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प्राची - जुलाई 2016 / आशंकाओं के नागपाश / कहानी / कुंवर प्रेमिल

 

कहानी

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डॉ. कुंवर प्रेमिल

इस 'तो' के आगे उसका दिमाग घूम गया...

उसे होश तब आया जब किसी की नरम-नरम नाजुक अंगुलियां उसके पैर दबा रही थीं. यह उसकी नववधू ही थी. पुत्र जतिन उसका माथा सहला रहा था, यह वह जान गई थी.

''अरे, मेरे पैर क्यों छुए बहू, अभी देवी-देवताओं की पूजा कहां हुई है? यह तो अपशकुन हो गया है.'' वह बीमार किंतु सधे स्वर में अपनी बहू से मुखातिब हुई थी.

नामः डॉ. कुंवरपाल सिंह भाटी

जन्मः 31 मार्च, 1947

प्रकाशनः देश की सभी जानी-मानी पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन, लघुकथा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य, अनियतकालीन ककुभ का लंबे समय तक संपादन, प्रतिनिधि लघुकथायें वार्षिकी का नियमित रूप से संपादन/प्रकाशन

पुस्तक प्रकाशनः चिनम्मा, अनुवांशिकी, पांचवां बूढ़ा, आशंकाओं के नागपाश, प्रदक्षिणा, अंततः, आम आदमी नीम आदमी, कुंवर प्रेमिल की 61 लघुकथायें, शैलपर्ण की शैला आदि पुस्तकों का प्रकाशन. लघुकथा संग्रह 'हंसीराम हंसा' शीघ्र प्रकाश्य.

पुरस्कार/सम्मानः अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित

प्रसारणः जबलपुर, छतरपुर आकाशवाणी से कहानियां एवं कवितायें प्रसारित

सम्प्रतिः स्वतंत्र लेखन

सम्पर्कः एम.आई.जी-8, विजय नगर, जबलपुर-482002 (म.प्र.)

मोः 09301822782, 09301123958

 

आशंकाओं के नागपाश

डॉ. कुंवर प्रेमिल

सुनीता आज ऐसी सोई कि उसे तनिक भी होश शेष नहीं रहा. कितने ही दिनों से जाग रही थी वह. आखिर उसके बेटे जतिन का ब्याह जो था. उस घर में उसके सिवाय और कौन था, जो यह जिम्मेदारी निभाता भला!

एक-दो दिन नहीं बल्कि पूरे सप्ताह भर के कार्यक्रम उसने अपनी अकेले दम से निबटाये थे. केवल रिश्ते की एक मीरा भाभी ही थीं जो बीच-बीच में उसकी मदद कर जातीं, हिम्मत बंधा जातीं.

कहने को तो देवरानी जेठानी, ननदें सभी थीं, पर ये सभी मेहमान थीं. भला मेहमान किसी काम के होते हैं क्या? ये सब मूक दर्शक बनी रहतीं, दूर से ही उसकी दौड़म-भागम देखती रहतीं.

उसकी दिनचर्या मेहमानों को गरम पानी मुहैया कराने से प्रारंभ होती. चाय-नाश्ता, दोपहर का खाना सब कुछ समय पर चाहिए होता. दिन भर जुगाली करने को पान की दरकार होती. हर आधा एक घंटे में चाय बेचारी करती रहती हाय-हाय.

रात के खाने के बाद ही उसका टेंशन कम होता. महाराजन तो कब की आजिज आ चुकी थी, उसके अनुरोध पर ही सबको जैसे-जैसे झेल रही थी.

बच्चों का धमाल अलग से था. शोर-शराबा, हल्ला-गुल्ला, लड़ाई-झगड़ा उनका दिन-दिन भर चलता रहता. उनके मां-बाप बेफिक्र थे, आंखें-कान दोनों बंद किये रहते. इन सबके लिये सुनीता थी ही जो लस्त-पस्त होती रहती.

''बच्चे तो शोरगुल करेंगे ही.'' देवरानी मुंह फुलाकर कहती और अपने कमरे में बंद हो जाती.

''शादी-ब्याह के मौके पर बच्चे मस्ती नहीं करेंगे तो क्या बूढे करेंगे?'' जेठानी ही अपने साथ लाये नाती-नातिनों का पक्ष लेतीं और अपने बंद कमरे में पसर जातीं.

ननदों को अलग कमरे नहीं मिलने से वे अलग कसमसा रही थीं. हाल में गुजारा करती हुई गुस्से में फूल-पिचक रही थीं. मिठाइयां खाकर भी उनकी जुबानें कड़वाहट से भरी पड़ी थीं.

सुनीता बराबर सबका ध्यान रखती, पर पीठ पीछे खुराफात करती ननदें, देवरानी, जेठानी कोई न कोई शिकायत से उसका संबंध जोड़ लेतीं. कोई न कोई उलाहना उनके पास सदैव तैयार मिलता. वे सब उसके प्रति नृशंस थीं. रात बारह बजे के बाद ही वह बिस्तरे में जा पाती.

