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व्यंग्य

एक सड़ी हुई बिल्ली

राधाकृष्ण

हां चारों ओर ईमानदारी, तत्परता और हित-कामनाएं बहुत हैं. पड़ोसियां से भी अच्छे संबंध बनाए जा रहे हैं. आज सवेरे उठकर देखा कि कोई पड़ोसी अपने घर से मरी हुई बिल्ली लाकर मेरे दरवाजे पर डाल गया है. सबसे पहले उसे नौकरानी ने देखा और नाम-भौं सिकोड़ती हुई आकर बोली, 'मैं झाड़ू-बुहारू कर सकती हैं, मगर बिल्ली फेंकने का काम मेरा नहीं हैं.'

पत्नी से पूछने पर भी इस बात की सच्चाई साबित हुई. नौकरानी की ड्यूटी चार्ट में कहीं भी मरी हुई बिल्ली को फेंकने का काम सम्मिलित नहीं था. मरी हुई बिल्ली कौन फेंके? उसकी लाश से बड़ी बुरी बास आ रही थी. मैंने पत्नी से कहा कि क्या हर्ज है, तुम्हीं उठाकर फेंक दो और डिटोल से हाथ धो लो. इस पर वे तमक गयीं और कहने लगीं, 'वाह जी, बड़े आए हैं कहां के हुक्म चलानेवाले! मेरे पिताजी ने मुझे तुम्हारे यहां इसलिए नहीं भेजा है कि मैं सड़ी-गली बिल्ली उठाती फिरूं और फेंकती चलूं. कायस्थ की लड़की हूं, कोई डोमिन नहीं हूं.'

तब मैं स्वयं फेंकने को तैयार हो गया, मगर इस पर भी आपत्ति उठायी गयी. मुझसे बतलाया गया कि मेरी जाति भी कायस्थ ही है. अतएव मुझे डोम का काम करने की अनुमति नहीं मिल सकती. इसके अलावा मैं एक संपादक भी हूं. संपादक को अधिकार है कि वह किसी गरीब लेखक की रचना को उठाकर फेंक दे, लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं देखा गया है कि संपादक मरी हुई बिल्ली को भी उठाकर फेंक रहा है. पत्रकार कला के इतिहास में भी इस प्रकार का उल्लेख नहीं मिलता. आप गांधी जी भी नहीं हैं कि आपका फोटो खींचा जाएगा और अखबारों में छपेगा कि महाशयजी मरी हुई बिल्ली फेंककर एक महान आदर्श स्थापित कर रहे हैं. अतएव आप अपना काम कीजिए और जिसका काम बिल्ली फेंकने का है, उसे मरी हुई बिल्ली फेंकने दीजिए.

मगर इस बात की चिंता तो करनी ही होगी कि मरी हुई बिल्ली की फेंकने का काम किसका है? लोगों ने बतालाया कि यह साफ-साफ म्युनिसिपैलिटी का काम है. म्युनिसिपैलिटी में खबर कर दीजिए. वहां से कोई आएगा और मरी हुई बिल्ली को उठाकर ले जाएगा. तब म्युनिसिपैलिटी में फोन किया. उधर से उत्तर आया कि आपके आदेश पर हम बिल्ली नहीं उठा सकते. इसके लिए चेयरमैन का आदेश प्राप्त करना होगा. आप चैयरमैन से अनुरोध करें.

चेयरमैन को फोन किया तो उधर से बोले -''नौस्ते जी....आप बिल्ली जी...जी, मरी हुई बिल्ली...अजी भाई जी, मरी हुई बिल्ली दुर्गन्धि नहीं देगी तो क्या सुगंधि फेंकेगी...जी, जहां तक उसे फेंकने का सवाल है उसके विषय में विचार करना होगा...आप जरा आ जाइए तो मैं आपसे बातें कर लूं...जी, मैं म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर में तो कभी जाता नहीं...अपने पास कोटा, परमिट, लाइसेंस के बहुत सारे काम हैं...सो दफ्तर ही मेरे यहां आ जाता है...आप आ जाइए तो बात हो...''

तब पिचहतर पैसे खर्च हुए और मैं चेयरमैन के यहां पहुंचा. उन्होंने कहा, ''अच्छा जी, आप आ गए. मैंने भी सोचा था बिल्ली की गंध के कारण आप तुरंत आ जाएंगे. अभी ही तो म्नुनिसिपैलिटी के बड़े बाबू यहां से गए हैं. वे कह रहे थे कि आपके मकान से बिल्ली उठाने की ड्यूटी मेरी नहीं है.''

