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प्राची - जुलाई 2016 / राधो काका / कहानी / तरुण कु. सोनी तन्वीर

कहानी

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तरुण कु. सोनी तन्वीर

बेटे, उस दिन जब मैं तुम्हारे यहां शहर आया था, तब एक कमजोर बुड्ढा और बेबस बाप बन कर आया था. अपने ही पुत्र से मदद की आषा लेकर, लेकिन बेटे तुमने मुझे जीवन के इस मोड़ पर भी मुझे जीने का सही रास्ता बता दिया. तुमने मेरे अन्दर के स्वाभिमान और खुद्दारी को जगा दिया. तुम्हारे ससुर के षब्दों से ज्यादा मुझे बेटे तुम्हारी खामोषी और तुम्हारा व्यवहार चोट कर गया था, इसलिए मैं तुमसे बिना मिले ही सुबह वापस लौट आया. मैंने तुम्हारे ही दिए रुपये अपने पसीने की कमाई के दस रुपये के साथ तुम्हें वापिस लौटा दिए. आज तेरा भेजा मनी आर्डर भी लौटा दिया. बेटे मुझे क्षमा करना. बेटे तेरे दिए 500 रुपये तेरे ससुर की कमाई के थे. उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं था. सो मैंने उसे अपनी खुषी से अपने पोते को दे दिए.

राधो काका

 

तरुण कु. सोनी तन्वीर

25 बरस पहले राधो काका की बीवी नैना काकी स्वर्ग सिधार गई थी, तब से काका गांव में अकेले ही रहते हैं. बेटा बरसों पहले शहर कमाने गया तो वही रच बस गया. शादी भी कर ली और अपने ससुर करोड़पति सेठ गंगा प्रसाद का घर दामाद भी बन गया. करोड़ों की सम्पति का मालिक. शुरू-शुरू में बेटा अपने पिता को मनी आर्डर से कुछ रुपये खर्चे के लिए गांव भेजता रहा. लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसने पैसे भेजना बंद कर दिया. इधर 65 बसंत देख चुके राधो काका की बुड्ढी हड्डियों में भी इतनी ताकत नहीं थी कि वो मेहनत मजूरी कर गुजर बस कर सके. ले-दे के एक पच्चीस गुना पंद्रह का छोटा सा झोंपड़ेनुमा खपरैल से बना पुश्तैनी मकान था.

सुबह जल्दी उठ के मंदिर को साफ करना, कबूतरों को दाना डालने के चबूतरे पर झाड़ू बुहार कर दाना डालना, कबूतरों के लिए पानी के बर्तनों में पानी डालना और राहगीरों के लिए ठंडे पानी के मटके भरके उसी चबूतरे पर रखना...राधो काका का रोज का काम था.

फिर घर आकर खाना बनाकर-खाकर कर उसी चबूतरे पर चले जाते. आते जाते राहगीरों से बतिया लेते. गांव के अपने ही हमजोली बुजुर्ग संगी साथियों से मिल बैठ के सुख दुःख की बातें करके अपना दिन व्यतीत कर लेते. काका तो कभी कभार ही खाना बनाते हैं. बाकी अक्सर आस पड़ोस में रहने वाले विषना काका और रामू काका के घर से उनके लिए खाना बन के आ जाता दोनों समय.

विषना काका और रामू काका, दोनों राधो काका के बचपन के दोस्त और रिश्ते में भाई भी लगते थे. इसलिए दोनों परिवार के सदस्य राधो काका का अच्छा ख्याल रखते थे. और दोनों के भरे-पूरे परिवार के बच्चों में मन लगा रहता. राधो काका की जिन्दगी अकेलेपन के बावजूद बड़े मजे से गुजर रही थी. बेटा हर महीने जो तीन-चार सौ रुपये भेजता है, उसमें से कबूतरों का दाना और अपने लिए चाय-बीड़ी और दवा पर खर्च कर देते थे.

