफ कर देने के लिए कोई इनसे विनती कर इनसे लिपट जाता है, तो इनकी बातों के कांटों से उसे शर-शय्या ही प्राप्त हो जाती है. बस भरोसा मात्र इन हंसुओं पर है, जो शुद्ध फौलाद के बने हुए हैं- खजूर के पेड़ों का गला काटने के लिए- वे ये लोग हैं.'

यह कहकर नुटू बाबू ने सरकारी कर्मचारियों की ओर इशारा कर समझा दिया कि उनका तात्पर्य वे लोग ही हैं.

'खजूर के पेड़ से रस निकालना हो तो हंसुओं के बिना काम नहीं चलता. हंसुआ चलाने पर मीठे रस की धारा निकल कर गगरी भर देती है. ऐसे ही एक गगरी-भर रस आज हमारे विलायती सोने के पानी चढ़े हुए हंसुए, अर्थात् हमारे मजिस्ट्रेट साहब बहादुर की कृपा से इलाके के लोगों को मिला है. इससे उन लोगों की प्यास थोड़ी सी बुझेगी. इसके लिये हंसुआ व खजूर के पेड़ दोनों को धन्यवाद देकर मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं.'

नुटू बाबू बैठ गये लेकिन तालियां कोई खास सुनाई नहीं पड़ी, सिर्फ कुछ नासमझ बच्चों ने बड़े उत्साह से तालियां बजा दीं. काफी देर के बाद सभा के बाकी सब लोगों ने हाथ पर हाथ लगाया लेकिन उससे कोई आवाज नहीं निकली. उसके पश्चात् सभा स्थल निस्तब्ध हो गया. सभी लोग एक विचित्र परेशानी का अनुभव करने लगे. सभा में ऐसी घुटन हो गई जैसी हवा न बहने से बादलों से घिरी बरसात की रात्रि में होती है. मुखर्जी बाबू लोग सर नीचा किये, गुस्सा दबाकर, मन ही मन अजगर की तरह फुंफकार रहे थे.

किसी तरह सभा खत्म हुई, मेहमान लोग सब चले गये. तब कहीं जाकर मुखर्जी बाबुओं से सर उठाया. उनके सिर विषैले अजगर के समान हो उठे थे. नुटू मोख्तार को खत्म कर डालने की शपथ लेकर वे कोठी के अंदर चले गये.

यह समाचार नुटू बाबू से छिपा नहीं रहा. रामपुर में ही उनके पास कंकणा का समाचार पहुंच गया. बड़े मुन्सिफ बाबू ने ही यह समाचार उन्हें सुनाया. सुनकर नुटू बाबू ने हंस कर, हाथ जोड़ किसी को प्रणाम किया.

मुन्सिफ बाबू ने पूछा, 'क्यों, बाबू लोगों को प्रणाम कर रहे हैं क्यों?'

'नहीं; महर्षि दुर्वासा को प्रणाम कर रहा हूं.'

'तो यूं कहिए कि आप खुद को ही प्रणाम कर रहे हैं, क्योंकि लोग तो आपको ही कलियुग का दुर्वासा कहते हैं.'

नुटू बाबू ने जवाब दिया, 'नहीं. यदि यह सच होता तो लक्ष्मी का अहंकार तोड़ने के लिए एक बार फिर उसे समुद्र के नीचे निर्वासित कर देता.'

नुटू बाबू ऐसे ही स्वभाव के व्यक्ति थे. उस दिन जो उन्होंने कहा था, मेरी मां ने मुझे नीम के फूल का शहद दिया था, वह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी. बात चाहे सही न हो, लेकिन उनका आशय बिल्कुल सत्य था. उनका स्वभाव बचपन से ही ऐसा था.

बी.ए. पास कर पहले नुटू बाबू ने स्कूल की मास्टरी का पेशा अपनाया था. उनकी इच्छा थी कि वह अध्यापकी का एक आदर्श खड़ा करें. लेकिन उनके स्वभाव की वजह से उनकी इच्छा पूरी न हो सकी, अध्यापकी का काम छोड़कर मोख्तारी का पेशा अपनाने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ा.

घटना इस प्रकार थी- उस वर्ष पूजा के समय ग्राम के रईस जमींदार चटर्जी परिवार में नुटू बाबू की पत्नी दावत खाने गई थी. पर वहां से वापस आते ही वह रो पड़ी और बोली, 'अब मैं कभी कहीं दावत खाने नहीं जाऊंगी.'

नुटू बाबू कोई किताब पढ़ रहे थे. उन्होंने सर उठा कर पूछा, 'क्यों?'

इस 'क्यों' का जवाब उनकी पत्नी आसानी से नहीं दे सकी, बार-बार उसे रुलाई आ जाती थी. चिढ़कर नुटू बाबू किताब बन्द कर उठ बैठे. बार-बार पूछने पर बड़ी मुश्किल से उन्हें बात समझ में आई. नुटू बाबू की श्रीमती जी दुर्भाग्यवश गांव के अमीर घराने की गहनों से लदी बहुओं की पंक्ति में भोजन करने बैठ गई थीं. नतीजा यह हुआ कि जब भी कोई परोसने आता, उनका अपमान करता. जिस तरह घर की मालकिन व नौकरानी के साथ खुले आम दो तरह से व्यवहार किया जाता है, उसी तरह उनके साथ नौकरानी-सा बर्ताव किया गया.

