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बदलाव / कहानी / डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा

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शहरी चकाचैंध से अलग थलग अमराइयों से घिरा छोटा सा दुरई गाँव पूरी तरह से कोहरे की चादर में लिपटा रात्री विश्राम के करीब पहुँच चुका था। हीरा रोटियाँ सेक रहा था और दोनों लड़कों को जल्दी-जल्दी काम निबटाने को कह रहा था। सामू और रंजन दौड़कर बर्तन साफ कर रैक में लगाने, बैंच साफ करने और छोटे बड़े डिब्बों को उठाकर अलमारी में रखने जैसे काम निबटा रहे थे। हीरा की तवे पर आखिरी दो रोटियाँ सेकनी रही तो रंजन ने खाना बनाने के शेष बर्तन भी धोने के लिए उठा लिए। यूँ तो अभी रात के नौ ही बजे थे पर सर्द हवाओं में आधी रात जैसा सन्नाटा इलाके में पसर गया था। इन दिनों आठ बजे के बाद ग्राहकी लगभग समाप्त हो जाती थी इसी से हीरा दुकान जल्दी बंद करने लगा था। सामू और रंजन का काम खत्म हुआ तो हीरा ने उनका खाना परसना शुरू कर दिया। तभी दो नौजवान हीरा की दुकान पर आए। एक ने आगे बढ़कर चार थाली खाना लगाने का हुक्म दिया। हीरा ने विनम्रता से नकार दिया। युवक को अपने कानों पर विश्वास न हुआ। इतने छोटे दुकानदान से वह भी खाने के लिए नकारात्मक उत्तर मिलने की उसे बिलकुल भी उम्मीद न थी। उसने पुनः अपनी बात पर जोर देते हुए कहा - “कितनी देर लग जाएगी?” हीरा ने सामान्य भाव से उत्तर दिया- “साहब खाना नहीं मिल पायगा।” युवक ने कड़ककर बूझा- “क्यों?”

“हमारा दुकानदारी का समय खत्म हो गया है।”

“क्या मतलब?”

“साहब मेरे छोटे-छोटे नौकर हैं। मैं उन्हें इससे अधिक समय नहीं रोक सकता। अब उनके आराम का समय है। सुबह सात बजे दुकान खोलनी है।”

युवक के दूसरे साथी ने हीरा को समझाते हुए कहा- “तुम जो रोटियाँ सेक रहे हो ये ही हमें दे दो। हम तुम्हें दुगना दाम देंगे।”

हीरा पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा उसने पहले जैसी सहजता से ही उत्तर दिया- “नहीं दे सकता साहब। ये मेरे काम करने वाले बालकों के लिए है।”

अब तक युवक के दो और साथी आ गए थे। बात जानकर वे हीरा की ओर बढ़े। एक बोला- “तुम जानते हो किस्से बातें कर रहे हो? हमें फाइव स्टार होटल में भी कोई ना नहीं कह सकता और तुम साधारण सी दाल रोटी के लिए ना कह रहे हो।”

“ना कहता होगा साहब। मेरे पास नहीं है तो ना कह दिया। आपका पैसा आपको मुबारक हो। मैं तो दिनभर में अपने लायक कमा चुका हूँ। रही आपकी ताकत की बात तो आजकल के लड़कों को मैं कुछ गिनता नहीं। चाहो तो अजमा लो। चारों को मैं अकेला ही काफी हूँ।” हीरा पूर्ववत् अपना काम करता रहा और युवक दुकान से कुछ हटकर खड़े हो आपस में बातें करने लगे। कुछ देर बाद वे जिधर से आए थे उधर ही कोहरे में अन्तर ध्यान हो गए। सामू और रंजन खाना खाकर भट्टी के पास खड़े हो हाथ सेकने लगे। हीरा खाना खाने बैठा तो कौर मुँह में रख आहिस्ता-आहिस्ता चबाते हुए अतीत की गहराइयों में उतरता चला गया। सामने हीरा और रंजन नहीं वरन वह स्वयं खड़ा था।

