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छोटी स्कर्ट / कहानी / लक्ष्मी यादव

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छोटी स्कर्ट...... “दीदी मैं वो अपनी फेवरेट वाली ड्रेस इस बार खोज के रहूंगी तुम देखना वही वो शोर्ट वाली स्कर्ट और वो फिटिंग वाली टॉप ” कहकर...

छोटी स्कर्ट......

“दीदी मैं वो अपनी फेवरेट वाली ड्रेस इस बार खोज के रहूंगी तुम देखना वही वो शोर्ट वाली स्कर्ट और वो फिटिंग वाली टॉप ” कहकर हिम्मी ने जोर से सुकून वाली सांस भरी और अक्टूबर महीने की ताज़ी ठंडी हवा उसके भीतर मन मस्तिस्क में किसी सपने के सच होने जैसे अहसास से जा मिली और ख़ुशी की मीठी चाशनी हिम्मी के चेहरे पर उतर आई ।जिसे बहुत अच्छी तरह से महसूस कर लिया था कनिका ने ...। कनिका, हिम्मी के चेहरे को देखकर अपने मन के भाव छिपा ले गयी, बनावटी सा चेहरा बनाकर बोली “हाँ हाँ क्यूँ नही बिलकुल तुम अपनी पसंद की ड्रेस ही लेना ...लेकिन ....ज़रा इस बात का भी ख़याल रखना की मम्मी तुम्हारी ड्रेस देखकर कही आग बबूला न हो जाएँ ...।बड़ी बहन कनिका की बात सुनकर हिम्मी तुनक गयी और मुंह बनाते हुए बोली “क्या दी! कपडे मुझे पहनने हैं और पसंद न पसंद मुझे मम्मी की देखनी होगी। ... दी अब.. अब न हम दूध पीते बच्चे तो नही हैं न! कि हमेशा मम्मी कुछ भी अपनी पसंद का लायें और हमको पहना दें जिसे पहन हम लॉफिंग बुद्ध की तरह पेट पर हाथ रखकर,जीभ निकालकर मुस्कुरा दें । क्या दी... इट्स टू फनी..... आई कांट टेक इट मोर ....... छठी में पढ़ने वाली हिम्मी न जाने क्या क्या बोलती रही और कनिका चुपचाप सुनती रही ...

आठवीं में पढ़ने वाली कनिका को याद हो आया कि कैसे बचपन से लेकर अब तक उसके और उसके भाई बहनों के सारे कपड़े हमेशा माँ और पापा ही लाते थे या तो खुद अकेले जाकर या बच्चों को साथ ले जाकर ,कभी अगर कनिका को माँ ने मामा, मौसी या किसी के भी साथ भेजा भी तो कपड़े पसंद करते वक़्त जाने क्यूँ कनिका के हाथ किसी और ड्रेस पर होते, नज़रें और मन किसी और ड्रेस पर ...कोई भी ड्रेस पसंद करते हुए कनिका बार बार अपने साथ आये हुए इंसान से यही पूछती कि क्या ये ड्रेस माँ को पसंद आएगी..इसमें मेरे घुटने तो नहीं दिखेंगे?.या झुकने पर गर्दन से नीचे कुछ ....?