लेकिन पिछले काफी दिनों से काका बहुत परेषान से हैं. हर दिन डाकघर का एक चक्कर तो लगा ही आते. तीन चार महीनों से बेटे का मनीआर्डर नहीं मिला था. जिससे कबूतरों का दाना और दवा का काफी उधार हो चुका था. जेब में रुपये भी नहीं बचे थे. राधो काका के बार बार खत लिखने पर भी कोई जवाब नहीं मिल रहा था बेटे का.

आज फिर जैसे ही वे डाकघर पहुंचे, डाक बाबू ने उन्हें दूर से देख लिया. पास आने पर राधो काका कुछ बोलते, उससे पहले ही डाक बाबू ने कहा, "अरे राधो काका, राम राम. आज आप फिर आ गये. मैंने आपको कहा ना कि जैसे ही आपकी चिट्ठी या मनी आर्डर आएगा, मैं सबसे पहले आपको ही लाकर दूंगा."

"राम राम डाक बाबू जी, काफी दिनों से श्रवण की खैर खबर नहीं आई जिससे मन में तरह तरह के ख्याल आते हैं और पैसे भी नहीं आ रहे, जिससे उधार भी काफी हो गया है. कबूतरों का दाना भी बराबर नहीं दे पा रहा हूं, इसी लिए मैं चला आया...ठीक है...चलता हूं." रुआंसे से हो गए कहते कहते.

वहां से चलते चलते राधो काका ने शहर जाकर बेटे से मिलने का विचार किया. घर लौट आये. फिर शाम को विषना काका के घर खाना खाते-खाते विषना काका के मंझले बेटे से कहने लगे- "अरे श्यामू, बहू से कहना कि सुबह के लिए भी दो-चार रोटी ज्यादा अभी ही बना देना."

विषना काका बोल उठे, "क्यों राधो, क्या बात है, कहां जाना सुबह सुबह जो अभी ही रोटियां बनवा रहे हो?"

"मुझे शहर जाना है बेटे के पास. तीन चार महीनों से खैर खबर नहीं आई तो सोचा जाकर मिल आऊं और कुछ दिन वहां रह भी लूंगा. सुबह जल्दी निकलूंगा. रास्ता लम्बा है तो भूख भी लगेगी, तब खा लूंगा. बहू को बोल देना जब तक मैं वापस ना आऊं, तब तक मेरे लिए खाना मत बनाए.''

"चलो ठीक है, बबुआ को मेरा भी शुभाशीष देना." पीछे से रामू काका ने आते हुए कहा.

"आ रामू आ, तेरा ही इंतजार हो रहा था. चल आ जा खाना खा ले." विषना काका बोले.

राधो ने कहा, "हां रामू, जरूर बोलूंगा. चल आ बैठ, खाना खा ले." हाथ पकड़ कर बैठाते हुए राधो काका ने कहा.

"लो चूरमे के लड्डू भी खाओ." कहते हुए अपने हाथ में पकड़े बर्तन से रामू काका ने 3-4 लड्डू थाली में परोस दिए.

विषना काका ने आगे कहा, "शहर जाओ तो श्रवण के लिए बढ़िया घी, मक्खन और चने लेते जाना राधू..."

बात आगे बढ़ाते हुए रामू काका बोले, "आज घर पर बहू ने ये चूरमे के लड्डू बनाये हैं. मैं अभी डब्बे में डलवा देता हूं. साथ ले जाना. श्रवण को बहुत पसंद है ना..." रामू काका ने कहा.

"ठीक है, पहले खाना तो खा लो. बाकी काम बाद में..."

खाना खाकर तीनों खाट बिछाकर सो गए.

सवेरे जल्दी उठ कर अपना सामान और घी, चने, मक्खन और लड्डू लेकर राधो काका शहर को रवाना हो गए.

शाम को जब राधो काका बेटे के बंगले पहुंचे तो वहां बहुत रोशनी और चहल-पहल थी. बाहर कारों का काफिला खड़ा था. बैंड बाजे भी बज रहे थे.

