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पाठकीय / प्राची - जुलाई - 2016 / आपने कहा है

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आपने कहा है साहित्य मनोरंजन का साधन नहीं कभी अमृत की पर्याय रहीं पवित्र नदियों गंगा और जमुना की दशा देखकर क्या आपको नहीं लगता कि अच्छा हु...

आपने कहा है

साहित्य मनोरंजन का साधन नहीं

कभी अमृत की पर्याय रहीं पवित्र नदियों गंगा और जमुना की दशा देखकर क्या आपको नहीं लगता कि अच्छा हुआ कि सरस्वती लुप्त हो गयी. यह बात आज साहित्य रूपी सरस्वती के साथ भी लागू होती प्रतीत हो रही है. मीडिया विस्फोट और कला, संगीत, मनोरंजन के नाम पर जो कुछ भी समाज के समक्ष परोसा जा रहा है, वह हमारी सभ्यता संस्कृति का कहां तक पोषण करने वाला है. हाल ही में एक अखिल भारतीय स्तर की प्रतियोगिता से चुनकर कुछ लोगों के साथ गुफ्तगू के दौरान पता चला कि यह पीढ़ी बड़े बड़े ओहदों तक तो पहुंच रही है लेकिन कला साहित्य और संस्कृति की जड़ों से पूरी तरह कटी हुई है. इन्हें सिर्फ अपने सिलेबस में सर्वश्रेष्ठ करना और नब्बे प्रतिशत पाना ही परम लक्ष्य दिखाई देता है. आज कुछ प्रकाशक कतिपय नवोदित रचनाकारों के उपन्यास एवं कथा संग्रह के दूसरे-तीसरे संस्करण छाप रहे हैं. ऐसी ही एक पुस्तक हाथ लगी. जिसकी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा है. पढ़ा तो पाया- न वहां भाषा और शिल्प का संस्कार है, न ही समाज के लिए कुछ सकारात्मक. ऐसा लगा जैसे सावधान इंडिया की कड़ियां हैं. आधुनिक जीवन के श्लील-अश्लील अनुभवों, हॉस्टल जीवन के गाली गलौज, मेट्रो जीवन की कुंठाओं और गांठों को बिना किसी भाषा व्याकरण के लिखकर कुछ लोग कहानी उपन्यास कह रहे और इनके लेखक फूले नहीं समा रहे, हास्यापद है.

प्राची के मई 2016 अंक में अनेक नए-नए पाठकों के पत्र और उन पत्रों में विस्तृत समीक्षा. समालोचना पढ़कर हार्दिक खुशी हुई. निश्चय ही हमारी मनपसंद पत्रिका अपने सुनहरे सफर में है. सुधांशु शर्मा और डॉ. मधुर नज्मी जी ने अपनी बेबाक राय पत्रों में रखी है. सम्पादकीय में आपने परोपकार और इंसानियत की जो बातें कहीं हैं वह सटीक और सशक्त लहजे में हैं. इनसे हम सबके भीतर मुसीबत में फंसे किसी व्यक्ति की मदद करने की प्रेरणा मिले यही मेरी भी कामना है. सचमुच आज हम उस टमटम के घोड़े की तरह भागे जा रहे हैं, जिसकी आंखों पर ढपनी लगी होती है. याद कीजिये कोल्हू के बैल की आंखों में भी यही ढपनी हुआ करती थी. जिससे वह वही और उतना ही देखे जितना उसे दिखाना चाहे जोतने वाला. यही आज का बाजार है, इसकी दखल परिवार, समाज हर जगह हो गयी है. रांगेय राघव और मैक्सिम गोर्की मेरे प्रिय रहे हैं. कहानी ''उत्तम'' एक छोटे से कथानक और सन्देश की श्रेष्ठ बुनावट का नायाब उदाहरण है. कॉलेज के दिनों में ''मेरा बचपन', ''जीवन के विश्वविद्यालय'' और अमर कृति 'मां' पढ़ी थी. टॉलस्टॉय, चेखव और दोस्तोवोस्की की तुलना में गोर्की का सर्वहारा दर्द अधिक जेनुइन और यथार्थ के करीब है. खास बात यह है कि दुःख के विवरण में भी निराशा नहीं, हताशा नहीं. ''छब्बीस आदमी और एक लड़की'' कहानी बांधे रखती है. मजदूरों की नियति और उनकी स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण कहानी में है. शंकर पाटिल की कहानी ''रोटी का स्वाद'' अंक की हासिल है. पात्रों और घटनाओं को बड़ी सहजता से बुना-गुना गया है. भाव-प्रभाव की दृष्टि से कहानी कहीं भी लचर नहीं होती. बड़ी बात यह भी कि यह हमारे आस-पास की कहानी लगती है. आज की कहानी लगती है. सोचने को विवश करती है. साहित्य मेरे लिए मनोरंजन का साधन नहीं, लेकिन फिर भी ''एक गधे की वापसी'' पसंद आ रही. इसका एक कारण यह भी कि कहानी में लेखक पात्रों के मन तक पहुंचा है और व्यंग्य में भी मर्म है. डॉ. मधुर नज्मी की गजलें बहुत अच्छी हैं. खास कर पहली गजल टूटते परिवार और छूटते गांव के दर्द को स्वर देने में समर्थ हुई है. नाट्य विधा को समर्पित व्यक्तित्व डॉ. मंजुला दास से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत समकालीन नाट्य-रंग जगत की स्थितियों की गहराई तक पड़ताल करने में सफल रही है. लघुकथाएं, यहां वहां की और अन्य स्तम्भ भी रुचिकर लगे. आवरण से लेकर साहित्य समाचार तक यह अंक पठनीय और सराहनीय है. सम्पूर्ण प्राची टीम को बधाई और शुभकामनायें.

