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ए.पी.जे. अब्दुल कलाम - परिधि के बाहर का एक आदमी / शामिख़ फ़राज़

"इस किताब को पढ़ने में मुश्किल से दो घंटे का वक्त लगेगा, लेकिन यह किताब पूरी पढ़ने के बाद आप जान पाएंगे कि कैसे कलाम, कलाम बने। कैसे उन्होंने साहस और निर्णय से भरकर समय की रेत पर अपने पद्चिन्ह छोड़े।"

27 जुलाई पुण्य तिथि पर विशेष प्रस्तुति.

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A. P. J. Abdul Kalam

A man beyond the orbit

Shamikh Faraz

(MCA, M. Tech)

 

ए0 पी0 जे0 अब्दुल कलाम

A man beyond the orbit

 

-:लेखकः-

शामिख़ फ़राज़

सर्वाधिकार सुरक्षित । इस किताब का कोई भी भाग किसी भी रूप में या किसी भी अर्थ में लेखक की अनुमति के बिना प्रकाशित नहीं किया जा सकता है। प्रकाशन के संबंध में अनाधिकृत कार्य करने वाले व्यक्ति के विरूद्ध आपराधिक अभियोजन की कार्यवाही के साथ क्षतिपूर्ति के लिए भी मुकदमा किया जाएगा।

प्रथम संस्करणः 2016

लेखक शामिख़ फ़राज़, 2016

ISBN: 978.93.5258.057.6

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मेरे माता पिता और

मिसाइलों वाले आदमी को

समर्पित

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आभार

एक किताब न सिर्फ़ कुछ पेजों से बनी होती है बल्कि शब्दों की आकाशगंगा होती है। मैं भी अपनी पहली शब्दों से भरी आकाशगंगा के लिए शुक्रगुज़ार हूँ अपने पिता श्री बी0 एम0 इरफ़ानी और माता श्रीमती यास्मीन अख़्तर के साथ-साथ उन तमाम लोगों का जिन्होंने इस किताब का आख़िरी शब्द लिखे जाने तक मेरा हौसला बनाए रखा। शुक्रिया!

 

पृष्ठसूची

क्या कहाँ

1) आभार vi

2) कुछ मेरी कलम से viii

3) 1931-1958 01

4) 1958-1963 06

5) 1963-1980 14

6) 1980-1991 30

7) 1991-2002 42

8) 2002-2007 45

9) 2007-2015 49

10) 27 जूलाई 2015 52

11) दुनिया की नज़र में कलाम 55

12) कलाम की किताबें 58

13) पुरूस्कार एवं सम्मान 60

14) ए0पी0जे0 अब्दुल ‘‘कमाल’’ 63

15) और आख़िर में 64

 

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कुछ मेरी क़लम से

अब्दुल कलाम के बारे में मैंने जितना पढ़ा है, उससे यही अन्दाज़ लगाया है कि ख़्वाब उनकी सबसे पसंदीदा चीज़ है। ख़्वाब के बारे में उनका ख़ुद का कहना है ‘‘ख़्वाब वह नहीं होते जो हम सोते में देखते हैं, बल्कि ख़्वाब वह होते हैं जो हमें सोने ही न दें’’ और उन्होंने न सिर्फ़ ऐसा कहा, बल्कि ऐसा करके भी दिखाया जब वह एसएलवी-3 के परीक्षण के दौरान रात में सिर्फ़ 3 घंटे ही सोया करते थे।

अब्दुल कलाम के बारे में कुछ लिखने की शुरूआत करना मेरे लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। इसलिए उनकी शख्सियत को अल्फ़ाज़ में बयान करने के लिए मैंने Ralph Waldo Emerson की इन पंक्तियों का सहारा लिया। ऐसा लगता है जैसे यह उन जैसे लोगों के लिए नहीं बल्कि उन्हीं के लिए लिखी गई हैं।

Brave man who works while others sleep

Who dare while others fly

They build a nations pillar deep

And life them to sky

 

क्या हैं कलाम

‘‘मिसाइल मैन’’

-सारे भारत के शब्द में

‘‘चौबीस कैरेट स्वर्णं’’

-वाई. एस. राजन के शब्दों में

वाइस चांसलर

पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी

‘’मिस्टर टेक्नोलॉजी ऑफ इंडिया’’

-डा0 आर. ए. माशेलकर के शब्दों में

सचिव औद्योगिक संस्थान विभाग

भारत सरकार

मान लीजिए कोईं कहता है कि दो और दो पांच होते हैं तो हम उसकी खिल्ली उड़ा सकते हैं परन्तु यह महान विचारक कहेगा कि चलिए विश्लेषण करते हैं। इसी कारण कलाम, कलाम बने हैं।

-डा0 आर. सुब्रमण्यम के शब्दों में

सदस्य

क्रेन्द्रीय योजना आयोग`

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1931-1958

अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु के रामेश्वरम कस्बे के धनुषकोडी गांव में 15 अक्टूबर 1931 को एक मुस्लिम परिवार में हुआ, जो कि एक गरीब परिवार था। उनका परिवार नाव बनाने का काम करता था। उनके पिता वही नाव मछुआरों को किराये पर दिया करते थे। उनके पिता जैनुल आबदीन एक स्थानीय ठेकेदार जलालुद्दीन के साथ काम करते थे, जिनसे बाद में कलाम की बड़ी बहन की शादी हुई। जलालुद्दीन से कलाम के रिश्ते दोस्त जैसे थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में जलालुद्दीन के बारे में लिखा है ‘‘जलालुद्दीन ईश्वर के बारे में मुझे बहुत गहराई से बताते थे। वह ईश्वर के बारे में ऐसे बातें किया करते थे जैसे ईश्वर के साथ उनकी कामकाजी भागीदारी हो।’’ इसके साथ ही उनके दूसरे दोस्त जो कि उम्र में उन से बड़े थे, वह उनके चचेरे भाई शम्सुद्दीन थे। इसके अलावा उनके हम उम्र दोस्तों में उनके तीन पक्के दोस्त रामनंद शास्त्री, अरविंद और शिवप्रकाशन थे।

वह स्कूल से आने के बाद कुछ देर तक अपने बड़े भाई मुस्तफा कलाम की दुकान पर भी बैठते थे, जो कि रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन पर थी। द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने पर जब ट्रेन ने रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन पर रूकना बंद कर दिया था, तब अख़बार के बंडल चलती ट्रेन से ही फेंक दिए जाते थे। उनके भाई शम्सुद्दीन को एक ऐसे इन्सान की ज़रूरत थी जो अख़बारोंको घर-घर पहुँचाने में उनकी मदद कर सके, तब कलाम ने यह ज़िम्मेदारी निभाई। जब उन्होंने अपने पिता से रामेश्वरम् से बाहर जाकर पढ़ाई करने की बात कही तो उन्होंने कहा कि हमारा प्यार तम्हें बांधेगा नहीं और न ही हमारी जरूरतें तुम्हें रोकेंगी। इस जगह तुम्हारा शरीर तो रह सकता है, लेकिन तुम्हारा मन नहीं।

कलाम ने सन् 1950 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए त्रिची के सेंट जोसेफ कालेज में दाख़िला लिया और इसके बाद बीएससी की। बीएससी करने के बाद अचानक उनका ख़्याल बदला कि मुझे बीएससी नहीं करना चाहिए थी, बल्कि मेरा सपना तो इंजीनियरिंग था। फिर मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग में एडमीशन लेने के लिए बहुत मेहनत की, कयोंकि वह उस वक़्त एक मंहगा कॉलेज था, जिसकी एरोनॉटिकल इंजीनियरिंगकी फ़ीस 1000 रूपये थी। फ़ीस भरने को उनकी बड़ी बहन ने अपने गहने गिरवीं रखे और उन्होंने गिरवीं गहनों को अपनी कमाई से ही छुड़ाने की बात मन में ठानी। घर की बहुत याद आने के बावुजूद नए माहौल में रहकर उन्होंने खुद को अपने सपने से बांधा हुआ था क्योंकि ‘‘उड़ान ही उनका सपना था।’’ अपनी पढ़ाई के बारे में उनका कहना था कि परीक्षाओं में डिवीजन लाने की दृष्टि से तो मैं कोई होशियार छात्र न था लेकिन रामेश्वरम् के अपने दो उस्तादों जलालुद्दीन और शम्सुद्दीन का मैं शुक्रिया अदा करता हूँ जिनसे मैंने जो व्यवहारिक ज्ञान लिया, उसने मुझे कभी नीचा नहीं दिखने दिया।

कॉलेज में जैसे-जैसे वक़्त बीतने लगा वैसे-वैसे विमानों में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। दूसरे छात्र जब होस्टल चलेजाते, वह तब भी विमानों के बीच बैठे रहते। धीरे-धीरे उनके पायलट बनने का ख़्याल मकसद में बदल गया औेर उनके इस मक़सद को हासिल करने में उनके तीन प्रोफ़ेसर प्रो.स्पांडर, प्रो.के.ए.वी. पनदलई और प्र्रो. नरसिंह राव काफ़ी मददगार रहे। एक शिक्षक और छात्र के बारे में उनका कहना था कि एक कुशल शिक्षक से कमज़ोर छात्र जो सीख पाता है उसकी तुलना में एक होशियार छात्र कमज़ोर शिक्षक से कहीं ज़्यादा सीख सकता है जो कि चीनी कहावत “teacher open the door but you must enter yourself” से मिलता हुआ है।