हीरा का बचपन स्नेह की छाव और प्रकृति की गोद में बीता। उसे उस समय से घटनाएँ बखूबी याद है जब उसकी उम्र आठ-दस साल रही होगी। उस समय पर दुरई गाँव मात्र दस-बारह घरों का मौहल्ला भर था। घर भी क्या कहो छोटी-छोटी झोपड़ियाँ। वे भी एक दूसरे से कई-कई सौ गज की दूरी पर। तब यहाँ दूर तक बाग ही बाग थे। उस समय का यह रिवाज़ ही था कि सेठ लोग शहर से दस बीस कोस की दूरी पर बाग लगवाते और वहाँ रखवाली को किसी गरीब परिवार को रख देते थे। दूरई ऐसे ही सेठों के बागों का इलाका बन गया था। इन्हीं बगीचों की रखवाली को हीरा के पिता और उनके रिश्तेदारों और दोस्तों ने बागों में झोपड़ियाँ डाल ली थीं और सपरिवार रहने लगे थे। साल भर साग सब्जी या फल गुजारे भर के होते थे। सबसे अधिक काम और आमदनी आम की फसल से होती थी। कच्ची अमियों से लेकर आम के सबसे बाद में पकने वाले देसी टपोरों तक लारियाँ भर-भर कर शहर जाती थीं। उन दिनों बागों के मालिक भी सैर सपाटे को सपरिवार आते थे। जिस भी बाग का मालिक आता उस दिन उसके रखवाले को दिनभर उनके खाने और आराम की व्यवस्था करनी पड़ती। पर मालिक-मालकिन लौटते समय जब पैसे और उपहार देते तो बड़ों की सारी थकान उतर जाती और बालकों की आँखे चमक उठती। वे उन्हें दूर तक जाते हुए देखते और उनके जल्दी ही दोबारा आने की प्रभु से प्रार्थना करते।

हीरा के पिता तब हर दिन पेड़ों से आम उतारते, बोरियाँ भरते और लारियों में लदवाते। पर कुछ देर बाद ही पेड़ों पर और पके आम नजर आने लगते। वे दो टोकरा आम भरकर सड़क किनारे बैठ जाते। उन्हें देखकर दूसरे भी ऐसा करने लगे थे इससे सड़क किनारे बीसियों आम के टोकरे सज जाते थे। आते-जाते मुसाफिर कुछ देर विश्राम करने और आम खाने के लालच में रूक जाते। वे आम खरीदते और ठण्डा पानी और छाया मुफ्त पा जाते। तपती दुपहरी में मुसाफिर के लिए इससे बड़ा उपहार क्या हो सकता है? कुछ मुँह से, कुछ आत्मा से बाग लगाने और रखाने वालों को दुवाएँ देते। बहुत बार ट्रक बस थोड़ी ही देर को रूकती और सवारियाँ सवारी में बैठे ही आम मांगती तो हीरा और उसका दोस्त डमरू दौड़-दौड़ कर उन्हें आम पकड़ाते। मौसम गर्मी का होता सो मुसाफिर खाने से अधिक पानी को बेचैन हो जाते। तब माँ सुबह नदी से बड़ी मेहनत से भरकर लाए अपने पानी के मटके मुसाफिरों के लिए एक के बाद एक खाली कर देती। उसके लिए तपी धूप में प्यासों को पानी पिलाना बड़े पुण्य का काम था। तब ये बिसलरी-फिसलरी कहाँ थीं। कुवें या मटके का ठण्डा मीठा पानी जितना पी सको पी लो बस। भरने, ले जाने का कोई चक्कर नहीं।

हीरा का ध्यान थाली पर गया। थाली खाली है और उसके मुँह का निवाला भी न जाने कब का निबट गया था। उसे ख्याल ही नहीं था। उसने रंजन को आवाज़ लगाई- “ओ रंजन, दो रोटियाँ ला।”

रंजन रोटियाँ रख गया। चार छः निवाले स्वाद से खाने के बाद हीरा फिर अतीत में विचरने लगा। उसे वह घटना याद आ गई जब उसके सेठ का परिवार बगीचा घूमने आया था। सेठानी, एक रिश्तेदार सेठानी और उनके गोल-मटोल हीरा के हम उम्र तीन शरारती लड़के। ड्राइवर छोड़ गया था कि शाम को वापस ले जायगा। परन्तु शाम से रात और फिर रात से सुबह हो गई तो बालक रोने लगे और सेठानियाँ चिंतित हो गई। कुछ ही घंटो बाद शहर को जाते और तुरंत वहाँ से वापस लौटते वाहनों से खबर मिली कि शहर में दंगा हो गया है। पता नहीं कब तक शहर में जाना न मिलें।

