रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

प्राची - जुलाई 2016 / सुपनीली की कब्र / कहानी / अमृता प्रीतम

साझा करें:

  कहानी ''सुपनीली के पिता ने ज्योतिषियों से कहा कि मुझे केवल इतना बता दीजिए कि इस लड़की के गीत मनुष्य के जीवन को कुछ संवारेंगे भी ...

 

कहानी

''सुपनीली के पिता ने ज्योतिषियों से कहा कि मुझे केवल इतना बता दीजिए कि इस लड़की के गीत मनुष्य के जीवन को कुछ संवारेंगे भी या नहीं?'' फिर ज्योतिषियों ने कहा, ''इस बात का तो हमें पता नहीं, लेकिन इस लड़की के गीत सुनकर इस देश के जवान दिलों में स्वतंत्रता- मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता के सपने जाग उठेंगे और जब गुलामी के पालक उन सपनों के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहेंगे, तो इस लड़की के अपने हृदय में से और इस देश के हर युवक के दिल में से लहू बह निकलेगा.''

सुपनीली की कब्र

अमृता प्रीतम

बिच्छू-बूटी की मुझे पहचान थी, इसीलिए मैंने उसे हाथ भी नहीं लगाया. लेकिन नाग-बूटी की मुझे पहचान नहीं थी, चुनांचे मैंने एक छोटे-से पौधे से लगी हुई नन्हीं-नन्हीं गिल्लियों-जैसे सुर्ख दानों वाली एक बाली तोड़ ली.

पिछली रात से मेरे मन में इस गिल्लियों-जैसे सुर्ख दानों वाली बाली की तरह प्रेम का एक गीत उभर रहा था...यह उस समय की बात है, जब मुझे सोलहवां वर्ष लगा था. मेरी मां का देहांत हो चुका था, और मेरे पिताजी शहर की गरमी और मन की उदासी से घबराकर हर वर्ष मुझे साथ लेकर किसी-न-किसी पहाड़ पर जा पहुंचते. इस वर्ष हम डलहौजी आये हुए थे, जहां हमने बकरौटे के स्थान पर एक विशाल कोठी के बाहर वाले दो छोटे-छोटे कमरे किराये पर ले लिये थे...पिछली रात से मुझे यूं महसूस हो रहा था, जैसे मेरे मन में एक नन्हा-मुन्ना गीत जन्म ले रहा हो और मैं हाथ में एक कागज और एक कलम लिये अकेली ही करीब वाली एक खड्ड में उतर गई हूं.

कागज मेरे दाहिने हाथ में था. अभी मैंने गीत लिखा तो नहीं था, लेकिन मुझे यूं लग रहा था, जैसे अभी, शीघ्र ही मेरे बाएं हाथ में थमी हुई सुर्ख दानों वाली बाली की भांति मुहब्बत का एक गीत उस कोरे कागज पर उभर आएगा.

वह सुर्ख दाने रस से भरपूर थे, बिलकुल उसी तरह, जैसे मेरे मन में गीत के शब्द वलबलों-से भरे हुए थे. किसी-किसी शब्द की महक मेरे मन में घुलती जा रही थी. मेरा जी चाहा कि मैं उस बाली से एक-दो दाने तोड़कर चख लूं.

बकरियां चराता हुआ एक बूढ़ा चरवाहा मेरे निकट पहुंचकर रुक गया. उसने बड़े गौर से मेरे दोनों हाथों की ओर देखा और पूछा, ''तेरे हाथों में क्या है?''

''मेरे हाथों में?'' मैंने हैरान होकर उसकी ओर देखा और फिर सीधा-सादा उत्तर दिया, ''यह बाली है और यह कागज.''

''तू इस बाली और इस कागज का क्या करेगी?''