आज घर-बाराती सभी निकल गये थे घर से, वधू को ब्याहने. महिलायें पिकनिक स्पॉट देखने चली गई थीं. जैसे-तैसे उसने दो-चार निवाले निगलकर ही बिस्तरा पकड़ लिया था, फिर नींद ने जो उसे दबोचा तो उसे तनिक भी होश शेष नहीं रहा. बड़े दिनों के बाद आज वह चैन की नींद सो रही थी.

सच पूछा जाये तो वह वर्षों से उनींदी थी. पूरी नींद सो कहां पाती थी. नींद उड़न छू हो गई थी मानो. आंखें बंद होते ही डरावने सपने उसे घेर लेते. आशंकाओं-कुशंकाओं के बीच झूलती रहती वह. आंसू बहाना ही उसकी नियति हो गई थी.

पति की मृत्यु के बाद नन्हें जतिन को मां-बाप दोनों ही थी वह. उसके वैधब्य के बीते उन सालों में उसे रोशनी की एक किरण भी कहां दिखाई देती थी. ऐसे में एक मीरा भाभी ही आकाश का वह तारा थीं जो उसके धुंध भरे रास्ते पर जीर्ण-शीर्ण प्रकाश बिखेरकर उसका पथ आलोकित करने का यत्न कर रही थीं.

उसके ससुराल वाले उससे पूरी दुश्मनी निभाते रहे. उसके खिलाफ तरह-तरह के दांव-पेंच आजमाते रहे. इन सबकी तह में उसका प्रेम विवाह ही था. नितिन के साथ उसने कुछ रंगीन सपने देखे, फिर वे हमसफर बन गये. उनका प्रेम, प्रेम कहानी और प्रेम विवाह जहां उसकी ससुराल पक्ष के लिए नफरत के केंद्र बने, वहीं उससे तरह-तरह के इल्जाम लगाकर बदनामी के शिखर से ढकेल दिया. उन्हें भर बरसात में घर से निकाल दिया गया.

उसके विवाह में दोनों ही पक्ष के लोग शामिल नहीं हुए और वे उनके आशीर्वाद के बिना ही पति-पत्नी के बंधन में बंध गये. उनका प्रेम विवाह किसी को रास नहीं आ रहा था, इसलिए उनके पथ में कांटों का छिड़काव बखूबी किया जा रहा था.

तब से अब तक वह कांटों की सेज पर सो रही थी. खुशियों के मायने वह भूल गई थी. खोई हुई आज भी वह अतीत के गली कूचों में अपना पथ, अपना भविष्य तलाश रही थी.

वह और न जाने कब तक बेहाल, बेचैन भटकती कि मीरा भाभी ने उसे झिंझोड़कर जगा दिया.

''अरे उठो न, गधे-घोड़े बेचकर सो रही हो क्या?'' मीरा भाभी पल भर को आवाज लगाती हुई आईं और फिर अन्तर्धान हो गईं.

उसे उठना तो पड़ेगा ही, बारात के लौटने पर कई काम उसे ही निबटाने होंगे. यह अतीत उससे इस तरह जोंक की नाई चिपक जायेगा, उसने कभी ऐसा सोचा ही नहीं था.

नितिन आज उसे बेहद याद आ रहे थे. वह होते तो स्वयं देखते कि उनका सपना उसने नितिन को इंजीनियर बनाकर पूरा कर दिया है. वह देखते कि कैसे उसने अपनी जिंदगी का रथ एक चक्के के बल पर ही हांक दिया था और मंजिल भी प्राप्त कर ली है.

नितिन की डेडबॉडी की अकेले दम पर रखवाली करना मीरा भाभी जैसे जीवट वाली स्त्री का ही काम है. उसे तो अपने तन-बदन का होश नहीं था. कई दिनों से जाग रही मीरा भाभी को एक पल की झपकी क्या आई कि गजब हो गया.

न जाने कब जतिन बिस्तर से उठकर चुपचाप नितिन की मृतदेह के साथ सो गया. मीरा भाभी की चीख ने उसे पूरी तरह हिलाकर रख दिया था. उसका कलेजा अंदर तक कांपकर रह गया था.

उस दिन के बाद वह जतिन की मां, पिता, बाडीगार्ड सब कुछ थी. वह एक क्षण के लिए भी जतिन से दूर नहीं थी. उसने अपनी जिन्दगी जतिन के नाम कर दी थी.

जतिन हंसता तो वह हंसती, उसके रोने पर वह रोती, घर-बाहर पूरा जतिनमय हो गया था. मूर्त्त और अमूर्त्त के बीच उसका संसार विभक्त होकर रह गया था.

सुनीता की ननदें, जेठानी, देवरानी उसकी नौकरी लगने के बाद उसके घर पहुंचीं. घर की एक-एक चीज को वे बड़ी बारीकी से देखतीं. ऊपरी मन से उसके बेटे पर प्यार लुटाने का नाटक भी करतीं. ''देखो न, कितनी साहसी है सुनीता, अपनी अकेली दम पर लड़के को पढ़ा-लिखा कर इंजीनियर बना दिया, यह क्या कम गौरव की बात है.'' ननद की आंखों में स्कूटर बस रहा था.