मैं आसमान से टपक पड़ा. चकित होकर पूछा, ''ऐसा क्यों.''

''आपका मामला टेक्निकल मामला है, साहब!'' चेयरमैन ने कहा, ''आपको याद होगा कि जब आपने अपना मकान बनवाने का नक्शा म्युनिसिपैलिटी में दाखिल किया था, तो इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट ने आपत्ति उठायी कि मकान का नक्शा पास करने का और अनुमति देने का अधिकार चेयरमैन को नहीं, इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट को है. मैंने हजार कहा, मगर मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई. आपको मकान बनवाने की अनुमति इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट से ही प्राप्त हुई थी. अब आपके मकान में कोई मरी हुई बिल्ली फेंक देता है तो मैं आपके लिए सिरदर्द क्यों लूं? आप इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट में जाइए. मैं कोई सरकारी मुलाजिम तो हूं नहीं, जो किसी का मुंह देखकर काम करूं. पब्लिक का आदमी हूं और खरा काम जानता हूं. जिसने आपको मकान बनवाने की अनुमति दी है, उसी से बिल्ली फेंकने के लिए कहिए.''

मैंने कहा, ''मगर होल्ंिडग-टैक्स तो मैं आपको देता हूं.''

''वह म्युनिसिपल-टैक्स है, जनाब!'' चेयरमैन ने कहा, ''वह तो आपको हर हालत में देना ही होगा. मगर जब मैंने आपको मकान बनाने की अनुमति नहीं दी, तो मैं उस मकान से बिल्ली भी नहीं फेंक सकता. साफ बात है. आप इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट के पास जाइए. बिल्ली वहीं फेकेंगे.''

टका-सा जवाब पाकर मैं इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट में पहुंचा. वहां कार्यालय के लोग बड़े प्रेम से मिले और मीठी-मीठी बातें कीं. जब उन्हें मालूम हुआ कि मैं बिल्ली फेंकने का अनुरोध लेकर आया हूं तो बिदक गए और रुखाई से पेश आने लगे. बोले, ''यह सब काम हमारा नहीं. हम लोग मकान बनाने की अनुमति देते हैं, मकान का नक्शा पास करते हैं, मगर बिल्ली नहीं फेंकते. यह म्युनिसिपैलिटी का काम है. आप वहीं जाइए.''

मैंने कहा, ''मैं म्युनिसिपैलिटी से ही आ रहा हूं. चेयरमैन ने मुझे बतलाया है कि मेरे घर से बिल्ली को इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट ही फेंकेगा.''

''ऐसा क्यों?''

''ऐसा इसलिए कि मकान बनाने की अनुमति मुझे चेयरमैन ने नहीं दी, मुझे आप लोगों ने मकान बनाने की अनुमति दी है. चेयरमैन का कहना है कि जिसने मकान बनाने की अनुमति दी है, वही आपके मकान से मरी हुई बिल्ली फेंकेगा.''

''अजीब बात हैं!'' इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट के बड़े बाबू ने कहा, ''अगर ऐसी बात है तो आप हमारे इंजीनियर साहब से बातें कर लें. मगर जहां तक मेरा ख्याल है, वे आपकी कोई मदद नहीं कर सकेंगे, क्योंकि हम लोगों के पास मरी हुई बिल्ली फेंकने का कोई इन्तजाम नहीं है.''