कोर्स पूरा होने के बाद उन्हें लड़ाकू विमान का माडल तैयार करने का काम दिया गया, लेकिन काम में देरी हो जाने की वजह से उनकी छात्रवृत्ति रूकने की स्थिति बन गर्ई थी। छात्रवृति ही सिर्फ़ एक तरीक़ा था उनके पास अपनी बहन के गहने छुड़ाने का। फिर उन्होंने तीन दिन का समय और मांगा और उन तीन दिनों में से एक रात तो बिना खाए रात भर काम किया। यह पहला मौक़ा था जब उन्होंने साबित किया था कि ‘‘सपना वह नहीं जो हम सोते में देखते है बल्कि सपना वह है जो हमें सोने ही न दे।’’

इंजीनियर बन जाने के बाद उनके सामने दो राहें थीं। एक एअरफ़ोर्स में पायलट बनने की तरफ़ जा रही थी और दूसरी रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक बनने की तरफ़। उन्होंने पहली राह को चुना क्योंकि वह उनके ख़्वाबों की मन्ज़िल की तरफ़ जा रही थी। एअरफ़ोर्स में पायलट के इन्टरव्यू के लिए दक्षिण भारत से उत्तर भारत रवाना होने को उन्होंने अपनी आत्मकथा में कुछ ऐसे लिखा ‘‘दक्षिण भारतीय तटीय इलाके के इस लड़के ने उत्तर भारत जाने के लिए ट्रेन पकड़ी। गंतव्य से दो हज़ार किलोमीटर दूर जाना था । अपनी मात्रभूमि की विशालता से यह मेरा पहला सरोकार था। ’’

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1958-1963

इंटरव्यू में कोई भी प्रश्न ऐसा नहीं था जो उनकी योग्यता को चुनौती देने वाला हो, लेकिन इंटरव्यू के नतीजों ने उनको बुरी तरह झंझोड़ कर रख दिया। वह आठ कामयाब लोगों के बराबर तो खड़े थे, लेकिन ख़ुद कामयाब न थे। वह एअर फोर्स के भावी आठ पायलटों की लाइन में भी खड़े थे, लेकिन खुद पायलट न थे। अपने सपने को रेत की तरह अपनी मुट्ठी से फिसलता देख रहे थे। वह काफ़ी टूट चुके थे क्योंकि सिर्फ़ आठ लोगों को ही चुना जाना था और उनका नम्बर नौंवा था। उनके अनुसार ‘‘मुझे मालूम था कि आने वाले दिन काफ़ी मुश्किल भरे होंगे। कई ऐसे सवाल थे जो जवाब चाहते थे।’’

फिर कलाम दिल्ली आकर क्त्क्व् में वैज्ञानिक के पद पर काम करने लगे तब उनका मासिक वेतन दो सौ पचास रूपये मात्र था और उनकी सोच कुछ ऐसी थी कि अगर मैं जहाज़ उड़ा नहीं रहा हूँ तो कम से कम उड़ाने के लायक़ बनाने में मदद कर ही रहा हूँ। इसके बाद विमानों के रखरखाव का अनुभव हासिल करने के लिए उन्हें ‘एअरक्राफ्ट एंड अपार्टमेंट टेस्टिंग यूनिट’ कानपुर भेजा गया। उनके दिल्ली वापस लौटने पर उन्हें ‘डार्ट’ लक्ष्य के डिज़ाइन बनाने की टीम में शामिल किया गया। तीन साल बाद ’वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान’ का केन्द्र बंगलौर में बनाया गया और उन्हें इस केन्द्र में भेज दिया गया।

वह उस वक़्त अपनी सफ़लता और असफ़लता के बीच झूलते और उन्हें ऐसा महसूस होता ‘‘मेरे जैसे ग्रामीण, छोटे कस्बे वाले मध्यम वर्गीय जिसके माता पिता की थोड़ी सी शिक्षा हुई हो, पृष्ठ भूमि वाले को कहीं किनारे तो नहीं कर दिया जाएगा और लगता अस्तित्व बचाने के लिए मुझे तब तक संघर्ष करना होगा जब तक कि उचित परिस्थिति पैदा न हो। मैंने ठान लिया कि अपने अवसर मुझे ख़ुद ही तैयार करने होंगे।’’ कलाम की कहानी सही मायनों में यहीं से शुरू होती है। उन्हें हावरक्राफ़्ट बनाने का काम सौंपा गया था जो उन्होंने निर्धारित समय में पूरा कर दिया, लेकिन फिर भी हावरक्राफ़्ट को सेना में शामिल नहीं किया गया। वह असफ़ल रहे थे, लेकिन यहीं से उन्होंने अपनी सफ़लता की शुरूआत भी की थी। उनका ख़ुद का कहना है

समय की रेत पर यदि छोड़ना चाहो अपने पद चिन्ह

तो साहस और निर्णय से भरकर उठाओ क़दम

उन्हें स्वदेशी हावरक्राफ़्ट बनाने की ज़िम्मेदारी दी गई और साथ ही उस टीम की कमान भी सौंपी गई। उस वक्त हावरक्राफ्ट बनाना बहुत ही मुश्किल काम था क्योंकि भारत में न तो इसके विशेषज्ञ थे और न ही इसके कल पुरज़े थे। इसके बारे में जितना पढ़ने को मिल सकता था सिर्फ वही पढ़कर हावरक्राफ़्ट बनाने की तैयारी में जुट गया था भारत का मिसाइल मैन।

GEM (Group Equipment machine) परियोजना पर काम करते समय उनके वरिष्ठ सहयोगी उनसे और उनकी टीम से खुश नहीं थे। उनके अनुसार ‘‘कई तो हमें सनकी आविष्कारकों का समूह कहते थे, जो असम्भव सपने को पूरा करने में लगा था। इस टीम का मुखिया होने की वजह से मुझे ही निशाना बनाया जाता था। कुछ लोग दूसरी तरह का सम्मान भी देते थे। यह लोग कहते कि एक ऐसा देहाती जो हवा में उड़ने के बाद हवा को अपनी ज़मीदारी जैसा समझता है।’’ इन लोगों की बातों से उन्हें ‘जान टाबिज़’ की राइट ब्रादर्स पर लिखी कविता अक्सर याद आती थी।

बांस और सुतली से

मोम से, हथौड़े से

कुंदों से, पेंचों से

जोड़कर, जुगाड़कर

चमगादड़ से प्रेरित, दो भाई दीवाने

झोंक रहे कोयला, फूंक रहे धोकनी

बना रहे देखो

लकड़ी की एक परी

कलाम साहब को यह पक्तियाँ अकसर याद आती थीं और आनी भी चाहिए क्योंकि जब राइट बंधुओं ने उड़ सकने वाले जहाज का ज़िक्र रायल सोसाइटी के सामने किया था तो रायल सोसाइटी के प्रेसीडेंट लार्ड केल्विन ने कहा ‘‘Anything heavier than air cannot fly and can’t be flown” और कुछ गणितज्ञों ने कई गणितीय नियम निकालकर यह बात साबित करने की कोशिश की थी कि हवा में हवा से भारी कोई चीज़ उड़ ही नहीं सकती, लेकिन इसके बाद भी राइट बंधुओं नेअपनी शानदार उड़ान भरी थी।

सारी मुसीबतों को दरकिनार करते हुए अब्दुल कलाम और उनके सहयोगियों ने हावरक्राफ़्ट तैयार किया और इसे ‘नंदी’ नाम दिया गया। कृष्णमेनन और कलाम ने हावरक्राफ्ट में पहली उड़ान भरी। कृष्णमेनन ने उनसे कहा कि तुमने दिखा दिया हावरक्राफ़्ट के विकास में जो बुनियादी समस्याएँ थीं। उन्हें भी दूर कर लिया गया है। इससे भी शक्तिशाली वाहन तैयार करो और मुझे दोबारा सवारी के लिए बुलाओ, लेकिन उसी समय कृष्णमेनन रक्षा मंत्रालय से हट गए और वह अपना वादा पूरा न कर सके और हावरक्राफ़्ट नंदी सेना में शामिल न हो पाया। कलाम के अनुसार बदली हुई व्यवस्था में स्वदेशी हावरक्राफ़्ट को सेना में इस्तेमाल करने के सपने बनाने मे कईयों की संगति नजर नहीं आती थी और अंत में इस ताक पर रख दिया गया। शायद उनकी सोच उस वक्त वुडरो विल्सन के शब्दों जैसी थी मैं उस काम में असफ़ल होना पसंद करूँगा जो आख़िर मे सफ़ल हो।

इसके बाद कलाम को एक मौका मिला ‘इंडियन कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ के इंटरव्यू का। हालांकि वह इस इंटरव्यू के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्होंने खुद को इसके लिए तैयार किया। इंटरव्यू विक्रम साराभाई ने लिया। कलाम नतीजे को लेकर निश्चिंत थे। उनका मानना था कि या तो उन्हें रॉकेट इंजीनियर के पद पर काम करने का मौका मिल जाएगा या फिर एक सीख मिल जाएगी कि कैसे आने वाली चुनौतियों के लिए खुद को तैयार रखा जाए। इंटरव्यू के नतीजों ने उन्हें रॉकेट उड़ाने का मौका दिया। उनका चयन रॉकेट इंजीनियर के पद पर हो गया था।