अभिनव अरुण, वाराणसी

कथा और कविता पक्ष अद्भुत है

पहली बार प्राची पत्रिका (जून 2016 अंक) पढ़ने का मौका मिला. इस अंक मे मां विषय पर कई रंग लिये कविताएं व लघुकथाओं को पढ़कर सुखद अनुभूति हुई. सम्पादकीय में अमीर बनने वाले उद्योगपतियों पर प्रकाश डालकर सम्पादक महोदय ने अच्छा कटाक्ष किया है. नये लेखकों को आगे बढ़ने का मौका देकर आप साहित्य सृजन को प्रोत्साहित कर रहे हैं. रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना प्रक्रिया के बारे में पढ़कर सुखद लगा.

'इन्दुमती', 'डॉक्टर के शब्द'. 'मुझे पंख दे दो' इत्यादि रचनाएं मन को छू गईं. सरसरी तौर पर ही पढ़ पाई हूं पर अभी तक ऐसा नहीं लग रहा कि प्रथम बार पढ़ रही हूं. ममता बनर्जी की लघुकथायें प्रभावी रहीं, राकेश भ्रमर जी की लघुकथा 'भारत माता की जय' में लेखक ने दोगली मानसिकता रखने वाले व्यक्ति की मानसिकता को शब्दों में चरितार्थ किया है.

शगुन अग्रवाल जी की याद व साथ कवितायें, डॉ. सुचिता जी, तरुण सोनी 'तन्वीर' जी की मां पर लिखी रचनाएं बेहतरीन लगीं. पत्रिका का कथा व कविता पक्ष अद्भुत लगा. प्राची का सम्पादकीय विभाग इस हेतु बधाई का पात्र है. सिहंस्थ महाकुंभ 2016 का संक्षिप्त विवेचन ज्ञानवर्धक लगा, इस आलेख से हमें ऐतिहासिक व धार्मिक जानकारी मिली जो मुझे बहुत अच्छी लगी. भविष्य में प्राची उतरोत्तर प्रगतिशील रहे यही शुभकामना है.

अल्पना हर्ष, बीकानेर (राज.)

मां ममता का सागर है

प्राची पत्रिका का जून 2016 अंक अंक मिला. पहली बार पढ़ने का मौका मिला. साथ ही साथ पत्रिका में आपने मेरे

शोध पत्र और कविता को स्थान दिया, इस हेतु हार्दिक आभार. सम्पादकीय में आपने नितांत नये विषय पर दृष्टि डाली और अमीर उद्योगपतियों पर प्रकाश डालकर आपने तीक्ष्ण कटाक्ष किया है. रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना प्रक्रिया बेहद सुंदर लगी. अंक को आपने मां विषय पर समर्पित कर बहुत सुंदर प्रयास किया. मां एक ममता का सागर है. मां विषय पर जीवन के कई अनुभव लिए कविताएं व लघुकथाओं को पढ़कर आत्मानुभूति हुई.

ममता बनर्जी जी की लघुकथा में सुंदर अभिव्यक्ति हुई. राकेश भ्रमर जी की लघुकथा 'भारत माता की जय' में लेखक ने दोगली मानसिकता रखने वाले व्यक्ति की मानसिकता को शब्दों में चरितार्थ किया है.

सारी रचनाएं मन को छू गईं. शगुन अग्रवाल की कवितायें, डॉ. सुचिता कुमारी, तरुण सोनी तन्वीर, अल्पना हर्ष, रमा शर्मा, अनीता सिंह राज, डॉ. भावना शुक्ल आदि की रचनाएं बेहद सुंदर और सार्थक लगीं. साक्षात्कार के माध्यम से साहित्यकारों के निजी जीवन एवं उनके साहित्य और समाज के प्रति विचारों को जानने का मौका मिला. सिहंस्थ महाकुंभ 2016 का संक्षिप्त विवेचन ज्ञानवर्धक लगा.