तब मैं वहां से उठ गया और उधर जाकर देखने लगा जिस ओर इंजीनियर लोग बैठते थे. एक मकानों के इंजीनियर थे, एक नालियों के इंजीनियर थे, एक सेप्टिक टैंकवाले पाखानों के इंजीनियर थे, एक पार्कों के इंजीनियर थे, एक सड़कों और गलियों के इंजीनियर थे और सब के परली ओर चीफ इंजीनियर बैठते थे. मेरे लिए यह स्वाभाविक था कि मैं मकानों में इंजीनियरों से मिलता. वे एक गंजे सिरवाले आदमी थे और बड़ी मोटी चुरुट मुंह में डाले हुए बैठे थे. मुझे देखकर वे बड़ी शालीनता से मुस्कराये और मेरे आने का कारण पूछा. मैंने उन्हें अपना बिल्ली-वृत्तान्त बतलाया और कहा कि कृपा करके उस सड़ी हुई बिल्ली को फेंकवा दें. मेरी बात उन्होंने पूरी तरह सुनी भी नहीं और आगबबूला हो गए. आवेश में आकर उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेज का थपथपाना और सिर हिलाना शुरू किया. आंखें तरेरकर कहने लगे, ''भला देखिए...देखिए...तमाशा...यह भी कोई बात है. बिल्ली फिंकवाने के लिए आ गए हैं...मेरा काम बिल्ली फेंकने का है? मेरा...मेरा...इसी की ट्रेनिंग के लिए मुझे अमेरिका भेजा गया था कि मैं आपके मकान की मरी हुई बिल्ली को उठाकर फेंक दूं...वाह जी, क्या कहने हैं!...अजी साहब, आप आदमी हैं या पजामा? आपका दिमाग सही है या उसमें कोई कसर है?...मुझसे कहने आ गए कि मैं आपके मकान से मरी हुई बिल्ली फेंक दूं?''

मैंने कहा, ''आपसे फेंकने के लिए कौन कहता है? मैं तो आपके पास यही अनुरोध लेकर आया हूं कि यदि आपके पास इस बात का इंतजाम हो और आपके द्वारा संभव हो, तो कृपा करके बिल्ली फेंकने का आदेश दे दें.''

उन्होंने तेज आवाज में कहा, ''आप मेरा दिमाग न चाटिए, यहां से जाइए. यह काम म्युनिसिपैलिटी का है. वहां जाकर चेयरमैन से मिलिए.''

''मिल चुका हूं.''

''तो फिर दुबारा जाकर मिलिए. उनसे जाकर कह दीजिए कि यह काम इन्प्रूवमेंट-ट्रस्ट का नहीं. आप तो चेयरमैनी झाड़ेंगे और अपना काम भी ठीक से नहीं करेंगे.''

''चेयरमैन ने इंकार कर दिया है, इसीलिए मैं आपके पास आया हूं. वे कहते हैं कि जो मकान बनवाने की अनुमति देता है उसी का काम है कि वह बिल्ली को भी फेंके.''

''उन्हें जाकर सुना दीजिए कि इम्प्रूवमेंट-ट्रस्टवाले भी इंकार कर रहे हैं. देखना है कि वे क्या कर लेते है.''

''मगर इससे मेरा क्या लाभ होगा?''

''मैं नहीं जानता साहब, मैं आपको भी नहीं जानता, आपकी मरी हुई बिल्ली को भी नहीं जानता. आपकी जहां खुशी हो वहां जाइए, जिससे इच्छा हो उससे मिलिए.''

''क्या मैं आपके चीफ इंजीनियर से मिल लूं.''

मेरी नाक में उस मरी हुई बिल्ली की बदबू आने लगी. मैंने सोचा कि वह आदमी तो उस मरी हुई बिल्ली से भी ज्यादा मरा हुआ और बदबूदार है. तब मैं चीफ इंजीनियर के पास पहुंचा. वे काला कोट पहने चुपचाप बैठे हुए थे. चेहरे पर कोई भाव नहीं. मालूम होता था कि समस्त कामनाओं और मनोभावनाओं को पीकर निर्विकार हो गए हैं. मैं कहता जा रहा था और वे सुनते जा रहे थे. मालूम होता था जैसे वे पत्थर के बने कोई देवता हैं जिनके सामने मैं मरी हुई बिल्ली के लिए स्तुति कर रहा हूं. उनका सिर भी नहीं हिलता था, उनकी पलकें भी नहीं झपकती थीं. काले पत्थर की मूर्ति की तरह वे चुपचाप सुन रहे थे. मेरी सारी बात सुनकर उन्होंने निर्लिप्त भाव से कहा, ''महाशयजी, अब आप ही बतलाइए कि मैं इस प्रसंग में आपकी क्या मदद कर सकता हूं?''

मैंने सीधी बात की, ''मेरे घर से बिल्ली उठाकर फेंक दी जाए बस!''

उन्होंने कहा, ''मुझे खेद है कि इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट आपकी यह सेवा करने में असमर्थ हैं.''