काका थोड़ी हिम्मत करके बंगले के गेट में दाखिल हुए. अन्दर कोई पार्टी चल रही थी. सूट बूट में सजे-धजे लोग खाने-पीने का लुत्फ उठा रहे थे. कुछ सोच कर राधो काका के कदम वही ठिठक कर रुक गए.

उन्होंने वहां खड़े दरबान से पूछा- "यहां क्या हो रहा है भाई?"

दरबान ने बताया- "हमारे सेठजी के दोहिते का जन्मदिन मनाया जा रहा है."

"श्रवण ठाकुर यही रहते हैं ना?" काका ने दरबान से पूछा.

"हां जी! यही रहते हैं. श्रवण ठाकुर ही हमारे बड़े सेठजी के दामाद हैं. आज उनके ही बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही है." दरबान ने बताया

श्रवण के बेटे का जन्मदिन...सुनते ही राधो काका के माथे पर सलवटें पड़ने लगीं. झुर्रियों भरा चेहरा एकदम से सोच में डूब गया...श्रवण ने शादी भी कर ली, बेटा भी हो गया और उसे बताया भी नहीं.

तभी उनकी आंखों में कुछ चमक सी आती है और दरबान के पास जाकर पूछते हैं.

''क्या श्रवण का बेटा है वो?'' राधो काका ने केक काटते बच्चे की ओर इशारा करके पूछा.

दरबान ने कहा- ''हां! ये हमारे श्रवण साहब के ही बेटे हैं.''

इतना सुनते ही दिन भर के सफर का दर्द और सारी बातें भूल दादा बनने की खुशी में चहकते हुए अपने पोते को गले लगाने के लिए काका ने अन्दर जाने को कदम बढाया ही था कि तभी ससुर के साथ खड़े बेटे की नजर अपने पिता पर पड़ी. वह झट से साथ खड़े लोगों को "एक्सक्युज मी, आई कम बैक इन टू मिनट्स." बोल कर अपने पिता की ओर लपका.

पास आते ही पिता का हाथ पकड कर एक तरफ ले जाते हुए धीरे से बोला- "आप यहां क्यों आये हो? अभी आप यहां से जाओ, कल सुबह आना, नहीं तो ये मेहमान क्या सोचेंगे. आपको मेरी इज्जत की जरा भी परवाह नहीं हैं?''

राधो काका गंभीरता से अपने बेटे का चेहरा देखते हुए

धीरे से बोले- ''श्रवण बेटा, पिछले कई महीनों से तुमने खर्च के रुपये नहीं भेजे. घर में आटा दाल नहीं है. ना ही कबूतरों का और ना मेरी मेरी दवा का खर्च. उधार काफी हो गया है. मैंने सोचा, तुम काम में व्यस्त होने से भूल गए होंगे. इसलिए लेने आ गया.''

तभी बेटा तुनक कर बोला- ''तो खत लिख देते. यहां मेरी इज्जत का फलूदा करने क्यों आये?''

काका बोले- ''बेटा पिछले 9 महीनों में 15-20 खत भेजे मैंने. एक का भी जवाब नहीं आया, न ही रुपये मिले.''

तभी नौकर ने आकर कहा, ''सर आपको बड़े सेठजी बुला रहे हैं.''

बेटे ने कहा, ''तुम जाकर पिताजी को बोलो अभी दो मिनट में आ रहा हूं.'' फिर तेजी से घूमकर अपनी जेब से पर्स निकाला और 500 का नोट बाहर निकलते हुए कहने लगा- ''ये लो 500 रुपये. अब जल्दी से यहां से वापिस गांव चले जाओ.''

''पर र र बेटा...'' कहते कहते गला रुंध सा गया काका का. शब्द गले में ही अटक गए हों जैसे.

''हां! बोलिए अब क्या कहना चाहते हैं?'' बेटा बोला.

''एक बार बहू और अपने पोते से मिलना चाहता हूं. पोते को गोद में खिलाना चाहता हूं.'' कहते कहते राधो काका की आंखों से आंसू बहने लगे.