नुटू बाबू कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर अपने ही मन में बोल उठे, 'लक्ष्मी! दुर्वासा ने तुझे नाहक अभिशाप नहीं दिया. उसने ठीक ही किया.'

उनकी पत्नी कुछ समझ नहीं पाई, सिर्फ मुंह बाये उनकी ओर ताकती रही. नुटू बाबू को अपनी ओर देखते ही वह फिर से रो पड़ी.

नुटू बाबू ने कहा, 'अच्छा मुझे दो साल की मोहलत दो. इसका बदला जरूर लूंगा.'

उसके बाद ही मोख्तारी की परीक्षा पास करने के लिये वे तैयारी करने लगे. एक ही साल के अंदर मोख्तारी पास करके रामपुर महकमे में मोख्तारी करने लगे. तीसरे साल पूजा में सधवा भोजन के समय एक अनोखा काण्ड हो गया. मछली परोसी जा रही थी. परोसने वाला जब नुटू बाबू की पत्नी के पत्तल के पास आया, तो उन्होंने अपनी साड़ी के अंदर के रुपयों की एक भारी थैली निकाल कर सामने रख दी और कहा, 'इन लोगों के समान ही गहने मेरे पास भी हो जायेंगे, ये रहे उनके रुपये. अब इनके बराबर मछली मुझे न भी दो, तो भी कम-से-कम एक तो दे ही देना.'

परिवेषक के हाथ से मछली का बर्तन गिर गया. पूरे गांव में इस बात की जोर-शोर से चर्चा होने लगी. लोगों ने सिर्फ नुटू बाबू पर ही दोष नहीं लगाया, उनके पूर्वजों को भी कोसते हुए बोले, 'बबूल का वंश है, इसमें ऊपर से नीचे तक कांटे ही कांटे हैं. कांटा चुभाना इनकी आदत ही ठहरी.'

नुटू बाबू के दादा शास्त्रज्ञ थे, लेकिन पाण्डित्य की ख्याति से अप्रिय सत्य भाषण के लिये उनकी बदनामी ज्यादा थी. एक बार किसी राजघराने में श्राद्ध के सिलसिले में शास्त्रार्थ चल रहा था. युवराज अपनी पंडिताई जाहिर करने के लिए गीता का एक श्लोक बोलते हुए कह उठे, 'अजी स्वयं भगवान ने ही कहा है, 'जदा जदा ही धर्मस्य....'

नुटू बाबू के दादा ने बीच में ही टोक कर कहा था, 'आपकी जिह्वा की जड़ता अभी दूर नहीं हुई है, उसे और भी मांजने की जरूरत है. 'जदा जदा' नहीं यदा यदा!'

नुटू बाबू के पिता का नाम था, 'कुनो'-काली प्रसाद. वे विशेष पंडित नहीं थे, न ही उनमें कोई और विशेषता थी. समाज में उन्हें कोई प्रतिष्ठा नहीं मिली थी, उसके लिए उन्होंने कोई चेष्टा भी नहीं की थी. लेकिन सारी जिंदगी उन्होंने घर के कोने में बैठकर ही बिता दी. कभी किसी से दुश्मनी नहीं की, फिर भी लोग कहते थे, यह आदमी घमंडी है.

खैर, ये सब पुरानी बातें हैं.

कंकणा के जमींदारों की शपथ सुनकर नुटू बाबू घबराये नहीं. कंकणा के बाबू लोगों ने अपनी परम्परा के अनुसार प्रतिशोध लेने का तरीका ढूंढ़ना शुरू किया. लेकिन उनके कर्मचारियों ने निराश होकर खबर दी कि नुटू बाबू पर कहीं कोई कर्ज नहीं है. बाबू लोग तलाश में थे कि किसी के पास नुटू बाबू का हैंडनोट या दस्तावेज गिरवी रखे हों तो उन्हें खरीद कर नुटू बाबू को कर्ज के जाल में जकड़ कर खत्म कर डालेंगे.

मुखर्जी परिवार के बड़े बाबू ने बहुत देर तक चुप रहने के बाद अपने कर्मचारियों से पूछा, 'लाट कमलपुर के जमींदार की हालत इस समय कैसी है?'

कमलपुर में ही नुटू बाबू का मकान है, खेत, जमीन, तालाब, बगीचा आदि सारी जायदाद कमलपुर के इलाके के अंदर है.

नायब ने जवाब दिया, 'हालत खास अच्छी तो नहीं है, लेकिन किसी तरह गुजारा हो जाता है. हां दो-एक घरों की हालत बहुत खराब है.'

बड़े बाबू बोले, 'तो फिर उन लोगों का हिस्सा खरीद लो, रुपये कुछ ज्यादा लगे तो कोई हर्ज नहीं. लेकिन हां, एक बार हमारे सभी साझेदारों की राय पूछ लो!'

लगभग चार महीने बाद की बात है.

शाम के समय नुटू बाबू संध्या उपासना कर रहे थे...उनकी पत्नी कमरे में आकर खड़ी हो गई. नुटू बाबू ने देख कर भी नहीं देखा. कुछ देर इंतजार करने के बाद पत्नी ने कहा, 'सुनते हो, कमलपुर से हमारा आदमी महाभारत मंडल आया है.'