उसके प्रश्न मुझे बेतुके-से लगे. अगर वह कोई शहरी होता, या जवान होता तो मुझे जरूर उसकी नीयत पर शक हो जाता, लेकिन वह था चरवाहा, और फिर इतना बुड्ढा, इसीलिए मुझे उसकी बातों से कोई सन्देह नहीं हुआ. मैंने फिर सीधा-सादा उत्तर दिया, ''बाली को खाऊंगी और कागज पर मैं गीत लिखूंगी.''

''इन दोनों चीजों को परे फेंक दे!'' उसने गंभीरता से कहा.

मैंने सहमकर उसकी ओर देखा. मैंने सोचा कि वह मेरी बात समझ नहीं पाया, चुनांचे मैंने फिर अपनी बात दोहराई, ''देख, बाबा, यह बाली कितनी सुंदर है! मैंने तो आज तक ऐसी बाली कभी नहीं देखी. मैं तो इसे जरूर खाऊंगी....और रहा यह कागज, यह कोरा कागज जो मेरे हाथ में है, इस पर मैं एक बहुत खूबसूरत गीत लिखूंगी.''

चरवाहा मुस्करा दिया और फिर उसी गंभीरता से बोला, ''दोनों चीजें परे फेंक दे.''

''पर क्यों?'' मैंने दोनों चीजें अपने हाथों में और भी मजबूती से पकड़ लीं.

''इसलिए कि वह बाली विष से भरी हुई है, उसे यहां के लोग नाग-बाली कहते हैं.''

''क्या जहर इतना खूबसूरत होता है?'' मैंने हैरान होकर बाली की ओर देखा.

''सामने देख! बकरियां हर एक पत्ते पर मुंह डाल देती हैं, कड़वे-कसीले पत्तों पर भी, लेकिन इस बाली को देखते ही मुंह परे हटा लेती हैं.''

''अच्छा, बाली तो मैं फेंक देती हूं, लेकिन इस कागज को क्यों फेंकूं?'' मैं आधी हार मान चुकी थी, इसलिए मेरी आवाज में नम्रता आ गई थी.

चरवाहा मुस्करा दिया, ''हर गीत भी इस बाली की तरह खूबसूरत होता है, लेकिन हर गीत में अपनी तरह का एक जहर भी होता है.''

मैं चरवाहे के मुंह की ओर ताकती रह गई. मुझे लगा कि वह मनुष्य नहीं था, छलावा था और इस समय वह एक बूढ़े चरवाहे का रूप धारण करके मेरे सामने खड़ा हुआ था.

''यह तो सीधी-सी बात है, बेटी! गीत सदा सपनों के हाथों में पलते हैं और सपने इस दुनिया में हमेशा जख्मी हो जाते हैं. ये जख्म कभी भरते नहीं. इसलिए उनमें जहर पैदा हो जाता है और उनका यह जहर गीतों में भी भर जाता है. अगरचे गीत का जहर नाग-बाली की भांति नहीं होता, लेकिन जहर तो होता ही है. नाग-बाली का पानी अगर मुंह को लग जाए, तो पहले गला सूख जाता है, फिर दम घुटने लगता है और मनुष्य बारह घंटे के अंदर-अंदर मर जाता है. लेकिन गीत का जहर इस तरह नहीं चढ़ता, उसके जहर से इंसान तड़पता रहता है, लेकिन उसकी जान नहीं निकलती. सो, एक तरह से गीत का जहर नाग-बाली के जहर से भी ज्यादा खराब है.''

वह बुड्ढा, वह छलावा, पता नहीं कहां का सपना था!...अक्लमंदी का प्रकाश उसके चेहरे पर जगमगाने लगा. उसने खड्ड के एक पहलू की ओर इशारा करते हुए कहा, ''वह देख, सामने क्या है?''

मैंने देखा कि चांदी के-से रंगवाले पानी की एक धारा वहां बह रही थी.

''जरा पास जाकर देख!'' चरवाहे ने फिर कहा.

मैं पानी की धार, के निकट पहुंची. काले-स्याह पत्थरों के ढेर में एक कब्र सी बनी दिखाई दी. मैं उसके और करीब चली गई तो मुझे यूं लगा, जैसे भोजपत्रों का एक ढेर वहां पड़ा हो.

