भारतीय साहित्य में कहानियों का सफ़र. / डॉ.कौशल किशोर श्रीवास्तव

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ऋग्वेद में मुख्यतः इन्द्र एवं वृत्रासुर के युद्ध का संक्षिप्त विवरण आता है. उन्हें यज्ञ कर्त्ता के साथ में सोमपान के लिए आमंत्रित करते थे. सभी वेदों में लगभग यही वर्णन है. अथर्ववेद पूर्णतः आयुर्वेद से भरा पड़ा है. कहीं-कहीं केवल तीन वेद का ही वर्णन है. यथा-ऋग्वेद, सामवेद एवं युजर्वेद.

भारतीय संस्कृति का पहला महा-काव्य वाल्मिकि रामायण है. दूसरा महाकाव्य महाभारत है. इन महाकाव्यों में से अनेक कहानियाँ प्रसूत हुईं. इन काव्यों में कई अंतरिक्ष हैं. इनमें से कालिदास ने रघुवंश एवं अभिज्ञान शाकुन्तलम जैसे रचनाएँ दीं. कालिदास के पूर्व भास ने कई नाटक लिखे. पर मालुम नहीं क्यों भरत ने उनके नाट्य-शास्त्र में भास का संदर्भ नहीं दिया. आम आदमियों का वर्णन करते हुए संस्कृत में शुद्रक ने मृच्छकटिकम नामक पहला नाटक लिखा, जिसमें गरीबी, राज्य कर्मचारियों का भ्रष्टाचार, वैश्यावृत्ति इत्यादि का वर्णन है. यह मुख्यतः उदयन, वासवदत्ता एवं पद्द्मावति की कहानी है. अन्यथा तो परवर्ति सभी नाटककारों ने रामायण एवं महाभारत के अंशों को लेकर ही नाटकों की सुविधानुसार रचनाएँ कीं हैं. कुछ लोग तो अभिज्ञान शाकुन्तलम को ही दुष्यंत एवं शकुन्तला की मूल कहानी मानते हैं. इसी तरह भास ने कर्ण जैसे विभिन्न पात्रों को लेकर तेरह नाटक लिखे हैं.

हिन्दी में शताब्दियों के पश्चात तुलसीदास ने रामचरित मानस की सर्जना की. रामायण के अलग भाषाऒं एवं धर्मों में अनेक परिवर्तनों के साथ कई भाष्य लिखे गए. अतः महावीर प्रसाद की “साहित्य समाज का दर्पण है” उक्ति आशिंक रूप से सत्य साबित होती है, क्योंकि शुद्रक के “मृच्छकटिकम” के अलावा तुलसीदास तक सभी ने रामायण या महाभारत काल का ही चित्रण किया है. महाभारत को तो “बाइबिल” कह सकते है, जिसका मतलब होता है” ए बुक आफ़ बुक्स”

हिन्दी में पहले नाटककार भारतेन्दु हैं. हिन्दी कहानियों में देवकी नंदन खत्री का योगदान हम अक्सर भूल जाते हैं. हिन्दी के पहले कहानीकार हम मुंशी प्रेमचंद को मानते हैं. इनकी कहानियों में हम तत्कालीन समाज का वर्णन देखते हैं. इसी तरह चंद्रधर शर्मा गुलेरी की तीनों कहानियों में तत्कालीन समाज का वर्णन है. पर आज समाज फ़टी धोतियों से मोबाईल तक आ गया है. मुंशी प्रेमचंद के गरीब ईमानदार नायक कहीं गुम हो गए हैं. मगर फ़िर भी उनका ऎतिहासिक महत्व है. हालांकि धर्मवीर भारती का अन्धायुग या सावंत का मृत्युंजय फ़िर महाभारत काल में कुछ परिवर्तनों के साथ चला जाता है.

हिन्दी जब पौराणिक कथाओं से मुक्त हुई तो रोमान्टिक कहानियां एवं उपन्यास अधिक लिखे जाने लगे. ऎसे अवसरों पर हम वुन्दावनलाल वर्मा इत्यादि को भूल जाते है. रोमान्टिक काल के बाद साम्यवाद का युग आया. फ़िर दलित विमर्श पर कहानियां लिखी जाने लगीं. उसके बाद स्त्री विमर्श पर कहानियां लिखी जाने लगीं. आज वृद्ध विमर्श की चर्चा होती है.

पहले इलाहाबाद ने कई साहित्यकार दिए. अब छॊटी जगहों से भी साहित्यकार दिए जा रहे हैं. जैसे छिन्दवाड़ा से ही हनुमंत मनगटे, गोवर्धन यादव, दिनेश भट्ट जैसे साहित्यकार हुए हैं. इसका एक विशेष कारण भी है. पहले अधिकतर प्रकाशन उत्तर भारत से ही होते थे. जैसे- धर्मयुग, सारिका, दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्थान आदि. मगर उस समय भी मध्य क्षेत्र से दैनिक भास्कर, नई दुनिया, नवभारत, देशबंधु, इत्यादि प्रकाशनों ने टक्कर के साहित्यकार दिए थे और यह परम्परा आज भी चल रही है.

देश के विभाजन पर भी कई प्रसिद्ध लेखकों ने कलम चलाई है.

केवल हिन्दी में ही नहीं, देश के हर प्रांत में उपन्यास और कहानियों का विस्फ़ोट हुआ है. बंगाल में बंकिमचन्द्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर या महाराष्ट्र में पु.ल. देशपांडॆ या उड़िया, कर्नाटक, तमिलनाडु केरल, कश्मीर, पंजाब अदि से भारतीय साहित्य को कई उत्कृष्ट कहानियां मिली हैं.

पर आधुनिक कहानी साहित्य मुंशी प्रेमचन्द, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, देवकीनन्दन खत्री इत्यादि से काफ़ी आगे निकल चुका है. आज नायकों के वस्त्र, इलेक्ट्रानिक गेडगेट्स, आदर्श इत्यादि में बहुत बदलाव आया है. इस तरह हम देखते हैं कि रामायण और महाभारत का ठहराव बहुत पीछे छूट चुका है. भारतेन्दु बाबू, प्रेमचन्द का समय बीत चुका है.

भारतीय साहित्य विशेषकर बंगला साहित्य ने ही हमें “ वंदेमातरम “ और “ जनगण मन “ जैसे राष्ट्रीय गीत दिए. भारतीय लेखकों ने हिन्दी सहित तमाम क्षेत्रीय भाषाओं सहित इंगलिश में भी अमर साहित्य दिया है. जैसे- झुम्पा ने “ फ़ार नेक्स सेक”, खुशवंतसिंह ने कई कहानियां दी है.

आधुनिक हिन्दी कहानियों का ही “ केनवास” इतना बड़ा हो गया है कि वह अनन्त हो गया है, उसे एक छॊटॆ से लेख में समेटना मुश्किल है. आधुनिक हिन्दी कहानियों का आरम्भ हम मुंशी प्रेमचन्द से आरम्भ होना मान सकते हैं.

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