इस खबर ने जितना चिंतित सेठ परिवार को किया था उससे अधिक हीरा के माँ और पिता को। सुख सुविधाओं में रहने वाले और अच्छा खाने वालों की व्यवस्था कैसे हो सकेगी। यहाँ तो एक समय साग-सब्जी मिली तो बहुत समझो। कभी-कभी तो दाल, चावल भी आधा-अधूरा ही रहता है। हीरा के पिता ने पत्नी को एक ओर बुलाकर बूझा- “इनके खाने का इंतजाम कैसे होगा?” माँ ने हँसते हुए कहा- “खाने का तो मैं जोड़-तोड़ करके कर ही लूंगी। न चार कटोरी हुई एक ही अच्छी मसालेदार बन जाये तो खा लिया जायगा। मुझे तो अधिक चिंता इनके कपड़ो की है। सेठानी तो बगैर नहाए और ठाकुर जी को भोग लगाए कौर भी नहीं तोड़ेगी।”

यही हुआ भी। बालको ने हीरा और उसके साथियों के साथ नदी में नहा भी लिया और खाया भी। पर दोनों सेठानियाँ दिन भर निराहार हरी।

शाम तक एक समस्या और आ गई। बगीचों में पके आम के ढेर लगने शुरू हो गए और लारियों के आने का कोई उपाय नहीं था। रात को हीरा के बापू को तरकीब समझ में आई क्यों न दो गाँव पार तीसरे बड़े गाँव में कल पैंठ है उसी में आम बेक दिए जाय। उसने बस्ती के दूसरे लोगों से सलाह की और सुबह पास के गाँव से चार घोड़ा-गाड़ी मंगाकर आम लाद दिए गए।

शाम को जब हीरा का बापू लौटा तो वह दो थान कपड़ा-एक छींटदार और दूसरा सादा लिए था। अगले दिन सुबह वह टमटम में बैठाकर अपने दोस्त को उसकी सिलाई मशीन सहित ले आया। सबसे पहले दोनों सेठानियों के लिए लहंगा व कुर्ती सिले गए। इसके बाद लड़कों के कपड़े दोपहर तक कपड़े तैयार हो जाने पर दोनों बहनों ने नदी पर जाकर स्नान किया। हीरा की माँ ने बड़े प्रेम से भोजन परोसा। एक तो माँ का आदर भाव उस पर सेठानियों की तीन दिन की भूख। सेठानियों को ऐसा स्वाद मिला कि वे देर तक खाती रहीं।

अगले दिन से काफी कुछ ठीक चलने लगा। बापू घोड़ा-गाड़ी में आम भरकर पास के गाँवों में बेक आता। माँ और बस्ती की अन्य सभी औरतें सेठानियों की सेवा में लगी रहती। कभी उनके कपड़े धोना, कभी पंखा झलना, कभी नहाने की व्यवस्था करना और कभी खाने की। लड़के तो दिन भर बस्ती के बालकों के साथ उधम मचाते। वे पेड़ों पर चढ़ना, जानवरों की सवारी और तैरना सीख रहे थे। कभी सब बालक मिलकर कबड्डी खेलते कभी गुल्ली डंडा। कभी किसी घर में कोई फटी पुरानी किताब हाथ लग जाती तो सेठ बच्चे उसको पढ़कर सुनाते या गिनती और पहाड़े सुनाकर अपनी पढ़ाई का रौब दूसरों पर गांठते। परन्तु दोड़ने, तैरने में बस्ती के बच्चों से पिछड़े जाते। शहरी बच्चे बस्ती के बालकों के लिए कौतुहल थे और सेठ बालकों में जंगली व पालतू जानवरों और विविध प्रकार के पौधों को देखने जानने की उत्सुकता थी। सेठानियाँ कभी-कभी घर परिवार के लिए चिंतित हो जाती। बापू बराबर शहर की खबरे जानने की कोशिश करता रहता। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होने की खबर मिलने लगी और एक दिन सेठ जी का ड्राइवर गाड़ी लेकर उन्हें लेने आ गया।

सेठानियाँ और उनके बालक तो घर जाने की खुशी में थे पर बस्ती के बालक कुछ उदास हो गए थे। हीरा को भी उनका जाना अच्छा नहीं लग रहा था। बापू ने अच्छे पके आमों का टोकरा लारी में रख दिया और माँ ने बाल्टी भर ताजा दुहा दूध। गाड़ी चलने को हुई तो बस्ती के सभी बड़े छोटे इकट्ठे हो गए। सेठानियों ने महिलाओं से गले लगकर और सभी को हाथ जोड़कर विदा ली। वे बार-बार आठ दिन से की गई अपनी सेवा के लिए सबको धन्यवाद दे रही थीं और माँ व बापू हाथ जोड़कर उन्हें ऐसा कहने को मना कर रहे थे। जाते-जाते बड़ी सेठानी ने माँ के हाथ पर कुछ रूपये रख दिए।