रॉकेट इंजीनियर बन जाने के बाद उन्हें नासा भेजा गया। नासा से लौटने के बाद उन्हें ज़िम्मेदारी मिली भारत के पहले रॉकेट को आसमान तक पहुँचाने की। उन्होंने भी इस ज़िम्मेदारी को पूरी तरह निभाया। रॉकेट को पूरी तरह से तैयार कर लेने के बाद उसकी उड़ान का समय तय कर दिया गया, लेकिन उड़ान से ठीक पहले उसकी हाईड्रोलिक प्रणाली में कुछ रिसाव होने लगा। फिर असफ़लता के बादल घिर कर आने लगे, मगर कलाम ने उन्हें बरसने न दिया। रिसाव को ठीक करने का वक़्त न हो पाने की वजह से कलाम और उनके सहयोगियों ने रॉकेट को अपने कंधों पर उठाकर इस तरह सेट किया कि रिसाव बंद हो जाए। कलाम ने रॉकेट को कंधों पर नहीं उठाया था, बल्कि उस ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया था जो उन्हें नासा से लौटने के बाद दी गई थी। फिर भारत के सबसे पहले उपग्रह ‘नाइक अपाची’ ने उड़ान भरी।

रोहिणी रॉकेट भारत को इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यही रॉकेट भारत को अंतरिक्ष में लेकर गया था। इसके बाद से ही भारत की ज़मीन गवाह बनी स्वदेशी रॉकेटों की उड़ान की। वैसे भारत से सबसे पहले उपग्रह ‘नाइक अपाची’ ने उड़ान भरी थी, लेकिन यह पूरी तरह स्वदेशी नहीं था, क्योंकि यह नासा में विकसित किया गया था। राकेट के आविष्कार के बारे में कलाम ने लिखा है कि अठारवीं सदी में टीपू सुल्तान ने बनाए थे और 1799 में जब वह मर गया तो अंग्रेजों ने नौ सौ राकेट पकड़े थे।

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1963-1980

कलाम के जीवन में भी वैज्ञानिक एडीसन के जीवन में घटित एक घटना जैसा वाक़्या है। एक बार कलाम और उनके सहयोगी सुधाकर कुछ काम कर रहे थे, तभी लैबोरेट्री में एक तेज़ धमाका हुआ। किसी को कुछ समझ न आया कि अचानक यह क्या हुआ और क्यों हुआ। पूरी लैब को बहुत ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचा। बाद में जाँच करने पर पता चला कि उनके सहयोगी सुधाकर के माथे से पसीने की एक बूँद सोडियम में गिर गई थी।

उनके दिल में कुछ एडिसन जैसे ही ख़्यालात थे जब एडीसन की फैक्टरी में आग लगी थी तो एडीसन कहना था ‘‘यह बरबादी बहुत कीमती है। अब नई शुरूआत करने का मौका मिला है’’ और तीन हफ़्ते बाद ही उसने फोनोग्राफ़ का अविष्कार किया। ठीक इसी तरह कुछ वक़्त बाद कलाम ने भी दो राकेट तैयार किए जो कि स्वदेशी थे और अब भारतीय उपग्रहों को छोड़ने के लिए फ्रांस के रॉकेटों की भी जरूरत न थी। इन रॉकेटों के नाम ‘‘रोहिणी’’ और ‘‘मेनका’’ थे। इनको देखने के लिए इंदिरा गाँधी भी आईं थीं। इस तरह उन्होंने समझाया कि असफ़लता मिलने पर सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता बल्कि यहाँ से नए हौसले और प्रयासों की कहानी शुरू होती है।

इसके बाद कलाम को एक और ज़िम्मेदारी के लिए चुना गया। यह जिम्मेदारी थी राटो परियोजना के रूप में। राटो का इस्तेमाल सैनिक विमानों को विपरीत परिस्थितियों में उड़ान भरने में काफ़ी मदद करता था। साराभाई ने कलाम को 18 माह का समय दिया इस प्रणाली की मोटर तैयार करने के लिए। कलाम ने 18 माह में राटो प्रणाली की मोटर तैयार करके उस जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाया जो उन्हें ख़ासतौर से रात एक बज े बुलाकर दी गई थी। कलाम और उनके सहयोगी राटो परियोजना को पूरी तरह से विकसित करने में जुट गए। विक्रम साराभाई उनकी हर मुमकिन मदद किया करते थे। उस समय रक्षा अनुसंधान पूरी तरह से दूसरे देशों पर ही निर्भर था, जिस पर हर साल बहुत खर्च आता था।

राटो परियोजना जल्द ही अपने अंतिम चरण में पहुंच गई। इसका परीक्षण 8 अक्टूबर 1972 को उत्तर प्रदेश के बरेली एअर फ़ोर्स स्टेशन पर हुआ और सफल रहा। इससे देश पर पड़ने वाले अतिरिक्त ख़र्च से निजात मिली। परीक्षण सफल रहा, लेकिन असफ़लता फिर आ धमकी। असफ़लता इस बार साराभाई के निधन का रूप धर कर आई थी। साराभाई के अचानक निधन के कारण राटो परियोजना भी पूरी न की जा सकी। हालांकि हावरक्राफ़्ट ‘नंदी’ और ‘राटो’ दोनों ही पूरी तरह सफल प्रयास रहे थे, लेकिन कलाम को दोनों ही की कामयाबी का जश्न नसीब नहीं हो पाया। जिस तरह ‘नंदी’ सेना में शामिल नहीं हो पाया, उसी तरह ‘राटो’ भी बीच में छोड़ना पड़ी। विक्रम साराभाई भले ही चले गये थे, लेकिन वह आज भी एस.एल.वी. के रूप में कलाम के अन्दर ज़िन्दा थे। एस.एल.वी. एक प्रकार का उपग्रह था जिसको साराभाई ‘राटो’ परियोजना पूरी होने के बाद शुरू करना चाहते थे। इसके लिये उन्होंने टीम भी बना ली थी जिसकी कमान वह कलाम को सौंपना चाहते थे। एस.एल.वी. के विकास की मंजूरी मिल जाने के बाद कलाम और उनकी टीम एस.एल.वी. को तैयार करने में जुट गये।

एस.एल.वी. में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के लिए इंडियन रॉकेट सोसाइटी ने बुलावा भेजा फ्राँस के स्पेस वैज्ञानिक प्रो. कुरियन को। कलाम के काम करने के तरीके से प्रो0 कुरियन भी बहुत प्रभावित हुए। उनका कहना था जो उपलब्धि तुमने एक साल में हासिल की है, वही उपलब्धि यूरोप ने तीन साल में हासिल की थी।’’ कलाम ने भी कुरियन के साथ काम करके नए अनुभव हासिल किए।

कलाम और उनकी टीम ने दो साल जी तोड़ मेहनत करके एस.एल.वी. तैयार किया। डायामांट व्हील के साथ इसके प्रयोग के नतीजे देखे जाने थे। लेकिन उसी वक्त फ्राँस ने अपना डायामांट कार्यक्रम रद्द कर दिया। फ्राँस के नेशनल सेंटर सी.एन.ई.एस. से जब यह संदेश आया कि फ्राँस को अब एस.एल.वी. की कोई भी जरूरत नहीं है, तब कलाम को बहुत धक्का लगा। उनके अनुसार, ‘‘मैं उसी तरह हताश हुआ जब वायुसेना में चयन न हो पाने पर और बंगलौर में ‘नंदी’ परियोजना रद्द किए जाने पर हुआ था।’’ कलाम की असफलता ने उन्हें यह तीसरा धक्का दिया था। पहले हावरक्राफ्ट नंदी को सेना में जगह न मिल पाना, दूसरे ‘राटो’ परियोजना बीच में ही छूट जाना और तीसरे एस.एल.वी. को डायामांट के साथ न जोड़ पाना। एसएलवी चौथे चरण से उनकी बड़ी कोशिशें और उम्मीदें जुड़ी थी जिससे यह डायामांट के साथ उड़ पाती। इसके अचानक हुए अन्त ने उनके अन्दर एक शून्य पैदा कर दिया था।