''कोई जरूरत नहीं अभी मिलने की. आप कल सुबह आना, मैं मिलवा दूंगा...पर अभी जाओ...जल्दी से...किसी ने देख लिया तो लोग क्या सोचेंगे?'' बेटे ने कहा

''पर बेटा, इतनी रात को मैं कहा जाऊंगा. मैं तो यहां किसी को जानता भी नहीं हूं.'' काका बोले.

''यहां वहां कहीं पर भी आप आज की रात गुजार लो, कुछ ही घंटों की तो बात है...आप एक काम करो...वो सामने फुटपाथ है. आप वही सो जाओ. कल सुबह मैं आपको सबसे मिलवाकर गांव भिजवा दूंगा.''

आगे कुछ बोलता, उससे पहले ही उसके ससुर की आवाज आई, ''श्रवण बेटा, वहां क्या कर रहे हो, जल्दी से यहां आओ! सभी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.''

ससुर को अपनी तरफ आता देख राधो काका को बोला, ''अब आप जल्दी से निकलो यहां से...'' कह कर अपने ससुर की तरफ कहते हुए बढ़ा- ''आया पिताजी!"

ससुर ने पूछा, ''कौन था वो बुड्ढा जिससे तुम बातें कर रहे थे?''

हड़बड़ाते हुए श्रवण बोला- ''वो मेरे गांव के रहने वाले

राधो काका हैं. आज शहर आये थे तो जेब कट गयी. कुछ मदद के लिए मेरे पास आ गए. मैंने उनको कुछ रुपये देकर भेज दिया.''

''अरे बेटा! तुम इतने भोले न रहा करो! ये गांवों के लोग बड़े होशियार होते हैं. झूठ-मूठ की कहानियां गढ़ कर रुपये ऐंठ ले जाते हैं.'' ससुर ने दामाद को समझाते हुए कहा.

बेटा ससुर की बातों को सुन सर हिलाकर चलने लगा और फिर से पार्टी में मेहमानों से मिलने में व्यस्त हो गया.

इधर बेटे और उसके ससुर की बातें सुनकर राधो काका आंखों में आंसू लिए सड़क की तरफ चलने लगे. गेट के पास पहुंचते ही उन्होंने अपनी मुट्ठी में पकड़ा 500 का नोट और अपनी जेब में रखे सिकुड़े हुए 10-10 के दो नोटों में से एक नोट निकाल कर दरबान के हाथों में देते हुए दरबान से बोले, ''भाई, ये 510 रुपये तुम्हारे सेठ को जाकर दे दो...साथ ही साथ कांधे पर लटका झोला देते हुए बोले, ''ये सामान भी ले जाकर दे दो. बोलना उनके बेटे के जन्मदिन पर राधो काका की तरफ से छोटी-सी भेंट...'' कहते कहते राधो काका की आंखें भर आईं और वह झट से वहां से आगे निकल गए.

दरबान काफी देर से श्रवण साहब और राधो काका को दूर से बातें करते देख रहा था. उसे अपने 60 साल के अनुभव से समझने में देर न लगी की हो ना हो ये ही श्रवण साहब के असली पिता हैं. लेकिन नौकरी न छिन जाए, इस डर से चुप रहना उचित समझा. वह रुपये ले जाकर श्रवण साहब और उनके ससुर जी के हाथों में नोट थमाते हुए कहा- ''साहब, अभी अभी आप जिन बुजुर्ग से बात कर रहे थे, उन्होंने छोटे बाबा के जन्मदिन पर ये 510 रुपये और यह कुछ सामान भेंट भेजी है...और कहा है कि कहना 'राधो काका की ओर से छोटे बाबा के लिए छोटी सी भेंट.'''

इतना सुनते ही श्रवण अपने ससुर की तरफ देखने लगा. श्रवण को वो रुपये उसके गाल पर एक पिता की खुद्दारी और स्वाभिमान की थप्पड़ की तरह लगे. वह विवश खड़ा ससुर की आंखों में आंखें डाले देख रहा था. आंखों ही आंखों में दोनों के बीच मौन संवाद हुआ.

