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आवाज़ दो- हम एक हैं! / डॉ. रामवृक्ष सिंह

मेरा दफ्तर शहर की मुख्य सड़क पर है। सड़क जो विधान सभा से होते हुए आगे निकल जाती है। इस सड़क पर हर दूसरे दिन कोई न कोई जुलूस निकलता है। जुलूस चाहे जिसका हो- किन्तु नारे तो सभी के लगभग एक जैसे ही होते हैं- जो हमसे टकराएगा- चूर-चूर हो जाएगा; हर ज़ोर-जुलुम की टक्कर से- संघर्ष हमारा नारा है; मजदूर एकता- ज़िन्दाबाद; किसान एकता- ज़िन्दाबाद; अमुक-अमुक- होश में आओ; आवाज़ दो- हम एक हैं। इन सब नारों का पहला हिस्सा एक व्यक्ति बोलता है और दूसरा हिस्सा जुलूस में शामिल कुछ लोग। कुछ लोग इसलिए, क्योंकि अधिकतर लोग तो बस जुलूस में आये होते हैं। उन्हें तो शायद यह भी पता नहीं होता होगा कि वे जुलूस में आये ही क्यों हैं, या जुलूस निकाला क्यों जा रहा है। लिहाज़ा जुलूस के ज्यादातर लोग बाकी लोगों के पीछे-पीछे बस चल रहे होते हैं। उनमें से कुछ थोड़े-से खुशनसीब लोग होते हैं, उन्हें किसी ठिकाने पर पूड़ी-सब्जी खिला दी जाती है, कहीं चाय पिला दी जाती है। सुना है कि जो थोड़े और खुशनसीब होते हैं, उन्हें आयोजकों की ओर से रुपये भी मिलते हैं। खैर..हमें क्या!

हम तो ऐसे जुलूसों के एक नारे पर चर्चा करना चाहते हैं- आवाज़ दो- हम एक हैं! मैं जब-जब यह नारा सुनता हूँ मेरा मन मयूर नाच उठता है। अपने देश के लोगों पर मुझे गर्व होता है। मेरा सीना छप्पन इंच का होने को आता है (हो नहीं पाता, यह दूसरी बात है)। मुझे अच्छा लगता है कि चलो यार, नारे में ही सही- कहीं न कहीं तो हम एक तो हैं।

मैं तो जबसे पैदा हुआ हूँ, तभी से देखता-सुनता चला आ रहा हूँ कि हम एक नहीं हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश से चलकर दिल्ली गये। वहाँ के लोगों ने कभी हमें अपने जैसा नहीं माना। जिसे देखो वही हमें भइयन कहता रहा। कोई-कोई पुरबिया कहकर हमारा सम्मान करता। बात कहने तक ही सीमित रहती तो कोई बात ही नहीं थी। पुरबिया कहने में जो तिरस्कार का भाव था, पीड़ा की बात तो वह थी। पुरबिया यानी बिलकुल गए-बीते घटिया किस्म के लोग, जिनके पास कोई साधन नहीं हैं, जो एक कमरे में दस-दस बारह-बारह की संख्या में घुचड़-मुचड़ कर रह लेते हैं। जिनका कोई स्टैंडर्ड नहीं है, जो हजार रुपये का काम पाँच सौ रुपये में कर लेते हैं और सच कहें तो मानवता के नाम पर काला धब्बा हैं। बिलकुल यह भाव था दिल्ली में पुरबियों के लिए।

उसी दिल्ली में कुछ दक्षिण भारतीय भी रहते थे। उन्हें भी दिल्ली वाले कुछ खास सम्मान नहीं देते थे। दक्षिण वालों को वे मद्रासी कहते। तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम और यहाँ तक कि उड़िया-भाषी लोगों को भी दिल्ली में केवल एक ही नाम दिया जाता- मद्रासी। मज़ाक में लोग कहते-अरे एक कनस्तर में कंकड़ डालकर हिलाओ, तो जो आवाज़ आएगी वह मद्रासी भाषा है। मद्रासी, यानी दही-भात एक ही में सानकर पूरी हथेली से सड़प-सड़प खानेवाले लोग। मद्रासी यानी काले-कलूटे लोग। मद्रासी यानी पूरे समाज से कटकर रहनेवाले अपनी दुनिया में सिमटे हुए लोग। मद्रासियों के लिए यही भाव दिल्ली वालों के मन में था।