हर होली –दिवाली और रक्षाबंधन पर नये कपड़े मिलते थे लेकिन हर बार नये कपड़े पसंद करने में बड़ी ज़द्दोज़हद करनी पड़ती थी कनिका को और आखिरकार जो ड्रेस वो लेकर घर आती वो कनिका से ज्यादा उसकी माँ को पसंद आना ज़रूरी था ,,किसी एग्जाम में बैठने जैसे लगते थे वो लम्हे जब लायी हुई नई ड्रेस माँ के सामने खुलती थी ,,, कनिका की साँसे कुछ पल छुट्टी पर चली जाती थी ...वो खुद में साँसे महसूस करने के लिए अपने दायें हाथ को हल्के से बायीं ओर दिल के पास रखकर सांसों को महसूस करने लगती थी ..और जब माँ के चेहरे पर मुस्कान आ जाती तो उसकी जान में जान आती...कनिका की माँ का पहनावे को लेकर एक दायरा था जो कुछ रुढियों और कुछ व्यक्तिगत राय में कैद था ..... मतलब जो उनको ठीक लगे वो ठीक है ....कनिका के लिए बड़ा मुश्किल होता था इस तरह न जाने कितनी ही ड्रेसेस को पहनकर उनको अपनी पसंद कहना ... लेकिन धीरे कब माँ की पसंद को समझना और उनकी पसंद के कपड़े पहनना कनिका की आदत में शामिल हो गया उसे पता ही नहीं चला ..।उसके ठीक विपरीत हिमानी जिसे अभी तक ऐसी कोई आदत नहीं पड़ी थी । वक़्त बेवक्त उसको इसी कारण डाट और मार पड़ जाती थी...लेकिन इन सबसे सबक कुछ नहीं सीखा था हिमानी यानी कनिका की प्यारी और मासूम हिम्मी ने .....हिम्मी के जोर से कनिका का कन्धा हिलाने पर कनिका का ध्यान टूटा

हिम्मी- “किस सोच में खो गयी हो दी ..हमारा शोपिंग काम्प्लेक्स आ गया है ...कार में बैठी रहोगी क्या ? या बाहर भी आओगी .. देखो पापा आगे भी बढ़ गये हैं ..नज़र उठाकर जब कनिका ने कार के शीशे से बाहर देखा तो पापा हमेशा की तरह काम्प्लेक्स के बाहर वाली पान की दुकान से सिगरेट लेकर सुलगा चुके थे ..कनिका और हिमानी तेज़ कदमों से पापा की ओर बढ़ी तबतक पापा बिना कुछ बोले ही काम्प्लेक्स की एक निश्चित सी दुकान के अंदर घुस चुके थे और कनिका आगे थी और हिमानी के कदम पीछे रुक गये ।कनिका ने पूछा क्या हुआ हिम्मी रुक क्यूँ गयी ?हिम्मी- “दी इस शॉप में कुछ भी न्यू नहीं होता है मैं आगे वाले शॉप में जाना चाहती हूँ ...कनिका सोच में पड़ गयी कि ये बात वो पापा से कैसे कहे कि हिमानी आगे वाली शॉप में जाना चाहती है ..। कुछ देर दोनों अंदर न गयी तो पापा खुद ही बाहर आ गये और हिमानी ने झट से कह दिया “पापा आगे वाली दुकान पर चलें क्या” ? हिमानी जितना माँ से नहीं बोल पाती उतना पापा से कह देती है तो उसे ये कहने में कोई झिझक ही नहीं हुई लेकिन कनिका न माँ से कभी कुछ कह पाती न पापा से, झिझक दोनों ओर बराबर ..

बहरहाल .. आगे वाली दुकान पर जाते ही हिम्मी ने बहुत सारी ड्रेसेस देखनी शुरू की कनिका जो ड्रेस उठाती हिमानी के लिए हिम्मी उसे फट से रिजेक्ट कर देती और वो फेवरेट वाली ड्रेसेस जिसको वो एक टी वी प्रोग्राम में देखती थी उसे खोजने लगती .. हिम्मी के खूब समझाने पर दुकानदार को हिम्मी की बात समझ आई, उसने झट से एक छोटी ब्लू जींस की शोर्ट स्कर्ट और क्रीम कलर की टॉप निकाल कर सामने रख दी जिसे देख हिम्मी का चेहरा ख़ुशी से खिल गया और उसने उसे अपने हाथ में लेकर अपने गुलाबी गालों पर लगाते हुए कहा “दी देखो न कितना सॉफ्ट कपड़ा है ..और स्कर्ट कितनी प्यारी है ..। मुझे यही तो लेनी थी ऐसी ही स्कर्ट तो है सुहानी के पास .. । दी मुझे भी ये ड्रेस लेनी है ... पापा देखो ये ड्रेस कैसी है ?अच्छी है न ? पापा कभी कुछ नहीं कहते न अच्छा न बुरा ...कई बार तो अपनी बात भी माँ से ही कहलवा देते हैं इसलिए समझ ही नहीं आता कनिका को कि माँ क्या चाहती है? और पापा क्या चाहते हैं?

