सोमवार, 4 जुलाई 2016

पुस्तक समीक्षा : हास्य-व्यंग्य संकलन “बेवकूफ़ी का सौंदर्य”

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हास्य-व्यंग्य संकलन “बेवकूफ़ी का सौंदर्य” - हिंदी सोशल मीडिया में दशकों से हायपर-एक्टिव और जाने-पहचाने – अनूप शुक्ल “फ़ुरसतिया” का कायदे यह पहला व्यंग्य संग्रह है जो प्रिंट मीडिया में आया है. इससे पहले उनके व्यंग्य संग्रह ईबुक और प्रिंट-ऑन-डिमांड के रूप में ऑनलाइन जगत में प्रकाशित हो चुके हैं.

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इस किताब की भूमिका जाने-माने व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने लिखी है. उनकी भूमिका से कुछ अंश –

“व्यंग्य पर जिन लोगों की गहरी नजर रही है, जिन लोगों का गहरा अध्ययन है उनमें से एक हैं अनूप शुक्ल. ... वे जिंदगी को गहराई से जीने वाले आसपास और दूर-दराज को बहुत महीन तरीके से फुरसत से आब्जर्व करने वाले, परतों को खोलने वाले लेखक हैं. इसलिए उनके लिखे में जिंदगी हर रूप में दिखाई पड़ती है. मेरे खयाल में वह हिंदी के फिलहाल इकलौते वृत्तांतकार हैं. ....मसला यह है कि व्यंग्य को तकनीक ने बदल दिया है... तकनीक के रास्ते व्यंग्य में फुर जोरदारी से आने वाले ऐसे ही एक लेखक हैं अनूप शुक्ल. पहले ब्लॉग के जरिए आते थे, अब फ़ेसबुक के जरिए आते हैं और ऐसे आते हैं कि मुख्यधारा के अख़बार इनके लिखे को फ़ेसबुक-ब्लॉग से उठाकर छापते हैं.”

“बेवकूफ़ी का सौंदर्य” में कोई 30 से अधिक हास्य-व्यंग्य संकलित हैं जिसमें रोजमर्रा-जीवन के विविध आयामों को लक्षित कर व्यंग्य रचे गए हैं. अनूप शुक्ल के व्यंग्य में वन-लाइनर व्यंग्यों की भरमार है. फ़ेसबुक फ़नी स्टेटस की तरह. परंतु सतही नहीं, बल्कि धीर-गंभीर, गहरे तक मार करने वाले. वन-टू-लाइनर व्यंग्य के बारे में आलोक पुराणिक कहते हैं – कबीरदास के दोहे वस्तुतः टू लाइनर ही हैं. इस कथन से आप वन-लाइनर व्यंग्य की क्षमता का अंदाजा तो लगा ही सकते हैं, क्योंकि कबीर आज भी पठनीय हैं और प्रासंगिक हैं.

शीर्षक व्यंग्य “बेवकूफी का सौंदर्य” की पहली पंक्ति में ही वन लाइनर है –

“सोचते हैं कोई बहुत बड़ी बेवकूफ़ी की बात कह डालें लेकिन फिर आलस्य हावी हो जाता है. इस चक्कर में दूसरे बाजी मार ले जाते हैं.”

बोरियत जो न कराए शीर्षक व्यंग्य का एक वन लाइनर –

“दफ़्तर में हमारे एक सहकर्मी हैं. एक ही दफ़्तर में होने के बावजूद वे हमारे मित्र हैं.”

अनूप शुक्ल के व्यंग्य में अकसर अलग, आश्चर्यकारी नजरिया यत्र-तत्र दिख जाता है. “गर्मी का सौन्दर्य वर्णन” में एक वर्णन यूँ है –

“बादलों को इंद्र ने बरसने का आदेश बीते माह ही दे दिया है लेकिन वे हड़ताल पर हैं और कह रहे हैं कि पहले हमें छटे वेतन आयोग के अनुसार वेतन और भत्ते दिये जाएं तभी हम पानी की खेप आगे ले जाएंगे.”

125 पृष्ठों की किताब का गेटअप आकर्षक है, काग़ज और छपाई उम्दा है. फ़ॉन्ट हालाकि बड़े हैं, मगर लाइन स्पेसिंग थोड़ी कम है जिससे स्पीड-रीडिंग में समस्या आ सकती है. कुल मिलाकर संकलन पठनीय व संग्रहणीय है. किताब का मूल्य बेहद वाजिब है – 150 रुपए. जिसे रुझान प्रकाशन की वेबसाइट –

http://www.rujhaanpublications.com

से ऑनलाइन मंगाया जा सकता है.

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- रवि रतलामी

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