उसने दरबान से रुपये लेकर कहा, ''ठीक है सामान वहां एक तरफ रख दो और तुम जाओ.'' रुपये जेब में रख श्रवण पार्टी में मेहमानों को खाना खिलाने में व्यस्त हो गया.

रात काफी हो गई थी. भूखे प्यासे राधो काका के पास बेटे के बंगले के सामने बने फुटपाथ पर सोने के अलावा कोई दूसरा ठिकाना भी नहीं था. बंगले से कुछ दुरी पर एक तरफ जगह देख कर सर की पगड़ी उतार कर तकिये की जगह रख के फुटपाथ पर सोये भिखारियों की लाइन में लेट गए. पर आंखों में नींद कहां थी. वह रात भर जागते रहे. सोचते रहे और रोशनी में छुपी कालिख को देखते रहे.

इधर पार्टी के सारे मेहमानों को विदा करने में रात के 2-3 बज गए. तभी श्रवण ने जेब से कुछ निकलने के लिए हाथ डाला. कुछ हाथ से छूते ही वह रुक गया. धीरे से उसने जेब से हाथ निकाला तो वो दरबान के हाथों राधो काका के भेजे रुपये थे. उसकी नजर जब मैले कुचले सलवटें पड़े 10 के नोट पर पड़ी तो उसे अपने दिए 500 का नोट भी बौना नजर आने लगा. तभी सामने पड़े थैले पर उसकी नजर पड़ी, वह भाग कर थैले के पास गया और खोल के देखने लगा. उसमे देशी घी से भरा डिब्बा, मक्खन से भरा टिफिन और पोटली में बंधे उसके मनपसन्द चटपटे चने.

उसे शर्म आने लगी खुद पर कि आज वह अपने पिता को पिता का दर्जा नहीं दे सका. उसे वह दिन याद आने लगा जब उसे बचपन में मलेरिया में जकड़ लिया तो कैसे एक पिता ने अपने पुत्र के लिए पूरे 9 दिन रात जाग कर गुजारी. उसका पूरा ख्याल रखा. डॉक्टरों के पैर भी पकड़े उसको जल्दी ठीक करने के लिए...और आज भी वह उसका कितना ख्याल करते हैं...और एक मैं हूं जो अपने पिता के घर आने पर भी खाना खिलाना तो दूर अन्दर आने को भी नहीं कह सका...यह सोच सोच कर उसकी आंखों से आंसू झरने लगे.

उसके कदम फुटपाथ पर सोये अपने पिता को लाने के लिए आगे बढ़ने ही वाले थे कि सामने बीवी और ससुर को अपनी ओर आते देख ठिठक गए.

पास आते ही श्रवण से उसके ससुर बोले, ''बेटा रात काफी हो गयी है. अब तुम दोनों जाकर सो जाओ. सुबह जल्दी ऑफिस भी जाना है. लन्दन से मि. जोसेफ आ रहे हैं अपनी कम्पनी को देखने और 5 करोड़ के आर्डर देने.''

ससुर कुछ आगे बोलते, उससे पहले ही श्रवण की बीवी बीच में बोली, ''हां, चलो श्रवण! सोने चलो, आज काफी थक गयी हूं. मुझे तो नींद आ रही है.'' फिर अपने पिता की ओर घूमकर बोली- ''पापा, आप भी अब जल्दी से सो जाओ, रात काफी हो गयी है...अपनी दवा लेना मत भूलना.''

कहते हुए श्रवण का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बेडरूम की ओर ले गयी. श्रवण अपने मन के विपरीत चुपचाप बीवी के पीछे जाने लगा. यह सोचकर कि सुबह जल्दी उठा कर अपने पिता से मिल लेगा.

सुबह रीना की आवाज के साथ श्रवण की नींद टूटी, ''श्रवण उठो! नौ बज गए हैं! ऑफिस के लिए तैयार हो जाओ. नीचे पापा तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.''

