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ग्रीटिंग कार्ड / कहानी / हरीश कुमार

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वैसे कहानी का विषय आप सब का जाना पहचाना है । एक मोटे शानदार प्रिंट कागज को बीच में से तह किया हुआ सन्देश वाहक ।

मुझे याद है कि बचपन में अपनी सबसे खूबसूरत स्कूल टीचर को उसके जन्मदिन पर या नए साल पर यह ग्रीटिंग कार्ड बड़े मौलिक रूप में मैं दिया करता । पहले या दूसरी कक्षा का वह मासूम प्रेम । कितना मजाकिया लगता है जब आज मैं इसे याद करता हूँ ।

हर साल घर वाले नव वर्ष के आगमन से एक महीना पहले घर में मूंगफली खाते हुए एक लिस्ट बनाया करते जिसमें उन खास रिश्तेदारों और दोस्तों का नाम लिखा जाता जिन्हें ग्रीटिंग कार्ड भेजने होते ।

पिता जी इकट्‌ठे ही दर्जन या इससे कुछ ऊपर एक जैसे ग्रीटिंग कार्ड ले आते । फिर लिस्ट के हिसाब से सबका नाम और पता लिखा जाता और यह उम्मीद भी की जाती कि इस सन्देश के बदले जवाब भी खूब आएंगे । मैं अक्सर अपनी मासूमियत के कारण या बचपने के कारण उन एक जैसे कार्डों से कुछ इतर करना चाहता था. मेरे लिए तो सबसे खास दोस्त मेरी वो अंग्रेजी की टीचर थी । पद्‌मिनी कोल्हापुरी जैसी हंसती तो उसकी मुस्कुराहट को जैसे मैं अपने लिए ही घेर लेना चाहता । शायद मेरी माँ की शक्ल भी दोनों शक्लों को मिला जुला रूप थी ।

वो मुझे अक्सर प्यार से बुलाया करती । खैर धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ और एक छोटे स्कूल से निकल कर शहर के बड़े स्कूल में आ गया । कुछ दिन बड़ा अकेला पन महसूस हुआ । ज्यादा कुछ बस में नहीं था । अभी तो कई बार अपनी कमीज का सबसे ऊपरी बटन भी लगाना न सीख पाया था । वो दौर कब गुजर गया पता ही न

चला । बस अपनी टीचर की शक्ल याद रही । जवान होते होते कई चेहरे दिमाग और दिल को चौंकते रहे पर पद्‌मिनी कोल्हापुरी वाली इमेज ने दिमाग में एक चौखटा बना दिया जिसमें और कोई इतने गहरे रूप में फिट न हो सके ।

जवान होते-होते कई चेहरे दिमाग और दिल को चौंकते रहे पर पद्‌मिनी कोल्हापुरी वाली इमेज ने दिमाग में एक चौखटा बना दिया जिसमें और कोई इतने गहरे रूप में फिट न हो सके । मुझे याद है कि बचपन में एक बार पिता जी एक प्यारे से पिल्ले को घर ले आये । बड़ा ही स्याना पिल्ला था । उसे पेशाब आ रहा होता तो अपने आप नाली की और दौड़ जाता -स्कूल जाने से पहले और स्कूल से आने के बाद उसे देखना छूना और उसके गददी बालों वाले शरीर और माथे को सहलाना मेरी सबसे बड़ी आदत बन चुके थे । पर एक महीने बाद ही मैं रोज की तरह स्कूल से लौटा और उसे घर के बागीचे में ढूंढा । शेरू शेरू कह कर उसे कई बार पुकारा । पर कहीं से उसके मेरी तरफ भागते हुए आने की आहट या दृश्य नहीं बना । शायद वो बगीचे के पिछले बड़े गेट के नीचे से बाहर निकल गया हो । मैं भरी हुयी आँखों में उसकी मासूम सी आकृति लिए उसे शाम होने तक खोजता रहा । माँ ने प्यार से बहुत समझाने की कोशिश की पर न मैंने चाय पी और न ही रात का खाना खाया । पिता जी काम से वापिस आये और मुझे यूँ सुस्त पड़ा देखकर मेरे सर पर हाथ फेरा । मुझे बुखार था ।

'' तू घबरा मत बेटा मैं अभी आस पास के मुहल्ले में देखकर आता हूँ कई बार कोई बच्चा ही जान बूझ कर उठा ले जाता है । पर तू फिक्र न कर कुत्तों को उस घर की बड़ी पहचान होती है जहाँ उसे तेरे जैसा प्यार करने वाला बच्चा मिले । सुबह तक तो लौट ही आएगा । ''