पन्द्रह दिन बाद सेठजी अपने मुंशी और तीन चार लोगो के साथ आए। वे हीरा के घर के बाहर की जमीन की जाँच करने और कुछ हिसाब लगाने लगे। सब लोग अचंभित थे। परन्तु आगे बढ़कर सेठजी से कुछ बूझने का किसी का साहस नहीं था। नाप-तोल पूरी हुई तो मुंशीजी ने बताया - “सेठजी ने यहाँ एक कुआँ खुदवाने का फैसला किया है। इस खबर से बस्ती भर में आनंद आ गया था।” बाग की सिंचाई और जानवरों के लिए पानी तो बाग के पास कच्चे जोहड़ से मिल जाता था। परन्तु पीने का पानी फलांग भर दूर नदी से लाना पड़ता था। सेठानियों ने इसे देखा था और बस्ती की महिलाओं के लिए यह उपहार उनके सप्ताह भर की सेवाओं के बदले दिया था। सेठजी ने चरखी और छतरी लगवाकर कुआँ बनवाया था।

हीरा घूट-घूट पानी पी रहा था। उसने फिर आवाज़ लगाई। रंजन एक रोटी ला। रंजन रोटी का कटोरेदान उठा लाया और हीरा की थाली में आखिरी रोटी रखते हुए बोला- “बस चाचा अब मत मांगना। यही आखिरी है। आज दो रोटी अधिक खा गए हो। आधे घंटे से खाना ही खा रहे हो।” हीरा ने निवाला तोड़ते हुए महसूस किया ठण्ड और बढ़ गई थी। कुछ बाहर की ठण्ड और कुछ पिए ठण्डे पानी का असर। हीरा को हल्की कपकपी सी आ गई। हीरा अब जल्दी खाना खत्म कर घर जाने की सोच ही रहा था कि उसे कंबल ओढ़े डमरू आता दिखाई दिया। साथ में मास्टर अभय भी थे। हीरा ने अपनी रोजी-रोटी के लिए यह चाय की दुकान खोली थी और डमरू ने डेरी खोल ली थी। पहलवानी करने और डटकर खाने में तो उसकी रुचि थी ही। डेरी का धंधा भी उसके अनुकूल ही था। घर का दूध घी रहे तो जी भर खाया जा सकता है। हीरा ने उन्हें सामने बैंच पर बैठने का इशारा किया। दोनों बैठ गए। हीरा ने डमरू की ओर देखकर सवाल किया - “क्या खबर है?”

“सब दुरूस्त है। बस रहीसजादों की एक कार जवाब दे गई है। बेचारे कोस भर से धकेल कर नदी के इस पार तक तो ले आए हैं। पर चली नहीं। दो गाड़ी के अन्दर लेटे हैं और दो सोहन की दुकान के चबूतरे पर।”

“आए थे यहाँ खाने का हुक्म करने। उन्हें फाइव स्टार में भी ना सुनने की आदत नहीं है। पर आज मुझसे ना सुनने को मिली।”

“कुछ बोले नहीं।”

“अकड़े थे हल्का सा। मैंने समझा दिया। चले गए।”

“एकदम ठीक किया।”

अभय ने उनका समर्थन किया- “यही सही तरीका है लाइन पर लाने का।”

हीरा, डमरू तो साथ खेले कूदे थे बचपन की दोस्ती थी। पर अभय से उनकी दोस्ती दस बारह बरस की उम्र में हुई। अभय कंधे पर बस्ता और हाथ में तख्ती लिए जब हीरा के बाग से पगडंडी पर सरपट स्कूल को जाता दिखता तो हीरा का मन भी स्कूल जाने को ललचाया। आम का सीजन निबट जाने पर हीरा और डमरू भी अभय के साथ कुछ महीनों के लिए स्कूल जाते। हीरा आते जाते अभय को अपने बाग में सुस्ताने को कुछ देर बैठा लेता। अभय उम्र में और दरजे में हीरा डमरू से बड़ा था। वह कभी-कभी इनकी पढ़ाई में मदद करता। बस यहीं से तीनों की दोस्ती शुरू हुई। हीरा डमरू की पढ़ाई तो दर्जे तीन के आगे न चल पाई। परन्तु अभय ने पाँचवी तक गाँव में और इण्टर तक की पढ़ाई शहर जाकर की। बाद में गाँव के उसी स्कूल में अध्यापक हो गया जहाँ तीनों पढ़ते थे। अध्यापक हो जाने के कुछ सालों बाद अभय ने हीरा की बस्ती में ही जमीन खरीद ली और बाद में अपने परिवार के साथ आकर यहीं रहने लगा। तीनों की दोस्ती आज भी उतनी ही गहरी थी जितनी बचपन में थी और अभय आज भी हिसाब-किताब और कागज पत्र पढ़ने में उनकी पहले जैसी ही मदद करता था। तीनों बस्ती भर के तीज त्यौहारों के काम सम्भालते और सभी की मदद करते थे।