प्रो0 विक्रम साराभाई के निधन के बाद प्रो0 सतीश धवन को इसरो का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। ‘The Space Science and Technology Center’, ‘The Rocket Propellant Plant’, ‘The Rocket Fabrication Facility’, ‘The Propellant Fuel Complex’ इन सबको मिलाकर एक अंतरिक्ष केन्द्र बनाया गया और इसका नाम ‘‘विक्रम साराभाई स्पेस सेन्टर’’ रखा गया। फ्राँस से कार्यक्रम रद्द किए जाने की घोषणा के बाद इसे भारत में ही एस.एल.वी.-3 नाम से विकसित करने की योजना बनायी गई। इसरो के नए अध्यक्ष प्रो. सतीश धवन ने भी दूसरे वैज्ञानिकों के होने के बावजूद कलाम को एस.एल.वी.-3 की बागडोर संभालने को कहा। कलाम इस बात पर बहुत हैरान भी हुए कि मुथुनाएगम और गवरीकर जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिकों के होते हुए भी उन्हें ही एस.एल.वी.-3 के विकास के लिए चुना गया है। उन्होंने इस सवाल का जवाब जानने के लिए कुछ लोगों से बात भी की, तब जवाब मिला कलाम यह मत सोचो कि ऐसा क्यों हो रहा है, बल्कि जो हो रहा है उसे सही साबित करने की कोशिश करो। कलाम भी इस भरोसे को मजबूत करने में जुट गए। एक बार फिर एस.एल.वी.-3 का काम शुरू हो गया। दो सौ पचहत्तर इंजीनियरों की ज़िम्मेदारी को सिर्फ पचास इंजीनियर संभाल रहे थे, क्योंकि कलाम ने 275इंजीनियरों की ज़रूरत बताई थी, लेकिन सरकार की तरफ़ से सिर्फ़ पचास ही मिले थे। डायामांट कार्यक्रम रद्द हो जाने पर कलाम के अन्दर एक शून्य पैदा हो गया था और अब वह एस.एल.वी.-3 को आकाश तक ले जाने की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। शून्य से आकाश तक का सफर उन्हें एस.एल.वी.-3 के रूप में तय करना था। बिखरी हुई उम्मीदों को फिर से जोड़ जुगाड़ करके आकाश के सफ़र की तैयारी कर रहा था वह मिसाइलों वाला आदमी और उसका साथ निभा रहे थे वह पचास इंजीनियर जो 275 के बराबर थे। 24 जुलाई 1974 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संसद में घोषणा की कि भारत का पहला उपग्रह प्रक्षेपण यान कार्य प्रगति पर है। भारत की पहली कक्षीय उड़ान सन् 1978 में होगी।

एक दिन जब कलाम अपनी लैब में काम कर रहे थे, तभी रामेश्वरम् से ख़बर आई कि उनके बहनोई जलालुद्दीन चल बसे। उनकी दोस्ती की बुनियाद की दो ईंटों में से एक ईंट उखड़ गई थी। उनके बहनोई अब कभी न उठने वाली नींद में सो चुके थे। उनके शब्दों में ‘‘यह ख़बर सुनकर कुछ मिनटों के लिए मैं थम सा गया, कुछ सोच भी नहीं पाया, न कुछ महसूस कर रहा था। फिर उनके साथ गुज़ारे गए कल की यादें उभर आईं।’’ कलाम अपने बहनोई को अलविदा कहने के लिए रामेश्वरम् गए और फिर वापस आकर एस.एल.वी.-3 के रूप में खुद को विकसित करने लगे। प्रो. धवन जब उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा करते कि जैसे-जैसे एस.एल.वी.-3 का काम बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे तुम्हें मजबूती मिलेगी, तब उनकी हिम्मत और भी बढ़ जाया करती।

फिर 1976 में उन्हें नाव बनाना सिखाने वाले हाथ हमेशा के लिए बेजान हो गए थे। अब उनके पिता का देहांत हो गया था। पता नहीं नियति को क्या मंजूर था। इससे पहले उनके पिता की जब तबीयत ख़राब होती तो वह डॉक्टर के पास ले जाते, इस पर उनके पिता कहते कि मुझे डाक्टर के पास ले जाने की क्या ज़रूरत है सिर्फ तुम ही रामेश्वरम् आ जाया करो।

अपने पिता की मृत्यु पर पर उन्हें औदेन की लिखी पंक्तियाँ याद आ रही थीं।

धरा ने पाया अपना अतिथि

पिता में मेरे देखो आज

वापस लौटकर उन्होंने दोबारा एसएलवी-3 परियोजना पर काम शुरू कर दिया। कुछ जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। एसएलवी-3 का मॉडल भी कुछ एसएलवी डायामांट की तरह ही था। कुछ समस्याओं से निबटने के लिए उन्हें फ्रांस जाना था लेकिन एक बुरी घड़ी एक बार फिर उनका इन्तज़ार कर रही थी, जिसने उनको फ्रांस जाने से रोक दिया। अब उनकी माँ का देहान्त हो गया था। उनके अनुसार ‘‘वे दोनों आत्माएँ जिन्होंने मुझे स्वरूप देने के लिए आकार लिया था, मुक्त हो चुकी थीं। उनकी यात्रा के अन्त का समय आ गया था, बाक़ियों को यह सफ़र जारी रखना था और जीवन का खेल पूरा होने देना था।’’

तुम उनका अफसोस मत करो कलाम! उस काम पर ध्यान दो जिसे सिर्फ़ तुम ही कर सकते हो। कलाम से यह किसी ने कहा नहीं, फिर भी उन्होंने यह सुना था। घर की सामने वाली मस्जिद से नमाज़ पूरी करके बिना अपने घर को देखे चल पड़ना मुश्किल भरा होगा। लेकिन एक इंसान इसी रास्ते पर चल कर रेलवे स्टेशन पहुँचा और वहाँ खड़े होकर अपनी मंज़िल की तरफ़ जाने वाली गाड़ी का इंतजार करने लगा। बार-बार गिरकर भी मंज़िल पर जाने के लिए फिर खड़ा था, वह इंसान मुश्किलों से कितना बड़ा था।

फिर कलाम की मुलाकात वी-2 मिसाइल तैयार करने वाले फ़ॉन ब्रान से हुई। फॉन ब्रॉन का कहना था कि हम सिर्फसफ़लताओं से नहीं बनते, हमारा निर्माण असफ़लताओं से भी होता है। अपने काम को पूरी तन्मयता के साथ करने के लिए कलाम को अब पहले से भी ज़्यादा हौसला चाहिए था। मगर हौसले की तीन सीढ़ियाँ टूट जाने की वजह से धरती से आकाश तक मिसाइल भेजने वाला इंसान अपने आप में थका हुआ महसूस कर रहा था। फिर पता नहीं कहाँ से उसने हौसले की जुगाड़ करके खुद को एस.एल.वी.-3 को आकार देने में झोंक दिया। उसने खुद से बात की और यह बात सुनी कि आदमी की कामयाबी और नाकामयाबी ज़िन्दगी के तजुर्बों को इस्तेमाल करने के तरीक़ों पर निर्भर करती है।

परियोजना लगभग परीक्षण के क़रीब पहुँच चुकी थी। कलाम और उनके साथियों ने और ज्यादा तेजी के साथ काम करना शुरू कर दिया था। इस परियोजना के परीक्षण से पहले वह रात में सिर्फ़ तीन घंटे ही सोया करते थे और खाने के बारे में उनका कहना था कि कई बार मैं और मेरी टीम के सदस्य काम में इस क़दर लगे रहते थे कि हम दोपहर का खाना ही नहीं खा पाते थे और न ही हमें लगता था कि हम भूखे हैं। वह दिन भी आ गया जिसका उन्हें इन्तजार था। परीक्षण की तिथि 10 अगस्त 1979 रखी गई।

10 अगस्त 1979 को जब श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केन्द्रपर एस.एल.वी.-3 का परीक्षण किया गया, तब शुरूआत में एस.एल.वी.-3 ने उड़ान भरी। कलाम की आँखों में एक चमक थी कि उनका उपग्रह आकाश छू लेगा, लेकिन 317 सैकेण्ड के बाद ही उड़ान बन्द हो गई और पूरा का पूरा उपग्रह श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केन्द्र से पाँच सौ साठ किलोमीटर दूर समुद्र में जा गिरा। असफल परीक्षण की इस घटना ने कलाम को अन्दर से हिला कर रख दिया। उनका खून जम गया और रंगों में निराशा भर गई। अपने आप से बेहद नाराज था वह इंसान जिसने देश को सबसे ज्यादा मिसाइलें दीं हैं। उसे महसूस हुआ कि जैसे उसके पैर थम गए हों और उनमें दर्द हो रहा हो। यह चौथी बार था कि उसके सपनों के घरौंदे को नाकामयाबी की लहर बहा ले गई थी। इससे पहले उसके हावरक्राफ्ट ‘नंदी’ को सेना में शामिल नहीं किया गया था, ‘राटो’ परियोजना बीच में ही रोक दी गई थी और फ्राँस ने उसका एस.एल.वी. लेने से मना कर दिया था। सारी नाकामियाँ उसकी आँखों के सामने नाचने लगीं।

11 अगस्त 1979 को हुई एस.एल.वी-3 की असफ़लता की मीटिंग में सत्तर से ज़्यादा वैज्ञानिकों के सामने कलाम ने असफ़लता की सारी जिम्मेदारी खुद ली। यह उनके लिए काफ़ी मुश्किल वक्त था।

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यदि आपको दूसरों के मुक़ाबले सफ़लता देर से मिले तो हिम्मत नहीं हारना चाहिए क्योंकि महल बनाने में घर बनाने से ज्यादा समय लगता है। सफ़लता देर से मिलने के विचारों के बारे में उन्होंने ‘अग्नि की उड़ान’ में लिखा है कि कैप्लर को दो नियम प्रतिपादित करने के बाद तीसरा नियम खोजने में 17 साल लगे थे और इस दरमियान उसे बहुत सी असफ़लताओं और निराशा का सामना करना पड़ा था। इसी तरह नोबल पुरुस्कार विजेता प्रो0 चन्द्रशेखर के बारे में उन्होंने लिखा है कि प्रो. चन्द्रशेखर को अपनी खोज ‘चन्द्रशेखर लिमिट’ के बाद नोबल पुरुस्कार के लिए पचास साल इन्तजार करना पड़ा था। सन् 1930 में ही उन्होंने ब्लैक होल की खोज कर ली थी। अगर तभी मान्यता मिल जाती तो यह खोज चार दशक पहले ही सामने आ जाती। कामयाब लोगों की कहानियों से बात करके उन्होंने अपने हौसले को दोबारा इकट्ठा किया। वह हौसला जो अपने प्रक्षेपण केन्द्र से पाँच सौ साठ किमी दूर जा गिरा था। विज्ञान के बारे में कलाम का कहना था कि विज्ञान के लक्ष्य हमें खुशी तो देते ही हैं, साथ ही दुख तकलीफ़ और दिल तोड़ के रख देने वाले लम्हे भी सामने आते हैं।