इतना कहकर पिता जी टार्च लेकर उसे ढूंढने निकल गए ।

खैर वो न मिला और न ही लौटा । उसके जैसा एक कुत्ता घर में लाया गया । घर वालों को डर था कि कही मैं ज्यादा बीमार न पड़ जाऊं । पर एक जैसा दिखने में और एक जैसा होने में बहुत फर्क होता है ।

आप सोच रहे होंगे कि कहानी में ग्रीटिंग कार्ड की जगह ये पिल्ले या कुत्ते का प्रसंग कहां से आ गया । पर जैसा कि मैंने कहा कुछ ग्रीटिंग कार्ड हम दूसरों को देते हैं तो कुदरत भी हमें कुछ अच्छे सन्देश प्यार मासूमियत और स्पर्श के रूप में भेजती है । पर सब का एक ही केंद्र होता है प्यार का सन्देश । बस हम उसे कैद करने का प्रयास करके खो देते हैं ।

खैर ये बात जितनी आसान लगती है उतनी होती नहीं । तो जवानी की देहलीज की और बढ़ते हुए हर नए साल पर ग्रीटिंग कार्ड का चलन पिछली स्मृतियों से जोड़ने और नए अनुभवों और अहसासों के चलते उन्हें भूलते चले जाने का माध्यम बनते रहे । ये दौर अभी जुकरबर्ग और मोबाइल सन्देश के क्षण भंगुर अहसासों के घेरे में नहीं आया था । उन दिनों अनुभव और अहसासों की दुनिया बड़ी जरखेज हुआ करती थी । उन दिनों प्रेम बड़ा निश्छल अहसास था । बेवफाई और वफा के सन्दर्भ सामाजिक मर्यादाओं में दबे घुटे रहते ।

विशेषकर ये सब बातें मध्यवर्गीय परिवारों के परिवेश से जुड़ी हुयी थी ।

बहरहाल बात निकली है तो दूर तलक जायेगी । मैं आपको लम्बी औपन्यासिक यात्रा पर नहीं ले जा रहा । कहानी मुझे फिर याद दिलाती है कि बात इंग्लिश टीचर और पद्‌मिनी कोल्हापुरी की मुस्कान में रंगे ग्रीटिंग कार्ड की खुशबु लिए चल रही है ।

वो शायद कालेज के दिनों का पहला प्रेम रहा होगा शायद नहीं भी । पास से गुजरते हुए अपनी ही सहपाठिका का मुस्करा भर देना प्रेम है या नहीं ये बड़ा अजीब प्रश्न है और पहेली भी । ऐसी पहेली के साथ जीना भी एक अजीब सी जिज्ञासा में उलझाये हुए आपके मन को सर्दियों की धूप जैसा आराम देता है । मुझे याद है कालेज का पहला दिन । मैं सुबह-सुबह छत पर बने कमरे में लगे शीशे को देख कर अपने बाल संवार रहा था ।

सामने की छत पर से राज भाभी ने कहा ।

'' अरे वाह आज तो ऐसा लग रहा है कि कालेज जाना है । ''

मेरे लिए ये समझना बड़ा कठिन था कि भाभी को कैसे पता चला और बाल संवारने से इसका क्या सम्बन्ध है?

अब अचानक ही अकेले रहना और किसी की मुस्कुराहट को याद करते हुए मुस्करा देना वाकई मेरे भीतर बचपन की ग्रीटिंग कार्ड और पद्‌मिनी कोल्हापुरी की याद ताजा कर रहा था । अगर भाभी छत पर होती तो मैं छत पर न जाता । मुझे उससे शर्म आती थी जैसे वो मेरे सारे भेद मेरी आँखों से ही जान लेगी मुझे इसका डर सताता ।

नया साल फिर से नजदीक आ रहा था और अब मैं कालेज में था .मेरे पास से गुजरने वाली मुस्कुराती लड़की मेरी मित्र बन चुकी थी । इसके आगे अभी हम न बढे थे मुझे कहीं न कहीं उसे खोने का डर सताता । खोने का दर्द क्या होता है शायद इसका अहसास मेरे खो गए उस पिल्ले की याद से गहरा जुड़ा था ।

कालेज के ये दिन बडे सुहाने थे . गर्मी का चिपचिपा अहसास और ऊब खत्म हो चुका था । दिसम्बर के शुरूआती दिन थे । धूप का आनंद उसमें ज्यादा देर तक बैठे रहने से खो जाता और फिर हम कालेज में लगे पेड़ों की छाव में ठंडा पानी पीकर बैठ जाते । कुछ दोस्तों के ग्रुप में हम दोनों भी शामिल थे । हम ग्रुप में ही घूमते पर इस ग्रुप में भी सबके अपने निजी साथी थे । मैं और वो ग्रुप में होते हुए भी अपने में ज्यादा खोये रहते । घर आने के बाद अगले दिन का इन्तजार बड़ा लम्बा लगता ।

