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लघुकथाएँ / अशोक जैन 'पोरवाल'

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ज्यादा समझदार

‘‘बेटा गौरव ! मुझे किसी से मालूम पड़ा कि पिछले दिनों तुम्हारे कॉलेज में नामी बहुराष्ट्रीय कम्पनी बी. ई. अन्तिम सेमिस्टर के विद्यार्थियों में से कुछ योग्य उम्मीदवारों को चुनकर अपनी कम्पनी में नौकरी देने आई थी। उसमें तुम्हारा ‘सेलेक्शन‘ भी हो गया था। तीन लाख रूपये का पैकेज था। तुमने कम पैकेज बताकर नौकरी करने से मना कर दिया। तुमने यह सब बातें घर में भी किसी को नहीं बतलाई -- ‘‘गौरव के पिता अपने बेटे से बोले। ‘‘पापा ! मैं अच्छी नौकरी करके बहुत अधिक कमाई करना चाहता हूं........इसके लिये एक इण्टरव्यू भी दिया है। वहॉ 99 परसेंट सलेक्शन होने का चॉस है।‘‘ गौरव अपने पिता से बोला।

‘‘अच्छा......कितने का पैकेज है, उस नौकरी का ?

‘‘ पैकेज तो एक लाख अस्सी हजार सालाना है।‘‘

‘‘इतना कम पैकेज ? फिर तू कह रहा है, अच्छी नौकरी ?‘‘

‘‘ पापा कम पैकेज से कुछ नहीं होता। मैं इसी नौकरी में कम से कम तीस हजार रूपये महीने की यानी कि तीन लाख साठ हजार की सूखी बचत कर लूंगा। मेरी कमाई तो और भी अधिक होगी।‘‘

‘‘वह कैसे ?‘‘

‘‘पापा ! मैं प्रदेश सरकार के एक मलाईदार विभाग में इंजीनियर की नौकरी करूंगा। इसके लिये मैंने उस विभाग के एक आला अफसर से ‘सेटिंग‘ करके अपनी नौकरी भी ‘सेंक्शन‘ करवा ली है। पूरे तीन साल तक हजार रूपये मन्थली किश्त मुझे नगदी के रूप में उस अफसर को रिश्वत के रूप में देनी होगी। तभी जाकर बाद में मेरी नौकरी पक्की होगी। इधर मेरी एक भी किश्त चूकी उधर नौकरी छूटी। सूना है उस नौकरी में एक महीने की ऊपरी इनकम ही कम से कम पचास हजार रूपये महीना होगी--‘‘ गौरव गर्व महसूस करते हुए पापा के बोला।

‘‘अरे बेटा तू तो कमाई के मामले में मुझसे भी ज्यादा।‘‘समझदार हो गया है रे।

 

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माँ ही दोषी क्यों?

शहर के एक बड़े से बहते हुए नाले के पास की झाडि़यों से सुबह-सुबहअचानक एक नवजात शिशु के रोने की आवाज़ें सुनाई देने लगी। रास्ते चलते लोगों की भीड़ जमा हो गई। भीड़ में महिलाओं की कानाफूसियाँ शुरू हो गई-

‘‘अरे, अपना मुँह काला करते हुए उस कलमुही माँ ने जरा भी लोक-लाँज की परवाह नहीं की’’ - एक महिला कहने लगी।

‘‘कुलटा........ कलंकनी कोई बिन-ब्याही माँ बनी होगी’’ -दूसरी महिला बोली।

‘‘अरे, उस कठोर........... निर्दयनी माँ का कलेजा क्यों नहीं फट गया। अपने नवजात शिशु को यहाँ फेंकते समय’’ ? -तीसरी बोली।