''यह तो भोजपत्र हैं.''

''जरा हाथ लगाकर देख.''

वह जो कागज की भांति दिखाई दे रहे थे, हाथ लगाने पर बिलकुल पत्थर महसूस हुए.

''देखने में तो यह भोजपत्र लगते हैं.

''हां, भोजपत्र तो हैं, लेकिन समय बीतने पर पत्थर हो गए हैं. अब कैसी भी बारिश हो या आंधी चले, यह धुल नहीं सकते. भला जरा ध्यान लगाकर देख तो, इनके ऊपर...''

''इनके ऊपर तो कुछ लिखा हुआ है.'' मैं बिलकुल ही चकित रह गई.''

''भला पढ़ तो, क्या लिखा हुआ है?''

अक्षर तो जरूर थे, लेकिन पता नहीं चलता था कि किस भाषा के अक्षर हैं. मुझसे कुछ भी नहीं पढ़ा गया.

''यह क्या चमत्कार है, बाबा?''

''चमत्कार कुछ भी नहीं. यह सुपनीली की कब्र है. इसे चाहे कब्र कह लो, चाहे समाधि कह लो. सुपनीली यहीं मरी थी. उसे कब्र में दबाने या जलाने वाला कोई नहीं था. उसके हाथों में बहुत-से भोजपत्र थे. उन दिनों लोग कागज के बजाय भोजपत्रों पर लिखा करते थे. जब वह मर गई तो उन्हीं भोजपत्रों का कफन बन गया.''

''इन भोजपत्रों पर उसने लिखा क्या था?''

''कहते हैं कि इनपर उसने गीत लिखे.''

''यह सुपनीली थी कौन, बाबा?''

''कहते हैं, उसकी आंखें सपनों से भरी रहती थीं और उसके होंठ गीतों से भरपूर रहते थे.''

''तब तो वह बड़ी भाग्यवान थी!'' मेरी आंखें चमक उठीं.

लेकिन उस बूढ़े चरवाहे की आंखें बुझ-सी गईं. वह बोला, ''कभी-कभी लोग बदकिस्मती को खुशकिस्मती कहकर खुश हो लेते हैं.''

''क्यों, बाबा?...मैं तो यही कहूंगी कि वह बड़ी खुशकिस्मत थी!''

''जब उसने जन्म लिया तो ज्योतिषियों ने उस घड़ी का हिसाब लगाकर उसके बाप से कहा कि वह अपनी बेटी को जहर देकर मार दे. इस लड़की की आंखें सपनों से भरी हुई हैं, ज्यों-ज्यों यह लड़की बड़ी होगी त्यों-त्यों इसके होंठ गीतों से भरपूर होते जाएंगे और यह लड़की सारी उम्र तड़पती रहेगी. लेकिन बाप ने ज्योतिषियों का कहना नहीं माना, उसने अपनी खूबसूरत बेटी का नाम सुपनीली रख दिया और अपने मन के कटोरे में शहद घोलकर उसे चटा दिया.''

''फिर, बाबा?''

''ज्योतिषियों ने बहुतेरा कहा कि इस लड़की का जीवन बड़े दुखों में कटेगा, क्योंकि हर गीत एक सूझ में से पैदा होता है, और हर सूझ एक ठोकर में से जन्म लेती है. जिंदगी की ठोकरें खा-खाकर इस लड़की के पांवों में से हर समय लहू रिसता रहेगा. जिस तरह गन्ने का रस निकालने के लिए गन्ने को बेलन में डालकर उसका कचूमड़ निकाला जाता है, उसी तरह इस लड़की को हर गीत लिखने के लिए अपने-आपको दुर्घटनाओं के बेलन में डालना पड़ेगा. इस लड़की की एक जिंदगी हजारों मौतों के बराबर होगी.''

''बाबा, फिर?''

