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पंडित जी / हास्य व्यंग्य कहानी / गंगा प्रसाद श्रीवास्तव

पंडित जी

( १)

जब किसी की नाक कट जाती है तो उसे ईश्वर दिखाई देता है। यह बात कहाँ तक सच है और कहाँ तक झूठ, यह तो वही जानता है। इसी तरह मैं भी लोगों के बहकाने में आ गया और फारसी का पढ़ना छोड़ संस्कृत के फंदे में फँस गया। अच्छा किया या बुरा, इसकी समझ अभी कहाँ थी १ परन्तु मौलवी साहब के यहां के मजे पंडित जी के यहां न थे। न उतने लड़के, न चुहल, न छेड़छाड़, न दिल्लगी। घंटा पहाड़ हो जाता। एक तो गांव के. पंडित स्वयं गोबर गणेश-न व्यक्तित्व, न प्रभाव। दूसरे मिले दो साथी- रटने में तोता, देखने में उल्लु।

पहले ही दिन पंडित जी ने भलमनसाहत प्रगट कर दी। मुझे देखते ही चेहरा बिगड़ गया। नाक सिकोड़ कर कहने लगे-''सन्तों में मलेच्छों का कहां. प्रवेश! देवभाषा सबके लिये नहीं है।'' ऐसी आवभगत देखकर अपने और संस्कृत के भाग्य को कोसता हुआ मैं बेंच के किनारे बैठ गया। ईश्वर जाने, थोड़ी देर तक पंडित जी अगड़म-बगड्रम क्या बोलते रहे, इसके बाद कुर्सी ही पर बैठे-बैठे सो गए। दोनों लड़के--मेरे सहपाठी, किताब खोले, सिर. झुकाए न जाने ऊँघ रहे थे या किसी शब्द-विशेष को घूर रहे थे 1 तबीयत- बड़ी घबराई। यही सोचता था कि यदि यही हालत कुछ दिनों रही तो काँजीहाउस के पशु की-सी दशा हो जायगी। पहले तो घरवालों के आगे- संस्कृत की निन्दा की, पर जब उन पर कुछ प्रभाव न पड़ा तो मित्रों को फांसने की चिन्ता की। और छ: सात दिन के भीतर अपने दर्जनभर साथियों को मौलवी साहब की कक्षा से फोड़ लाया। मगर पंडित जी की बड़ी शिकायत थी कि अब ऐसा अँधेर हो गया कि सबके सब लड़के संस्कृत पढ़ने लगे। एक दिन जैसे ही हम लोग क्लास में पहुँचे वैसे ही पंडित जी भुनभुना के कहने लगे-''सभी कुत्ते काशी चले जायेंगे तो हांडी कौन चाटेगा ?'' आग' लग गई। जी में आया कि पंडित जी समेत पुस्तकों को दियासलाई लगाओ और चल दो। उधर वे समास पूछने लगे और इधर हम लोगों ने इशारों में'' तय कर लिया कि कोई ठीक उत्तर न दो।

पंडित जी-बहुव्रीहि' किसे कहते हैं?

मोहन-कहते होंगे किसी वस्तु को, पंडित जी! आपको क्या- पडी है?

सोहन-और आप तो जानते होंगे। फिर पूछ कर क्याकरेंगे?

पंडित जी-मदन तुम बोलो।

मदन-कौन, मैं! आपके सामने भला मैं' क्यों बोलूं?

पंडित जी-बताओ बहुव्रीहि किसे कहते हैं?

प्रद्युम्न-क्या आप इतना भी नहीं जानते समझता था कि आप जानते होंगे।

पंडित जी--तो न बताओगे तुम लोग क्या?

मैं-पंडित जी, किताब में क्यों नहीं देख लेते?

सोहन-बहुव्रीहि के बिना, क्या आपका काम नहीं चल सकता?