नुटू बाबू आंखें मूंद कर ध्यान करने बैठे.

पत्नी ने बताया, 'कंकणा के बाबू लोगों ने उसे मारा-पीटा है, उसके तालाब से मछलियां उठवा ली हैं, उसकी गायों को बन्द करवा लिया है.'

नुटू बाबू आंखें बंद किये चुपचाप बैठे रहे. उनकी पत्नी खींझकर कमरे से बाहर चली गई. नियमानुसार संध्या उपासना खत्म करने के बाद नुटू बाबू उठकर बाहर आये और पत्नी से पूछा, 'दूध गरम हो गया!'

पत्नी ने दूध का कटोरा सामने रख दिया तो नुटू बाबू ने कहा, 'देखो, भगवान को कोई पुकारता हो, तो उसका ध्यान नहीं बंटाना चाहिए.'

पत्नी ने कहा, 'बेचारा ऐसे रो रहा है कि मुझसे रहा नहीं गया. आंसुओं से बेचारे का खाना तक नमकीन हो गया है.'

मुंह धोकर पान चबाते-चबाते नुटू बाबू बाहर के कमरे में आये तो महाभारत उनके पैरों में लोट गया. नुटु बाबू ने उसका हाथ पकड़ कर खींचा और कहा, 'पहले उठो और बताओ कि क्या हुआ, उसके बाद रोना.'

महाभारत की रुलाई और बढ़ गई.

नुटू बाबू ने कड़े स्वर में कहा, 'मैं कहता हूं उठोगे या नहीं?'

उनकी आवाज की कठोरता व बात के ढंग से महाभारत हतप्रभ होकर उठ बैठा और आंसू पोंछने लगा.

नुटू बाबू ने पूछा, 'क्या हुआ है, बताओ!'

'जी, कंकणा के बाबुओं ने हमारे तालाब की सारी मछलियां- तीन छंटाक एक-एक पाव की...'

'तीन छंटाक, एक पाव की बात छोड़ो. तुम्हारे तालाब की सारी मछलियों का क्या हुआ बताओ!'

'जी, बाबू लोगों ने जबर्दस्ती पकड़वा लीं!'

'उसके बाद!'

इस सवाल को सुनकर महाभारत हक्का-बक्का होकर उनकी ओर देखने लगा. नुटू बाबू ने फिर से पूछा, 'और क्या किया है!'

'जी, हमारे गाय-बैलों को पकड़वा कर पिंजरापोल में बन्द करवा दिया है.'

'और?'

अबकी महाभारत फूट-फूट कर रोने लगा, रोते-रोते बताया, 'चपरासी से मुझे बंधवाकर-.'

आगे वह बोल न सका.

नुटू बाबू ने कहा, 'अच्छा, लेकिन कारण क्या है? तुम्हारे साथ यह सब उन लोगों ने क्यों किया?'

किसी तरह अपने को संभाल कर आंखें पोंछते-पोंछते महाभारत ने कहा, 'जी, मुझे बाबू लोगों ने बुलाकर कहा कि नुटू मोख्तार की जमीन तुम ही जोतते हो, हमने सुना है. तुम्हें वह जमीन छोड़ देनी होगी. नुटू मोख्तार की जमीन को इस इलाके में किसी को जोतने नहीं दिया जाएगा.'

नुटू बाबू ने कहा, 'अच्छा, फिर?'

'जी, मैंने हाथ जोड़ कर बताया कि हुजूर, यह मुझसे नहीं हो सकेगा. वह बाभन हैं- नेक आदमी हैं. हम तीन पुस्त से उनकी जमीन जोतते हैं- वे हमारे पुराने मालिक हैं. इतना कहते ही, बस-.'

रुलाई के मारे फिर उसकी आवाज रुंध गई. वह चुपचाप जमीन से आंखें गाड़कर आंसू बहाने लगा.

नुटू बाबू ने लंबी सांस खींच कर कहा, 'महाभारत तुम्हें मुकदमा लड़ना होगा. खर्चा-वर्चा सब मैं करूंगा, आना-जाना, अदालत खर्च सब मैं दूंगा. तुम बस मुकदमा दायर कर दो. सोच-विचार कर लो. कल सवेरे मुझे जवाब देना और अगर यह तुमसे न हो सके तो मेरी जमीन छोड़ दो. मुझे कोई दुःख न होगा. तुम्हें जो नुकसान हुआ है, उसे मैं पूरा कर दूंगा.'

उसके बाद लालटेन की लौ उठाकर, कुछ किताबें उतार कर वे बैठ गये. बहुत ध्यान से कानून का अध्ययन खत्म कर जब उन्होंने किताब बंद की, तब इस छोटे महकमे में सन्नाटा छा गया था. दूर के जंक्शन स्टेशन के यार्ड से मालगाड़ी की शंटिंग की आवाज तेज व गंभीर होने लगी थी. महाभारत कब तक वहीं बैठा एकटक नुटू बाबू की ओर देख रहा था. उसकी ओर नजर पड़ते ही नुटू बाबू बोले, 'तुम अब तक बैठे हो, महाभारत! जलपान तो किया है न, तम्बाकू नहीं पी!'