''सुपनीली के पिता ने ज्योतिषियों से कहा कि मुझे केवल इतना बता दीजिए कि इस लड़की के गीत मनुष्य के जीवन को कुछ संवारेंगे भी या नहीं?'' फिर ज्योतिषियों ने कहा, ''इस बात का तो हमें पता नहीं, लेकिन इस लड़की के गीत सुनकर इस देश के जवान दिलों में स्वतंत्रता- मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता के सपने जाग उठेंगे और जब गुलामी के पालक उन सपनों के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहेंगे, तो इस लड़की के अपने हृदय में से और इस देश के हर युवक के दिल में से लहू बह निकलेगा.''

''अच्छा, बाबा, सुपनीली के पिता ने फिर क्या कहा?''

''वह बेचारा रो पड़ा. परंतु उसने कहा कि अगर यही मेरी लड़की की तकदीर में है तो मैं इसे कैसे बदल सकता हूं? इसके जिन होंठों ने कभी गीत गाने हैं, मैं उन्हें अपने हाथ से जहर नहीं चटा सकता. ज्योतिषी चुप हो रहे. लेकिन जाते-जाते उन्होंने एक बात कह दी. बोले, वह समय भी आ सकता है, जब जमाना इस लड़की को जहर दे देगा, या यह लड़की जमाने के हाथों तंग आकर स्वयं जहर खा लेगी.''

''अच्छा, तो फिर, बाबा?'' मुझे अपनी सांसों में तपिश होने लगी.

''जब सुपनीली बड़ी हो गई तो उसने गीत लिखने शुरू कर दिए.''

''कैसे गीत, बाबा?''

''सत्य के गीत- वह जीने का हक मांगती थी- सबके जीने का हक मांगती है- मुहब्बत का हक और मेहनत का हक भी....लेकिन इस लूट-खसोट की दुनिया में वह खुद भी जख्मी हो गई और उसके गीत भी जख्मी हो गए.''

''नहीं, बाबा, यूं नहीं, मुझे तो उसकी सारी कहानी सुना दे.''

''वह बहुत छोटी-सी थी, जब उसने अपने मन में अपने सपनों के राजकुमार की मूर्ति बना ली थी.''

''यह तो शायद हर लड़की बनाती है, खासकर वह लड़की जिसकी कल्पना उपजाऊ होती है.''

''हां, हर लड़की बनाती है. लेकिन जिस दिल को केवल अपनी ही आवाज न बनना हो, बल्कि अपने-जैसे हजारों दिलों की आवाज बनना हो, भला कुदरत उसकी मंजिल को उसके करीब तक पहुंचने देती है? यह कुदरत का नियम है.''

''कुदरत इतनी निर्दयी क्यों होती है, बाबा?''

''इसलिए कि उसको उस दिल से बहुत-सा काम लेना होता है. अगर कोई अपने दुखों को निपटा सकें तो फिर वह दुनिया के दुखों को रोये क्यों? कुदरत शायद यह सोचती थी कि अगर सुपनीली को उसकी मंजिल मिल गई तो फिर उसके गीत सिर्फ उसी के काम आएंगे और दूसरे हजारों-लाखों लोगों के काम नहीं आएंगे और फिर कुदरत ने यही तय किया कि जब तक दुनिया के हजारों बल्कि लाखों दुखियों को उनकी मंजिल नहीं मिल जाती, तब तक वह लड़की दुनिया-भर के दुखों को अपना दर्द बनाकर गाती ही रहे.''

''अच्छा तो, बाबा, क्या वह लड़की सचमुच दूसरों के दुखों के गीत बनाती रही?''

