वैद्यजी की पीड़ा / व्‍यंग्‍य / शशिकांत सिंह

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

सनीचर जी जो हैं काफी मॉड हो गये हैं। उनकी सरपंची चल निकली है। उधर बैद्यजी अब बूढ़े हो गये हैं।उन्‍हें परामर्शमंडल में डाल दिया गया है। रूप्‍पन भैया तो नगरवासी हो ही गये हैं। बदरी पहलवान भी गांव में नहीं रहते सो वैद्य जी अब सनीचरा के भरोसे ही रहते हैं। ऐसे में एक दिन वैद्य जी और सनीचरा में ठन गई। वैद्य जी ने श्राप देने की मुद्रा बनाई और उवाचे-

-’’ तुझे कौन जानता था ? कल तक तू मेरे चौखट पर भंग पीसा करता था। आज तू बड़ा आदमी बन गया तो मेरा निरादर करता है। यह नाम, यह यश, एक दिन मिट जायेगा। बेटा, मैं भी कभी अखबारों की सुर्खियां बना करता था। मेरे आगे-पीछे भी मीडिया वाले घूमा करते थे। आज जो यह तुम अपने नाम के नारे लगवा रहे हो यह काम हम बहुत पहले हम कर चुके हैं। एक दिन तू भी मेरी जगह परामर्श मंडल में ही होगा। तू तब पछतायेगा।’’

-’’ महोदय, आपकी बातों का जवाब तो हम बाद में देंगे पहले शिवपालगंज का विकास तो कर लें। आपने तो कभी शिवपालगंज की सुध ली नहीं। गांव के लोगों को एक दूसरे से लड़ाते रह गये। एक कॉलेज है गांव का, उसको आपने अखाड़ा बना दिया था। हमने सारे मास्‍टरों को हटाकर, वहां एक विशाल मुर्गीबाड़ा खोला है। उससे गांव के लोगों को रोजगार मिलेगा। रोजगार होगा। जेब में दो पैसे आयेंगे तो लोग नगरों में जाकर पढ़ लेंगे। मास्‍टरों की लड़ाई देखने से अधिक आनंद तो मुगोंर् की लड़ाई देखने में है।’’

-’’ अरे अधम, तू ने कॉलेज को मिटा दिया। मेरा बहुत पुराना सपना था कि जब मैं कभी सरपंच बनूंगा तो इसी कॉलेज में भृगुपुराण और रावणपुराण की पढ़ाई होगी। बच्‍चे ज्‍यातिष में प्राकंड विद्वान बनेंगे और अपना भविष्‍य जान सकेंगे। अपना भविष्‍य जान लेंगे तो उसे संवारने में काफी सुविधा होगी। तूने कॉलेज को ही हटा दिया। वहां खोला भी क्‍या तो मुर्गीबाड़ा। तू नरक में जायेगा।’’

-’’ ये गंजहापनी कहीं और झाड़ना बापू। हमें अच्‍छी तरह पता है कि आपको कॉलेज की नहीं अपने सरपंची की चिंता सता रही है। यह सपना तो अब पूरा होने से रहा। हम कभी हारेंगे ही नहीं। न दूसरे को आगे आने देंगे। बापू तुमने जो गलती कि मुझे आगे लाकर, मैं वह गलती नहीं करने वाला। जमे रहो। परामर्श लेने शाम में आऊंगा।’’

सनीचरा गये और लंगड़ सीन में घुसे। वैद्यजी भगवान शंकर की फोटो के आगे खड़े उनको कोस रहे थे। लंगड़ ने दूर से पंवलग्‍गी की। वैद्यजी आकर बैठे -

-’’ महाराज क्‍या हुआ ? मुख पर तेज नही ंचमक रहा आज।’’

-’’ तेज तो चमके जमाना हो गया। तेज तो तब चमके जब सत्‍य या सत्‍ता की ताकत हो। यहां न सत्‍य न सत्‍ता।’’

-’’ बापू मैं कहूंगा तो आपको बुरा लगेगा लेकिन आपने सनीचरा को सरपंच बनाकर ही गलती की थी। अपने बेटे-भतीजे को बनाते तो यूं परामर्श मंडल में नहीं पड़े होते।’’

-’’हां लंगड़ बात तो तुम्‍हारी ठीक ही है। भगवान किसी को ऐसे दिन न दिखाये। कहां तो ये ससुर मेरे चौखट पर लंगोट डाटे पड़े रहते थे। हमारी भंग पीसा करते थे और कहां आज गांव में सनीचरा-सनीचरा के नारे लग रहे हैं। समय का फेर है और बताओ नकल मिली ?’’

-’’ नकल का तो एइसा है बापू कि मिल ही जायेगी। और बताओ परामर्श मंडल में अकेले ही हो कि और कोई है आपके साथ ?’’

-’पुरुष बलि नहीं होत है समय होत बलवान।’देख लेना लंगड़ यही गांव वाले इनकी लंगोट ढ़ीली करेंगे। ससुरे ने मेरे अलावा प्रिंसपल साहब और भिखमखेड़वी को भी परामर्शी बना रखा है। एकबार.....................।’’

-’’ बुरा मत मानना महाराज पर आपने भी हर उल्‍टे-सीधे काम में सनीचरा का साथ दिया था। यही सनीचरा जब पूरा गांव में गुंडगर्दी कर रहा था तब तो आपने विराध नहीं किया था। उस समय तो आपको मजा आ रहा था कि आपके सनीचरा प्रख्‍यात हो रहे हैं। दूसरे गांव के लोग आकर आपको समझाते थे कि सनीचरा ने लोगों का जीना मुश्‍किल कर रखा है। आप मुंछों के नीचे मुस्‍कराते रहते थे। आपको आनंद आता था कि आपका भंग पीसने वाला आज स्‍टार हो गया। अब बापू रोने से क्‍या होगा ? पहले दिन ही कमान कसी होती तो आज सरपंच आप होते और सनीचरा होता जेल में।’’

-’’ सच पूछो लंगड़ तो कमान मेरे हाथ कभी आई ही नहीं। मैं तो लोगों को बनाता ही रह गया। मेरे कंधों पर चढ़कर कितने आगे चले गये। उनमें से एक यह अधम भी है। जनता का नशा जिस दिन टूटा यह भी मेरे साथ ही होगा।’’

लंगड़ उठ गये।

-’’ चलूं ज़रा, बड़ा बाबू के आफिस जाना है। आज बुलाया है। देखते हैं। आदमी बदल गये व्‍यवस्‍था थोड़े ही बदल गई है। राम-राम बापू।

वैद्य जी उठकार डमरू बजाने लगे और जोर-जोर से भगवान शंकर की स्‍तुति कर रहे थे। उनसे अवतार लेने की सिफारिश कर रहे थे।

 

शशिकांत सिंह ’शशि’

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्‍ट्र, 431736

मोबाइल-7387311701

इमेल- skantsingh28@gmail.com

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "वैद्यजी की पीड़ा / व्‍यंग्‍य / शशिकांत सिंह"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.