मैंने नए साल पर अपनी इस मित्र को ग्रीटिंग कार्ड देने की कई योजनायें बनायीं उसमें क्या लिखना है

-इसके बारे में घंटों सोचा । मैं अपने कमरे में इस को लेकर अजीब कल्पनाओं में खोया रहता और घर वालों की आवाजें मुझे न सुनाई देतीं ।

'' पता नहीं ये लड़का सारा दिन क्या खिचड़ी पकाता रहता है चीनी खत्म हो गयी है .जा बाजार से ले आ जाकर । अभी ये आ जायेंगे तो कहेंगे कि लड़का बड़ा हो गया है जो सामान चाहिए होता है इसे लिस्ट बना कर दे दिया करो । बाजार से ले आया करेगा । अब इसे चीजों के मोल भाव की समझ आनी चाहिए । '' माँ

बड़बड़ाती हुई कहती ।

मैं मुस्कराता हुआ और कई बार खीजते हुआ सामान की पर्ची लेकर बाजार चला जाता । मेरी नजर बाजार की दुकानों पर सजे रंग बिरंगे खूबसूरत ग्रीटिंग कार्डों पर ही रुक जाती । मैं उन्हें हसरत भरी निगाहों से देखता और उनमें से कई कार्डों को हाथ में लेकर एक काल्पनिक दृश्य देखता जिसमें मैं यह कार्ड अपनी उस मुस्कुराती हुयी खूबसूरत लगने वाली मित्र को दे रहा होता । मुझे लगता कि मेरा प्रेम निवेदन सफल सन्देश के रूप में उस तक पहुंचेगा । और ये सोचता हुआ मैं ग्रीटिंग कार्ड पर बने बड़े से दिल और उस पर प्यार की लिखी खूबसूरत चंद पंक्तिया बार बार पढ़ता । मैं ये यकीन करना चाहता था कि जो मैं कहना चाहता हूँ उस बात का हर शब्द इन इबारतों में पूरी तरह समाया हो ।

पर ये डर भी था कि कहीं मेरे अहसास मेरी इस हसीं मित्रता और अहसास का अंत न कर दे। अपनी प्रिय चीजों के खो जाने का भी मेरे अन्दर एक गाँठ बन गया था।

आशिकी फिल्म के सारे गीत मुझे मुंह जबानी याद हो गए थे खासकर 'हां इक सनम चाहिए, आशिकी के लिए ' वाला । फिल्म का हीरो राहुल राय मेरी आँखों में बैठ गया था । शीशे में स्वयं को देखता तो शक्ल हूँ ब हूँ उसके जैसे लगती । मैंने बाल बढ़ाकर उस जैसा स्टाइल भी बना लिया ।

पिता जी मेरे चेहरे की और गौर से देखते और मेरी पीठ पीछे माँ से अक्सर कहते लड़के को कालेज की हवा लग रही है .सारा दिन इसके नक्शे ही नहीं ठीक आ रहे । पढाई वढ़ाई का तो अब नतीजा आने पर ही पता चलेगा । ''

उन्होंने मेरा जेब खर्च बहुत कंजूसी से सेट किया था पर माँ इसकी कमी पूरी कर देती । खैर कोई महंगा शौक तो मैंने भी नहीं पाल था । साल भर में दो जोड़ी नए पेंट कमीज से काम चल जाता पर सर्दियों में हम दोस्त एक दूसरे की जैकेट बदल बदल कर पहनते । हाँ एक अच्छा ग्रीटिंग कार्ड और वो भी आर्चीज का खरीदना

ज्यादा बड़ी बात नहीं थी । लगभग १५ दिन कई कार्ड देखते और उनमें लिखी इबारतों को पढ़ते मुझे एक नया ग्रीटिंग कार्ड पसंद आया । लाल रंग के गुलाब वाले चित्र से सजा हुआ उसकी खास बात यह थी की उसे खोलो तो उसके अंदर लगा दिल जगमगाने लगता और म्यूजिक बजता । ये बाजार में आया नया परिवर्तन था । कार्ड में ये खासियत घडी के एक सेल से पैदा की गयी थी । मुझे लगा की इसे बनाने वाले ने जैसे मेरी कल्पना को पढ़ लिया था बिलकुल वैसे ही जैसे पड़ोस की छत वाली भाभी मेरी आँखों को पढ़कर मेरे कालेज जाने के उत्साह को पढ़ लेती थी ।