मैं और भी कुछ कहने जा रहा था कि उन्होंने हाथ जोड़कर मुझे प्रणाम किया और दाहिनी ओर पड़ी हुई फाइलों की ओर सिर घुमाकर देखा. स्पष्ट था कि मुझसे जाने के लिए कह दिया गया है. फाइलों की ओर देखते हुए मानों उन्होंने बताया कि मेरे पास और भी बहुत काम हैं. मैं उठ गया और अभिवादन करता हुआ जाने लगा. मुझे वहां भी मरी हुई बिल्ली की बदबू-जैसी मालूम हुई. जाते-जाते मैं रुक गया और पूछा, ''इस ट्रस्ट के चेयरमैन कौन हैं?''

उन्होंने उसी प्रकार निर्विकार चित्त से कहा, ''यहां के जिलाधीश महोदय से मिल लीजिए. वही हमारे चेयरमैन हैं.''

मैं मरी हुई बिल्ली से और उसकी बदबू से निस्तार पाना चाहता था. सोचा कि चलो, उनसे भी मिल लिया जाए. जिलाधीश महोदय का कार्यालय वहां से निकट ही था. वहां पहुंचने पर पता चला कि जिलाधीश महोदय की तबीयत कुछ ऐसी-वैसी है, वे बंगले पर ही काम रहे है. आप वहीं चले जाइए. यह सूचना मुझे यहां के चपरासी ने दी और मेरी ओर इस भाव से देखा मानो उसने कोई बहुत बड़ी खबर सुनाई है, जिसके द्वारा मेरा महान उपकार हो जाएगा. और इसके लिए उस चपरासी को कुछ पुरस्कार मिलना नितान्त उचित है.

तब जिलाधीश के बंगले पर पहुंचने में आधा घंटा लग गया. उसके बाद प्रतीक्षा करने में इतनी देर हो गयी कि मैं प्रायः भूलने लगा कि मैं यहां किस प्रयोजन से आया हूं. बड़ी देर के बाद उन्होंने साक्षात्कार के लिए बुलाया. वे पैंतीस-सैंतीस साल के सुदर्शन आई.ए.एस. थे. चेहरे पर हल्की-सी तेजस्विता और हल्की-सी पाउडर की परत थी. उनके शरीर की ओर से किसी अपरिचित सेंट की भीनी-भीनी खुशबू भी आ रही थी. ऐसी सज-धज के साथ बैठे हुए थे मानो शासन-सेवा में नियुक्त न होकर हनीमून के लिए प्रस्तुत हैं. उन्होंने सिर उठाकर मेरी ओर देखा और मुसकराने की असफल चेष्टा की.

''कहिए.'' उन्होंने इस तरह कहा मानों वे बलिदान होने के लिए प्रस्तुत हैं, मानों निश्चय ही उनका बलिदान होगा और न जाने कितनी देर तक व्यर्थ ही वह बलिकर्म चलता रहेगा.

तब मैं उनके सम्मुख अपना बिल्ली-वृत्तान्त सुनाने लगा. वे सुन रहे थे, कभी अपना सिर खुजला रहे थे और कभी विचित्र दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे. एक बार तो ऐसा लगा जैसे उठकर वे वहां से भाग जाएंगे. उन्हें अपने आपको संयत करना कठिन हो रहा था. फिर भी उन्होंने आदि से अंत तक मेरी बात सुनी. उसके बाद उन्होंने निष्कृति की सांस ली और कहने लगे, ''चेयरमैन साहब को देखिए. जनता के प्रतिनिधियों की ओर से ऐसे-ऐसे अड़ंगे आते हैं कि जी झल्ला उठता है. मुझे दुःख है कि आपको खामख्वाह सताया जा रहा है. उस मरी हुई बिल्ली को फेंकना म्युनिसिपैलिटी का ही काम है.''

मैंने कहा, ''यही बात जरा उन्हें बुलाकर समझा दें या टेलीफोन पर कह दें.''

उनका हाथ टेलीफोन की ओर बढ़ा, फिर रुक गया. बोले, ''यह बात चेयरमैन से ट्रस्ट के इंजीनियर कहते तो दूसरी बात होती. मेरा कहना ठीक नहीं होगा. चेयरमैन अपने को समझते हैं तो मैं भी क्यों न अपने को लगाऊं. मैं उनसे कुछ नहीं कहूंगा. यह टेक्निकल मामला है और इसे नियमपूर्वक ही हल होना चाहिए. आप एक बार लोकल-सेल्फ मिनिस्टर से मिलकर कह दीजिए.''