बंगाली, बिहारी, मराठी, मारवाड़ी, गुजराती हर प्रकार के लोगों के लिए अपनी-अपनी तरह के पूर्वग्रह थे, जिनसे दिल्ली का समाज ग्रस्त था। ज़ाहिर है कि जब दिल्ली से इतर प्रान्त वालों के लिए दिल्ली वाले ऐसा सोचते-समझते थे, तो स्वयं दिल्ली वालों के लिए इन दीगर प्रान्तों के लोगों के मन में भी कुछ ऐसी ही बातें आती थीं। फैशनपरस्ती की अधिकता, बेहयाई, दिखावापरस्ती, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अशिष्टता आदि विशेषण दिल्ली वालों के साथ जोड़कर देखे जाते थे। दिल्ली वाले- जिनमें अविभाजित पंजाब के लोगों का बहुत बड़ा हिस्सा था।

इन सब बातों में कितनी सच्चाई है, इसकी मीमांसा करना मेरा अभीष्ट नहीं। मेरा अभीष्ट तो केवल यह पूछना है कि क्या हम सब वाकई एक हैं?

प्रान्तीय और भाषिक विभेद तो जो हैं वे हैं ही, ज़रा अपने देश की साम्प्रदायिक स्थिति तो देखिए। यदि उसे भी भुला दिया जाए तो जातियों का बखेड़ा देखिए। कोई पंडित है तो कोई ठाकुर, कोई बनिया है तो कोई कायस्थ, कोई अगड़ा है तो कोई पिछड़ा, कोई अनुसूचित जाति वाला है तो कोई अनुसूचित जनजाति वाला। सब एक से बढ़कर एक पहुँचे हुए। सब अलग-अलग। यदि ठाकुर साहब की बेटी वर्माजी के बेटे से शादी करना चाहे तो हो नहीं सकती, क्योंकि जाति आड़े आती है। खाँ साहब का बेटा सिंह साहब की बेटी को चाहता है, दोनों में प्रेम है, किन्तु घर वाले शादी नहीं होने देंगे, क्योंकि धर्म की दीवार बीच में आती है। तरह-तरह का अलगाव, तरह-तरह का भेद-भाव, किन्तु नारा क्या है- आवाज़ दो- हम एक हैं!

आप कभी एक नहीं हो सकते। केवल नारे लगाने से कोई एक नहीं होता। एक होने के लिए यह भूलना पड़ेगा कि मैं बड़ा हूँ और सामनेवाला छोटा। एक होने के लिए कई बातों को अनदेखा और अनसुना करना पड़ेगा। एक होने के लिए अपनी स्मृतियों की स्लेट को पोंछकर साफ करना पड़ेगा। यह सब तो हम करेंगे नहीं। हम अपने जिले, अपने राज्य, अपनी भाषा, अपनी जाति, अपने धर्म आदि को हमेशा बाकी लोगों की अपेक्षा अच्छा मानते रहेंगे। दूसरों की निजता, इयत्ता और अभिमान का सम्मान और रक्षा करना तो हम सीखेंगे नहीं, दूसरों के लिए सहिष्णुता का विचार तो हमारे मन में कभी आएगा नहीं, तो दूसरे भी हमें क्यों पसंद करेंगे? और यदि हम एक-दूसरे को पसंद नहीं कर सकते तो एका कहाँ से आएगा?

तो फिर यह नारा क्यों लगाते हो कि हम एक हैं! और एक मज़े की बात बताऊँ? जो नेता लोग आम आदमियों से यह नारा लगवाते हैं, वे मरदुए सब के सब एक हैं। दिन भर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं, ऐसे दिखाते हैं, जैसे एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं, किन्तु रात को सब साथ मिलकर दारू पीते हैं, मुर्गा तोड़ते हैं। एका तो उनमें है। उनमें एका इसलिए है क्योंकि उनके स्वार्थ ने उन्हें आपस में जोड़ रखा है। जनता को तरह-तरह के झुनझुने पकड़ा दो और अपना उल्लू सीधा करते रहो। जनता को एक न होने दो, बात-बात पर उसे अपनी भाषा, संस्कृति, प्रान्तीयता, पंथ और जाति याद दिलाते रहो, लड़ाते-कटवाते रहो और खुद पीछे-पीछे मिलकर अपने स्वार्थ की रोटी सेंकते रहो। इसी का नाम नेतागिरी है। शायद इसीलिए नेताजी लोग नारे लगवाते हैं- आवाज़ दो- हम (यानी नेता) एक हैं। और जो हमसे (यानी नेताओं से) टकराएगा- चूर-चूर हो जाएगा। आज देश के नेता बहुत बड़े माफिया हैं, उनसे टकराने का माद्दा किसमें है! बस आप तो नारे जपते रहिए- हर ज़ोर जुलुम की टक्कर से, संघर्ष हमारा नारा है। संघर्ष करते रहो मेरे भारत। तुम संघर्ष की संतान हो- यही तुम्हारा प्रारब्ध है, और यही नियति।

