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प्राची - जुलाई 2016 / पक्षाघात / कहानी / मार्कण्डेय

धरोहर कहानी

परेश पलभर को लड़खड़ाया. लेकिन डॉक्टर कह चुका था और पीछे दर्शन खड़ा था. परेश चुपचाप खड़ा रहा. दर्शन एक कुरसी के सहारे मरीज को उड़ती निगाह से देखता रहा. डॉक्टर ने नब्ज पर हाथ रखा और रीना चिल्ला पड़ी, ''नहीं, परेश, अब रहने दो मुझे कोई डर नहीं, परेश!...दर्शन बिल्कुल नाराज नहीं होगा. मैं बचपन से यही सोचती रही हूं कि मैं मां बनूं और किसी बच्चे के साथ खेलूं. इसी एक इच्छा को मारते-मारते मैं एकदम मर गई, लेकिन यह आज तक नहीं मरी.''

पक्षाघात

मार्कण्डेय

से एक हलका झटका-सा लगा था. गाड़ी वह धीरे-धीरे ड्राइव कर रही थी कि एक नन्हा-सा बच्चा दौड़ता हुआ सामने आ गया था और उसने ब्रेक लगाकर गाड़ी रोक ली थी. उस समय न तो उसे ऐसी सिहरन ही महसूस हुई थी, न उसका दिल ही धड़का था. लेकिन इस समय तो वह...उसने एक और चारपाई से आगे झुककर दीवार पर स्विच टटोला और रोशनी की, फिर पलंग के सिरहाने से तौलिया लेकर माथे और गरदन से पसीना पोंछ डाला. कमरे की घड़ी की टिक-टिक पहले उसे एकदम सुनाई नहीं पड़ी थी, लेकिन जैसे-जैसे उसके दिल की धड़कन कम हुई, घड़ी की आवाज बढ़ती गई और जब उसे एकाएक दर्शन का ख्याल आया तो वह इतनी तेज हो उठी कि उसने घूमकर देखा, एक बजकर कुछ मिनट हुए थे. एक बार फिर उसका ध्यान दर्शन के बिस्तर पर चला गया था. सिकुड़ी हुई चादर पर गन्दी गठरी की तरह लुंज-पुंज सोये हुए दर्शन की जगह साफ, धुली हुई चादर, कम्बल और तकिया करीने से सजे हुए थे और बीच में वह क्या है?...अजीब बात है! उसने झुककर उसे उठा लिया- रबर के बबुए की केवल एक टांग, अभी जोड़ पर लगा हुआ धागा भी इसमें पड़ा है. यह आया कहां से? मेरे घर में तो कोई बच्चा भी नहीं. उसने उसे हाथ से दबाया तो वह पिचक गई. लेकिन यह कितना अजीब है...बबुए की एक टांग, सारे धड़ से अलग. उनके रोयें ऊपर से नीचे तक उभर आए और एक अजीब-सा भय, वितृष्णा और उलझन का मिला-जुला भाव उसके मन पर छा गया. उसने बबुए की उस टांग पर से तुरंत दृष्टि हटा ली, पर उसकी पलकों पर वह टांग आकर जैसे चिपक गई. उसने गिनगिनाकर उसे पूरी शक्ति से दूर फेंका, लेकिन वह दर्शन के बिस्तर पर उसी जगह जाकर गिरी, जहां वह पहले थी. अब वह डरने लगी. इधर-उधर देखा तो एकदम सन्नाटा और जाने कैसे उसे अब उसी बबुए के हाथ, पांव, धड़ और सिर से लगी हुई गरदन, सब अंग अलग-अलग दिखाई पड़ने लगे...हवा में झूलने लगे...दीवारों पर उड़ने लगे और दूर-दूर से रेंग-रेंगकर उसके बिस्तर पर इधर-उधर चलने लगे. वह हांफने लगी...पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूंदें तो जो अभी कुछ मिनट पहले उसके माथे पर सूख गई थीं, फिर उग आईं और एक-दूसरे से मिलकर बहने लगीं. उसने तौलिया लेने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ में नहीं आया. चीखने की कोशिश की, लेकिन गले से सायं-सायं की आवाज निकलकर रह गई. फिर पता नहीं क्या हुआ! आंखें खुली रहीं या नहीं, बत्ती जलती रही या नहीं, जाने क्या हुआ, कैसे हुआ, उसे कुछ पता नहीं और उसी तरह एक सिकुड़े हुए कीड़े की तरह बेजान, लुढ़की, सिमटी पड़ी रह गई.