पंडित जी – (बिगड़ कर) अभी तुम सबको धुन के रख दंगा।

प्रद्युम्न- इसमें क्या सन्देह है! यह तो आपके यहाँ सदा से होता आया है।

मैं- (धीरे से) केवल इतना अन्तर है कि अब तक रूई धुनते थे, अब कुछ और धुनेंगे।

मोहन-- ( धीरे से और क्या अपना, सिर धुनेंगे।

सोहन-हैं तो कुछ इसी धुन में।

पंडित जी-न मानोगे तुम लोग! बकबक लगाये ही रहोगे।

मदन-यह लीजिए। आप ही पूछते हैं और आप ही कहते हैं कि? बकबक लगा रहे हो। बोलो तो आफत, न बोलो तो आफत।

मोहन-हाँ जी, इससे तो यही अच्छा है कि कोई बोले ही न।

पंडित जी-तो तुम लोगों में से किसी को नहीं आता?

चार-पाँच एक साथ- क्या चीज?

पंडित जी-बहुव्रीहि बहुव्रीहि!

प्रद्युम्न - बहु बरी?

पंडित जी-हाँ, बहुव्रीहि।

प्रद्युम्न -इसमें क्या कठिन है! बहू बरी हो गई होगी। या बड़ी बहू - बडे लड़के की बीबी।

मैं-कहीं ऐसा तो नहीं है कि पंडित जी बड़ियों की बात पूछ रहे हैं-पापड़ बरी.। '

इतने में घंटा बजा और पंडित जी बोले-जाओ, जाओ, सिर न- खाओ, तुम्हारा समय हो गया है।

यों तो पंडित जी पढ़ाते-पढ़ाते हर घंटे ही पर एक नींद खींच लिया करते थे, पर आधे घंटे की छ्रुट्टी में विशेषतया बेंच पर लेट कर सोते थे। एक दिन ऐसे ही पंडित जी निद्रा की गोद में पड़े थे कि मैं घूमता-घामता कक्षा में चला आया। देखा कि पंडित जी चारों खाने चित पड़े हैं। मेज पर पगड़ी औंधी रक्खी थी। वहीं कलमदान भी पड़ा था। मैंने पगड़ी के भीतर का बीच वाला फेंटा हटाया और उस जगह नीली व लाल रोशनाई की दोनों दबाते रख कर उन्हें पगड़ी के फेंटे से ढक दिया। बाहर आकर साथियों को जो बताया तो मोहन ने कहा कि ठहरो, मेरी भी एक बात मानो; दो-एक मेंढक पकड़ लाओ तो काम बने।

दो के बदले चार मेंढक आ गए। जूते उतार कर हम और मोहन फिर पंडित जी के कक्ष में घुसे। पंडित जी अभी तक खुर्राटे भर रहे थे। उनकी अचकन की दोनों जेबें बेंच के इधर-उधर लटक रही थीं। हमने उनकी जेबों में दो-दो मेंढक रख दिए। फिर मेंढकों से भरी हुई जेबों को उठा कर पंडित जी की तोंद पर रख के भाग. गए।

दो-तीन बार जो तोंद पर मेंढक उछले तो पंडित जी की आँख खुल गई। अपने पेट पर यह बेतुकी उछल-कूद देख कर मारे डर के पंडित जी चिल्ला उठे, और ऐसे घबड़ाए कि भद से बेंच के नीचे लुढ़क पडे। जल्दी से उठ कर अचकन उतार कर दूर फेंकी। फिर जब जरा होश ठिकाने हुआ तो अचकन को उठाकर झाड़ने लगे। उसमें से मेंढकों को जो बारी-बारी निकलते देखा तो एकदम चकित रह गए। थोड़ी देर के बाद अचकन को फिर झाड़ा और पहन कर उठ खड़े हुए। अब पगड़ी उठा कर सिर पर औंधाई, पर ठीक न बैठी। इसलिए पगड़ी को फिर सिर से उठाया। वैसे ही दवातें झल्ल-झल्ल करती हुईं उसमें से निकली और खोपड़ी पर तड़ाक से लग कर अलग जा गिरीं। पगड़ी, खोपड़ी, चेहरा, अचकन, धोती रँगरँगा गई। मारे क्रोध के इसी रूप में हैडमास्टर के पास दौड़े। जैसे ही अपने कक्ष से बाहर हुए, लड़के इनके पीछे-पीछे दौड़ पड़े। हँसी से सब के पेट में बल पड़ रहे थे। यहाँ तक कि चपरासी भी इनकी सूरत देख कर हँसते-हँसते लोट गया। ऑफिस में हैड- मास्टर नहीं मिले। अब पंडित जी उनकी खोज में एक कक्षा से दूसरी और दूसरी से तीसरी में फिरने लगे। सैकेण्ड मास्टर बड़े हास्यप्रिय थे। इन्हें देखते ही खिलखिला कर हँसे, फिर पंडित जी को बुला कर पूछा।

मास्टर-होली बधाई, पंडित जी! कहिए यह स्वांग बना कर कहां चले?