तब लोकल-सेल्फ मिनिस्टर...

एक घंटे के बाद लोकल-सेल्फ मिनिस्टर पान चबाते हुए मेरी ओर कुतूहल से देख रहे थे और मैं अपना बिल्ली-वृतान्त उनके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा था. उनके चेचक के चिह्नवाले खुरदरे चेहरे पर हास्य, करुणा, वीर, रौद्र आदि भाव एक-एक करके प्रकट होकर विलुप्त होते जा रहे थे.

जब मेरी बात समाप्त हो गयी तब उनके चेहरे पर एक ऐसा भाव दिखलाई दिया जिससे मैं नितान्त अपरिचित था. ऐसा लगा जैसे उन्हें कुछ मिनटों तक लोकल-सेल्फ मिनिस्टर की गद्दी से उतार दिया गया था. और अब उन्हें फिर से यथास्थान स्थापित कर दिया गया हो. उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मेरी ओर देखा और कहा, ''मुझे आपके लिए दुःख है. मगर मैं कर ही क्या सकता हूं. चेयरमैन दूसरे दल के आदमी हैं. अगर अपने आदमी होते तो कर देता. और एक बात आप जानते हैं? वह चैयरमैन कायस्थ हैं. ये कायस्थ लोग...खैर, नहीं.''

अब मैं उनसे यह बात कैसे कहूं कि मैं भी कायस्थ हूं और मेरे साथ ही ऐसी बात उठ आयी है. मगर मैं चुप रहा और उनकी बात सुनता रहा. वे कह रहे थे. ''आप सोचते होंगे कि यह लोकल-सेल्फ का मिनिस्टर है. यह चेयरमैन को कुछ भी कह सकता है. मगर ऐसी बात नहीं. अब युग बहुत बदल गया. हर बात के लिए सवाल होते हैं, हर बात के लिए विधानसभा में जवाब देना पड़ता है. हम मंत्रियों के समान दयनीय संसार में कोई नहीं. मैं चेयरमैन को कुछ भी नहीं कह सकता. सिर्फ उनके लिए सहायता की रकम मंजूर कर सकता हूं और दे सकता हूं. आप ही कहिए कि इसके अलावा मेरा अधिकार क्या है?''

मंत्री बड़े दयनीय और अशक्त होते हैं भगवान मुझे भी वैसा ही दयनीय और अशक्त बना देता तो मुझे कितनी प्रसन्नता होती. मुझे यह सुनकर भी आश्चर्य हुआ कि ये म्युनिसिपैलिटी को रुपये दे सकते हैं, लेकिन उनसे उनका काम करने के लिए नहीं कह सकते. मैं इस संबंध में सवाल करने वाला ही था कि उन्होंने कहा, ''इसके अलावा बिल्ली फेंकनेवाली बात मेरे पोर्टफोलियों में आती भी नहीं. यह विषय पब्लिक-हेल्थ से संबंध रखता है. आप जन-स्वास्थ्य मंत्री से मिलकर बिल्लीवाली बात कहें. चेयरमैन खुद भीगी बिल्ली बन जाएंगे और आपके घर की बिल्ली को उठवाकर तुरंत फिंकवा देंगे.''

अब जाकर बात बनी. जन-स्वास्थ्य मंत्री महोदय के पास पहुंचा. मालूम हुआ कि उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख्याल भी जनता के स्वास्थ्य के समान ही रहता है. अभी डॉज पर चढ़कर टहलने के लिए निकले हैं. थोड़ी देर के बाद आ जाएंगे तो बातें कर लीजिएगा. तब मैं थोड़ी देर ठहरने के बदले बहुत देर ठहर गया. उसके बाद जन-स्वास्थ्य मंत्री के दर्शन हुए. जन-स्वास्थ्य मंत्री का स्वास्थ्य अद्भुत था. वे अपने शरीर के द्वारा, तोंद के द्वारा, हाथ और पैर के द्वारा, एक विशाल और प्रकाण्ड स्वास्थ्य का प्रदर्शन कर रहे थे. कम से कम तीन क्विंटल उनका वजन होगा. ऐसे भारी-भरकम स्वास्थ्य-मंत्री को देखकर मेरा हृदय पुलकित हो गया और उनसे मैंने अपना बिल्ली-वृत्तान्त बतलाना शुरू कर दिया. सुनते-सुनते उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और खर्राटा लेने लगे. यह देखकर मैंने बिल्ली-वृत्तान्त बंद कर दिया और चुप ही रहा. तब उन्होंने अपनी आंखें बंद किए हुए ही कहा, ''आप कहते जाइए, मैं सब सुन रहा हूं.''