सुबह पांच के करीब जब दर्शन लड़-लड़ाता हुआ घर पहुंचा, तो उसने पहली बार रीना को बांहों में लिया- ऐसा नहीं कि रीना और दर्शन कभी पास-पास नहीं सोये. सोये, एक-दूसरे को प्यार किया, चूमा, पर कुछ ही दिन. इन कुछ दिनों को आज पांच-छः वर्ष बीत चुके हैं, इसलिए अगर इसे पहली बार कहा गया तो कोई ऐसी बड़ी गलती नहीं हुई. लेकिन रीना दर्शन के प्यार करते ही लुढ़क गई, उसके हाथ बेजान-से इधर-उधर पड़े रह गए. आवाज की जगह पर थूक, गाज राल-सी निकलकर रह गई.

दर्शन चौंका, उसका नशा हिरन हुआ और उसे लगा कि रीना ने जहर खा लिया है.

जाड़े की सुबह के पांच बजे थे. अंधेरा माड़े की झिल्ली की तरह आंखों पर चढ़ा था. दर्शन ने खिड़की से बाहर झांका और लपककर किसी डॉक्टर को फोन करना चाहा, लेकिन उसके पैर लड़खड़ा गए. उसने घूमकर फिर रीना को देखा- बेबसी की एक अजीब-सी कातरता और वीरान सौंदर्य...उसका मन जाने कैसा हो गया. उसने रीना के सिर को अपनी गोद में ले लिया. तौलिये से उसका मुंह साफ किया और उसके गालों को चूमा. लेकिन हाथ से छूटते ही गरदन फिर लुढ़क गई और वह घबराकर उठ खड़ा हुआ. फोन तक गया और एक-एक कर कई डॉक्टरों को एक साथ सूचित किया- मेरी बीवी को जाने क्या हो गया है! वह बेहोश है. शीघ्र आयें. उसके मन में पुलिस को भी सूचित करने का ख्याल आया, पर, जाने क्यों, उसे लगा कि पुलिस इस क्षण-भर के सुख को भी उसने छीन लेगी. जाने क्यों, उसने पूरी परिस्थिति के स्वामी बने रहने के सुख को अपने अंदर फूलते हुए पाया. एक बार फिर लौटकर रीना के पास गया. उसके बालों को ठीक किया, कपड़े संभाले और उसे ठीक से लिटाकर फिर उसके माथे पर झुक गया. पांच बरस पहले ही रीना का सजा हुआ, सिंदुर-मंडित भाल...फूलों के भीतर से झांकता हुआ उसकी शराबी रंग और मछली की तरह उलट-पुलट जाने वाली सुहाग-भरी आंखें उसे याद आई...वह पसीने से तर-ब-तर हो गया. कितनी बड़ी बेवकूफी थी कि वह आग में जान-बूझकर कूद गया था! कैसी अजीब बात है, इसकी तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी! काश, रीना ऐसी ही उसे पहले मिली होती! लेकिन आज वह मुस्कराकर रह गया...कहीं डॉक्टर फिर इसे अच्छा न कर दें. सो, लगा, उसने नाहक ही डॉक्टरों को फोन कर दिया...अभी थोड़ा अंधेरा बाकी था... पल-भर रीना को गोद में लेकर सोता, फिर सवेरे...वह पूरा सोच भी नहीं पाया कि कार का हॉर्न उसके कानों में कांटे की तरह सीधा सूराख बनाता चला गया.

डॉ. सुदेश चक्रवर्ती को देखते ही दर्शन की आंखों से आंसुओं की धारा बह चली. असल में वह रोना नहीं चाहता था, न उसे ऐसा कोई सदमा ही था, पर पल-भर पहले एक झटके के कारण उसके दिमाग का जो भारीपन उड़ गया था, जाने कहां से फिर लौट आया और उसके पांव फिर हलके पड़ गए. डॉक्टर ने धीरे से अपना हाथ उसके हाथों में दे दिया और खुद एक छोटा-सा स्टूल लेकर मरीज के पास जा बैठा. अलकोहल की हलकी गंध कमरे में भरी हुई थी, इसलिए उसने घूमकर दर्शन के चेहरे पर आंखें धंसा दीं और उठकर कमरे की खिड़कियां खोलने लगा.