सामने टंगी दीवार घडी पर नजर डालते हुए श्रवण बोला, ''रीना कम से कम मुझे थोड़ा जल्दी तो उठा देती...मुझे...'' इससे आगे कुछ बोलने से पहले ही रीना ने कहा, ''रात को सोये भी तीन बजे थे. पापा ने कहा- कुछ देर और सोने दो...अब जल्दी से नहा धोकर तैयार हो जाओ. मैंने नाश्ता बना दिया है. खाना बना कर टिफिन पैक कर देती हूं. क्या पता आप मीटिंग की वजह से दिन में घर आप पाओ या नहीं.''

''ओके डिअर!'' कहते हुए श्रवण बाथरूम की ओर लपका.

कुछ ही देर में तैयार होकर श्रवण नीचे आते ही बीवी से बोला, ''रीना तुम नाश्ता टेबल पर लगाओ, मैं एक मिनट में आता हूं.'' कहते हुए तेज कदमों से गेट की तरफ बढ़ने लगा. कुछ क्षणों में गेट से बाहर फुटपाथ के पास पहुंच कर किसी को ढूंढ़ने लगा.

तभी पीछे से आकर दरबान ने कहा, ''किसे खोज रहे हैं साहब!''

''किसी को भी नहीं!'' सकपकाते हुए श्रवण बोला.

अपने पिता को उधर ना पाकर श्रवण वापिस अनमने भाव से गेट की ओर मुड़ा. अचानक वापिस दरबान की ओर मुड़ कर दरबान से पूछा, ''दरबान काका, क्या आपने रात को राधो काका को कहीं देखा क्या?''

''कौन से राधो काका साहब! वही जो कल शाम को आये थे और जिन्होंने छोटे बाबा के लिए रुपये और सामान मेरे साथ भेजे थे?'' दरबान ने पूछा

''हां, हां, वहीं, कहा हैं वो?'' श्रवण ने उत्सुकता से पूछा.

''साहब! वो तो अपने गांव चले गए वापिस, आज सुबह जब 6 बजे मैं गेट खोलकर में दूध लेने सामने फुटपाथ के पास गया तब वो गाड़ी में बैठ कर अपने गांव जा रहे थे. उन्होंने आपको देने के लिए एक पोटली दी थी मुझे. कहा था कि श्रवण साहब को यह बहुत पसंद है, उन्हें दे देना.'' दरबान ने कहा.

''कहां है वो पोटली जल्दी लाओ?'' श्रवण ने कहा

''अभी लाता हूं.'' कहकर दरबान पोटली लाने अपने चेंबर की और मुड़ा. श्रवण गुमसुम सा खड़ा रास्ते की ओर देखने लगा.तभी दरबान ने पोटली लाकर श्रवण के हाथ में रख दी. मैली कुचैली थैली की पोटली को हाथों में पकड़ते ही महसूस किया.आहा! ये तो बाबा के हाथ के सत्तू हैं.

वही खड़े खड़े वह पोटली की गांठों को खोलने लगा. तभी पीछे से आवाज आई, ''श्रवण! नाश्ता ठंडा हो रहा है, जल्दी आओ! ऑफिस से भी तुम्हारे लिए फोन आया है.'' पीछे रीना खड़ी आवाज दे रही थी.

पोटली को हाथों में थामे ही बंगले की ओर बढ़ने लगा. फिर वह गैरेज की ओर मुड़ा और कार का गेट खोल कर उसने अन्दर वह पोटली छुपा कर रख दी. बंगले में पहुंच कर आधा अधूरा नाश्ता कर कार लेकर ऑफिस के लिए रवाना हो गया. पूरे रास्ते राधो काका के बारे में सोचता रहा. ऑफिस कब आया पता भी नहीं चला.

तभी पोस्टमैन डाक देने आया तो श्रवण की नजर उस पर पड़ी. उसने पोस्टमैन को अपने केबिन में बुलाया और मनी आर्डर करने का लास्ट ऑफिस टाइम पूछा. पोस्टमैन ने बताया- ''सर, 2 बजे तक ऑफिस में मनी आर्डर बुक होते हैं.''

