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सताऊ (7) वेतन आयोग / व्यंग्य / राजशेखर चौबे

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    अर्थशास्त्र का सिद्धांत है 'बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है' । इसी तरह कहा जा सकता है कि बुरी खबर अच्छी खबर को बाहर का रास्ता दिखा देती है ।  । सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट आ गई है ।  कर्मचारियों में अभी यही खबर चल रही है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार केंद्रीय कर्मचारियों से अधिक अन्य लोगों को था । राज्य के कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि इसके उपरांत ही होती है । जिनसे केन्द्रीय कर्मचारियों ने उधार लिया होगा वे भी इसका इंतजार कर रहे होंगे । मैंने कई बेवड़े कर्मचारियों को डी0ए0 एरियर्स मिलने की पेपर कटिंग दिखाकर उधारी में किराना सामान लाते देखा है । वेतन आयोग के सिफारिशों के भारी-भरकम प्रचार के पेपर कटिंग पर तो कार भी उधारी पर उपलब्ध हो जायेगी । यह प्रचार किया जा रहा है कि 14.3 से 23 प्रतिशत बढ़ोत्तरी की सिफारिश की गई है । सबसे अधिक नफरत नेताओं के प्रति है शायद सरकारी कर्मचारी दूसरे नंबर पर थे परन्तु इस सिफारिश का ऐसा दुष्प्रचार किया गया कि वे पहले नंबर पर आ गये हैं ।

    वास्तविक (कुल वेतन) वृद्धि नगण्य ही है । इसे इस तरह समझ सकते है । सवा करोड़ कर्मचारियों को एक लाख करोड़ अधिक वेतन मिलेगा यानी औसत वेतन वृद्धि लगभग 6500 रू0 । यदि इससे गृप-ए की सर्विस को अलग कर दिया जाय तो औसत वेतन वृद्धि लगभग 3000 रू0 प्रतिमाह होगी । 40000 औसत वेतन माना जाये तो 7.5 प्रतिशत वेतन वृद्धि, वह भी दस वर्ष में । यानी एक वर्ष में 0.75 प्रतिशत वृद्धि । इसके सूत्रधार जो भी हो वे नोबल पुरस्कार के हकदार हैं । सरकार का दावा है कि उसने आयोग की सिफारिशें जस की तस मान ली है और इसके लिए कर्मचारियों को शुक्रगुजार होना चाहिए । इस संबंध में यह भी पता चला कि आयोग के लिए एक सीमा निर्धारित कर दी गई थी । आयोग की हालत ''शोले'' के ठाकुर जैसी ही थी जिन्हें लात मारकर ही बदला लेना था आयोग के अध्यक्ष ने अपना पूर्वाग्रह छिपाने की कोशिश भी नहीं की । उन्होंने माना कि मजबूरी में वेतन वृद्धि की सिफारिश की है । उन्हें सभी बातों के ऊपर एक ही बात याद है, 'चिट्ठियां आती थी - कसम है सेलरी मत बढ़ाना' बाबू काम नहीं करते हैं'।

    सन् 1982 के आस-पास महालेखाकार कार्यालय ग्वालियर में केंद्र सरकार के लगभग 5000 हजार कर्मचारी कार्यरत् थे । वेतन महीने के अंतिम कार्य-दिवस को नगद प्राप्त होता था । उस दिन कार्यालय के बाहर 25-30 भिखारी जमा हो जाते थे । आश्चर्य तो तब होता था जब बोनस या डी.ए. एरियर्स के समय भी ये भिखारी जमा हो जाते थे । हम सभी सोचते थे, इन भिखारियों ने भी हमारे बीच अपना कोई एजेंट नियुक्त कर रखा है । हो सकता है कि इन भिखारियों में से ही किसी ने सातवें वेतन आयोग के अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी हो क्योंकि वेतन बैंक खाते में जमा होने से उन्हें भीख मिलनी बंद हो गई होगी । अध्यक्ष जी को अवश्य ही वेतन न बढ़़ाने की सिफारिश करने वाले देशभक्त की बात माननी चाहिए थी । अच्छा है कि उन्हें विधायकों सांसदों, मंत्रियों के वेतन वृद्धि के लिए गठित आयोग का अध्यक्ष नहीं बनाया गया । उस वक्त आने वाली चिट्ठियों का मजमून बताने की शायद ही हिम्मत करते । सातवें वेतन आयोग को दूसरा सबसे बुरा वेतन आयोग कहा गया है । सरकारी कर्मचारियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए सरकार को पहले नंबर के बुरे आयोग की सिफारिशें उनमें सर्कुलेट करना चाहिए ताकि वे अपना दुःख कुछ हल्का कर सके ।    
 
राजशेखर चौबे
रायपुर

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सब कुछ सच ही तो कह रहें हैं हैं चौबे जी...यह सच केंद्रीय कर्मचारियों की आँखों में धूल झोंकने जैसा ही है...खोदा पहाड़ ..निकला चूहा...

वेतन आयोग की विसंगतियों पर सराहनीय रचना ।बधाई

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