पत्रिका में रचनाओं का चयन बेहद सजगता से किया गया है. सम्पादकीय विभाग इस हेतु बधाई का पात्र है. भविष्य में प्राची उतरोत्तर प्रगतिशील रहे, यही शुभकामनाएं. इतनी बेहतरीन पत्रिका को हमेशा पढ़ने का मन चाहता है. जल्दी ही पत्रिका की सदस्यता ग्रहण करूंगी.

सीमा शाहजी, थांदला, झाबुआ (म.प्र.)

संस्कार और संस्कृति लुप्त हो रही है

प्राची का अप्रैल 16 का अंक मिला. पढ़कर बेहद प्रसन्नता हुई. अंक में मेरी कविताएं प्रकाशित कीं, आपका हृदय से आभारी हूं. आवरण पृष्ठ सुंदर है. सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक विचारों से भरपूर सामग्री है. शिक्षा, संस्कार और संस्कृति लुप्त होती जा रही है. ऐसे में आपका लेख सार्थक है. पत्रिका में हमारी विरासत, धरोहर कहानी, कश्मीरी कहानी के साथ-साथ, प्रभात दुबे की कहानी 'आखिर क्यों' अच्छी लगी. एक गधे की आत्मकथा देकर पत्रिका को महत्वपूर्ण बना दिया. पत्रिका की जितनी प्रशंसा की जाए कम है. कविता, गीत, गजल लघुकथाएं भी ठीक हैं. कुल मिलाकर पत्रिका में आपकी लगन और कठिन परिश्रम से इसको भली भांति संवार दिया है. मैं पहले नाम से साधारण पत्रिका समझता था, परंतु पढ़ने के पश्चात् तो मुझे प्रभावित कर दिया, हार्दिक बधाई समस्त प्राची परिवार को.

शिव डोयले, हरीपुरा, विदिशा (म.प्र.)

दुर्योधन-दुशासन बढ़ रहे हैं

अभी कुछ दिनों पूर्व धारावाहिक 'सूर्यपुत्रकर्ण' देखते हुए श्रीकृष्ण का एक संवाद सुनकर मेरे मन में उथल-पुथल मच गई. श्रीकृष्ण कह रहे थे- ''बुराई बढ़ने का खतरा जितना बुरे लोगों से है उससे कहीं अधिक अच्छे लोगों के चुप रहने से है.'' हो सकता है और लोगों ने भी सुना होगा या उनके मन में भी बात रही होगी. किंतु इस बात में सच्चाई है. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता. जब अपराध करने वाले का विरोध होता है, तब उसका मनोबल गिरता है. उसे शर्म महसूस होती है. उसे भय भी लगता है. किंतु जब गलत काम करने वाले को कोई रोकता नहीं है, कोई विरोध नहीं करता है. तब वह निश्चिंत, निर्भय और निःसंकोच होकर गलत काम करने लगता है. वह समझ जाता है कि उसका कोई कुछ भी बिगाड़ने वाला नहीं है. श्रीकृष्ण का संकेत पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण की ओर था क्योंकि ये महारथी, महायोद्धा थे और द्रौपदी का चीरहरण जैसा कुकृत्य न होता. दुर्योधन भी समझ गया था कि उसका विरोध कोई नहीं कर सकता. यह तो तब की बात थी किंतु आज भी अन्याय के सामने बोलने वाले या उसका प्रतिरोध करने वाले नगण्य ही हैं. आज से बीस-पच्चीस वर्ष पहले तक घर गांव का ऐसा माहौल था कि बच्चे गांव भर के सयाने लोगों के सामने कुछ भी गलत बोलने या करने से डरते थे कि उनके माता-पिता को पता चल जाएगा. आज का बच्चा अपने चाचा-चाची तक से कह देता है कि आपसे क्या मतलब? माता-पिता भी अधिकांश ऐसे हैं जो बच्चे का पक्ष लेकर दूसरों से लड़ जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि पचास साल का कोई व्यक्ति उपस्थित है फिर भी अठारह-बीस वर्ष वाले बेशर्म बनकर मजाक करते हैं, भद्दी टिप्पणियां करते हैं, गाली-गलौज करते हैं. राह चलती लड़कियों, महिलाओं पर फब्तियां कसते हैं. अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं. अब लोगों की मानसिकता हो गई है कि कौन पचड़े में पड़े. दूसरी ओर सामान्य और अकेला आदमी बोलता है तो पिट जाता है. आए दिन समाचारों में पढ़ने-देखने को मिलता है कि बहन से छेड़छाड़ कर रहे युवकों का विरोध करने पर लड़की के भाई या पिता को बुरी तरह मारा. कभी-कभी तो हत्या कर देने की भी खबर आती है. ओवरटेक न करने देने या पास न देने वाले को दबंगों द्वारा गोली मार देने की कई घटनाएं सुनने में आ चुकी हैं. पूंजीपतियों, नेताओं और बाहुबलियों की औलादें इतनी निरंकुश हो चुकी हैं कि उन्हें कानून और प्रशासन का रंच मात्र भी भय नहीं रह गया है. पेट्रोल टंकियों और टोल प्लाजों पर इनकी गुंडागर्दी खूब चल रही है. लड़कियों का अपहरण और बलात्कार करना तो उनका शौक है या इसे वे अपना स्टेटस सिम्बल मानने लगे हैं. उनके साथ हथियारधारी उनके गुर्गे कुछ भी करने को तैयार हैं. शिक्षा जितना हाइटेक हुई है उससे कहीं ज्यादा हाईटेक अपराध और अपराधी हुए हैं.

बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति के इस दौर में दुर्योधन-दुशासन एक नहीं, हर गांव-गली-शहर में बढ़ते जा रहे हैं. अब समस्या है कि इनका विरोध कौन करे? यदि विरोध नहीं होगा तो उनकी संख्या बढ़ती जाएगी. विरोध करने वाला अपने और अपने परिवार के नाश के डर से चुप रह जाता है. लेकिन कब तक! कब तक डरेगा इंसान. एक दिन तो विरोध करना ही होगा. अकेले विरोध करने से कुछ नहीं होगा. जरूरी है कि ऐसे गुंडों, दबंगों, अपराधियों के विरुद्ध एकजुट होकर हजार-हजार लोग सामने आएं. उनको गिरफ्तार कराने में पुलिस करें. सामाजिक रूप से उनका बहिष्कार करें. तभी इन अपराधों और अपराधियों से निजात मिल पायेगी. अन्यथा तो ये एक-एक कर सबको अपना शिकार बनाते रहेंगे. पाठकों से आग्रह है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लें और अपने सुझाव भी लिखें तो कृपा होगी. इसे केवल पठनीय सामग्री न समझें.

अरविंद अवस्थी, मीरजापुर, (उ.प्र.)

मनुष्य से पशु अच्छे हैं

मई 16 का अंक प्राप्त हुआ. सम्पादकीय तो हमेशा पठनीय और संग्रहणीय रहती है. इस अंक की सम्पादकीय भी अति प्रेरणादायी है.

आखिर हम है क्याक्या धार्मिक, अधार्मिक, मनुष्य, पशु, या कुछ और...समझ के परे हैं. कोरा धर्म का आडम्बर ओढ़े हैं. वास्तविकता से एक हम परे/मानव मूल्यों का कहीं भी अता-पता नहीं. क्या हो गया है हमें?

कब तक चलेगा यह आडंबर/दिखावा. मनुष्य से तो पशु अच्छे हैं. कम से कम उनमें दया, ममता और आत्मीयता तो है. यह है आज हमारे समाज का स्वरूप, जिसकी ओर आदरणीय भ्रमर जी ने ध्यान आकर्षित कराया है.

समकालीन कहानीः कुछ प्रश्न, आलेख में कथा साहित्य से संदर्भित अनेक तथ्य हमारे समक्ष परोसे गये हैं, जो कि सार्थक एवं उपयोगी हैं. कहानी, कविता, गजल आदि विविध सामग्री से सजी पत्रिका अपनी श्रेष्ठता को स्वयं ही प्रतिपादित करती है. एतद् बधाई.

सनातन कुमार वाजपेयी 'सनातन', जबलपुर

प्राची का इंतजार रहता है

ढेर सारी पत्रिकाएं प्रतिमाह आती हैं, किंतु 'प्राची' का विशेष इंतजार रहता है. आप मन से, नियमित 'प्राची' का संपादन प्रकाशन कर रहे हैं. सदैव पठनीय सामग्री और वो भी सलीके से परोसना...सबके बस की बात नहीं...उस पर निरंतरता बनी रहती है. अनंत बधाइयां.

मैं तो तीन माह में 'अभिनव प्रयास' का 40 पृष्ठीय अंक निकालने में ही हांफने लगता हूं. पत्रिका मिलती होगी. कृपया रचनाएं व विशेष रूप से लघुकथाएं भिजवाएं. बहुत समय से कुछ आया नहीं है.

अशोक अंजुम, अलीगढ़ (उ.प्र.)

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रचनाकार: पाठकीय / प्राची - जुलाई - 2016 / आपने कहा है
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