कालेज में सर्दियों की छुट्‌टियां खत्म हो चुकी थी और नए साल के पहले दिन कालेज खुलने वाला था । मेरे लिए ये छुट्टियां पहाड़ सी बीती । कितनी ही कल्पनायें, ऊब, मिले जुले स्वप्न जिसमें मैं उस जादुई कार्ड को खरीद कर अपनी उस मित्र को दे रहा था और अपनी मित्रता को प्रेमी प्रेमिका के रिश्ते में बदलने की ओर बढ़ रहा था देखते हुए बितायी । कई बार ऐसा होता कि मेरा कार्ड देखकर मेरी मित्र कोई भी प्रतिक्रिया न करती न हंसती न मुस्कुराती .ऐसा लगता कि उसके चेहरे पर एक शून्यता सी छा गयी है । मुझे ये सब डरा देता । और एक उदासी मेरे मन पर छा जाती । खैर मैं वो कार्ड खरीद लाया । साल के समाप्त होने में अभी दो दिन बाकी थे और कालेज खुलने में तीन । इन तीन दिनों में मैंने कार्ड के साथ एक गुलाब का फूल भी देने की सोची । जैसे जैसे नए साल का दिन आ रहा था कार्ड देना मेरे लिए एक आयोजन सा बनता रहा जिसका मेजबान सिर्फ और सिर्फ मैं था और मेहमान भी सिर्फ और सिर्फ मेरी वो मित्र जिसे अपनी प्रेमिका बनाने की ख्वाहिश मेरी इकलौती ख्वाहिश बन चुकी थी ।

'' अरे वाह हमारा इतना इन्तेजार वाकई मैंने भी तुम्हें बहुत मिस किया । नए साल की बहुत बहुत मुबारक '' उसने बड़ी बेबाकी से कालेज के प्रवेश द्वार पर मुझे देखकर कहा. जैसे उसे इस बात का कोई अहसास ही न हो कि सिर्फ उसे ही इतने दिनों के बाद देखने के लिए मैं सुबह से उसकी राह देख रहा हूँ ।

मैं अपने दिमाग में चल रही भूमिकाओं के भंवर में फंसा हुआ उसके इस बोल्ड व्यवहार से चकित था । इसलिए हड़बड़ाते हुए मैंने भी उसे नए साल की बधाई देते हुए सिर्फ इतना कहा तुम्हें भी ''.

न जाने वो तमाम बाते जो मैंने न जाने कितने अहसासों से बुनी थी । सब उलझ पुलझ सी गयी ।

'' अरे यार कोई कार्ड वगैरह नहीं लाये तुम मेरे लिए। दोस्ती में इतना हक तो बनता है । '' कहते हुए उसने अपने बैग से एक ग्रीटिंग कार्ड निकल कर मुझे दे दिया ।

'' अब देखो न छुट्‌टियों में कहीं घूमने चली गयी थी .कल ही लौटी थी. जल्दबाजी में सभी दोस्तों के लिए शायद खूबसूरत कार्ड नहीं खरीद पायी । फिर भी मैं तुम लोगों को कार्ड देना कैसे भूल जाती ।

'' ऐसे कोई बात नहीं ये कार्ड तो बहुत सुन्दर है । कितना सुंदर लिखा है इस पर फ्रेंइस फॉरएवर ' । आई आम सॉरी की तुम्हारा कार्ड जल्दबाजी में घर ही भूल आया । '' मैंने सफेद झूठ कह दिया, अपनी सारी हैरानी को मुस्कुराहट में बदलते हुए हकलाकर कहा ।

नववर्ष के इस दिन हम सभी दोस्त अपने ग्रुप सहित कालेज की कैंटीन में आ गए । आज बहुत चल पहल थी । मित्रता और प्रेम के नए दृश्य वह बिखरे पड़े थे । और मैं खोया-खोया सा बार-बार अपने बैग में रखे उस प्यार के परवाने ग्रीटिंग कार्ड को छूकर देख लेता । मेरे दिल की धड़कनें निराशा और भय से दुबकी जा रही थी ।

नए साल के इस मौसम में सीनियर छात्र कुर्सियों का गोल घेरा बना कर बैठ गए । फिर बारी-बारी से कुछ न कुछ गाने लगे । हमारा एक सीनियर म्यूजिक का छात्र था और मुझे भी म्यूजिक के छात्र होने के नाते जानता था । मेरे साथ बैठे एक मित्र राहुल और अंजलि ने भी उसी की सिफारिश पर कुछ चलती फिल्मों के रोमांटिक गीत गाकर सुनाये । आवाज कैसी है इस बात की ज्यादा परवाह किसी को नहीं थी बस सब एक मस्ती में थे और शायद सर्दी की कुलियों के बाद अपने अंदर के अकेलेपन की बोरियत दूर कर रहे थे ।