डमरू और अभय के आ जाने पर हीरा ने रंजन, सामू को घर भेज दिया। रोज का यही नियम था। हीरा ने कहा- “मैं आप लोगों के आने से पहले बचपन के वे दिन याद कर रहा था जब यहाँ सेठ लोग आया करते थे। हम कितनी खुशी से उनकी आवभगत करते थे और अब आज-कल के ये लड़के-रत्तीभर तरस नहीं आता इन पर।” तुम दोनों को याद है जब दो सेठानियाँ आठ दिन तक हमारे घर रही थीं। बस्ती भर के लोगों ने कितनी सेवा की थी, उनकी। डमरू ने हामी भरी- “हाँ भैया खूब याद है। हम तुम भी तो दौड़-दौड़ कर उनके काम करते थे।”

डमरु - “सेठानियों के छींटदार लहंगे बनवाए गए थे। हँसी आती थी उन्हें देखकर। पर चाचा के डर से क्या मजाल कोई हँसी उड़ाता।”

अभय ने समझाते हुए कहा- “भैया वो समय बड़ों की लिहाज रखने का था हँसी उड़ाने का नहीं था।” हीरा ने गम्भीर होते हुए कहा- “फिर सेठानी ने भी कुआँ खुदवाकर हमारे किए का कई गुना लौटा दिया था भाई। वरना नदी से पानी ढोते-ढोते हालत खराब हो जाती थी।”

अभय ने बात आगे बढ़ाई- “इतनी दूर क्यों जाते हो। अभी उस घटना को अधिक दिन कहाँ हुए हैं जब एक्सीडेंट में महिला का पैर टूट गया था और बाकी को भी गहरी चोट आई थी। तब बस्ती के ही लोगों ने उन्हें चारपाईयों पर लिटाकर सरकारी अस्पताल तक पहुँचाया था और तीन दिन उनके खाने और दवाओं का इंतजाम किया था।”

“हाँ कुछ अधिक न सही सबको एक-एक कंबल तो वे भी दे गए थे और खर्च हुए पैसे भी ड्योढ़े कर लौटाए थे।” डमरू ने हामी भरी।

“अरे ना भी कुछ देते ना सही करने वालों के मन में वापस पाने की लालसा नहीं थी। इन्सानियत के नाते जितना बन पड़ा कर दिया।”

“उन दिनों का तो अब जिक्र ही बेकार है। आजकल के मजनुओं का ऊन सेठ साहूकारों से क्या मुकाबला? वे पहले कमाते थे तब सैर करते थे।”

“ठीक कहते हो भाई। मोटा पहनना और सादा खाना-यही उनकी जीवनचर्या थी। दान पुण्य में एक दूसरे से बढ़कर रहते थे और आज के ये नौ जवान फकत ऐय्याशी में लगे हैं। शहर में महंगा पड़ता है सो गाँव में चले आते हैं मुँह उठाकर। जैसे सब कुछ इनका बपौती हो।”

“इनकी ऐसी ओछी हरकते न होती तो आज यह दुर्दशा न होती।”

अब से कुछ वर्ष पहले जहाँ ये तीनों दोस्त बाहरी लोगों का स्वागत करने, दुर्घटनाओं में फंसे की मदद करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे साथ ही बस्ती वालों को भी प्रेरित करते थे अब दूर ही से उन्हें फटकार लगाने लगे थे। शहरी लोग बस्ती में आते घूमते, खाते और आनंद लेते और आराम करते थे। पर विगत वर्षों में जब इलाके से लड़कियाँ गायब होने लगी तो इन्होंने एक ऐसा संगठन सा बना लिया था जो बाहरी लोगों पर नजर रखता था। इनके इशारे पर बस्ती के सैकड़ों लोग लाठी, डंडे लेकर दौड़ पड़ते थे। कितने ही अभी तक इनसे मार खा चुके थे।

रात काफी बीत चुकी थी। तीनों दोस्त बस्ती में पहुँचकर कल मिलने का वादा कर अपने-अपने घरों की ओर बढ़ गए।

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लेखिका

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं - भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

मैं किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

सम्पर्क -

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

(अपर्णा शर्मा)

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