''हां, बेटी, उसने बहुत-से लोगों के दुखों को अपना दुःख बना लिया. एक बार उसके देश में बहुत बड़ा युद्ध हुआ. हकूमत के नशे में चूर लोग अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए लड़ाइयां तो छेड़ते ही रहते हैं. इन लड़ाइयों में मर्द तो घायल होते ही हैं, लेकिन जो-जो जिल्लतें औरतों को सहनी पड़ती हैं उनके दर्द का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता. उस समय लड़की के दिल के मानो अनेक दिल बन गए हों. जहां कहीं एक औरत भी तड़पती, उस लड़की को यूं महसूस होता, जैसे वह खुद तड़प रही हो. अब कुदरत ने अपना यह नियम बना लिया कि जिस जगह सुपनीली को मंजिल की कल्पना होती, वह उसके पीछे-पीछे हो लेती. सुपनीली और आगे बढ़ती, यह रास्तों की ठोकरें खाती बढ़ती जाती, इस पर उसकी कल्पना और भी आगे जा पहुंचती. कुदरत ने यह छलावा इसलिए बनाया कि कहीं किसी ठोकर से हारकर सुपनीली गीत लिखने बंद न कर दे.''

''कुदरत का यह नियम तो बड़ा कठोर है, बाबा, सुना नहीं जाता....पर, बाबा, तुम तो कहते थे कि हर गीत में जहर होता है और गीतों में से जहर ही निकलना था, तो कुदरत यह गीत लिखवाती क्यों थी?''

''जहर दवा भी तो होता है, बेटी! लेकिन दवा उन लोगों के लिए होता है जो उन गीतों को सुनते हैं, लेकिन उन गीतों को लिखने वाले की किस्मत में यह बात नहीं होती.''

''अगर सुनने वाले के लिए गीत दवा का काम करता है तो लिखने वाले के लिए ऐसा क्यों नहीं होता, बाबा?''

''दवा की भी एक मात्रा होती है, बेटी! अगर वह मात्रा एक हद से बढ़ जाए तो वही दवा जहर बन जाती है.''

''मैं समझ गई, बाबा! अब तू मुझे सुपनीली की कहानी सुना.''

''धन के मालिक और जोरू के मालिक जहां तक बस चलता, किसी को सुपनीली के गीत न गाने देते. जिस रास्ते से सुपनीली को गुजरना होता था, उस रास्ते पर वे तानों के कांटे बिछा देते. अपने दिलों का गंदा पानी वह सुपनीली के उज्ज्वल कपड़ों पर डाल देते.''

''उसने अपने जीवन के ये वर्ष कैसे काटे होंगे?...मुझे तो सारे शरीर में कंपकंपी-सी महसूस हो रही है, बाबा!''

''कहते हैं कि कभी-कभी वह जिंदगी से बहुत तंग आ जाती थी. तब वह कुदरत को अपने गीतों का वास्ता देकर कहती थी कि या तो कुदरत उसके सपनों को असलियत में बदल दे या उसका जीवन उससे वापस ले ले.''

''फिर, बाबा?''

''उसने एक छोटी-सी झोंपड़ी बना ली थी. उसने उस झोंपड़ी की दीवारों को हरी-भरी बेलों से संवार लिया. अब उसने सोचा कि कोई परवाह नहीं अगर मेरे सपने पूरे नहीं भी होते. मैं सारी उम्र सपनों के गीत ही लिखती रहूंगी- अपने सपनों के और लोगों के सपनों के.''

''फिर, बाबा?''

''एक औरत ने उसपर बहुत बड़ा अत्याचार किया.''

''एक औरत ने.''

''उस औरत को सुपनीली की झोंपड़ी बहुत पसंद थी. वह सुपनीली के गीतों की पूजा के बहाने उस झोंपड़ी में ही आकर रहने लगी.''

''तो फिर?'' मैंने जल्दी से पूछा.

''वह सुपनीली को रोटी पकाकर खिलाती, उसके कपड़े धोती और एक रोज उसने दूध में जहर घोलकर सुपनीली को पिला दिया.''

मेरे सिर को एक चक्कर आया और मेरे मुंह से एक शब्द न निकल सका.

''अगर वह औरत हंसकर सुपनीली से उसकी झोंपड़ी मांग लेती तो...सुपनीली फौरन उसे झोंपड़ी दे देती, लेकिन उस दुष्ट ने तो सुपनीली की शाह रग पर ही हाथ डाल दिया. सुपनीली को खून की कै हुई और उसका बहुत-सा जहर निकल गया, लेकिन सुपनीली यूं हो गई कि उसकी गिनती न जिंदों में हो सकती थी न मुर्दों में.''