एक बार फिर 18 जुलाई 1980 को कोशिश की गई एसएलवी-3 की उड़ान की। सुबह 8:03 पर एसएलवी-3 ने अपनी कामयाब और शानदार उड़ान भरी। 600 वें सैकेंड में रोहिणी उपग्रह ने कक्षा में प्रवेश किया। सही मायनों में यह उनकी पहली और असली कामयाबी थी। 18 जुलाई 1980 को एसएलवी-3 द्वारा ‘रोहिणी’ को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। इस प्रकार उन्होंने अपनी सफ़लता की पहली मिठास को चखा। इस तरह वह ढेर सारी मिसाइलों वाला आदमी अपने पहले उपग्रह को उड़ान देने में कामयाब रहा था। एस.एल.वी.-3 के साथ-साथ वह भी शून्य से आकाश तक पहुँचा। वह भी अपनी असफ़लता की आर्बिट से बाहर निकलता चला गया था।

एसएलवी-3 की कामयाब उड़ान के कुछ दिन के अन्दर ही उन्हें बुलाया गया प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा उनके दिल्ली जाने का समय निश्चित हो चुका था, लेकिन ेपउचसम सपअपदह ंदक ीपही जीपदापदह में यक़ीन रखने वाला वह इन्सान आज भी सादे कपड़ों और हवाई चप्पलों में ही था। उसके मन में यह सवाल उठा कि प्रधानमंत्री से मिलने के लिए खुद को कैसे तैयार करूँ, कैसे सजाऊँ? क्योंकि प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के लिए कुछ सही कपड़े तो होने ही चाहिए थे। उन्होंने जब अपने मन में उठ रहे इस सवाल का जिक्र प्रो0 धवन से किया तो उन्होंने जवाब दिया ‘‘तुम तो अपनी सफ़लता से सजे हो।’’

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25 जून 1981 की शाम उनके लिए सुनहरी शाम थी। कलाम को उनकी कामयाबी के बदले एक तोहफ़ा दिया जाने वाला था। उन्होंने मुल्क को मजबूती दी थी, बदले में मुल्क भी उन्हें किसी ख़िताब से नवाज़ना चाहता था। प्रो0 यू0 आर0 राव ने फोन करके बताया कि उन्हें ग्रह मंत्रालय ने ‘पदम भूषण’ से सम्मानित करने की घोषणा की है। उन्हें पदम् भूषण दिये जाने पर भी उनके सहयोगियों के अलग-अलग रूख़ देखने को मिले। कुछ खुश थे, तो कुछ नाराज़ हुए। कुछ लोगों की आवाज में तल्ख़ी थी, तो कुछ में नरमी। कुछ ने ज़िंदादिली से मुबारकबाद दी, तो कुछ ने त्योरियाँ चढ़ा लीं। कलाम के अनुसार ‘‘अपनी प्रगति को परख पाना बड़ा मुश्किल होता है। जीवन के इम्तिहान में परचा भी खुद बनाना होता है और उत्तर भी खुद ही लिखने होते है। यहाँ तक कि जाँचना भी खुद ही को होता है।’’

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1981-1991

एसएलवी-3 के कार्य के सफ़लतापूर्वक अंत के बाद अब्दुल कलाम व उनके सहयोगियों ने कुछ और मिसाइलों के निर्माण की योजना बनाई। इसके लिए कुछ वैज्ञानिकों और पैसों की समस्या उन्होंने सरकार के सामने रखी। यह मिसाइल अलग-अलग लक्ष्यों के लिए बनाई जानी थी, ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली और आकाश से ज़मीन पर मार करने वाली। कुछ ही समय बाद मिसाइल बनाने का प्रस्ताव पास हो गया। ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइल को ‘पृथ्वी’, आकाश से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइल को ‘त्रिशूल’, ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल को ‘आकाश’, टैंक रोधी मिसाइल को ‘नाग’ और कलाम के सपनों की मिसाइल को ‘अग्नि’ नाम मिला। क्योंकि दोनों मिसाइलों के निर्माण सम्बन्धी पूरी ज़िम्मेदारी कलाम की ही थी, इसलिए अब उनके सामने दो सबसे बड़ी मुश्किल थीं, वह खुद किस मिसाइल की ज़िम्मेदारी सम्भालें और बाक़ी मिसाइलों को किसे सौंपा जाए। यह काम करना उनके लिए किसी चुनौती से कम न था, क्योंकि डी0 आर0 डी0 एल0 के वैज्ञानिकों का स्वभाव अपने आप में अलग ही था। वे तमाम मसलों पर चर्चा तो बहुत करते थे, लेकिन मानते थे जरा सी बात। उन्होंने इस समस्या को इस तरह सुलझाया कि ‘अग्नि’ को खुद के लिए बचाकर रखा। ‘पृथ्वी’ परियोजना के लिए कर्नल वी0 जे0 सुन्दरम्, ‘त्रिशूल’ के लिए कमांडर एस0 आर0 मोहन, ‘आकाश’ के लिए प्रह्लाद और ‘नाग’ के लिए एन0 आर0 अय्यर को चुना।

पूरे 280 इन्जीनियरों और वैज्ञानिकों ने डी0 आर0 डी0 एल0 में काम शुरू कर दिया। कुछ वैज्ञानिकों के इरादों में पूरा पक्कापन नहीं था। उन्होंने अपने दिल में एक कोना शक के लिए भी बना रखा था। एक इंजीनियर ने कलाम से पूछा, ‘‘हमारी टीम में कोई बड़ी हस्ती तो है नहीं। हम कैसे अपने काम को अंजाम दे पायेंगे?’’ कलाम ने कहा ‘‘एक बड़ी हस्ती वो छोटा व्यक्ति है, जो अपने बड़े लक्ष्य पर ध्यान रखे हुए है और उसे करने की कोशिश कर रहा है।’’ उन्होंने सफलता के लिए चार पहलुओं को जरूरी बताया - लक्ष्य निर्धारण, सकारात्मक सोच, मन में स्पष्ट कल्पना और उस पर विश्वास करना।

इन मिसाइलों में सबसे पहले ऊँचाई से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइल त्रिशूल का 16 सितम्बर 1985 को परीक्षण किया गया। यह परीक्षण लगातार कोशिशें करने पर सफल रहा था। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। क्योंकि इन मिसाइलों के निर्माण को मंजूरी उन्हीं के द्वारा दी गई थी, इसलिए इस पर भी संशय के बादल मंडराने लगे कि पहले रोकी जा चुकी परियोजनाओं की तरह इसे भी न रोक दिया जाए। कलाम ने अपनी डायरी में लिखा -‘‘ कुल मिलाकर जीवन अनसुलझी समस्याओं, संदिग्ध विजय और पराजय का ही मिश्रण है। समस्या यह है कि हम प्रायः जीवन के साथ जूझने के बजाए इसका विश्लेषण करने लगते हैं। लोग अपनी असफ़लताओं से सीखने या इसका अनुभव लेने के बजाए कारणों एवं प्रभावों की चीरा फाड़ी करने लगते हैं। मेरा यह मानना है कि कठिनाइयों एवं संकटों के बीच ईश्वर हमें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है। इसलिए जब आपके सपने, उम्मीदें, लक्ष्य चूर-चूर हो जाएं तो उनके भीतर तलाश कीजिए, आपको उनके भीतर छिपा कोई सुनहरा मौका अवश्य मिलेगा।’’

त्रिशूल के सफल परीक्षण के बाद पायलट रहित विमान का भी सफ़लतापूर्वक परीक्षण किया गया। हालांकि कलाम को अलग-अलग तरीकों से कामयाबी मिल रही थी, लेकिन उनकी ख़ालिस कामयाबी अभी भी दूर ही थी। कलाम का सपना ‘अग्नि’ अभी विकसित नहीं हुई थी। उनके अनुसार, ‘‘जैसे मैं किसी संगम पर खड़ा हूँ और ए0डी0ई0, डी0टी0डी0पी0 और इसरो से आने वाले रास्तों को देख रहा हूँ। चौथी सड़क डी0आर0डी0एल0 थी। मिसाइल टेक्नोलॉजी में देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाना वाला हाईवे।’’