महाभारत की आंखें गीली थीं, उसने जल्दी से आंखें पोंछकर शर्मिन्दा होकर कहा, 'जी हां, जाता हूं.'

नुटू बाबू ने कहा, 'तुम्हारा नुकसान मैं पूरा कर दूंगा, लेकिन बेइज्जती का नुकसान तो मैं पूरा नहीं कर सकूंगा. उसके लिए तुम्हें मुकदमा करना पड़ेगा, राजा के दरवाजे पर जाना पड़ेगा.'

महाभारत फिर से रो पड़ा. नुटू बाबू की आवाज में जो स्नेह का स्पर्श था, उससे उसका शोक मानो छलक पड़ा. उसने कहा, 'बाबू जी, छोटी, कच्ची मछलियां थीं, इस वर्ष की 'हालि-पोना' एक पाव, तीन छंटाक से बड़ी नहीं थी.'

अबकी नुटू बाबू नाराज नहीं हुए, क्रोध नहीं प्रकट किया, हंसे भी नहीं. बोले, 'ठीक है जाओ, तंबाकू पीकर अब खाना-वाना खा लो!'

महाभारत आंखें पोंछते हुए चला गया.

अंदर जाकर नुटू बाबू ने पत्नी से कहा, 'आज हमारे घर में लक्ष्मी की पूजा नहीं होगी.'

आश्चर्यचकित होकर पत्नी बोली, 'क्या बोलते हैं? भला ऐसा भी कहीं हुआ है?'

नुटू बाबू ने कहा, 'नहीं होगी, नहीं होगी.'

पत्नी और कुछ बोलने का साहस नहीं कर सकी.

मुकदमा दायर हो गया.

नुटू बाबू के योग्य संचालन से और तर्कपूर्ण सवालों से सारी घटनाओं पर सजाया गया झूठा आवरण टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया और सत्य की असली मूर्ति प्रकट हो गई. उसी सूक्ष्म व ठोस दलीलों के कारण मजिस्ट्रेट साहब के सामने कंकणा के बाबुओं के गुमास्ता व चपरासियों को दोषी करार देने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था. उन्होंने उन लोगों को कड़ी सजा देने का आदेश दिया. चारों ओर तहलका मच गया.

लेकिन किस्सा यहीं पर खत्म नहीं हुआ, कंकणा के बाबुओं ने जज-अदालत में अपील की.

उस दिन शाम के समय बूढ़े मुन्सिफ बाबू ने आकर कहा, 'नुटू बाबू, काफी हो चुका है, अब इस मामले का आपस में निबटारा कर लीजिये!'

आश्चर्य के साथ उनके मुख की ओर देख कर नुटू बाबू ने कहा, 'यह आप क्या कह रहे हैं?'

'ठीक ही कह रहा हूं. झगड़ा तो यहीं खत्म नहीं होगा. मान लीजिये कि जज-अदालत में भी यही सजा कायम रही तो वे हाईकोर्ट भी जाएंगे. फिर, नये झगड़े भी पैदा हो सकते हैं. उनके पास पैसे की कमी तो है नहीं. लोग कहते हैं कि कंकणा में लक्ष्मी बंधी हुई है.'

नुटू बाबू ने कहा, 'मेरा झगड़ा तो उस लक्ष्मी से ही है. उस देवी की आदत ही है लोगों के सर पर पैर रख कर रांदते हुए चलने की. उसके पैरों को मैं जमीन की धूल पर उतारूंगा.'

मुन्सिफ ने कहा, 'अरे छिः छिः यह आप क्या कह रहे हैं, नुटू बाबू!'

नुटू बाबू ने जवाब दिया, 'मैं तो ठीक ही कहता हूं मुन्सिफ बाबू, लेकिन आपको मेरी बात जंच नहीं रही है.'

उसके बाद हंस कर फिर बोले, 'न जंचना स्वाभाविक ही है. लक्ष्मी के पैर तो आपके ही सर पर सवार है. पगडंडी तो संकीर्ण होती हैं, किंतु आपके सर पर तो रथ चलने लायक राजकीय सड़क तैयार हो गई है. आपकी चांद काफी चौड़ी है.'

मुन्सिफ बाबू ठहाका मारकर हंस पड़े और बोले, 'खूब कहा आपने, बड़े मौके की बात कह डाली.'

उसके बाद उस प्रसंग में वे और कुछ नहीं बोले. हास-परिहास में शाम का समय बीत गया.

लेकिन लक्ष्मी की पराजय इतनी आसानी से नहीं होती है, जज-अदालत में अपील किये जाने पर यह मुकदमा खारिज हो गया. नुटू बाबू मुंह लाल किये अदालत से बाहर आये. सत्य की इस अपमानपूर्ण पराजय से उनके क्षोभ व शर्म की सीमा न थी. लेकिन उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ. क्योंकि जज-अदालत के वकील का सवाल सुनकर ही उन्हें इस बात का अंदाजा हो गया था कि वे हारेंगे.

सदर से रामपुर वापस आकर वे संध्या उपासना में बैठे ही थे कि मकान के बाहर कम से कम दस ढाक1 एक साथ प्रचंड आवाज के साथ बज उठे. कुछ क्षण बाद उनकी पत्नी विस्मय-विह्वल होकर उनके कमरे में आई और बोली, 'कंकणा के बाबुओं ने हमारे दरवाजे के सामने ढाक बजाने का हुक्म दिया है. लोगों ने खूब उछल-कूद मचा रखी है.' नुटू बाबू में कोई प्रतिक्रिया न हुई. वे जिस तरह ध्यान में बैठे थे, उसी प्रकार बैठे रहे.