दर्शन चुपचाप खड़ा था. डॉक्टर रीना की नब्ज देखने लगा. पलभर भी नहीं बीता था कि दर्शन रीना की चारपाई पर आ बैठा और डॉक्टर को अपनी ओर मुखातिब करके कहने लगा, ''मैं शराब कभी नहीं पीता, डॉक्टर! पिछले पांच वर्ष तक मैंने जीवन का कुछ जाना ही नहीं. यह मेरा बिस्तर है और वह...उधर देखो...बांध की उस निचली वादी में जो सांप के पेट-सा हलका दाग दिखाई दे रहा है, वही मेरा रास्ता है, जिसके एक-एक रोड़े और पत्थर से मेरी मुलाकात है...नीचे मरघट है, डॉक्टर! मैं और कुछ भी नहीं जानता.''

सुदेश उसे देखता रह गया. रीना की कलाइयां पूरी तरह उसके हाथों में आ पड़ी थीं और उसकी सुनहली घड़ी उसे बेहद ठंडी लग रही थी. उसने दूसरा हाथ भी ऊपर कर लिया था और दोनों हाथों में रीना का हाथ लिये एकटक दर्शन को देख रहा था. उसे पहले तो चिढ़ हुई दर्शन की बातों से, लेकिन जब एक झटके-से रीना ने मुंह फेरा और उसका श्यामल, मुरझाया हुआ पूरा चेहरा उसकी आंखों के आगे आ गया, तो वह जाने क्यों चुपचाप बैठा रह गया. उसे कुल मिलाकर इतना ही लगा कि प्रभाव को बनाए रहने और भूल जाने में बहुत अंतर है. अनुभवों और दवाओं में रास्ते को छोड़कर, अपने को पिचकाकर निकल जाने में और किसी तरह खड़े होकर रास्ते के जाने योग्य बन जाने का इंतजार करने में कोई फर्क जरूर है.

डॉक्टर ने रीना की आंखों के पपोटों को टॉर्च जलाकर ध्यान से देखा, फिर हाथ के नाखून देखकर दिल की गति देखने के लिए बैग से स्टैथेस्कोप निकालने लगा. अब दर्शन डॉक्टर की ओर गहरी दृष्टि से देख रहा था और डॉक्टर जैसे किसी उलझन में फंस गया था.

दर्शन फिर बोल पड़ा, ''लेकिन डॉक्टर...!''

''लेकिन-लेकिन कुछ नहीं, साहब, आप तो कमाल के आदमी हैं. आखिर कब से इनकी यह हाल है?...मुझे तो डर है कि केस प्वायजनिंग का है.''

''प्वायजनिंग...अच्छा तो रीना ने...लेकिन अभी पूरा असर तो नहीं हुआ होगा, डॉक्टर!''

डॉक्टर ने कड़ी और संदेह-भरी निगाह से दर्शन को देखा और उठ खड़ा हुआ. दरवाजे के बाहर खिड़की के पास गया और सरकारी अस्पताल का नम्बर मिलाकर, रोगी की पूरी हालत के साथ रिपोर्ट दर्ज कराई और बाहर जाने को आगे बढ़ा ही था कि दर्शन की आवाज सुनकर ठिठक गया, ''आपकी फीस, डॉक्टर?'' लेकिन सुदेश के जब कदम नहीं रुके, तो पीछे से किंचित तेज आवाज में दर्शन चिल्लाया, ''मैं पुलिस से कहूंगा कि रीना से तुम्हारी दोस्ती है.''