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त्रिशूल की सफलता के बाद कलाम ने सारा ध्यान ‘अग्नि’ पर लगा दिया। अग्नि कलाम के लिए बहुत बड़ा प्रोजेक्ट था। इसमें लगभग पाँच सौ से ज्यादा वैज्ञानिक थे। अग्नि की उड़ान के लिए तीन मुख्य स्तम्भ थे - भागीदारी, सारे वैज्ञानिकों के लिए अपने आपको अग्नि की सफ़लता में झोंक देना और खुद को अपने लक्ष्य से लगातार बांधे रखना। इसके अलावा भी एक और अहम बात थी और वह थी पूरी टीम के बीच मानवीय संबंध। मानवीय संबंध के एक नहीं कई उदाहरण मिलते हैं। एक वैज्ञानिक थे नागराज। काम के वक्त वह सोना खाना भूल जाते थे। जब वह आई0टी0आर0 पर थे तब उनकी पत्नी के भाई का निधन हो गया। उनके परिवार वालों ने उनको ख़बर नहीं दी ताकि अग्नि के विकास में बाधा न पड़े। अग्नि वैज्ञानिकों के लिए ही नहीं, उनके परिवार वालों के लिए भी एक अभियान था।’’

इसी तरह एक बार एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास गया और कहा कि मुझे आज शाम को 5:30 पर घर जाना है, मैंने बच्चों से वादा किया है उन्हें घुमाने का। बॉस ने इजाजत दे दी। लेकिन वह शाम को 5:30 पर घर जाना भूल गया और रात 8:30 बजे उसे याद आया। तब वह सीधा बॉस के रूम में पहुँचा लेकिन वहाँ बॉस नहीं थे। फिर वह घर पहुँचा। उसकी पत्नी मैग्ज़ीन पढ़ रही थी। वैज्ञानिक को देखकर उसने पूछा कि तुम कॉफ़ी पसंद करोगे या खाना खाना? पत्नी का सही रवैया देखकर उसे आश्चर्य हुआ क्योंकि उसे कुछ ऐसी उम्मीद थी कि सब नाराज़ होंगे। उसने दबी ज़बान में खाने को कहा और बच्चों के बारे में पूछा तो पता चला कि 5:15 पर एक आदमी आया था और बच्चों को घुमाने ले गया है। उस आदमी ने कहा कि तुमने उसे भेजा है। क्या तुमने उस आदमी को नहीं भेजा था? बच्चों को घुमाने वाला इन्सान कोई और नहीं कलाम ही थे। उन्होंने सोचा यह हर बार नहीं किया जा सकता है, लेकिन एक बार तो किया ही जा सकता है। इन्हीं सब वाक्यात के साथ 20 अप्रैल 1989 का दिन आ गया जब अग्नि के रूप में कलाम को अपनी परीक्षा देनी थी।

20 अप्रैल 1989 को अग्नि का परीक्षण किया जाना था। परीक्षण की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गईं। सारे उपकरणों को लगाकर अग्नि की उड़ान की उल्टी गिनती शुरू हो गई। यह न सिर्फ ‘अग्नि’ का परीक्षण था, बल्कि यह अग्नि के रूप में कलाम का परीक्षण था, यह पाँच सौ वैज्ञानिकों का परीक्षण था, यह उनके परिवारों का परीक्षण था। परीक्षण का समय नजदीक आने लगा। कलाम की खुशी में कुछ डर की भी मिलावट थी, लेकिन खुशी की मात्रा ज्यादा थी। परीक्षण किये जाने से ठीक पहले रूकावट के सिग्नल मिलने शुरू हो गए। पहले एक, फिर दो और फिर कई सारे। आखिरकार ‘अग्नि’ का परीक्षण रद्द करना पड़ा। बहुत सारी मिसाइलों वाले उस आदमी ने खुद को बहुत परेशान पाया क्योंकि उसकी एक और मिसाइल ने उड़ान भरने से मना कर दिया था। कलाम ने सहयोगियों को अपने अनुभव बताए- ‘‘मेरा प्रक्षेपण यान तो समुद्र में जा गिरा था, लेकिन सफलता के साथ उसकी वापसी हुई। आप लोगों की मिसाइल आपके सामने है, सही मायनों में आपने कुछ खोया नहीं है, लेकिन कुछ हफ़्ते फिर से काम करना होगा।’’

अग्नि की नाकामयाबी को मीडिया ने गरम मसाला लगाकर उछाला। एक कार्टूनिस्ट ने कार्टून बनाया-जिसमें दुकानदार सेल्समैन को सामान लौटाते हुए कह रहा है कि अग्नि की तरह यह भी नहीं उड़ेगा। हिन्दुस्तान टाइम्स ने कार्टून बनाया कि- एक राजनेता प्रेस रिपोर्टरों से कह रहा है-किसी तरह डर की कोई बात नहीं है। यह पूरी तरह शांतिपूर्ण अहिंसक मिसाइल है। द हिन्दू ने काूर्टन बनाया कि- एक ग्रामीण कुछ नोट गिन रहा है और दूसरे से कह रहा है - हाँ, टेस्ट साइट के पास बनी मेरी झोपड़ी से निकल जाने का ही मुआवज़ा है यह। कुछ और बार यह रद्द हो तो मैं खुद का मकान बनवा सकूँ। अमूल ने कार्टून बनाया कि- अग्नि को ईंधन के रूप में मक्खन की ज़रूरत थी। वह व्यक्ति जिसके नाम आज सबसे ज़्यादा मिसाइल दर्ज हैं, इस समय अपनी मंज़िल को सिर्फ देख पा रहा था लेकिन वह उस तक अभी भी नहीं पहुँचा था जिसके लिए उसने अपना घर छोड़ा था।

इसके बाद दोबारा अग्नि पर काम शुरू किया गया। मेन एग्ज़ाम में असफ़ल हो जाने के बाद इम्प्रूवमेन्ट एग्ज़ाम की तैयारी में जुट गए कलाम। अग्नि की उड़ान की अगली तारीख़ निर्धारित की गई 22 मई 1989, सुबह 7:10 पर अग्नि और कलाम का परीक्षण होना था। एक ख़ामोश सुबह में भी कलाम के अन्दर शोर मचा हुआ था। जब कलाम ने अग्नि को उड़ान भरने को कहा तो अब की न वह रूकी और न वापस लौटी, इस बार उड़ती ही चली गई और अग्नि के साथ-साथ कलाम भी। यह न सिर्फ अग्नि की उड़ान थी, बल्कि यह अग्नि के साथ उन पाँच सौ वैज्ञानिकों और उनके परिवार वालों की भी उड़ान थी , जिन्होंने कभी नागराज को उनके पत्नी के भाई की मौत की ख़बर नहीं दी, तो कभी खुद न आकर किसी और को भेज दिए जाने पर नाराज़ न हुए। यह किसी डरावने सपने वाली रात के बाद खूबसूरत सुबह में जागने जैसा था। इससे एक दिन पहले सबके दिमाग में यही सवाल था कि क्या हम कामयाब हो पायेंगे। तब रक्षा मंत्री ने सबका हौंसला कुछ यूँ बढ़ाया था- कलाम! कल अग्नि की सफ़लता पर तुम मुझसे क्या लोगे? कलाम ने कहा हम आर0सी0आई0 में एक लाख छोटे पौधे लगाएंगे

अग्नि के बारे में कलाम -

एक छोटी सी प्रतिमा है यह

भारत के गौरव की

आभा से प्रदीप्त जो

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पहले कलाम ने अग्नि को बनाया और फिर अग्नि ने कलाम को बनाया। अब दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके थे। अग्नि की धमक न सिर्फ पड़ोस में सुनी गई बल्कि सात समन्दर पार कोलम्बस के खोजे गाँव तक महसूस की गई। हाँ, वही गाँव जो आज सबसे ताक़तवर मुल्क है। दुनिया के ताक़तवर मुल्क एक और ताक़तवर मुल्क नहीं देखना चाहते थे। इसलिए सबने त्योरियाँ चढ़ा लीं। सबसे ज्यादा नाराज़गी अमेरिका को थी। यहाँ तक कि उसने तकनीकी सहायता बन्द कर दी और बहुराष्ट्रीय सहायता बन्द करने की धमकी दी। टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ गैरी मिलहालिन ने द वॉल स्ट्रीट जरनल में दावा किया कि अग्नि के विकास में भारत ने जर्मनी की मदद ली है। जर्मनी ने इस आरोप को फ्राँस की तरफ़ मोड़ दिया कि फ्राँस ने भारत की मदद की है। अमेरिकन सीनेटर जैफ बिंगमैन ने कहा कि अग्नि के लिए सभी जरूरी चीज़ें कलाम ने वैलप दीप की यात्रा के दौरान जुटाई थीं। जबकि कलाम वैलप दीप पच्चीस साल पहले गए थे जब अग्नि की तकनीक सारी दुनिया में कहीं नहीं थी। अभी कुछ वक्त पहले तक अग्नि का जन्म नहीं हुआ था और जन्म हुआ तो लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि ‘अग्नि’ कलाम की नहीं है।

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इससे पहले ‘पृथ्वी’ और ‘त्रिशूल’ का परीक्षण किया जा चुका था। ‘आकाश’ और ‘नाग’ की दक्षता ने भारत को उस मुक़ाम पर पहुँचा दिया था जहाँ उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। आज ‘पृथ्वी’ दुनिया की ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली सर्वश्रेष्ठ मिसाइल है। एक व्यक्ति पाँच तत्वों से मिलकर बना होता है। कलाम भी पाँच तत्वों से बने। उनके पंचतत्व ‘पृथ्वी’, ‘आकाश’, ‘नाग’, ‘त्रिशूल’ और ‘अग्नि’ थे।

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1991 - 2002

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है।

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।।

सन् 1990 में कलाम को पदम् विभूषण से सम्मानित किया गया। उनका कहना था कि जो वैज्ञानिक देश छोड़कर विदेश पैसा कमाने चले जाते हैं उन्हें वहाँ पैसा ज़रूर ज्यादा मिलता होगा लेकिन अपने देश के लोगों के प्रेम और सम्मान की क्या कोई भरपाई कर सकता है?

