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मानसून का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव / शशांक मिश्र भारती

 

मानसून शब्द के बारे में विचार करने पर स्पष्ट होता है कि यह शब्द मूलतः अरबी भाषा का शब्द ह जिसका अर्थ होता है मौसम। अर्थात् अरबवासी अरब सागर के ऊपर से चलने वाली हवाओं के लिए इस शब्द का प्रयोग करते थे। बाद में इसी शब्द का प्रयोग हिन्द महासागर से उठने वाली हवाओं के लिए किया जाने लगा। ये मानसूनी हवायें हवायें छः महीने जल से स्थल की ओर और छःमहीने स्थल से जल की ओर चला करती हैं। मौसम के अनुसार चलने के कारण इनको मौसमी पवन भी कहा जाता है।

चूंकि भारतवर्ष की नब्बे प्रतिशत वर्षा इन्हीं हवाओं से होती है। इसलिए यहां की अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव यहां पर होने वाली कृषि के माध्यम से ही देखा जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा भाग खेती पर निर्भर है। देश की 64 प्रतिशत जनसंख्या तो मूलतः कृषि पर ही आश्रित है। अपितु अधिकांश तो कृषि पदार्थों का व्यापार करके ही अपनी आजीविका चलाते हैं। इसलिए भारतीय कृषि देश के निवासियों के लिए जीवननिर्वाह का महत्वपूर्ण साधन है। यही नहीं देश की राष्ट्रीय आय में सर्वाधिक 26 प्रतिशत योगदान भी यहां की कृषि का ही है। देश के सिंचाई के साधनों की उपलब्धता के बाद भी यहां की कृषि का अधिकांश भाग यहां होने वाली वर्षा की मात्रा व समय पर निर्भर है। जिसके कारण यहां की कृषि की सफलता का बहुत कुछ श्रेय मानसूनी वर्षा को जाता है। वर्षा की मात्रा तथा होने के समय का यहां की कृषि पर प्रभाव स्पष्टतः देखा जाता है। देश में एक ओर तो बाढ़ें आती हैं,बादल फटते हैं, भू स्खलन होता है, उपजाऊ मिट्टी बहकर चली जाती है,फसलें नष्ट हो जाती हैं अर्थात् समस्त जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। वहीं दूसरी ओर कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां ग्रीष्म ऋतु में शुद्ध पीने को जल तक उपलब्ध नहीं हैं। पेयजल के लिए भीषण मारा-मारी रहती है। फसलें, नही, तालाब एवं कुएं सूख जाते हैं। इन सभी का प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

भारतीय कृषि का यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होने के कारण मानसून यहां की कृषि व अर्थव्यवस्था दोनों को समानरूप से प्रभावित करता है। भारतीय खाद्यान्नों की शतप्रतिशत पूर्ति यहां होने वाली कृषि से ही होती है, जो पूर्णतया खेती की सफलता पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त चीनी, वस़्त्र, पटसन, जूट, कपास, वनस्पति तथा चाय आदि उद्योग भी भारतीय कृषि पर ही निर्भर र्हैं तथा देश के 22 करोड़ पशुओं को चारा भी कृषि सम्पदा द्वारा ही प्राप्त होता है। कृषि के न होने या अत्याल्पावस्था में हो पाने की स्थिति में पशुओं से प्राप्त होने वाली आय तथा सुविधाओं में कमी आ जाती है। इस तरह यहां की कृषि का उद्योगों तथा पशुओं की जीविका से गहरा सम्बन्ध होने तथा देश की आय का एक बड़ा भाग कृषि द्वारा प्राप्त होने से भारतीय अर्थव्यवस्था मानसून से प्रभावित होती है। फलतः मानसून के प्रतिकूल होने पर देश में खाद्यान्नों तथा कृषि से सम्बद्ध विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चा माल विदेशों से मंगाना पड़ता है। जिसके लिए काफी मात्रा में विदेशी का व्यय होता है। यदि मौसम अनुकूल रहता है तो इन्हीं उत्पादों का विदेशों को निर्यात कर बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी प्राप्त हो जाती है और जिससे औद्योगिक विकास को बल मिलता है।

किसी भी देश में पायी जाने वाली जलवायु का वहां की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वहां की कृषि उपज जलवायु की दशाओं पर निर्भर करती है। यदि जलवायु अनुकूल होती है तो वहां फसलें बहुतायत में उगायी जाती हैं खाद्यान्न, वाणिज्यक फसलें अधिकाधिक उत्पन्न होती हैं। प्रतिकूलता की स्थिति में इन्हीं सबका संकट उपस्थिति हो जाता है। चूंकि भारतवर्ष की स्थिति भूमध्यरेखा से उत्तर में कर्करेखा के दोनों ओर है। इसलिए यहां उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी जलवायु पायी जाती है। इसके मानसूनी प्रदेशों में आने के कारण 90 प्रतिशत वर्षा मानसूनी हवाओं द्वारा होती है। ये हवायें हिन्द महासागर से उठती हैंऔर देश के अन्दर अरब सागर व बंगाल की खाड़ी के मार्गों से होते हुए जून से सितम्बर तक वर्षा करती हैं। इनके द्वारा की गई वर्षा की मात्रा देश के आन्तरिक भांगों में कम होती जाती है। कुछ क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा 5 सेमी तक ही रह जाती है।

कभी-कभी सात से बारह सालों के अन्तराल पर मानसूनी हवायें कमजोर पड़ जाया करती हैं। मानसूनी हवायें कमजोर क्यों पड़ जाया करती हैं । इसके कारणों पर गम्भीर विवेचन के बाद वैज्ञानिकों ने एलनीनों प्रभाव नाम दिया है। जिसके कारण हिन्दमहासागर पर हवा का दवाब कम हो जाता है और मानसूनी हवायें कमजोर पड़ जाती हैं। फलतः भारतवर्ष में वर्षा की कमी का सामना करना पड़ता है। देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। देश में कहीं-कहीं तो सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

निष्कर्षतः भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा भाग कृषि पर निर्भर होने से मानसून का यहां की अर्थव्यवस्था पर स्पष्टतः प्रभाव परिलक्षित होता है। जिसके विकास के आयामों के स्पर्श के लिए मानसूनी हवाओं की दिशा व दशा को स्मरण रख उसके प्रभावों का पूर्वानुमान करना अत्यावश्यक है। जिससे न केवल वर्षा की मात्रा व समय का ज्ञान होगा, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी न्यूनतम प्रभाव पड़ सकेगा।

03.07.2016

शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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