डॉक्टर सुदेश के आगे कटघरा-सा खिंच गया. अगर मरीज इस तरह का है, तो इसे छोड़कर जाने का क्या अर्थ हुआ? उसका यहां आना तो छिप नहीं सकता. फिर मुकदमे के लिए तो कोई भी बात काफी होगी. पार्टी पैसे वाली है...इस तरह की कई बातें डॉ. सुदेश के मन में आयीं और वह मोटर की चाभी की रिंग को उंगलियों में नचाता खड़ा हो गया. फिर इस उलझन का एक अजीब पहलू उसकी नजर में आया, जो बेहद दिलचस्प हो सकता था. वह लौटा और कमरे में जाकर फिर उसी स्टूल पर बैठ गया. रीना की हथेली उसने जहां छोड़ी थी, वहीं पड़ी हुई थी और अब एक मुरझाये हुए बंद कमल की तरह लग रही थी. काले रेशम के धागों में लॉकेट जाने कैसे सरककर उसकी गरदन के खुले भाग पर आ पड़ा था और सांस लेने के साथ हिल रहा था. चेहरे की विक्षिप्त चेतना जैसे कुछ शांत हो मृत्यु के नजदीक पहुंच गई थी और आंखों के खंजन बेसुध-से होकर अपने आकार को एकदम स्पष्ट कर रहे थे. दर्शन एक ओर लुढ़क गया था. द्वार खुला था. मोटर बाहर खड़ी थी. डॉक्टर का दिमाग तेज चक्कर काट रहा था. कई तरह की बात, कई तरह के विचार, कई तरह की शंकाएं, और साहसिकताएं...सब एक गोलाई में एक-दूसरे के पीछे तेजी से भागते जा रहे थे.

सरकारी अस्पताल की गाड़ी आयी और डॉ. सुदेश की दूसरी जांच को ठीक मानकर लौट गई. प्रमाण के लिए डॉ. सुदेश ने सरकारी डॉक्टर से भी मरीज की जांच करवा ली. रीना को बेहोशी की बीमारी है, यहीं दोनों डॉक्टरों ने निश्चय किया था. सुदेश कोरोमीन देते हुए खिड़की से उस धुंधली पगडंडी को देखता रहा, जो अब डसकर उलट जाने वाले सांप की तरह उजली हो उठी थी और दर्शन का वह वाक्य कि वह उसे रीना का दोस्त कह देगा...उस पगडंडी पर सूरज की पहली किरण उतरने ही वाली थी.

डॉक्टर ने एक इंजेक्शन दिया. रीना कनकनाई. पलकें हिलीं और धीरे-धीरे खुलने लगीं. डॉक्टर चुपचाप देखता रहा. बोला कुछ भी नहीं. रीना भी उसे देखती रही, एकटक. शायद इतनी शक्ति ही उसमें बाकी नहीं थी कि वह आंखें फेर सके. लेकिन फिर उसने आंखें बंद कर लीं. वह यही चाहता भी था. तनाव को कम करने के लिए नींद सबसे बड़ी दवा है.

दर्शन रोगी कुत्ते की तरह उस पूरे कनवैस में डॉक्टर को घिनौना लगा. बड़ी-बड़ी खिड़कियों से छोटे, फिर बड़े, फिर बड़े होते हुए पेड़ों के अलावा कुछ भी दृष्टि में नहीं आता था. सिर्फ कमरे की हलकी नीली दीवार और रीना का पलंग. डॉक्टर ने अपना बैग संभालते हुए दर्शन को झकझोरकर जगाया. वह चौंककर उठ बैठा और लड़खड़ाते हुए डॉक्टर के पीछे-पीछे बाहर मोटर के पास तक गया.

''हाथ-मुंह धोकर मरीज की देखभाल कीजिए. कोई दवा देने की जरूरत नहीं. सोने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए. मैं दोपहर को एक के करीब फिर देख जाऊंगा.'' डॉक्टर ने कहा और मोटर का दरवाजा खोलते हुए यह सोचता रहा कि आखिर इस आदमी ने उस समय यह क्यों कहा कि मैं रीना का दोस्त हूं...

डॉक्टर चला गया और दर्शन बड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा, जहां वह खड़ा था. उसे बिल्कुल याद नहीं कि उसने क्यों डॉक्टर को बुलाया था, उससे क्या कहा था और अब वह उसे और क्या करने के लिए कहकर चला गया है. अक्सर ऐसे ही लोग दर्शन के पास आये हैं, जो कुछ कहकर चले गए हैं और जो चले गए हैं वे दर्शन के दिल का उस समय तक बचा-खुचा खून भी साथ ही लेते गए हैं- मानसिक गुलामी का खून, और दर्शन उन सब पर हंसकर रह गया है. शायद इसलिए कि वह उन्हें बेवकूफ समझता है, क्योंकि वे अपनी विजय के बारे में भ्रमित हैं. असल में वे उसी क्षण हार जाते हैं, जब वे दर्शन को निकम्मा और बेमतलब का समझते हैं.