उनकी ऐसी तत्परता और जन-स्वाथ्य के संबंध में ऐसी करुणा देखकर मेरा मन संतुष्ट हो गया और मैं मरी हुई बिल्ली की सारी कहानी सुना गया. उसके बाद देखता हूं कि वे अचेत के समान आरामकुर्सी पर पड़े हुए हैं और खर्राटे ले रहे हैं.

सुविधा के लिए उन्होंने अपना मुंह इस तरह खोल दिया है मानों वे मेरी बात को कान से नहीं, अपने मुंह से ही सुन रहे हैं. मगर जब मेरी बात का उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया तब मैंने सोचा कि ये नींद में गाफिल हो गए. मैंने डरते-डरते कहा, ''मेरी बात का कोई उत्तर नहीं मिला?''

तब उन्होंने बड़े कष्ट से अपनी आंखें खोलीं. मेरी ओर कठोर दृष्टि से देखते हुए कहा, ''जनता के स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ करने का अधिकार चेयरमैन को नहीं है.''

मैंने उनका यह वक्तव्य सुना और सोचने लगा कि इसके बाद क्या कहा जाने वाला है. मगर यह वक्तव्य किसी इशारे के समान था जिसे सुनते ही उनके प्राइवेट सेक्रेटरी तुरंत वहां प्रकट हो गये. वे इस तरह वहां पहुंचे मानों वक्तव्य के द्वारा उन्हें यहां आने के लिए कहा गया तो और वे जानते हों कि उन्हें आगे क्या करना है. एक बार उन्होंने टेलीफोन की ओर देखा, फिर मंत्रीजी की ओर देखने लगे. मंत्रीजी ने कहा चेयरमैन को फोन करके कहो कि नगीना बाबू के घर में जो मरी हुई बिल्ली पड़ी है उसे उठाकर फौरन फेंकवा दें. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे और शहर में हैजा या प्लेग फैल गया तो वे उसके जिम्मेवार होंगे?

प्राइवेट सेक्रेटरी ने टेलीफोन कर दिया. उधर से भी कुछ जवाब आया जिसे मैं सुन नहीं सका. टेलीफोन की बातचीत समाप्त करके प्राइवेट सेक्रेटरी ने कहा, ''चेयरमैन का कहना है कि इनके मकान से बिल्ली फेंकने का मामला टेक्निकल मामला है. वे कहते हैं कि इस बात को कानूनी रूप से ही हल किया जा सकता है.''

मंत्रीजी ने पूछा, ''वे क्या कहते हैं?''

प्राइवेट सेक्रेटरी बोले, ''वे कह रहे हैं कि वे बिल्ली नहीं फेंकेगे. इस बात में उन्हें खतरा महसूस हो रहा है.''

''उन्हें अभी यहां बुला भेजिए.''

प्रााइवेट सेक्रेटरी ने कहा, ''वे खुद ही यहां आ रहे हैं.''

मंत्रीजी ने मेरी और देखकर कहा, ''चेयरमैन यहीं आ रहे हैं. मैं अभी उनसे बिल्ली फेंकने के लिए कह देता हूं तब तक यहीं आराम करें.''

यह कहकर वे स्वयं आराम करने लगे. आरामकुर्सी पर टांगें फैला दीं, आंखें बंद कीं और तत्काल खर्राटा लेने लगे. जब चैयरमैन वहां मुस्कराते हुए पहुंचे तो प्राइवेट सेक्रेटरी ने उन्हें जगाया. मंत्रीजी ने आंखें खोलते ही पूछा, ''चेयरमैन साहब, यह मैं क्या सुन रहा हू? इनके घर पर मरी हुई बिल्ली पड़ी हुई है और आप उसे उठाने से इंकार कर रहे हैं? मान लीजिए कि अगर हैजा फैल गया तो क्या होगा?''