लगभग एक महीने के बाद कंकणा के बाबुओं के घर में एक और समारोह हुआ. कुरूक्षेत्र के युद्ध में जब दुर्योधन द्वैपायन सरोवर में छिप गया था, तब पांडवों ने कोई समारोह नहीं किया था, लेकिन नुटू मोख्तार पराजय की लज्जा में मोख्तारी तक छोड़कर कलकत्ता भाग गये, इस खुशी में कंकणा के बाबू लोगों ने एक अच्छा खासा उत्सव मनाया. उसी समारोह में उन लोगों ने घोषणा की कि ढाक बजाकर बच्चू की मोख्तारी छुड़ायी है, अब कनस्टर बजाकर गांव से भगाएंगे.

बड़े बाबू ने कहा, 'उससे पहले उस महाभारत के बच्चे को खत्म करो, अठारह पर्व में से एक भी पर्व न बचा रहे.'

लगभग तीन साल के अंदर कंकणा के बाबुओं की यह शपथ भी करीब-करीब पूरी होने लग गई. महाभारत सब कुछ गंवाकर अब पूरी तरह छुटकारा पाने का एक आसान तरीका ढूंढ रहा था. लेकिन बहुत ही जिद्दी आदमी है यह महाभारत, किसी भी सूरत में बाबुओें के पैरों पर जाकर लोटने को तैयार नहीं हुआ. और नुटू मोख्तार गांव छोड़कर जो गये तो आज तक वापस नहीं आये. उनकी पत्नी अपने मायके में रहने लगी थी.

उस दिन जमींदार को शुभचिंतक ग्राम्य मंडल ने आकर महाभारत से कहा, 'अरे जा, बाबुओं के पैरों पर लोट जा. पानी में रहकर मगर से लड़ाई नहीं की जाती.'

सिरफिरे महाभारत ने जवाब दिया, 'लड़ाई करो तो मगर काटता ही है, न करो तब भी काटता है. इसलिए लड़कर मरना ही अच्छा है.'

मंडल नाराज होकर बोला, 'लक्ष्मी जब सर पर सवार होती हैं तब इंसान का दिमाग इसी तरह घूम जाता है.'

महाभारत ने कहा, 'मुझे लक्ष्मी ही ज्यादा पसंद है भैया, वह किसी को छोड़कर नहीं जाती.'

मंडल अवाक् हो गया, आखिर में उसने कहा, 'मेरा भी क्या कसूर है! नहीं तो ब्राह्नण जमींदार...'

महाभारत एकाएक भभक उठा, हाथ-पैर फेंकते हुए चिल्ला-चिल्लाकर बोलने लगा, 'चंडाल कसाई, चंडाल कसाई.'

दो दिन के बाद ही महाभारत की टूटी झोपड़ी में आग लग गई.

औरत व बच्चों की चीत्कार सुनकर लोग दौड़ आये, तो देखा महाभारत की झोपड़ी जल रही है. लेकिन महाभारत उधर ध्यान न देकर एक लंबे चौड़े काले जवान की छाती पर चढ़कर बैठा है और बेरहमी से उसे दबोचता जा रहा है. बड़ी कठिनाई से लोगों ने उस आदमी को महाभारत से छुड़ाया. दम घुटने से वह हांफते-हांफते बोला, 'पानी'.

महाभारत ने छलांग लगाकर एक जलता अंगार खींच लिया और कहा, 'ले पी पानी.'

उसी आदमी ने महाभारत के मकान में आग लगाई है, वह कंकणा के बाबुओं का चपरासी है. महाभारत ने उसे पुलिस के हाथ सौंप दिया. दूसरे दिन वह जले मकान की आग से चिलम सुलगाकर बेफिक्री के साथ तंबाकू पी रहा था, इतने में किसी ने आवाज लगाई, 'महाभारत!'

महाभारत ने बाहर आकर देखा, जमींदार का गुमाश्ता खड़ा हैं. छूटते ही उसने चिल्ला कर कहा, 'मैं कोई समझौता नहीं करूंगा, किसलिए आये हो तुम!'

गुमाश्ता ने कहा, 'अरे सुनो तो सही.'

कुछ भी न सुनकर महाभारत ने दोनों अंगूठे उसके सामने हिलाकर कहा, 'ले ले केला, ले ले केला, अब तू हमारा क्या बिगाड़ेगा!'

गुमाश्ता काला मुंह लेकर वापस चला गया, जाते समय उसने कहा, 'अबे गंवार, तू कुछ जानता भी है दुनिया किसके वश में है?'

दो दिनों के बाद रामपुर से नुटू बाबू का पुराना मुहर्रिर महाभारत को लेकर चला गया.

उसी दिन दोपहर को रामपुर की फौजदारी अदालत में महाभारत को साथ लेकर नुटू बाबू वकील का गाऊन पहन कर पहली बार दाखिल हुए. वे वकील होकर वापस आये हैं. इतने दिनों तक वे कलकत्ते में कानून की पढ़ाई कर रहे थे.