दर्शन लौटकर उसी स्टूल पर बैठ गया और एकटक रीना की आंखों में देखने लगा. कुछ देर वैसे ही देखता रहा. पलकें फैल गईं. पुतलियां निकलकर दर्शन की आंखों पर चस्पां हो गईं और उसे हर चीज अपनी पूरी गहराई में दिखाई पड़ने लगी. रीना की आंखें देखकर पहले उसे डर लगा, पर जैसे ही उसने उसके चेहरे पर दृष्टि डाली, हडिड्यों का एक विस्तृत जाल और रंगों में बहता हुआ अल्कोहल...मोह, इतनी शराब कहां मिली, रीना, तुम्हें? और उसने घबराकर रीना के दिल पर निगाह डाली...सफेद, बिना किनारे की, कढ़ी हुई धोती और लंबी बांहों वाला सफेद ब्लाउज पहने रीना कई बच्चों के साथ खेल रही थी. पीछे बड़ा सा तीन-तल्लों वाला मकान था, जिसके आगे संतरी खड़ा था और मोटरों की लंबी-सी कतार के पीछे से दर्शन दौड़ता हुआ चला आ रहा था. रीना के लिए कोई संदेश था उसके पास, लेकिन वह है क्या? एक मुनीम का लड़का, जिसका बाप कांपता हुआ दुर्गाबाई के आगे घंटों खड़ा रहता है...

...दर्शन अपने बाप की लंबी तोंद देखकर विक्षिप्त हो गया, जिसमें कितनी ही लाशें मुटिठ्यां तान-तानकर गगन-भेदी नारे लगा रही थीं. दुर्गाबाई के सफेद वस्त्रों के नीचे कोढ़ के भद्दे दाग थे और महल के ऊपर गिद्धों की एक पांत मंडरा रही थी. दर्शन ने देखा कि उसका बाप जमीन पर बैठा एक बरतन में जहर घोल रहा है. सेठ लक्ष्मीचन्द एक लड़का गोद लेना चाहता है और दुर्गाबाई जानती है कि गोद लिया जाने वाला लड़का उसके परिवार का है. बूढ़ा सठिया गया है, अब उसे जाना चाहिए. और लक्ष्मीचंद करोड़ों की मिल्कियत पीछे छोड़कर चला गया.

...दर्शन ने यमदूतों को देखा, उनकी विकराल आकृतियां उनके बड़े-बड़े दांतों के कारण और भी डरावनी हो उठी थीं.

...फिर उसे एक अलीब-सा दृश्य दीखा. रीना के दिल के पिछले हिस्से में एक सजा-सजाया कमरा है और दुर्गाबाई और उनका मुनीम कम से रीना और दर्शन के कपड़े उतार रहे हैं, उन्हें नंगा कर रहे हैं. दीवारें सटती आ रही हैं. हवा ऊपर को उड़ रही है और एक खोखलापन बढ़ता जा रहा है...

दर्शन घबरा गया. उसने जल्दी-जल्दी आंखें मीचीं, पलकें कंपकंपाई, तो देखा वह नींद में स्टूल पर से लुढ़क गया है. रीना चुपचाप सो रही है. किरणों की सुनहली बिल्ली आदमी की आहट पाकर फर्श से खिड़की पर चढ़ने के लिए उछलती है, लेकिन फिसल-फिसल जाती है.

नौकर काम पर आ गए हैं. शोफर गैरेज से गाड़ी निकालकर साफ कर चुका है. इंतजार है कि रीना अभी निकलेगी. कहीं बाहर जाएगी और एक बजे लौटकर आएगी. तब तक के लिए सबको अलर्ट रहना है. लेकिन रीना नहीं निकली. दर्शन स्टडी में घुसकर आरामकुरसी पर लुढ़क गया.

इसी बीच परेश आया. सीधे अंदर गया और दर्शन को इस तरह स्टडी में पड़ा देखकर ठठाकर हंसा. आवाज गूंज कर लौट आई और दर्शन उठा बैठा.