इसी बीच कचरा बीनने वाली अधेड़ सी ........अर्ध-विक्षिप्त सी एक महिला जिसके साथ चौदह-पंद्रहसालका एक लड़का भी था। जो कि शायद उस महिला का बेटा था। उसने उन सभी महिलाओं की कानाफूसी सुन ली थी। वो महिला अपने लड़के के साथ जल्दी से झाडि़यों की ओर बढ़ी और उस नवजात शिशु को ढूंढ कर उठा लिया। आँचल की छाया पाकर उस नवजात शिशु ने रोना बंद कर दिया। अपने बेटे का सहारा लेकर वो महिला नाले से ऊपर चढ़ते हुए सड़क पर आ गई और दूर जाकर बैठ गई। वो लड़का आक्रोश में उन महिलाओं की ओर देखते हुए..........शायद अपने गुमनाम बाप की भड़ास निकालते हुए भी बड़बड़ाने लगा, ‘‘साली , सभी औरतें पूरे का पूरा दोष उस बच्चे की माँ को ही दे रहीहैं। जबकि वास्तव में तो पूरा नहीं तो कम से कम आधे से तो ज्यादा ही दोषी उस बच्चे का बाप होता है। फिर भी उस बाप को कोई दोषी क्यों नहीं ठहराता है? ...... सिर्फ माँ ही दोषी क्यों होती है’’ ?

समाप्त

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शून्य होती संवेदनाएँ

जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर रूकी। ट्रेन में चढ़ने-उतरने वाले यात्रियों की भीड़ बढ़ गई। भारतीय सेना के उस जवान की ड्रेस पर ’परमजीत सिंह’ नाम का एक छोटा सा बैच लगा हुआ था। उसके सीधे हाथ पर कंधे से लेकर कोहनी तक प्लास्टर च़ढ़ा हुआ था। हाथ की सुरक्षा के लिये गले और हाथ के बीच एक पट्टीनुमा डोरी भी लगी हुई थी। उसने अपने बाँय हाथ से अपना छोटा सा फोल्डिंग बैड उठाया और अपनी पीठ पर टांग लिया। फिर सूटकेस उठाया और ट्रेन से नीचे उतरने की कोशिश करने लगा। किन्तु, .बहुत अधिक भीड़ होने के कारण वो आगे नहीं बढ़ पा रहा था। अंततः उसने यात्रियों से कहा, ’’प्लीज मुझे उतरने से मदद कीजिये.....मैं भारत-पाक सीमा पर तैनात एक सिपाही हूँ.....अभी पिछले सप्ताह सीमा पर हुई छुटपुट गोलीबारी के कारण मुझे हाथ में गोली लग गई थी....जिसे ऑपरेशन कर निकाला गया।’’

चढ़ने-उतरने वाले यात्रियों की भीड़ में से एक आवाज आई, ’’अरे जब हाथ ठीक नहीं था तो सफर ही क्यों कर रहे हो?’’ दूसरी आवाज आई ’’हम कुली नहीं हैं, जो तुम्हारा सामान नीचे उतारें।’’ तीसरी आवाज आई, ’’गोली खाई है तो क्या हुआ?.....देश की सरकार से मोटी तनख्वाह....चिकित्सा सुविधा....और भी बहुत सारी सुविधायें और भत्ते भी तो लेते हो।’’

लोगों की प्रतिक्रियात्मक आवाजों को सुनकर उसे ऐसा लगा मानों वो भले ही देश की सीमा के दुश्मनों से जीत गया हो। किन्तु, अपने ही देश के अति स्वतंत्र नागरिकों की देशप्रेम.....मानवता के प्रति शून्य होती संवेदनाओं के कारण हार गया हो?.....उसे अब अपने हाथ के जख्म में ठेस (धक्का) लगने का डर नहीं रहा। क्योंकि उसकी आत्मा को....उसके दिल को तो पहले ही ठेस लग चुकी थी। लिहाजा, वो हिम्मत करके फुर्ती के साथ अपने सामान सहित भीड़ को चीरता हुआ ट्रेन से उतर आया था। साथ ही उसके हाथ मे बंधे प्लास्टर में धक्का लगने से कुछ खून की बूंदें बाहर निकल कर धरती माँ के चरणों में गिर पड़ी थी।