अब कंकणा के बाबू लोग काफी चिंतित हो उठे. नुटू बाबू की पैरवी पर एस.डी.ओ. साहब स्वयं घटनास्थल का मुआयना कर गये. अंत में कंकणा के बाबुओं के नायब गुमाश्ता को भी अभियुक्त बनाकर मुकदमे को दौरा अदालत में सुनवाई के लिए भेज दिया गया. नुटू बाबू खुद भी सदर में जाकर बैठ गये, सिर्फ बैठे ही नहीं, सरकारी वकील के सहयोग से खुद ही मामला चलाने लगे.

कुछ ही दिनों के अंदर कई लोगों के माध्यम से अनेक विनीत अनुरोध और अनेक प्रकार के लुभावने प्रस्ताव नुटू बाबू के पास आये. उन लोगों ने कहा, 'मुकदमा वापस ले लीजिये, इससे आपकी ही मर्यादा बढ़ेगी.'

नुटू बाबू ने कहा, 'अमीर के साथ गरीब का झगड़ा कभी न समझौते से खत्म हो सकता है. न कभी हुआ है और न कभी होगा.'

आखिर में उन्होंने कहा, 'हां, अगर बाबू लोग खुद कंधों पर ढाक लेकर अदालत के सामने बजाएं, या महाभारत के मकान की छत पर खुद चढ़कर उसे छा दें, तो मैं कोशिश कर सकता हूं.'

अनुरोध करने वाले मुंह काला करके उठ गये. मामला चलने लगा. गवाही सुनवाई खत्म हो जाने पर सरकारी वकील की सम्मति से नुटू बाबू ने सबसे पहले सवाल पूछना शुरू किया. ऐसा लगा मानो ज्वालामुखी पर्वत फट पड़ा हो. गहरी संवेदना से पूर्ण ओजस्वी भाषा के द्वारा सारी घटनाओं को उन्होंने मानो अदालत की आंखों के सामने प्रत्यक्ष खड़ा कर दिया. बलवान के अत्याचारों से त्रस्त दुर्बल के हाहाकार ने मानो मूर्त स्वरूप प्राप्त कर लिया. झगड़े के मूल सूत्र से शुरू कर इस आगजनी तक की सारी घटनाओं को गवाहों की गवाही के साथ मिलाकर उन्होंने साबित करते हुए आखिर में कहा, 'आज सब ओर धन के मद में मदहोश धनिकों के अत्याचारों से दुनिया जर्जरित हो गई है. विचाराधीन घटना उसकी एक जलती हुई मिसाल है. लेकिन अफसोस की बात यही है कि धनी के अपराध का दण्ड दुर्बल को देने के सिवाय न्यायाधीश के सामने दूसरा कोई उपाय नहीं है. लेकिन उसका विचार तो कोई और करेंगे- जो सर्मज्ञ हैं, सर्वत्र विराजमान हैं, सर्वनियन्ता हैं- वे इसका इंसाफ जरूर करेंगे. उस न्याय का थोड़ा-सा अंश हमें मालूम है, जिसे ईश्वर के पुत्र महामानव ईसा मसीह खुदा बता गये हैं. उन्होंने बताया है- धनी के ईश्वर के राज्य में प्रवेश की अपेक्षा सुई के छेद में से ऊंट का चला जाना आसान है.'

उनकी जिरह के बाद सरकारी वकील को और कुछ कहने की जरूरत नहीं मालूम हुई. फैसला सुना दिया गया, जिसमें अपराधी को कठोर सजायें दी गयीं. फैसले के बाद नुटू बाबू के बाहर आते ही उनके मुहर्रिर ने कहा कि तीन मुवक्किल मुकदमे के कागजात लेकर बैठे हुए हैं.

नुटू बाबू के दिमाग में उस समय भी उसी मुकदमें की बात घूम रही थी. भौंहें सिकोड़ कर वे मुहर्रिर को घूरने लगे.

उसने बताया, 'एक सेशन्स और दो एस.ओ.ओ. कोर्ट के मुकदमे हैं, मैंने चार रुपये फीस बताई है.'

पीछे से एक मोख्तार मित्र ने आकर बधाई देते हुए कहा, 'बहुत बढ़िया आर्गूमेंट हुआ है. अब फटे हुए पैंट और जूते बदल डालीए भाई. मेरे हाथ में एक केस है, तुम्हें ही वकालतनामा दूंगा. लेकिन मुवक्किल गरीब है.'

नुटू बाबू ने कहा, 'भेज देना. पैसे के लिये कोई फिक्र न करो!'

यह दुनिया अजीब है, लेकिन इस दुनिया में घटित होने वाली घटनाओं की विचित्रता और भी विस्मयकारी है. समय की विचित्र धारा की गति में कंकणा के बाबुओं के साथ नुटू का विरोध एक दिन अचानक एक असंभव परिणाम के साथ समाप्त हो गया.

