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प्राची - जुलाई 2016 / काव्य जगत

 

काव्य जगत

अभिनव अरूण की दो ग़ज़लें

एक

इश्क न हो तो ये जहां भी क्या.
गुलिस्तां क्या है कहकशां भी क्या.

पीर पिछले जनम के आशिक थे ,
यूं खुदा होता मेहरबां भी क्या.

औघड़ी फांक ले मसानों की,
देख फिर जीस्त का गुमां भी क्या.

बेल बूटे खिले हैं खंडर में,
खूब पुरखों का है निशां भी क्या.

खुशबू लोबान की हवा में है,
अब अगर खत्म हो धुआं भी क्या.

मां का आंचल जहां वहीँ जन्नत,
इस जमीं पर है आसमां भी क्या.

खूब चर्चा में है वेलेन्टाइन,
इश्क तेरी सजी दुकां भी क्या.

उनकी नजरें हुईं जिगर के पार,
तीर को चाहिए कमां भी क्या.

मुझको शहरे गजल घुमा लायी,
खूब उर्दू जुबां जुबां भी क्या.

यूं लगे है खुदा बुलाता है,
इन मीनारों से है अजां भी क्या.


दो

अक्षरों में खुदा दिखाई दे.
अब मुझे ऐसी रोशनाई दे.

बाप के हौसलों का दे बिस्तर,
मां के आशीष की रजाई दे.

हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूं,
सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे.

रोशनी हर चिराग में भर दूं,
कोई ऐसी दियासलाई दे.

मां के हाथों का स्वाद हो जिसमें,
ले ले सबकुछ वही मिठाई दे.

धूप तो शहर वाली दे दी है,
गांव वाली बरफ मलाई दे.

बेटियों को दे खूब आजादी,
साथ थोड़ी उन्हें हयाई दे.

तल्ख लहजा तमाम लोगों को,
मीर दे मीर की रुबाई दे.

दर्द होरी सा दे रहा है तो,
साथ धनिया सी एक लुगाई दे.

घूस के सौ दहेज से बेहतर,
अपने हाथों बनी चटाई दे.


सम्पर्कः बी-12, शीतल कुंज, लेन-10,
निराला नगर, महमूरगंज,
वाराणसी-221010, (उ.प्र.)
मोबाइलः 9415678748

e mail  - arunkrpnd@gmail-com


एक पिता ये भी
कोमल सोमड़वाल

 

शून्य के किसी क्षितिज ने कर लिया है हरण,
या शायद जिल्द से विलग कर लिया है आवरण,
लावारिस सी पुस्तक ने या शायद गर्द हो हटी,
वे गीले प्रभंजन से और स्पष्ट हुई ये प्रतीति,
छल की वेदी पर जिस तन्मयता से आत्मा की बलि चढ़ाई है,
आघात कर के प्रेम पर जो विश्वासों की अर्थी सजाई है,
धन की सेज पर इंसानियत की जो चिता जलाई है,
वाह! पुत्री त्याग कर पितृत्व की बखूबी रीत निभाई है..
तुम्हारे जीवित होने पर भी मृत कहलाना मुझे अधिक स्वीकार्य है,
अंश तुम्हारा कहलाने से,
अनाथ कहलाना मुझे अधिक परिहार्य है...
स्वाथरें के व्याघ्र से लांघ चुके जो मानवता की देहरी,
अस्त है मिहिर वक्त का जल्द आएगा बन अहेरी,
स्वाथरें की लत में न भूल हर भूशायी का निश्चित मरण है,
जीवन तो है कर्म भूमि, मृत्युपरांत वास्तविक रण है,
भूल न कर दो पल खुशी के बिताकर, इतिहास तो अनिमेष है,
प्रवंचनाओं, छल, असि का कब हर्ष बचा शेष है?

सम्पर्कः बाफना सदन, पारीकों का नया बास
लाडनू-341306, जिला-पाली (राजस्थान)


यूनुस अदीब

कतआत

कौन किसको संभालता है यहां
रास्ते रब निकालता है यहां
किसको मालूम कब, कहां, कैसे
आफतें कौन टालता है यहां
हम सिवा मार्फत के कुछ भी नहीं
पालने वाला पालता है यहां.

तेरे हर फेअल पे उसकी नजर है
खबर तुझको नहीं वो बाखबर है
एक अंधी मां भी ये कहती है सबसे
मेरा बेटा मेरा नूरे नजर है.

जुल्मत की बादशाही को ऐसे मिटा के चल
इल्मो अदब का जेह्न में सूरज उगा के चल
सर को उठाके देख तू महलों को शौक से
ये दर फकीर का है यहां सर झुका के चल.

पनघट भी, खेत भी, ये परिन्दे भी, नाव भी
रहने लगी उदास ये पीपल की छांव भी
जब से शहर की आबो-हवा इसमें घुल गई
बेरंग हो गया मेरा छोटा सा गांव भी.