''ज्योतिषियों ने सच ही कहा था,'' मेरे अंदर से एक गहरी शाह निकली.

''फिर एक खूबसूरत-सा युवक सुपनीली का हाल पूछने के लिए आ गया.''

''फिर?'' मैंने उत्सुक होकर पूछा.

''उसने सुपनीली से कहा कि अब उस जगह उसकी जान को खतरा है, वह उसे किसी पहाड़ की ओट में ले जाएगा. वहां उसका स्वास्थ्य भी वह ठीक कर देगा. सुपनीली ने उसकी आंखों में झांककर देखा तो उसे अपनी कल्पना की याद आ गई.''

''फिर सुपनीली ने कोई गीत लिखा या नहीं?'' मैंने बच्चे के से भाव के साथ उस बुड्ढे चरवाहे से पूछा.

''हां, सुपनीली ने बड़े गीत लिखे, बड़े प्यारे गीत! उन गीतों से होंठ मुस्कराते थे. उस युवक को गीतों की यह मुस्कान बड़ी भली लगी. उसके पास एक बड़ी खूबसूरत नीली घोड़ी थी. एक दिन उसने सुपनीली को अपनी घोड़ी पर बिठा लिया, और शहर-शहर घूमता हुआ इन्हीं पहाड़ों में आ पहुंचा.''

''तो बाबा, सुपनीली ने यहां पहुंचकर क्या नई झोंपड़ी बनाई?''

''नहीं, बेटी! कुदरत को सुपनीली की कोई झोंपड़ी मंजूर नहीं थी. शायद उसे सुपनीली के उन गीतों की ही जरूरत थी, जिन गीतों के कपड़े सुपनीली के लहू में रंगे होते थे...शायद इसलिए कि उस लहू में हजारों-लाखों लोगों को अपने दिल के लहू का रंग नजर आता था.''

''क्या उसने सुपनीली को यहीं पर छोड़ दिया?'' मैंने कांपकर पूछा.

''हां, यहीं छोड़ दिया. कहने लगा, तुम बड़ी खूबसूरत हो, बड़ी अच्छी हो, लेकिन मैं ज्यों-ज्यों तुम्हारे चेहरे को देखता हूं, त्यों-त्यों मुझे महसूस होता है कि तुम वह लड़की नहीं हो जो मेरी कल्पना में बसती है.''

''सुपनीली के दुःख बहुत भारी थे,'' मेरा सिर बोझ से नीचे झुक गया.

''सुपनीली बड़ी प्यासी थी, लेकिन इन खढ्डों में कहीं भी पानी नहीं था. सुपनीली रो पड़ी तो इस पहाड़ के पहलू में से चांदी के रंग वाला पानी का चश्मा बहने लगा...लेकिन अपने आंसुओं के पानी से किसी की प्यास नहीं बुझती. लोग कहते हैं कि सुपनीली ने कोई जहर फांक लिया. जहर तो उसने क्या फांका होगा, हां, उसके गीतों का ही जहर उसे चढ़ गया होगा. तो फिर भोजपत्रों पर लिखे हुए, अपने गीतों को एक कफन की तरह अपने ऊपर ओढ़कर वह यहीं पड़ी-पड़ी मर गई.''

''बा...!'' पूरा शब्द भी मेरे मुंह से न निकल सका. मेरा गला बिलकुल ही सूख गया.

''मैंने जभी तो तुमसे कहा था कि इस नाग-बाली को और इस कागज को परे फेंक दे, इन दोनों ही चीजों में जहर भरा हुआ है.''

कुछ बकरियां बुड्ढे चरवाहे के आसपास ही चर रही थीं और कुछ इधर-उधर बिखर गई थीं. चरवाहे ने हाथ में पकड़ी हुई पतली-सी छड़ी को झुकाया और बकरियों को आवाज़ दी-''सदियों!...अरी सदियों!''