पन्द्रह साल के बाद. उस दिन अचानक कंकणा के बाबुओं की बग्घी नुटू बाबू के मकान के अहाते में घुसी और दरवाजे के सामने आकर रुक गई. अंदर से बूढ़े बड़े बाबू जी, उनके पुत्र और तीसरे बाबू उतर आये. नुटू बाबू के दरबान ने बाकायदा उन्हें सलाम किया और दरवाजा खोल दिया. साथ ही साथ दो खानसामे आकर श्रद्धा के साथ नमस्कार कर कुर्सियों को पोंछ कर, अगल-बगल खड़े हो गये. बूढ़े बाबू जी ने कमरे के चारों तरफ देखकर कहा, 'वाह भाई वाह! हमारे नुटू ने तो यहां इन्द्रपुरी बना डाली है. खूब, खूब!'

बड़े बाबू के पुत्र ने एक खानसामा को बुलाकर कहा, 'अब वकील साहब को खबर दो. बोलो कंकणा के बड़े बाबू और तीसरे बाबू आये हैं.'

नुटू बाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ. वे तुरंत नीचे उतर आये और बोले, 'आइए, अहोभाग्य है, आज मेरा!'

बड़े बाबू जी ने कहा, 'तुम्हारे बिना बुलाये ही हम आये हैं, अब बैठने दोगे या भगा दोगे.'

नुटू बाबू सकुचा गये, बोले, 'अरे यह आप क्या कहते हैं? क्या मैं ऐसा कर सकता हूं या कोई भी भला आदमी कर सकता है?'

बड़े बाबू ने मुस्करा कर कहा, 'ठहरो, आज मैं तुम्हारे साथ सवाल करूंगा. तुम तो इस समय हमारे मुल्क के सबसे बड़े वकील हो, दूसरे जिलों से भी लोग तुम्हें बुला कर ले जाते हैं. देखता हूं आज कौन हारता है!'

नुटू बाबू ने आदर के साथ कहा, 'ठीक है, बैठने की कृपा करें!'

बड़े बाबू ने कहा, 'मान लो कि तुम्हारे घर कोई भिखारी आया है, उसे बैठने के लिये कहने से क्या फायदा अगर उसे भीख ही न दो.'

नुटू बाबू ने हाथ जोड़कर कहा, 'आप लोग मुझसे भीख मांगेंगे यह तो असंभव बात है, आशंका की भी बात है. यह तो बलि के द्वार पर बाभन के भीख मांगने जैसा मामला है. ठीक है पहले बैठ तो जायें.'

बड़े बाबू बार-बार गर्दन हिलाते हुए बोले, 'उहूं, पहले तुम वादा करो कि दोगे, तब बैठूंगा, नहीं तो जाता हूं.'

नुटू बाबू ने कहा, 'ठीक है, कहिये अगर मेरी क्षमता के अंदर होगा तो दूंगा.'

बड़े बाबू ने कहा, 'तुम्हें अपने पुत्र को मुझे भीख में देना होगा, मेरी नातिन को तुम्हें अपने यहां आश्रय देना होगा'

बड़े बाबू के पुत्र ने आकर नुटू बाबू के दोनों हाथों को पकड़कर विनती की. नुटू बाबू के आश्चर्य का ठिकाना न रहा.

तीसरे बाबू ने कहा, 'तुम्हारा लड़का बहुत अच्छा है, बी.ए. और एम.ए. में फर्स्ट आया है, तुम भी अब काफी धनी हो गये हो, बड़ी-बड़ी जगहों से तुम्हारे लड़के की शादी के लिये प्रस्ताव आ रहे हैं. लेकिन कंकणा मुखर्जी परिवार की लड़की धन, वंश व इज्जत में तुम्हारे पुत्र के अनुपयुक्त नहीं होगी. रूप की बात मैं नहीं कहता, वह तुम खुद ही देख सकोगे.'

नुटू बाबू ने बड़े व तीसरे मुखर्जी बाबू का चरण स्पर्श करते हुए कहा, 'आप लोगों की नातिन हमारे घर आयेगी, यह सचमुच मेरा सौभाग्य है!'

जिस विरोध की शुरुआत एक समारोह में हुई थी, एक और समारोह में उसका अंत हो गया.

विवाह सम्पन्न हो गया.

कार्यक्रम का अंत होने के बाद भी उत्सव खत्म नहीं हुआ था. आये हुए रिश्तेदारों में से सब लोग अभी नहीं गए थे. कुछ बेशर्म लालची रिश्तेदार वहीं डेरा डाले पड़े रहेंगे- ऐसा मालूम होता था. उन लोगों के बच्चों के मारे तस्वीरें फूलदान वगैरह टूट-फूट कर खत्म होते जा रहे थे.

नुटू बाबू सवेरे एक आराम कुर्सी पर बैठे तंबाकू पीते-पीते इसी समस्या के बारे में सोच रहे थे. बहुत परिश्रम और अनियमितता के कारण उनकी तबियत खराब हो गई थी, कुछ बुखार भी था. नौकर ने आकर खबर दी कि उनकी फाउन्टेन पेन कहीं नहीं मिल रही है. नुटू बाबू का खून सर में चढ़ गया. उन्होंने तुरंत श्रीमती जी को बुला भेजा. श्रीमती जी के आते ही उन्होंने आदेश दिया- रतनपुर की काली की मां, पारुल की श्यामा-ठकुराइन-सबको आज ही वापस लौटने के लिए कह दो.

श्रीमती जी ने आश्चर्य के साथ कहा, 'यह कैसे हो सकता है. कोई अतिथि खुद जब तक न जाये, उसे जाने के लिये कैसे कहा जाये. अपने ही तो लोग हैं.'