खामोश खड़ी कनिका भी हिम्मी की बात पर पापा के जवाब का इंतजार कर रही थी ...जवाब सुनकर हिम्मी तो नहीं लेकिन कनिका ज़रूर चौंकी .. पापा ने कहा था या कानों में हवा सी बह गयी .. “हां जो लेना है अपनी पसंद से ले लो ...जो ठीक लगे .”इतना सुना ही था कि कपड़े पैक हो गये और और हिम्मी जुट गयी ड्रेस को लेकर मन में सपने सजाने पर ... फिर उसे कुछ याद आया तो बोली “अरे दी तुम बस देखती ही रहोगी इधर उधर या अपने लिए भी पसंद करोगी कुछ ? मैं तो कहती हूं कि तुम भी ऐसा ही ले लो ..बहुत अच्छा लगेगा तुम पर ..हिमानी अब कनिका के लिए ड्रेस देखने लगी तो कनिका ने बोला “नहीं-नहीं मैं ये सब नहीं लुंगी” उसे जाने क्यूँ एक स्कर्ट पसंद आई ऑफ़ वाइट लॉन्ग स्कर्ट जिसमे कत्थई रंग के छोटे छोटे फूल थे .. उस पर कत्थई रंग का टॉप ..ये ड्रेस भी पैक हो गया .. हिम्मी के भरोसे आज कनिका ने जाने कितने सालों बाद कुछ अपनी उम्र और अपनी पसंद का खरीदा था .. वो भी खुश थी ..पापा जो शुरू से ही अपने लिए कॉटन का पैजामा कुर्ता देख रहे थे उनको भी एक सेट कुर्ता पैजामा पसंद आ ही गया । पैकिंग और बिलिंग के बाद जब कार में बैठकर कार स्टार्ट करते हुए पापा ने रेडियो ओन किया तो ...गाना बजा “आज फिर जीने की तमन्ना है” ... जिस पर हिमानी और कनिका नई ड्रेस को लेकर अपने सपनों में खो गयी ...गाना खत्म हुआ... कई और गाने ख़त्म हुए और रास्ता भी ..

घर आकर जैसे ही कनिका और हिमानी माँ के पास पहुंचीं और ड्रेस दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ, कनिका के दिल की धड़कन फिर छुट्टी पर चली गयी ।घर में रहने वाली माँ की दोस्त और किरायेदार, मीना आंटी जो उम्र में माँ से दुगनी थी लेकिन दादी की जगह उनको आंटी सुनना ज्यादा अच्छा लगता था ये मोहतरमा तब से इस घर में किराये पर रह रही थी जबसे हिमानी ने अपने घुटनों को छोड़ पैरों पर चलना शुरू किया..हिमानी को जितना कनिका की माँ और कनिका ने न बचपन में नहीं दुलारा उतना मीना आंटी ने दुलार किया ..... ऐसा वो लगभग रोज़ ही अपनी बातों में सुना देतीं । मीना आंटी आकर कनिका और हिमानी के बीच में खड़ी हो गयीं ..हिमानी ख़ुशी में अपनी ड्रेस दिखाती रही ..माँ के कहने पर हिमानी ने ड्रेस पहनकर भी दिखाई ये सोचकर की माँ गुडिया जैसी अपनी बिटिया को देखकर खुश हो जाएँगी उल्टा माँ के चेहरे पर उतर आया 440 बोल्ट का हाई पॉवर गुस्सा हिमानी के नंगे घुटने और स्लीवलेस थोड़े डीप गले की टॉप पर टिक गया ।