चेयरमैन ने कहा, ''हैजे की बात पीछे होगी, पहले इस बात का फैसला कर लिया जाए कि इनके मकान से मैं बिल्ली उठवा सकता हूं या नहीं. इनके मकान का नक्शा मैंने पास नहीं किया है, इम्प्रूवमेंट-ट्रस्ट ने पास किया. अब मैं उस मकान से बिल्ली फेंकनेवाला कौन होता हूं? आप ही कहिए? किस न्याय से मैं इनके यहां की बिल्ली उठवाऊं?''

मंत्री महोदय कुछ कहने ही जा रहे थे कि चेयरमैन ने फिर कहा, ''मान लीजिए कि इनके घर में कोई मरी हुई बिल्ली फेंक गया है. जब इनके घर में बिल्ली है, तो अब वह इनकी संपत्ति है जिस पर इनका पूरा अधिकार है. अब मान लीजिए कि मैं इनके यहां अपने आदमियों को बिल्ली उठवाने के लिए भेजता हूं और ये हम पर ट्रेसपास का मुकदमा चला देते हैं, तब क्या होगा? ऐसी अवस्था में आप मेरी क्या मदद कर सकते हैं? मैं आप लोगों से बाहर नहीं हूं मगर कायदे के साथ काम होना चाहिए. यह बात आप भी पंसद करेंगे. इनके यहां से बिल्ली फिंकवाने के लिए मुझे पुलिस-फोर्स चाहिए. पुलिस की एक टुकड़ी लेकर हमारे आदमी जायेंगे और इनके यहां से मरी हुई बिल्ली निकालकर फेंक देंगे.

मंत्रीजी ने कहा, ''पुलिस के अधिकारियों से आप पांच आदमियों का फोर्स मांग लें.''

चेयरमैन ने कहा, ''मैं पुलिस के पास प्रार्थना करने के लिए क्यों जाऊं. आप मुझे पुलिस-फोर्स दें तो मैं अभी उनके यहां से बिल्ली को हटवा दूं.''

जन-स्वाथ्य मंत्री ने कहा, ''मगर फोर्स तो पुलिस मंत्री ही दे सकते हैं. नगीना बाबू आप पुलिस मंत्री से मिलकर पांच सिपाहियों की टुकड़ी एक जमादार के साथ मांग ले अैर उसके बाद चेयरमैन साहब से मिलिए. मगर ठहरिए पुलिस मंत्री अभी टूर में गए हैं वे चार-पांच दिन के बाद आएंगे, तब तक...''

तब तक मैं अपनी सारी उम्मीदें खो चुका था. मैंने उत्साहपूर्वक कहा, ''कोई बात नहीं हुजूर, आप आराम करें. मैं बिल्ली का इंतजाम खुद किए लेता हूं.''

और मैं वहां से सीधे घर आ गया. मुझे वहां बिल्ली तो दिखलाई नहीं दी, परन्तु अभी तक उसकी गंध आ रही थी. मैंने पत्नी से पूछा, ''मरी हुई बिल्ली की गंध अभी तक क्यों आ रही है?''

पत्नी ने कहा, ''तुम यहां से गए, उसके तुरंत बाद मैंने दस पैसे देकर एक छोकरे से बिल्ली फेंकवा दी. अब गंध कहां?''

मगर मैं मरी हुई बिल्ली की गंध महसूस करता ही रहा. आज उस बात को कई सप्ताह हो गये हैं, फिर भी मरी हुई बिल्ली की गंध मेरी नाक में आती ही रहती है. घर, बाहरजहां कहीं भी मैं जाता हूं, मेरी नाक में, मरी हुई बिल्ली की गंध आती रहती है. सड़कों पर, गली में, भीड़ में, एकान्त में, म्युनिसिपैलिटी में, सरकारी दफ्तरों में, सभा में समिति मेंसब जगह मुझे मरी हुई बिल्ली की गंध मिलती रहती है. जहां शासक और अधिकारी दिखलाई देते हैं वहां मुझसे नाक नहीं दी जाती. वहां की गंध ऐसे असहनीय मालूम होने लगती है कि जैसे मेरा गला घुट जायेगा, जैसे मैं बेहोश होकर गिर जाऊंगा.

पता नहीं कि इस सड़ी हुई बिल्ली की गंध से मुझे कब निस्तार मिलेगा.

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