नुटू बाबू ने कहा, 'अपने लोगों से मैं छुटकारा पाना चाहता हूं. मुझ पर दया करो, उन्हें विदा करो. चाहे तो कुछ रुपये पैसे दे-दिवाकर विदा कर दो, नहीं तो वे कमरे दरवाजे सब तोड़-ताड़ देंगे.'

श्रीमती जी असमंजस में पड़ कर अंदर चली गयीं. नुटू बाबू थकावट के मारे कुर्सी पर लेट कर शायद रिश्तेदारों से छुटकारा पाने का उपाय सोच रहे थे. थोड़ी देर में मुहर्रिर ने आकर मुकदमे के कागजात सामने की मेज पर रखते हुए कहा, 'आपने फैसले की जो नकद मांगी थी, वह लाया हूं लेकिन खर्च नाहक कुछ ज्यादा हो गया है.'

नुटू बाबू सचेत होकर उठ बैठे. एक सेशन्स मुकदमे के फैसले की नकल उनके सामने रखी थी. इस मुकदमे में नुटू बाबू की अप्रत्याशित पराजय हुई थी. उनके कुछ सूक्ष्म तर्कों को न्यायाधीश ने अनुचित ढंग से अस्वीकृत कर दिया था! भौंहें सिकोड़ कर उन्होंने उस फैसले को उठा लिया. मुहर्रिर चला गया. फैसला पढ़ते-पढ़ते नुटू बाबू की आंखें व मुंह लाल हो गये. न्यायाधीश के मन्तव्य व अनुचित न्याय पद्धति को देखकर उनके क्रोध की सीमा न रही. गुस्से के मारे उन्होंने फैसले को उठाकर दूर फेंक दिया और कमरे के अंदर चहलकदमी करने लगे. ऊपर के कमरे में रिश्तेदारों के लड़कों ने ऐसा हुड़दंग मचा रखा था जिसकी कोई हद नहीं थी. नुटू बाबू बड़ी परेशानी के साथ ऊपर की ओर ताक कर बोले, 'भगवान रक्षा करो.' नौकर ने आकर कई चिट्ठियां मेज पर रख दीं. चिट्ठियों को देखते समय एक बहुत परिचित हस्ताक्षर में लिखे लिफाफे को देखकर उन्होंने आग्रह के साथ उसे खोला, हां पुराने मित्र वृद्ध मुंसिफ बाबू की चिट्ठी थी. इस शादी में नहीं आ सके, उसके लिए क्षमा मांगते हुए उन्होंने लिखा था-

'आने की इच्छा प्रबल थी, फिर भी गठिया के दर्द के सामने इच्छा की हार हुई! बिस्तर पर लेटे-लेटे ही आपके पुत्र व पुत्रवधू को आशीर्वाद भेज रहा हूं. डाक से कुछ आशीर्वादी भेंट भी भेजी है कृपया स्वीकार करें'

अंत में उन्होंने लिखा था-

'आज एक बात कहूंगा, नाराज मत होइयेगा. एक दिन आपने कहा था, लक्ष्मी जी को लोगों के सिर पर पैर रखकर रौंदते हुए चलने की आदत है. उनके चरणों को आपने रास्ते की धूल में उतारने की बात कही थी. लेकिन आपने तो उन चरणों को खींच कर अपने ही माथे पर रख लिया. आप लज्जित न हों, ये चरण कमल हैं ही इतने लुभावने कि अपने सर पर रखे बिना चैन ही नहीं मिलता. क्या आपके सर पर भी देवी जी के रजत रथ के उपयुक्त रास्ता तैयार हो गया है! समझे या नहीं, गंजापन आया है, या नहीं!'

पत्र की भाषा तीखे भाले की नोक की तरह उनके मस्तिष्क में आकर चुभ गई. अस्वस्थ उत्तेजित मन के अंदर अचानक एक विचित्र भाव का आविर्भाव हुआ. पूरी जिंदगी क्षण भर में उनकी आंखों के सामने सिनेमा के चित्रों के समान स्पष्ट दिखाई देने लगी. ऐसा लगा जैसे उनका मकान, उनका ऐश्वर्य सब कुछ जैसे कुत्सित भाव से उनका उपहास कर रहे हैं. फिर ऐसा प्रतीत हुआ 'जैसे कमरे में लटकने वाली सभी तस्वीरों में मुन्सिफ बाबू का व्यंग्य से भरा चेहरा उनका मजाक बना रहा है. रतनपुर की काली मां और पारुल की श्यामा ठकुराइन ने ऊपर विजय उत्सव के सिलसिले में ताण्डव नृत्य शुरू कर दिया है?'

थर-थर कांपते हुए नुटू बाबू एक कुर्सी पर बैठ गये. महाभारत ने आकर प्रणाम करते हुए कहा, 'हुजूर, पारुल की श्यामा ठकुराइन घर जा रही हैं, मैं भी जाऊं उनके संग?'

नुटू बाबू से कोई जवाब देते नहीं बना, उनका दम मानो घुटने लगा था. विह्वल दृष्टि से वह कमरे से बाहर निकलने का दरवाजा ढूंढ़ रहे थे, लेकिन कहां, दरवाजा कहां हैं?

अनुवादः जितेन्द्र बंधोपाध्याय

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