पंडित जी-हैडमास्टर के पास जा रहे हैं। हैं कहाँ पर।

मास्टर-इस रूप में?

पंडित जी-यही तो उन्हें दिखाना चाहते हैं।

मास्टर-क्या कोई सगाई-सुनूई का शगुन हुआ है बात क्या है ? (हास्य का और फव्वारा छूटा)

पंडित जी-आज हम सब दुष्ट लड़कों को निकलवा के छोडेंगे।

मास्टर-क्या किसी लड़के ने रँग दिया? कौन था, कौन?

पंडित जी-यही जो ज्ञात होता तो फिर हमीं न ठीक कर देते

मास्टर-तो बताइए। फिर शिकायत किसकी करने चले? जरा विराजिए तो। आप तो घोड़े पर सवार मालूम होते हैं।

पंडित जी-हमारी पगड़ी में किसी ने दवात रख दी।

मास्टर-वाह। वाह! और आप कहाँ थे?

पंडित जी-हम सो रहे थे।

मास्टर-कहां? स्कूल में?

पंडित जी- हाँ आधे घंटे की छुट्टी में।

मास्टर- अरे! यह तो हैडमास्टर से कहिएगा भी नहीं। नहीं तो कुशल नहीं। वे पूछेंगे कि स्कूल में आप पढ़ाने आते हैं कि सोने आते हैं!

पंडित जी यह सुन कर तनिक हिचकिचाए और कुछ धीमे स्वर में बोले-छुट्टी में हम जो चाहे करें। हैडमास्टर का इसमें क्या बिगड़ता हैं?

मास्टर-अगर आप ऐसा कहेंगे तो लड़के भी कहेंगे कि हम भी छुट्टी में जो चाहें सो करें।

पंडित जी घबरा कर बोले-तब क्या किया जाए?

मास्टर--करना क्या है, यह तो स्पष्ट है कि जितना ही लड़कों के पीछे पड़े रहोगे उतना ही वे आपको तंग करेंगे, क्योंकि लड़के तो लड़के ही हैं। और आप को उस लड़के का नाम भी ज्ञात नहीं, फिर दण्ड किसे दिलवाएंगे? दूसरे, आपकी यह बात भी खुल जायगी कि आप स्कूल में सोते हैं। अपने ऊपर आँच आने का डर है। इसलिए चुपचाप जाइए घर, हो सके तो कपड़े बदल कर आ जाइएगा।

पंडित जी चुपचाप धर चले गये।

2

संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम थी। किसी कक्षा में दो, किसी में तीन लड़के थे। हमारी कक्षा में छ: थे। पर ड्राइंग के खुलते ही दो ने संस्कृत छोड़ दी। एक तो संस्कृत से यों ही लोग घबड़ाते थे, दूसरे पंडित जी ने इसको और भी हौवा बना रक्खा था। ' संस्कृत के विद्यार्थी प्रायः असंतुष्ट रहते थे।

इन्हीं दिनों इन्सपेक्टर आने वाले थे। पंडित जी ने इसके लिए बड़ी- बड़ी तैयारियाँ कीं। बहुत सी स्तुतियाँ मस्तिष्क में तह करके बैठा लीं? ताकि समय पर काम आएँ। मन ही मन योजना तैयार की कि इस तरह प्रश्नों पर प्रश्न पूछते जाएँगे; लड़कों को दम मारने का भी अवकाश न देंगे; किसी ने उत्तर देने में विलम्ब किया तो धुन के रख देंगे?? ताकि साहब समझ जायें कि पढ़ाई और अनुशासन दोनों में कितने कट्टर हैं।