मेरे मन में अपने अहसासों को कहने की एक ललक सी पैदा हुई । वह गए जा रहे कई गीत सुनकर मई अपने आप को अपने दर्द को अपने बेबस शब्दों को कहने के लिए मचल रहा था कि अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ा और ऊपर की और उठते हुए चीख पड़ी ।

'' अब मेरा दोस्त भी एक रोमांटिक गाना सुनना चाहेगा । ''

'' क्यों नहीं .क्यों नहीं लेटस एन्जॉय द फन । '' बैठे हुए कुछ सीनियर्स हमारी तरफ देखकर बोले ।

मैं अचानक आये इस प्रस्ताव के लिए तैयार नहीं था पर शरमाते हुए खड़ा हो गया और गाने लगा ऐ अजनबी तू भी कभी आवाज दे कहीं से..........''

गनीमत मानिये कि मैं भावुकता में रोया नहीं पर मेरी आवाज जरूर कांप रही थी । गीत के खत्म होते ही खूब तालियाँ बजी और भावुकता भरा वह दिन बड़ी मुश्किल से बीता ।

मेरा प्रेम मेरे बैग में पडे ग्रीटिंग कार्ड के साथ ही वापिस घर लौट आया । नींद बड़ी बेचैनी से आई और मैंने सपने में उस ग्रीटिंग कार्ड को कई बार उसे देते देखा । जब मैं अपने इस स्वप्न के सुखद अहसास की चार्ज सीमा पर था .नींद खुली और पता चला 'सपना क्या है जैसे सोयी हुई आँख का पानी ।

खैर ये सिलसिला चलता रहा । उसकी दोस्ती और साथ के लिए मैंने अपने जज्बातों पर काबू पा लिया और उस खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड को अपनी किताबों की अलमारी में छुपा दिया । हम वैसे ही एक दूसरे से मिलते रहे जैसे पहले मिलते थे । कई बार लगता कि उसे मेरे दिल का हाल मालूम है । वो अक्सर मजाक में कहती ।

' 'हमारे क्लासमेट्‌स को लगता है कि हमारे बीच कुछ चल रहा है मैंने तो कह दिया निशि और सूद से कि देखो यार हमारी दोस्ती ही इतनी प्यारी है कि सबको ऐसा लगता है क्या मैंने गलत कहा । ''

'' शायद उनका अंदाजा सही भी हो। ''

मेरे दिमाग में गूंजते ये शब्द मुंह से निकलते ही बदल जाते और मैं उससे नजरे चुराकर कहता हाँ नकुल -इन लोगों को बाते बनाने से फुर्सत नहीं । ''

मुझे ऐसा लगता जैसे वो मेरी आँखें पढ़ लेगी ।

कालेज के दूसरे ही साल के बाद हमारे रास्ते बदल गए । एक आर्मी ऑफिसर की बेटी होने के कारण ट्रांसफर के चलते उसे मेरे शहर से हजारों किलोमीटर दूर जाना पड़ा । उसके शहर छोड़ने के अंतिम दिन न जाने मैंने कितना कुछ कह देना चाहा । पर कह न सका । उसने जाते-जाते मेरे कान में सिर्फ इतना कहकर विदा ली,

'' मैं तुम्हें याद रखूंगी और हमेशा प्यार करती रहूंगी । ''

मैं बस इतना कह पाया - मैं भी। ''

आज इस बात को कई साल बीत गए हैं पर अब भी हर साल जब नया आता है तो किताबों की अलमारी में रखे उस ग्रीटिंग कार्ड को बड़े प्यार से खोलता हूँ और उसके संगीत में उसे याद करता हूँ । शायद पिता या पति हो जाने पर भी कई हंसीं गीत गुनगुनाये जाते हैं । मेरी पत्नी की शक्ल में भी एक पद्‌मिनी कोल्हापुरी है ।

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आत्मकथ्य:

२००८ में एक कहानी संग्रह 'चंदू भाई कामरेड नहीं रहे 'प्रकाशित हो चुका है।  हिंदी साहित्य में पी एच डी हूँ और सरकारी अध्यापक के तौर पर आजीविका चला रहा हूँ।  कवितायें ,लघु कथा और कहानी लेखन में साधना कर रहा हूँ।

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हरीश कुमार,

गोबिंद कालोनी,

गली नं - 2,

नजदीक विजय क्लाथ मर्चेंट ,बरनाला ,पंजाब ।

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