तभी घड़ी की तरफ देखते हुए उसने कुछ मन ही मन सोचा. 1 बजे ऑफिस का लंच होते ही श्रवण अपने केबिन से निकला और रिसेप्शन से कहा, ''मालती! कोई पूछे तो बोलना किसी अजेंट काम से कहीं गए हैं. अभी 15-20 मिनट में आते हैं." ''ओके सर!" मालती ने संक्षिप्त जवाब दिया.

श्रवण जल्दी से कार निकाल कर बाहर निकल गया. सड़क पर सरपट दौड़ती कार बैंक के एटीएम के सामने रुकी. एटीएम से कुछ रुपये निकाले. फिर वह पोस्ट ऑफिस गया और 5000 रुपये का मनीआर्डर कर बाहर निकला.

उसने अपने मन में कुछ राहत महसूस की कि अब बाबा के खर्चो में कोई कमी नहीं आयेगी और वह हमेशा अब समय पर रुपये गांव भेजता रहेगा.

श्रवण कार की तरफ बढ़ा. कार में बैठते ही श्रवण को भूख लगी थी जोर से...तो उसने वह पोटली निकाली और उसे खोल कर देखा. उसमें देशी घी में बने चूरमे के लड्डू निकले. और एक कागज में लिपटे तीन सत्तू. उसे अपने बाबा के हाथ के सत्तू बहुत पसंद थे. वह लड्डू और सत्तू खाने लगा. सत्तू खाकर उसकी आंखों में पानी भर आया. आज श्रवण को मां भी बहुत याद आ रही थी.

फिर आंखें पोंछ कर वह ऑफिस लौट आया. अब उसके मन पर सुबह की तरह कोई बोझ नहीं था. उसने मनी आर्डर भेज दिया है. अब बाबा के दिन भी आराम से गुजरेंगे. आगे से उन्हें किसी तरह की कमी नहीं आने दूंगा...यही सोचते-सोचते कब ऑफिस आ गया, पता भी नहीं चला.

शाम को घर पंहुचा तो उसने रीना को चूरमे के लड्डू और सत्तू देकर कहा, ''लो रीना, कुछ स्पेशल...असली घी में बने सत्तू और चूरमे के लड्डू.''

पोटली को हाथ में लेते हुए रीना बोली, ''कौन लाया इन्हें?'' और झट से पोटली से सत्तू और लड्डू निकाल कर टेस्ट करने लगी.

''गांव से राधो काका आये थे वो लाये थे.'' श्रवण ने बताया.

वह बोली, ''अरे वाह! ये तो बहुत टेस्टी हैं. मैंने कभी नहीं खाए.''

''तो अब टेस्ट कर लो.'' मुस्कुराते हुए श्रवण ने कहा.

बेडरूम में पलंग पर लेटे लेटे श्रवण सोचने लगा कि उसने अपनी जिन्दगी में आज ही सही निर्णय लिया है...अपनी जिम्मेदारियों का पालन करके. सोचकर उसे काफी राहत महसूस हो रही थी...

पांच दिन बीत गए. हमेशा की तरह श्रवण ऑफिस में काम कर रहा था, तभी पोस्टमैन आया. ''सर आपका भेजा ये मनी आर्डर रिटर्न हो गया है. प्राप्तकर्ता ने लेने से मना कर दिया है. प्लीज आप यहां हस्ताक्षर कीजिये.'' कह कर मनी आर्डर फॉर्म श्रवण के सामने कर दिया.

पोस्टमैन की बात सुनकर श्रवण को गहरा धक्का लगा. उसे लगने लगा कि उसके गालों पर उसके बाबा की खुद्दारी और स्वाभिमान के हाथों की मार पड़ रही है. उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा. अपने आपको संभालते हुए पोस्टमैन की बताई जगह पर हस्ताक्षर करने लगा. पोस्टमैन ने 5000 रुपये गिन कर श्रवण के हाथों में रख दिए. साथ में एक चिट्ठी भी दी और चला गया.

रुपये एक तरफ रख कर श्रवण ने चिट्ठी को खोलकर देखा. वह राधो काका की ही चिट्ठी थी. श्रवण ने भारी मन से पढ़ना शुरू किया. एक एक शब्द उसके गाल पर तमाचे की तरह पड़ रहे थे.