जुलाई 1992 में वे भारतीय रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए। उनकी देखरेख में भारत ने 1997 में पोखरण में अपना दूसरा सफ़ल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति से संपन्न देशों में शामिल हुआ। कलाम जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा शोध और विकास विभाग के सचिव रहे। उन्होंने रणनीतिक प्रक्षेपास्त्र प्रणाली का उपयोग आग्नेयास्त्रों के रूप में किया। इसी प्रकार पोखरण में दूसरी बार परमाणु परीक्षण भी परमाणु ऊर्जा के साथ मिलाकर किया। इस तरह भारत ने परमाणु हथियार के निर्माण की क्षमता प्राप्त करने में सफ़लता अर्जित की। कलाम ने भारत के विकास स्तर को 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की। वह भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। वह भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में निदेशक के तौर पर भी रहे और उन्होंने अपना सारा ध्यान ‘‘गाइडेड मिसाइल’’ के विकास पर केन्द्रित किया।

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2002-2007

डॉ0 अब्दुल कलाम भारत के ग्यारवें राष्ट्रपति (2002-2007) निर्वाचित हुए थे। 18 जुलाई 2002 को कलाम को नव्वे प्रतिशत बहुमत से भारत का राष्ट्रपति चुना गया था और उन्हें 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। इनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ।

कलाम वैसे तो कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, लेकिनएक राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने गहरी छाप छोड़ी। यहाँ तक कि उन्हें जनता का राष्ट्रपति भी कहा गया। उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा हमेशा बनाए रखी। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान उन्होंने लाभ का पद संबंधी विधेयक पारित करने से मना करके राजनीतिक गलियारों में हंगामा खड़ा कर दिया था। उन्होंने खुद के रबर स्टैम्प न होने के सबूत पेश किये। यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को खुद जाकर कलाम से मिलना पड़ा था।

राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली केरल यात्रा के दौरान उन्होंने एक मोची और एक छोटे से होटल के मालिक को बुलाया था। अब्दुल कलाम ने एक वैज्ञानिक के रूप में काफी वक्त केरल में बिताया। तभी उनकी दोस्ती उस होटल के मालिक से हो गई थी, जिसमें अक्सर वह खाना खाते थे। होटल मालिकके अलावा उस मोची से उनके बहुत अच्छे संबंध थे, जिसके साथ वह थोड़ा बहुत वक़्त बिताया करते थे।

राष्ट्रपति होते हुए भी खुद को शिक्षकों से बड़ा न माना। इसका भी एक वाक़्या है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शीर्ष लोगों के लिए पांच कुर्सियाँ रखी गईं जिनमें चार विश्वविद्यालय के कुलपति समेत मुख्य अधिकारियों के लिए और एक राष्ट्रपति कलाम के लिए। राष्ट्रपति के लिए रखी गई कुर्सी बाकी चार कुर्सियों से आकार में बड़ी थी। कलाम ने आकार देखकर कारण जानना चाहा। उन्हें बताया गया कि यह आपके लिये है क्योंकि आप राष्ट्रपति और भारत के प्रथम नागरिक हैं। कलाम ने कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया और कुलपति को उस कुर्सी पर बैठने के लिए कहा परन्तु कुलपति ने भी उस कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया। फिर कलाम के लिए भी बाकी कुर्सियों के आकार की कुर्सी मंगाई गई।

राष्ट्रपति भवन में वह अपने जूतों के फीते खुद बाँधते थे। उन्होंने इस के लिए नौकरों की सेवा लेने से इन्कार कर दियाथा। उनको जनता का राष्ट्रपति कहे जाने के पीछे भी एक नहीं कई रोचक बातें हैं। एक बार उनके 52 रिश्तेदार रामेश्वरम् से दिल्ली घूमने आए। उनको घुमाने के लिए कभी कलाम ने सरकारी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया, उनके खाने का इन्तेजाम भी निजी तनख्वाह से किया। यहाँ तक कि एक बार उनकी अतिरिक्त चाय का भुगतान उन्होंने निजी चैक देकर किया था। कलाम का कहना था कि उनके ख़र्च का बोझ जनता पर नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने एक इमारत की दीवार पर टूटे हुए काँच लगाने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया था कि यह पक्षियों के लिए नुकसानदेय रहता।

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2007-2015

राष्ट्रपति कार्यालय छोड़ने के बाद, कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर व भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलौर के मानद फैलो और विजिटिंग प्रोफेसर रहे। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तिरुवन्तपुरम के कुलाधिपति, अन्ना विश्वविद्यालय में एरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और भारत में कई अन्य शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों में सहायक रहे। वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और अन्ना विश्वविद्यालय में सूचना प्रौद्योगिकी और अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद में भी सूचना प्रौद्योगिकी के प्रोफेसर रहे।

मई 2012 में कलाम ने भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक कार्यक्रम ‘‘मैं आंदोलन को क्या दे सकता हूँ’’ शुरू किया। उन्हें 2003 व 2006 में ‘‘एमटीवी यूथ आइकन ऑफ द इयर’’ के लिए भी नामांकित किया गया था।

2011 में आई हिन्दी फिल्म ‘‘आई एम कलाम’’ में एक गरीब बच्चे पर उनके चरित्र का प्रभाव दिखाया गया। किस तरह एक गरीब लेकिन होनहार बच्चा उनसे प्रभावित होकर उनकी तरह बनने की कोशिश करता है। पहले वह उनकी तरह बाल बनाता है फिर अपना नाम छोटू से बदलकर कलाम रख लेता है।

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27 जुलाई 2015

किसी को नहीं मालूम था कि 27 जुलाई 2015 का दिन भारत के रत्न की ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा। सुबह जब उन्होंने ट्वीट करके बताया कि “going to taking course on livable planet at iim” , कोई नहीं जानता था कि यही उनका आख़िरी ट्वीट होगा। तब किसी को नहीं पता था कि भारत और उसके लोग आज आख़िरी दिन कलाम के साथ बिता रहे हैं। 27 जुलाई 2015 की शाम कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग में ‘रहने योग्य ग्रह’ पर एक व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें जोरदार कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) हुआ और वह बेहोश होकर गिर पड़े। लगभग 6:30 बजे गंभीर हालत में उन्हें बेथानी अस्पताल में आईसीयू में ले जाया गया और दो घंटे के बाद उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई।

28 जुलाई 2015 को जब उनका शव दिल्ली लाया गया, तब उनको श्रद्धांजलि देने वालों में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उ0प्र0 के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत बहुत से लोग थे। 30 जुलाई 2015 को जब उनका शव आख़िरी बार जनता के लिए रखा गया, तब अपने राष्ट्रपति को आखिरी सलाम कहने वालों का हुजूम उमड़ आया और लगभग 3,50,000 लोगों ने नम आंखों से विदाई दी। कलाम का कहना था कि जो वैज्ञानिक पैसे की वजह से देश छोड़कर चले जाते हैं, वह पैसा तो कमा लेते हैं, मगर अपने देश के लोगों का प्यार नहीं मिलता। लेकिन कलाम को वाक़ई अपने देश के लोगों का बहुत प्यार मिला।

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दुनिया की नज़र में कलाम

कलाम को देश भर में अलग-अलग तरीक़ों से श्रद्धाँजलि दी गई। यहाँ तक कि अपना अफ़सोस जताने के लिए गूगल ने भी अपनी बाँह पर काला रिबन बाँधा। गूगल ने अपना शोक प्रकट करने के लिए अपने होम पेज पर काला रिबन शोक प्रतीक के रूप में दिखाया था।

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(काला रिबन दिखाता गूगल का होम पेज)

भारत सरकार ने कलाम को सम्मान देने के लिए सात दिवसीय राष्ट्रीय शोक की घोषणा की। भूटान सरकार ने कलाम की मौत के शोक के लिए देश के झंडे को आधी ऊँचाई पर फहराया और श्रद्धांजलि में 1000 मक्खन के दीपक भेंट किए। दलाई लामा ने अपूर्णीय क्षति कहा तो बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने अपूर्णीय क्षति से भी परे बताया। अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने कलाम को लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणादायक शख़्सियत बताया। नेपाली प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने कहा कि नेपाल ने एक अच्छा दोस्त खो दिया है। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने कहा,‘‘डॉ0 कलाम दृढ़ विश्वास और अदम्य भावना के आदमी थे। मैंने उन्हें दुनिया के एक उत्कृष्ट राजनेता के रूप में देखा। उनकी मौत भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अपूर्णीय क्षति है।’’ इंडोनेशियाई राष्ट्रपति सुसीलो बम्बनग युधोयोनो, मलेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रज्जाक, सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सियन लूंग, संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख़ ख़लीफा बिन ज़ायद अल नहयान सहित अन्य अंतर्राष्ट्रीय नेताओं ने भी कलाम को श्रद्धांजलि अर्पित की। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि डॉ0 कलाम को हमारे देशों के बीच लगातार मैत्रीपूर्ण संबंधों के एक प्रतिपादक के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने पारस्परिक रूप से लाभप्रद रूसी-भारतीय सहयोग जोड़ने के लिए बहुत कुछ किया।’ संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, ‘‘अमेरिकी लोगों की ओर से मैं पूर्व भारतीय राष्ट्रपति डॉ0 ए पी जे अब्दुल कलाम के निधन पर भारत के लोगों के लिए अपनी गहरी संवेदना का विस्तार करना चाहता हूँ।’’