''मुद्दत के बाद तो दो घूंट पी और अब तक उसी में झूम रहे हो!'' उसने इतने जोर से दर्शन की पीठ थपथपाई कि वह गिरते-गिरते बचा.

तभी डॉक्टर की मोटर आ गई. हाथ में बैग संभाले वह गैलरी में घुसा और कमरे के सामने आते ही उसकी मुठभेड़ परेश से हो गई, ''हल्लो, डॉक्टर सुदेश!...किस पर आफत आई है?''

''तुम्हें मालूम नहीं?''

''रीना तो अच्छी...'' परेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

''आकर देखो,'' डॉक्टर तेजी से कदम बढ़ाता अंदर चला गया.

परेश पलभर को लड़खड़ाया. लेकिन डॉक्टर कह चुका था और पीछे दर्शन खड़ा था. परेश चुपचाप खड़ा रहा. दर्शन एक कुरसी के सहारे मरीज को उड़ती निगाह से देखता रहा. डॉक्टर ने नब्ज पर हाथ रखा और रीना चिल्ला पड़ी, ''नहीं, परेश, अब रहने दो मुझे कोई डर नहीं, परेश!...दर्शन बिल्कुल नाराज नहीं होगा. मैं बचपन से यही सोचती रही हूं कि मैं मां बनूं और किसी बच्चे के साथ खेलूं. इसी एक इच्छा को मारते-मारते मैं एकदम मर गई, लेकिन यह आज तक नहीं मरी.''

डॉक्टर बिना किसी उत्तेजना के सुनता रहा और रीना की कलाइयों को उसी तरह संभाले रहा. परेश के आये सारा कमरा घूम उठा, लेकिन हर चक्कर पर जैसे सारी व्यवस्थाएं जैसी-की-तैसी बनी रहीं. डॉक्टर बैठा रहा, दर्शन खड़ा रहा और रीना अपने हाथों में अपना सिर बांधे रही.

आया, नौकर और ड्राइवर दरवाजों से आ लगे थे. डॉक्टर ने मुड़कर सबको चले जाने के लिए संकेत किया और रीना का सिर संभालते हुए बोला, ''रीनाजी, देखिए मैं हूं-डॉक्टर!''

रीना ने आंखें खोलीं, ''यहां कहीं परेश था क्या? मुझे लगा जैसे उसकी हंसी...''

''परेशजी!'' डॉक्टर ने उलटकर पीछे देखा तो वह जा चुका था.

रीना मुस्कराई. यह मुस्कान ठीक वैसी ही थी, जैसे डॉक्टर को जाते हुए देखकर सुबह दर्शन मुस्कराया था.

''अब वह नहीं लौटेगा?'' रीना ने लंबी सांस छोड़ते हुए कहा.

''कोई बात नहीं आप आराम करें. मैं कुछ दवाइयां लिखे देता हूं.'' और वह दर्शन की ओर मुड़ा, हां, मिस्टर दर्शन, बधाइयां, रीनाजी प्रैगनेंट हैं.'' फिर पलभर रुककर डॉक्टर सुदेश ने रीना की आंखों में देखा. एक सपना तैर आया था उनमें, पानी की पतली-सी सतह पर डॉक्टर को अपना ही चेहरा दिखाई पड़ा.

''बेहतर हो, आप मेरे नर्सिंग होम में चली चलें. महीने-दो-महीने वहीं रहने में कोई हर्ज नहीं. हर तरह की सुविधा रहेगी. इस समय ऐसे ही खौफनाक ख्याल मन में आते हैं. कहीं दो-चार बार इसी तरह डर गई तो पक्षाघात'' जैसे तब डॉक्टर का अपना चेहरा ही उसे टेढ़ा होता हुआ मालूम हुआ और बाई ओर के पूरे अंग में एक सनसनी दौड़ गई.

श्रीमती रीना को पक्षाघात हो गया. यह बात अब तक बहुत-से लोग जान चुके हैं- कम-से-कम सारे लोग, जो उसे जानते थे या उसमें कोई दिलचस्पी रखते थे. लेकिन रबर के बबुए की टांग वाली बात केवल वह क्षण-मात्र जानता है, जो अपने प्रवाह में आकर रीना के आगे से अनदेखे ही काल के दहाते हुए सागर में सरक गया था.

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