हिमानी की ख़ुशी के जोर के ठहाके के साथ माँ का गुस्सा ब्लास्ट कर गया ..और फिर वही हुआ जो पहले भी कई बार होता आया ..चट... 1 चट.... 2 चट .....3 और हिमानी यानी हिम्मी के सपनों की ड्रेस और उससे जुड़े सारे सपने चरमराकर ...चकनाचूर हो गये ... रोती हुई हिम्मी अपनी नई ड्रेस वापस पैक कर रही थी और रोये जा रही थी .. बैकग्राउंड में माँ का चिल्लाना जारी था । तभी मीना आंटी ने बीच में माँ को टोका और कहा “ए ममता ज़रा देखो कनिका क्या लायी है”? अब कनिका का चेहरा लाल मिर्च के जैसा जलने लगा था । माँ खुद ही कनिका के कपड़े देखने लगी थी ..कनिका को जब ड्रेस पहनकर आने को कहा तो उसने डरते डरते ड्रेस पहनी तो याद आया की लॉन्ग स्कर्ट की बेल्ट तो शॉप पर ही छूट गयी .. .. माँ के सामने जब हाथ से पकडे स्कर्ट और टॉप में कनिका आई तो ..माँ के चेहरे पर कोई बदला हुआ भाव न देख कनिका समझ गयी .. और बेल्ट न होने की बात जब माँ को पता चली तो गुस्से में माँ ने एक जड़ दिया कनिका को भी .. चट... और कहा “तुम तो बड़ी हो तुमको भी समझाना होगा क्या कि क्या पहना जाता है क्या नहीं” ?... कनिका की भी पैकिंग शुरू हो गयी और माँ की बातों का बैकग्राउंड भी फिर से चालू ... ..

घर की इन सब बातों से बेखबर या यूँ कहें इस आशंका से परिचित पापा ने जब आँखों में आंसू लिए सर झुकाए कनिका और हिमानी को देखा तो बोले ... “चलें ये कपडे वापस करने”?

किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा, रास्ता कब बीत गया, कब शोपिंग काम्प्लेक्स आया, कब कनिका ने अपनी और हिमानी के लिए माँ की पसंद की ड्रेस ख़रीदी, वापस कार में बैठी और कार चल पड़ी पता ही नहीं चला ...

कनिका सोचने लगी कि बचपन में अगर कभी स्कूल स्कर्ट ज़रा भी छोटी होती थी तो माँ कहती थी “ए कनु ज़रा स्कर्ट नीचे बांध और मोज़े ऊपर चढ़ा ..घोड़ी जैसी टांगें खोले घूमने की ज़रूरत नहीं हैं छोटी स्कर्ट पहनकर .. कल ही बड़ी स्कर्ट लाती हूं तेरे लिए” और अगले दिन घुटने से 5 इंच नीचे वाली स्कर्ट लाकर पहनवातीं फिर स्कूल भेजती ... भीगी पलकों में कार के बाहर फुटपाथ पर सामान समेटते दुकानदारों को देखती हिमानी को देख कनिका सोचने लगी.. “अगर कुछ दिन घर में ही हिम्मी वो स्कर्ट पहन लेती तो क्या हो जाता ?खैर इस जनम में छोटी स्कर्ट पहनने का हिम्मी सपना पूरा होने वाला नहीं है” ...साथ ही हताशा भरी कनिका की सांसों ने हिमानी को उसके मन के भाव समझा दिए ..हिमानी की पलक के मुहाने तक लुढ़क आया आंसू दूसरी नई ड्रेस पर गिर पड़ा जो अब माँ की पसंद की थी।

हिमानी ने आंसू की बूँद पोलीबैग से हटाते हुए उसे अपनी गोद में रख लिया ......

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रचनाकार: छोटी स्कर्ट / कहानी / लक्ष्मी यादव
छोटी स्कर्ट / कहानी / लक्ष्मी यादव
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