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कुत्ते से भी बदतर

शाम ढ़लने में अभी देर थी. जबकि , अब 80-82 वर्षीय उन दोनों विधुरों की जिंदगी की शाम कभी भी ढल सकती थी. शायद इसलिए वे दोनों अपनी ही कॉलोनी के एक छोटे से पार्क में टूटी हुई सी एक लोहे की बेंच पर बैठकर प्रायः रोजाना ढलती हुई शाम को देखना पसंद करने लगे थे. ताकि इसी बहाने वे दोनों ढलते हुए सूरज के साथ-साथ अपने-अपने दुख-दर्दों को एक दूसरे से सांझा करते हुए अपने-अपने मन को हल्का कर सकें.

रूआंसू होते हुए पहला बोला -“ अब तो मेरे ही घर में मेरी जिंदगी कुत्ते से भी बदतर हो गई है.”

वो कैसे? -दूसरे ने धीरे से पूछा.

- “ मेरे घर के सभी सदस्यों में से कोई भी सदस्य एक निश्चित समय पर मेरे घर के कुत्ते को उसकी अनिवार्य नित्य-चर्या के लिए उसे घूमाने के लिए ले जाते है. उसका विशेष खाना उसे देते है.उसे पुचकारते हुए तब तक बातें करते रहते हैं, जब-तक कि वो अपना पूरा खाना नहीं खा लेता. वहीं दूसरी ओर मेरे कमजोर शरीर को देखते हुए बिना तेल-मसाले का उबला हुआ सादा खाना मेरे आगे रखकर चले जाते हैं. सादा खाना तो माना स्वास्थ्य के लिए ठीक है. किंतु , मुझे तकलीफ इसलिए होती है कि घर का कोई भी सदस्य मुझसे दो मिनट भी बातें करना पसंद नहीं करता है.“- कहते-कहते पहले विधुर की आँखों से आँसूओं से की धारा बहने लगी.

उधर शाम ढलने को हुई. इधर वे दोनों भी अपने अपने घरों की ओर चल पड़े. आगे-आगे तेज कदमों से अपने साथ आया हुआ उनका कुत्ता चल रहा था और पीछे-पीछे दबे पाँवों से लाठी का सहारे लिए हुए वे दोनों.

(समाप्त)

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साहित्यिक परिचय

नाम    :     अशोक जैन 'पोरवाल' मो0 09098379074/08518852924
शिक्षा    :     एम. काम./एम. ए. (हिन्दी साहित्य एवं मनोविज्ञान)
संप्रति    : स्वेछिक अवकाश (बैंक) वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कार्य   
संम्पर्क    : ई-8/298, आश्राय अपार्टमेंट,फ्लेटनं.एस-2त्रिलोचनसिंहनगर (त्रिलंगा)(शाहपुरा)भोपाल-462039(म.प्र.)  
जन्म तिथि : 14 नवम्बर 1956 (भोपाल) प्रथम प्रकाशन : महाविद्यालिन पत्रिका में कहानी (1970)
ई-मेल    : ashokjainporwal@gmail.com <mailto:ashokjainporwal@gmail.com>  ashokjainporwal@yahoo.in <mailto:ashokjainporwal@yahoo.in> ,  
सृजन     :    (1) मेरी 51 प्रतिनिधि लघुकथाएँ        (2) मेरे 21 प्रतिनिधि हास्य-व्यंग्य  (गद्य)
(3) मेरी 21 प्रतिनिधि कहानियाँ        (4) मेरे 111 हाइकु (संग्रह)