सम्पर्कः 2898, स्टेट बैंक के सामने, गढ़ा बाजार,
जबलपुर (म.प्र.) 482003
मो. 9826647735

पापा
डॉ. दिवा मेहता

वे अक्सर हमारी ख्वाहिशों पर
उंगली उठाते हैं.
पर वे ही तो अक्सर उनके लिए
हद से गुजर जाते हैं.
वे कभी हमें डांटते हैं
और कभी नहीं मानते हैं.
पर वे ही तो हमारे लिए
जहां भर से लड़ जाते हैं.
वे खत्म होता हुआ टूथपेस्ट
हर सुबह हमारे ब्रश पर लगाते हैं.
पर वे तो हमारी खुशी के लिए
खुद लुट भी जाते हैं.
वे अक्सर हमें अपने
जीने के अंदाज से सताते हैं.
पर वे ही तो अपने अंदाज में
हमें जीना हमें सिखाते हैं.
वे कभी-कभी हमारे ज्ञान और अनुभव का
मजाक उड़ाते हैं.
पर सच है वे आज भी
हर क्षेत्र में सब को हराते हैं.
वे कभी राई का पहाड़ बना कर
रिश्ते गर्माते हैं.
पर कभी हंसी-हंसी में ही
सब को अपना बनाते हैं.
वे हमारे लिए शक्तिपुंज,
लौह-स्तम्भ से खड़े रहते हैं.
पर ये भी सच है वे हमारी खुशी और गम में
आंसू बहते हैं.
वे कितना प्यार हम से करते हैं,
कभी नहीं जताते हैं.
और हम भी तो उन्हें बस मान कर चलते जाते हैं.
हम पास रहकर उन्हें यह कभी नहीं बताते हैं.
पर दूर रह कर वे सच में बहुत याद आते हैं.

सम्पर्कः शुभ रतन, 109-अभयगढ़,
रातानाडा-जोधपुर 342011
diva.mehta@gmail.com


हे मेघा मेरे आंगन में
शिवकुमार कश्यप

हे मेघा मेरे आंगन में
कुछ बूंदें बरसा देना...
पिय की पाती, घर ना आती,
कोई बात ना मन को भाती
मेरी जीवन की बगिया में
कुछ कलियां देना...
जब मेरे आंगन से जाओ
गरज के मुझको तुम बतलाओ
पिय को संदेशा दूंगी मैं
तुम उन तक पहुंचा देना...
रात डंसे नागिन सी काली
मैं व्याकुल बैठी मतवाली
तुम तो मेरी पीर समझकर
जीवन-रस छलका देना...
दिल पर बैठा प्रीतिका पहरा
पिय-पिय बोले रात पपीहरा
समझाना उस निर्मोही को
घर की राह बता देना...
कहना तेरी याद में पागल
जीवन का पी रही हलाहल
इस पागल को गले लगाके
घूंघट-पट सरका देना...

सम्पर्कः 15-बी, पौर्णमी अपार्टमेंट
पांच पाखाड़ी- नामदेव वाड़ी, ठाणे
पिन- 400602, (महाराष्ट्र)

--

 

तलाश

दीपिका जौहर

वो जिसकी तलाश हूं मैं

वो जिसकी आस हूं मैं

निशा के अंधकार में

ढूंढ़ता जो उजास को

वो जिसकी प्रयास हूं मैं

वो जिसकी आभास हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

स्वर्ग से वैभव में भी

ढूंढ़ता जो मन का सुख है

वो जिसकी प्यास हूं मैं

वो जिसकी खास हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

मधुवन की खूबसूरती मैं

ढूंढ़ता जो आलौकिक सौन्दर्य

वो जिसकी आत्मा का सार हूं मैं

वो जिसकी अभिसार हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

नदी के दो किनारों में

ढूंढ़ता जो प्यार को

वो जिसकी एतबार हूं मैं

वो जिसकी इजहार हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

मृत्यु की बेड़ियो में जकड़ा

ढूंढ़ता जो जिन्दगी को

मोह के बन्धन से परे

प्रेम के महायुध्द में लड़ता

वो जिसकी जीत हूं मैं

वो जिसकी हार हूं मैं

वो जिसकी तलाश हूं मैं...

सम्पर्कः जौहर कम्युनिकेशन, देहरादून रोड, दोइवाला (क्व्प्ॅ।स्।) उतराखंड पिन-248001

--

पिता

डॉ. भावना शुक्ल

मेरे लिये पिता

जीवन मूल्य हैं.

मैं उनकी बिटिया

उनके लिये अमूल्य हूं.

पिता संबल हैं, शक्ति हैं

निर्माण की अभिव्यक्ति हैं.

पिता धीर हैं,

गंभीर हैं.

मेरे लिये अधीर हैं.

पिता संस्कारों की खान हैं

मुझमें बसती जान है

मुझे जिंदगी जीना सिखाया.

संघर्षों का सामना

करना सिखाया.

प्रेम से चलाते

परिवार का प्रशासन

हमें सिखाया अनुशासन.

मुझे अपने पिता पर नाज है

वे साहित्य के सरताज हैं.

हैं उनके बहुत से मित्र

नाम है उनका सुमित्र

हमारे लिये वे

भगवान की मूरत हैं

माता-पिता दोनों की

हमें जरूरत है

सम्पर्कः सह संपादक प्राची

डब्ल्यू जेड 21 हरिसिंह पार्क, मुल्तान नगर पश्चिम विहार

नई दिल्ली-110056

मोबाइल- 09278720311

ईमेलः bhavanasharma30@gmail-com

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