मैंने अपने आंसू पोंछ डाले और सामने बहते हुए पानी से आंखें धोकर, उन्हें पोंछते हुए ज्यों ही मैंने मुड़कर देखा, तो न कोई चरवाहा दिखाई दिया और न बकरियां.

खढ्ड में पानी जरूर बह रहा था, लेकिन उसके पास भोजपत्र से ढंकी हुई कोई कब्र नहीं थी.

यह मेरे साथ कैसा चमत्कार हुआ? मैंने अपने-आप से पूछा. फिर मुझे याद आया कि उस चरवाहे ने अपनी बकरियों को कैसे आवाज दी थी- सदियों!...अरी सदियों!

सो, वे बकरियां सदियां थीं...तो फिर बकरियां चराने वाला चरवाहा कौन था? मेरे मन ने स्वयं उत्तर दिया- वह चरवाहा था- सदियों का ज्ञान!

सदियों के ज्ञान ने मुझसे कहा था कि मैं दोनों चीजें हाथ से फेंक दूं. मैंने उसकी आधी बात मान ली और आधी नहीं मानी- नागबाली फेंक दी और उस कागज को संभालकर रख लिया, जिसपर उस दिन मुझे गीत लिखना था. उससे अगले दिन मैंने एक और गीत लिखा, और फिर कई गीत लिखती रही....

यह उन दिनों की बात है जब मुझे सोलहवां वर्ष लग रहा था. आज जब कि मुझे चालीसवां वर्ष लग रहा है और जिंदगी की ठोकरों के कारण मेरे पैरों में से लहू बह निकला है, मैं सोचती हूं कि मैंने उस चरवाहे का कहना क्यों नहीं माना? अगर मुझे उसकी आधी बात ही माननी और आधी नहीं माननी थी तो मैं वही आधी मान लेती जो मैंने नहीं मानी और वह आधी भले ही न मानती जो मैंने मान ली. काश, उस दिन मैं कागज फेंक देती जिसपर मुझे एक बड़ा खूबसूरत गीत लिखना था, और उस दिन वह बाली खा लेती जिसके गिल्लियों-जैसे सुर्ख दाने बड़े खूबसूरत लग रहे थे.

उस दिन पानी के किनारे मैंने सुपनीली की जो कब्र देखी थी, आज मुझे यूं लगता है, जैसे भोजपत्रों की बनी हुई वह कब्र मेरे अपने दिल ही में बनी हुई है...और उसके निकट ही मेरी आंखों से बहते हुए पानी का चांदी जैसे रंग वाला चश्मा बह रहा है.

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

---***---

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|नई रचनाएँ_$type=complex$count=8$page=1$va=0$au=0

|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

|हास्य-व्यंग्य_$type=complex$count=8$src=random$page=1$va=1$au=0

|कथा-कहानी_$type=blogging$count=8$page=1$va=1$au=0$com=0$src=random

|लघुकथा_$type=complex$count=8$page=1$va=1$au=0$com=0$src=random

|संस्मरण_$type=blogging$au=0$count=7$page=1$va=1$com=0$s=200$src=random

|लोककथा_$type=blogging$au=0$count=5$page=1$com=0$va=1$src=random

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3822,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2762,कहानी,2094,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,49,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,234,लघुकथा,816,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1905,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,642,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,66,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची - जुलाई 2016 / सुपनीली की कब्र / कहानी / अमृता प्रीतम
प्राची - जुलाई 2016 / सुपनीली की कब्र / कहानी / अमृता प्रीतम
https://lh3.googleusercontent.com/-LChaC5vLCwM/V523Y44UE7I/AAAAAAAAvLU/Wj5XGSnn1ig/image_thumb%25255B1%25255D.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-LChaC5vLCwM/V523Y44UE7I/AAAAAAAAvLU/Wj5XGSnn1ig/s72-c/image_thumb%25255B1%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/07/2016_8.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/07/2016_8.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