''प्यारे बेटे,

सदा खुष रहो.

बेटे, उस दिन जब मैं तुम्हारे यहां शहर आया था, तब एक कमजोर बुड्ढा और बेबस बाप बन कर आया था. अपने ही पुत्र से मदद की आशा लेकर, लेकिन बेटे तुमने मुझे जीवन के इस मोड़ पर भी मुझे जीने का सही रास्ता बता दिया. तुमने मेरे अन्दर के स्वाभिमान और खुद्दारी को जगा दिया. तुम्हारे ससुर के शब्दों से ज्यादा मुझे बेटे तुम्हारी खामोशी और तुम्हारा व्यवहार चोट कर गया था, इसलिए मैं तुमसे बिना मिले ही सुबह वापस लौट आया. मैंने तुम्हारे ही दिए रुपये अपने पसीने की कमाई के दस रुपये के साथ तुम्हें वापिस लौटा दिए. आज तेरा भेजा मनी आर्डर भी लौटा दिया. बेटे मुझे क्षमा करना. बेटे तेरे दिए 500 रुपये तेरे ससुर की कमाई के थे. उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं था. सो मैंने उसे अपनी खुशी से अपने पोते को दे दिए.

''बेटे ये कभी मत सोचना के मै तुमसे नाराज हूं, या गुस्सा हूं. मैं तो आज भी वैसा ही हूं, जैसा उस वक्त था, जब तुझे

कंधे पर बिठाकर घूमता था. तुझे खेल खिलाता था. तेरी हर जिद पूरी करता था, क्योंकि तू ही मेरी आंखों का तारा है. बेटा! मुझे गांव में खेतों की निगरानी का काम मिल गया है. दिन भर सो लेता हूं और रात को कुछ घंटे निगरानी कर लेता हूं. बदले में गांव वाले मेरी सारी आवश्यकताओं को पूरा कर देते हैं. इसलिए अब बेटा, मुझे रुपये मत भेजना. बल्कि उन रुपये से मेरे पोते के भविष्य को सुधारना...उसे अच्छा नागरिक बनाना.

''और वैसे भी मुझे क्या चाहिए...दो वक्त की रोटी, दो वक्त की चाय. मेरे लिए इतना काफी है. वैसे भी विषना और रामू और उनका परिवार तो है ही न मेरी देख रेख करने के लिए...हमेषा वही से रोटी-सब्जी बन कर आती है. मैं नहीं बना पाता ना अब...इसलिए. वही हम तीनों दोस्त मिल बैठ कर खा लेते हैं...अब कोई दुःख नहीं. बेटा! ईश्वर ने मेरी सुन ली. मुझे चांद सा पोता दे दिया... ठाकुर वंष को चिराग मिल गया, अब और मुझे क्या चाहिए. तूने मुझे जीवन की बेशकीमती दौलत पोते के रूप में दे दी. मेरा जीवन सफल हो गया. मेरे वंश का उद्धार हो गया.

''बेटा अपना, बहू का और मेरे पोते का ख्याल रखना. उसे पढ़ा लिखा कर अच्छा इंसान बनाना. जुग-जुग जियो बेटा. सदा सुखी रहो...सदा हंसते-खेलते रहो. खूब अन्नवान-धनवान बनो...बेटा. मेरी एक अंतिम इच्छा है. पूरी करोगे क्या? मैं चाहता हूं कि जब मैं मर जाऊं तो मेरी चिता को मुखाग्नि मेरा पोता दे...बोलो बेटा...क्या तुम मेरी ये अंतिम इच्छा पूरी करोगे...या...

तुम्हारा बाबा

चिट्ठी पढ़ते पढ़ते श्रवण की आंखों से आंसू झरने लगे. कुछ बूदें चिट्ठी पर गिरने लगीं...जिससे बाबा के लिखे अक्षर भीगकर उभरने लगे...मानो बाबा उसकी तरफ हाथ बढ़ा रहे हो...और उसे बुला रहे हों...श्रवण बेटा...

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