कलाम की किताबें

कलाम ने अपने विचारों को इन किताबों में समाहित किया है। इन किताबों के कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

1) इण्डिया 2020: ए विज़न फ़ॉर द न्यू मिलेनियम

2) माई जर्नी

3) इग्नाइटेड माइंड्सः अनलीशिंग द पावर विदिन इण्डिया

4) इंडिया-माई ड्रीम

5) एनविजनिंग एन एमपावर्ड नेशनः टेक्नॉलॉजी फार सोसाइटल ट्रांसफारमेशन

6) विंग्स ऑफ फ़ायर : एन ऑटोबायोग्राफी ऑफ एपीजे अब्दुल कलाम

7) साइंटिस्ट टू प्रेसिडेंट

अन्य लेखकों द्वारा कलाम के जीवन के विविध पहलुओं पर लिखी गई हैं कुछ किताबें

8) इटरनल क्वेस्टः लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉक्टर अबुल पाकिर जैनुल आबदीन

9) प्रेसिडेंट एपीजे अब्दुल कलाम

10) ए.पी.जे. अब्दुल कलामः द विजनरी ऑफ इण्डिया

उनकी आत्मकथा विंग्स आफ फायर पहले अंगेजी में प्रकाशित की गई थी। बाद में इसे 13 भाषाओं में अनुवाद किया गया है, जिनमें फ्रेंच और चीनी भाषा भी शामिल है। इसमें अब्दुल कलाम के बचपन से लेकर लगभग 1999 तक के जीवन सफ़र के बारे में बताया गया है।

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पुरुस्कार एवं सम्मान

डॉ0 कलाम के 79 वें जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र द्वाराविश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाया गया। इसके अलावा उन्हें लगभग चालीस विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधि प्रदान की गईं। भारत सरकार द्वारा उन्हें 1981 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण का सम्मान प्रदान किया गया जो उनके द्वारा इसरो और डी आर डी ओ में कार्यों के दौरान वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिये था।

1997 में कलाम साहब को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया जो उनके वैज्ञानिक अनुसंधानों और भारत में तकनीकी विकास में अभूतपूर्व योगदान के लिए था।

2005 में स्विट्ज़रलैण्ड की सरकार ने कलाम के स्विट्ज़रलैण्ड आगमन के उपलक्ष्य में 26 मई को विज्ञान दिवस घोषित किया। नेशनल स्पेस सोसाइटी ने 2013 में उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान सम्बन्धित परियोजनाओं के कुशल संचालन और प्रबंधन के लिये वॉन ब्राउन अवार्ड से पुरस्कृत किया।

2014 डॉक्टर ऑफ साइंस

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय, यू के0

2013 वॉन ब्राउन अवार्ड

नेशनल स्पेस सोसाइटी

2012 डॉक्टर ऑफ लॉज़ (मानद उपाधि)

साइमन फ्रेजर विश्वविद्यालय

2011 आइ.ई.ई.ई. मानद सदस्यता

आई.ई.ई.ई.

2010 डॉक्टर ऑफ इंजीनियरिंग

यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू

2009 मानद डॉक्टरेट

ऑकलैण्ड विश्वविद्यालय

2009 हूवर मेडल

ए.एस.एम.ई. फाउण्डेशन

2009 वॉन कार्मन विंग्स अन्तर्राष्ट्रीय अवार्ड

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी,

2008 डॉक्टर ऑफ इन्जीनियरिंग (मानद उपाधि)

नानयांग टेक्नोलॉजिकल विश्वविद्यालय, सिंगापुर

2008 डॉक्टर ऑफ साइन्स (मानद उपाधि)

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,

2007 डॉक्टर ऑफ साइन्स एण्ड टेक्नोलॉजी की मानद उपाधि

कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय

2007 किंग चार्ल्स प्प् मेडल

रॉयल सोसायटी, यू0 के0

2000 रामानुजन पुरुस्कार

अल्वार्स शोध संस्थान, चेन्नई

1998 वीर सावरकर पुरुस्कार

भारत सरकार

1997 इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरुस्कार

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस

1997 भारत रत्न

भारत सरकार

1994 विशिष्ट शोधार्थी

इंस्टीट्यूट ऑफ डायरेक्टर्स इण्डिया

1990 पद्म विभूषण

भारत सरकार

1981 पद्म भूषण

भारत सरकार

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ए0 पी0 जे0 अब्दुल ‘‘कमाल’’

क्र 40 से अधिक विश्वविद्यालयों और संस्थानों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्राप्त पहले राष्ट्रपति ।

क्र 74 साल की उम्र में सुखोई विमान में यात्रा करने वाले पहले राष्ट्रपति।

क्र ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने वाले दूसरे वैज्ञानिक।

क्र पीपुल्स प्रेसिडेंट कहे जाने वाले पहले राष्ट्रपति।

क्र देश के पहले कुंवारे राष्ट्रपति।

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और आखिर में

इस किताब को पढ़ने में मुश्किल से दो घंटे का वक्त लगेगा, लेकिन यह किताब पूरी पढ़ने के बाद आप जान पाएंगे कि कैसे कलाम, कलाम बने। कैसे उन्होंने साहस और निर्णय से भरकर समय की रेत पर अपने पद्चिन्ह छोड़े।

आम लोग हिम्मत तब दिखाते हैं, जब दिखाना आसान होती है, लेकिन उन्होंने तब दिखाई जब दिखाना मुश्किल थी, ‘नंदी’, ‘राटो’ और ‘एस एल वी डायामांट’ तीनों को रोक दिए जाने के बाद भी एसएलवी-3 के परीक्षण की हिम्मत दिखाई। ट्रेन में बैठकर, पार्क में टहलते हुए या चाय की चुस्की लेते हुए आत्मविश्वास की, हौसले की, सकारात्मक सोच की बातें करना जितना आसान होता है, असल ज़िन्दगी में उसको लागू करना उतना ही मुश्किल। लेकिन कुछ लोग मुश्किल रास्ता ही चुनते हैं और वह अबुल पाकिर जैनुल आबिदीन अब्दुल कलाम बनते हैं।

यह किताब कोशिश है, 31 अक्षरों के नाम वाले एक आदमी की नाकामयाबियों से कामयाबियों तक का सफर बताने की। उस इन्सान की कहानी बयान करने की जो एक राकेट सांइटिस्ट था जबकि उसने कभी रॉकेट साइंटिस्ट बनने के बारे में सोचा भी नहीं था। वह तो एक एयरफ़ोर्स पायलट बनना चाहता था।

उस इंजीनियर के बारे में बताने की जिसने राष्ट्रपति बन जाने के बाद उस मोची को बुलावा भेजा था जिससे अक्सर वह अपने जूते मरम्मत करवाया करता था। उस वैज्ञानिक के जीवन के कुछ पहलू दिखाने की जिसने एक छोटे से स्कूल में लाइट चले जाने के बाद भी 400 बच्चों से बात की थी। उस राष्ट्रपति का परिचय देने की जिसके रिश्तेदार उससे मिलने ट्रेन के स्लीपर क्लास में सफ़र करके आए थे।

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‘‘मेरी कहानी ज़ैनुल आबिदीन के बेटे की कहानी है जो मस्जिद वाली गली में सौ साल से ज़्यादा तक रहे और वहीं अपना शरीर छोड़ा। यह उस किशोर की कहानी है, जिसने अपने भाई की मदद के लिए अख़बार बेचे। यह कहानी शिव सुब्रह्मण्यम अय्यर एवं आयुदरै सोलोमन के शिष्य की कहानी है। यह उस छात्र की कहानी है जिसे पनदलाई जैसे शिक्षकों ने पढ़ाया। यह उस इंजीनियर की कहानी है जिसे एम0जी0के0 मेनन ने उठाया और प्रो0 साराभाई जैसी हस्ती ने तैयार किया और ऐसे कार्यदल नेता की कहानी है जिसे बड़ी संख्या में विलक्षण व समर्थित वैज्ञानिकों का समर्थन मिलता रहा। यह छोटी सी एक कहानी मेरे जीवन के साथ ही ख़त्म हो जाएगी। मेरे पास न धन न सम्पत्ति, न मैंने कुछ इकट्ठा किया, कुछ नहीं बनाया, जो शानदार हो, एतिहासिक हो आलीशान हो। पास में कुछ भी नहीं रखा है - कोई परिवार नहीं, बेटा-बेटी नहीं। मैं इस महान पुण्य भूमि में खोदा गया एक कुआँ।’’

- अब्दुल कलाम

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शुभ प्रभात
एक बहु-उपयोगी शोध ग्रन्थ
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