सच कहें तो हम एक हैं- यह प्रपत्ति ही अपने-आप में त्रुटिपूर्ण है। और सबको मिलाकर एक बना देने की आकांक्षा तो और भी त्रुटिपूर्ण है। भारतीय दर्शनशास्त्र के किसी विद्वान से पूछिए तो वह बताएगा कि कैसे ब्रह्म ने एकोहं बहुस्यामः का संकल्प किया और अपनी कार्यित्री शक्ति माया के सहयोग से एक से अनेक हो गया। एक से अनेक होने की यह आकांक्षा सर्वव्यापी है। हमारा देश तो हमेशा से अनेकता-कामी रहा है। जब अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी मिली तो देश के पाँच सौ अधिक रजवाड़े अपना-अपना पृथक अस्तित्व चाहते थे। हैदराबाद के निज़ाम ने तो इसके लिए एक प्रकार से बग़ावत ही कर दी। उनको सीधा करने के लिए सरदार पटेल ने सेना की तोपों का मुँह निज़ाम की ओर कर दिया और घुड़का कि सीधे-सीधे भारतीय संघ में शामिल होते हो या तोपों से उड़वा दूँ? भारतीय संघ में शामिल होने के अलावा निज़ाम के पास कोई रास्ता नहीं बचा था, सो मान गये। किन्तु एक से अनेक होने की आकांक्षा ने इस देश में बार-बार हिलोरें मारी हैं। किसी को खालिस्तान चाहिए, तो किसी को बोडोलैंड। किसी को गोरखालैंड चाहिए तो किसी को नक्सलियों के लिए अलग राज्य। किसी को कश्मीर के टुकड़े-टुकड़े करने की जल्दी पड़ी है। झारखंड, उत्तराखंड, तैलंगाना, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों का पृथक होना भी एक से अनेक होने की आकांक्षा का ही प्रतिफल है।

घर में नई बहू आती है तो हाथों की मेहंदी छूटते-छूटते एक से दो चूल्हे करवा डालती है। किसी बदनसीब बाप के दो बेटे होते हैं तो उसके जीते-जी ही घर के आँगन में दीवार उठाकर घर के दो हिस्से कर डालते हैं। माँ-बाप को झख मारकर किसी एक के साथ, या बारी-बारी से एक-एक के साथ रहने का दंश झेलना पड़ता है। एक से अनेक होने की आकांक्षा ब्रह्म से शुरू होकर उसकी निर्मित पूरी दूनिया में व्याप्त हो गई है। हमारे एक गुरुजी कहते थे कि भगवान अपने बनाए हर मनुष्य के कान में धीरे से कहता है कि ‘जा कम्बख्त! मैंने तुझ जैसा कोई दूसरा नहीं बनाया।’ हमें तो भगवान ने ही सबसे अलग बनाया, ज़ाहिर है सब को उसने अलग-अलग बनाया। फिर हम सब एक कैसे हो सकते हैं?

और इन्हें देखिए- आवाज दे रहे हैं कि हम एक हैं। सॉरी सर, मैं ऐसी फालतू की आवाज़ नहीं दे सकता। मुझे आपके बनाए बेवकूफ नहीं बनना। आप ही आवाज देते रहिए और इस नारे की निरर्थकता को जो नहीं समझता, उसे मूर्ख बनाते रहिए। मैं तो एक से अनेक होने की रवायत का ही पालन करूँगा- ठीक वैसे ही, जैसे सारी दुनिया करती चली आ रही है।

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