इन्सपेक्टर आ गए। दूसरे दिन निरीक्षण था। मगर पंडित जी की खोपड़ी और दाढ़ी मुंडाने का वह दिन नहीं था, इसलिए इन दोनों पर ध्यान ही नहीं गया। माथे पर बड़ा चौड़ा टीका लगाया। एक मैली फटी पुरानी 'धोती निकाली और उस पर अपने पितामह के समय की पुरानी मिरजई पहन ली जिसकी कुहनियां मारे डर के पहले ही से अदृश्य हो गई थीं। पंडित जी ने यह वेश इसलिए धारण किया कि इन्सपेक्टर साहब समझें कि इनकी दशा बड़ी शोचनीय है और बेचारे बडे कष्ट में हैं। यह जान कर उनको दया अवश्य आएगी और फिर हमारा वेतन बढ़वा देंगे। इसके बाद भंग के दो गोले चढ़ाए ताकि ''जीव तनिक करेर हो जाय।'' रास्ते भर शिव-शिव करते स्कूल पहुँचे। '

पहला घंटा जैसे-तैसे कटा। दूसरे घंटे में इन्सपेक्टर साहब बगल वाले -कक्ष में आ गए। पंडित जी का दम घुटने लगा। हाथ-पैर फूल गए। कभी सोचते थे कि कैसी गलती हुई जो आज स्कूल आए। घर ही से अर्जी भेज देते। मन में यह भी आया कि अब भी चुपचाप खिसक जायें, बाद को जो होगा वह देखा जायेगा। इस वक्त तो जान बचे। पंडित जी इसी सोच- विचार में थे कि कक्ष का द्वार खुला। बाहर किसी के हाथ में साहब की टोपी दिखाई दी। पंडित जी को मारे घबड़ाहट के कुछ न सूझा। झट से बक्स में से लुटिया निकाली, कान पर जनेऊ चढ़ाते हुए निकल गए। हेडमास्टर और इन्सपेक्टर ने जो देखा तो वे अगले कक्ष में चले गये। एक घंटा भर में पंडित जी लौटे और हाथ में कुछ फूल भी लेते आए। उन्होंने संभवत: समझा कि अब बला टल गई। पर बकरे की माँ कब तक खैर मनाये। आखिरी घंटे में इन्सपेक्टर आ ही घुसे! पंडित जी तुरन्त कुर्सी छोड़ कर' अलग खड़े हो गए और दोनों हाथ उठाकर चिल्लाने लगे-जय ओं! जय हो! जय हो!

इसके पश्चात् झट से फूलों को लेकर, अहा हा! बलिहारी महाराज, बलिहारी'', कहते हुए उनके सिर पर उछाल दिया; फिर अपने स्तुति-संग्रह में से किसी समयोचित स्तुति की सोच में पड़ गये। कोई याद ही नहीं आई।

घबड़ाहट में मुँह से पार्वती की स्तुति निकल पड़ी। धुन में रुके नहीं, कहते- चले गए। भंग का नशा भी अब जोरों पर था, इसलिए आवाज में कुछ, लड़खड़ाहट और बेतुकी आगई थी। सिर हिला-हिलाकर गाने लगे-

 

जय जय जय गिरिराज किशोरी।

जय महेश-मुख-चन्द्र चकोरी।।

जय गजबदन षडानन माता।

जगत जननि दामिनी द्युति गाता।।

दैवि पूजि पद-कमल तुम्हारे।

सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।

मोर मनोरथ, हाँ रामा!

मोर मनोरथ जानहु नीके।

बसहु सदा उर पुर सब हीके।।

 

अभी स्तुति समाप्त भी न होने पाई थी कि हेडमास्टर और इन्सपेक्टर कक्ष से बाहर चले गये थे। पंडित जी बड़े प्रसन्न थे कि साहब मेरे काम से- इतने सन्तुष्ट हुए कि उन्हें लड़कों से कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई।.

3

इन्सपेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा-मालूम हुआ है कि छ: बरस. से संस्कृत का कोई लड़का इस स्कूल से एन्ट्रेंस पास नहीं हुआ। कक्षाओं में' भी संस्कृत में कुछ प्रगति नहीं है, विद्यार्थी भी बहुत कम हैं। पंडित हैं कि एक' तमाशा हैं। इन्हें शीघ्रातिशीघ्र अध्यापन-कार्य से मुक्त किया जाये और इनकी जगह किसी योग्य व्यक्ति को रक्खा जाये जो विद्यार्थियों में संस्कृत के. प्रति प्रेम और उत्साह उत्पन्न कर सके।

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