मीरा भाभी उसे पहले ही चेता गई थीं. जब स्कूटर मिलने की संभावना नहीं रही तो उन्होंने अपना गिरगिटी रंग बदल लिया. वे उस पर तरह-तरह के आक्षेप भी लगाने लगीं.

बड़ी मुश्किल से सुनीता उन्हें अपने घर से खदेड़ पाई थी.

सुनीता अभी और न जाने कितने-कितने दृश्य बिंबों से एकाकार करती, न जाने कितनीे देर तक इस तरह अतीत में विचरती कि मीरा भाभी दोबारा आ धमकीं.

''अरे अब उठो भी, वर-वधू दरवाजे तक आ पहुंचे हैं और तुम अभी तक जस की तस बैठी हुई हो. क्यों?''

वह बुरी तरह हड़बड़ाई- ''मैया री! यह कैसी मुर्दनी मुझ पर है छाई. मैं क्यों अपने आपको अपनी आप बीती सुना रही हूं?''

कहते हैं अपना शत्रु, अपना मित्र, आदमी स्वयं होता है. जमाने वाले बाद में शत्रुता-मित्रता निभाते हैं. आज जिन्दगी के पृष्ठ उसके सामने एक-एक कर खुल रहे थे. वह उनमें स्वयं को खोज रही थी. जमाने ने उनके साथ ऐसा बर्ताव किया कि दिनों-दिन वह शंकित और कुंठाग्रस्त होती चली गई थी.

एक बार तो नन्हें जतिन के अपहरण की कोशिश भी की गई थी, पर यहां भी मीरा भाभी उसकी ढाल बनीं और जतिन बाल-बाल बच गया था.

दरवाजे पर का शोर-गुल, बैंड की आवाजें उसे वर्तमान में खींच रही थीं. उसे कुछ समय के बाद ही बहू-बेटे की अगवानी करनी थी. चौक पूर कर पूजा की थाली सजानी थी. उस घर की मालकिन घर के दरवाजे पर खड़ी होकर उसकी अनुमति की प्रतीक्षा कर रही थी.

उसे यह खयाल अच्छा लगा, सहानुभूति भी हुई, पर आजकल की बहुओं के कारनामें उसे डरा रहे थे. अपनी अंगुलियों पर सास को नचाती बहुओं के किस्से आम थे और वह उनमें लाचार सास की तस्वीरें साफ देख रही थी.

दादा-दादी वृद्धाश्रम भेजे जा रहे थे या अपने घर से जबरिया बाहर किये जा रहे थे. कहीं उसके साथ भी ऐसा ही हुआ तो...उसकी बहू ने भी बवाल मचा दिया तो...कहीं वह भी बेबस होकर वृद्धाश्रम खदेड़ दी गई तो...

इस 'तो' के आगे उसका दिमाग घूम गया और वह लहराकर बिस्तर पर आ गिरी. उसका होशोहवास खो गया, बेहोशी उसके अंग-अंग में पसरती चली गई.

उसे होश तब आया जब किसी की नरम-नरम नाजुक अंगुलियां उसके पैर दबा रही थीं. यह उसकी नववधू ही थी. पुत्र जतिन उसका माथा सहला रहा था, यह वह जान गई थी.

''अरे, मेरे पैर क्यों छुए बहू, अभी देवी-देवताओं की पूजा कहां हुई है? यह तो अपशकुन हो गया है.'' वह बीमार किंतु

सधे स्वर में अपनी बहू से मुखातिब हुई थी.

''आपके पैर ही तो सगुन हैं माताजी! देवी-देवता किसने देखे हैं? आप तो जीती-जागती देवी हैं...हमारी कुल देवी हैं.''

ये वीणा के तार थे या नववधू के हृदयोद्गार, उसके मन की ग्रंथियां नववधू की वाणी से क्यों टूटती हुई सी महसूस हो रही थीं. वह कितनी भयाक्रांत थी. यहां तक कि उसने अपनी नववधू पर भी शक किया था. बेशक उसने अपनी नववधू को भी संदेहों के दायरे में ला खड़ा किया था. एक बड़ा पाप हो गया था उससे!

उसकी कुंठा और अविश्वास बहू की विनम्रता के सामने बौने हो चले थे. उसे बहू की शालीनता आश्वस्त करती प्रतीत हो रही थी.

अब आशंकाओं-कुशंकाओं के नागपाश ढीले पड़ रहे थे. उसमें विश्वास जग रहा था. बहू को गले लगाने के लिए वह अधीर हो रही थी.

अपनी बहू के बांहों के हार उसके गले में सुशोभित हो रहे थे और वह बहू के गले में सोने का हार पहनाती हुई फूली नहीं समा रही थी.

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