अखिल भारतीय स्तर पर प्राप्त साहित्यिक सम्मान एवं पुरस्कारः-
1    कला-मंदिर (स्थापित 1951) (भोपाल) द्वारा ''साहित्य कला मनीषा सम्मान (2005)
2    रेखा-सक्सेना स्मृति पुरस्कार (मुंबई) द्वारा कहानी 'नारीमन' (2006)
3    सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी (खण्ड़वा) द्वारा ''श्रेष्ठ लघुकथाकार'' (2008)
4    शबनम साहित्य परिषद (सोजत सिटी/राजस्थान) द्वारा ''हाइकु सम्मान'' (2009)
5    सरिता लोक सेवा संस्थान (सुल्तानपुर/उ.प्र.) द्वारा सर्वोच्च कीर्ति भारती सम्मान (2009)
(50 वर्ष से अधिक आयु पर) ''व्यंग्य (गद्य)'' विधा पर।
6    हिन्दी वेबसाइट स्वर्ग विभा नवी/मुंबई द्वारा स्वर्ग विभा तारा राष्ट्रीय सम्मान (2010)
''गद्य'' (आलेख लेखन) विधा पर।

निम्नलिखित मासिक व्यवसायिक पत्रिकाओं में 2012 से नियमित प्रकाशन(मुख्यतः हास्य-व्यंग्य (गद्य)और सामाजिक एवं मनोविज्ञानिक आलेखों का) नई दिल्लीः-(1)मेरी-सजनी   (2)''गृहलक्ष्मी''/(3)जहनवीं/लखनऊ (4)' दिव्यता/(5)''सुपर-आइडिया''नोयडाः-''वुमन ऑन टॉप''।

साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन :- सार्थक(मुबंई)/नारी-अस्मिता (बडोदरा)    /साहित्य-वाटिका (बीगापुर/उन्नौ)/साहित्य-त्रिवेणी (कोलकता)/नारायणीयम् (ठाणे)/वैश्य परिवार (कानपुर) नवल (नैनीताल)/ प्रेरणा-अंशु (उद्यमसिंह नगर)/ अविराम (रूड़की/हरिद्वार)/लोक गंगा (देहरादून)/सरस्वती सुमन (देहरादून)/
हिन्द ज्योति बिम्व (जयपुर)/अनुकृति(जयपुर) /दृष्टिकोण (कोटा) /शब्द सामयिकी (भीलवाड़ा)/
भोपाल समरलोक/कर्मनिष्ठा / अक्षरशिल्पी / प्रेरणा / समय के साखी / राग भोपाली रंग-संस्कृति/दिव्या लोक/कला मंदिर/जबलपुर :- मोमदीप /प्राची/रूचिर-संस्कार/परिधि(सागर)/अश्वस्त (उज्जैन)/शब्दप्रवाह (उज्जैन)/प्राची-प्रतिमा (लखनऊ)/जर्जर किश्ती (अलीगढ़)/अभिनव प्रयास (अलीगढ़)/सुमन-सागर (काजीचक बाढ़)/आरोह-अवरोह (पटना)/नयी सुबह (सीतामढ़ी)/समकालीन अभिव्यक्ति (दिल्ली)/पंजाबी संस्कृति (गुड़गांव) समय संवाद/(फरिदाबाद) भारतवाणी (धारवाड)/पुष्पक (हैदराबाद)/अहल्या (हैदराबाद) अदबनामा (जालौन)

 

दैनिक समाचार पत्रों में पूर्व प्रकाशन : संस्करण/दैनिकझ भास्कर (जन जागृति संस्करण ''मधुमिता'' इन्दौर/भोपाल/ग्वालियर/रायपुर) में  (2009 - 11) में 70 से अधिक लघुकथाओं का प्रकाशन)/ नई दुनिया (नायिका) में लघुकथा एवं आलेख साथ ही ''अधबीच'' (व्यंग्य) का प्रकाशन/ पत्रिका (राजस्थान पत्रिका) 'परिवार' में लघुकथाओं का प्रकाशन/ पीपुल्स  समाचार (2009-10) में एवं राज एक्सप्रेस (2005) डेढ़ वर्षों तक निरंतर लघुकथाओं एवं आलेखों का प्रकाशन/ दैनिक जागरण में धार्मिक लेखों का प्रकाशन।

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