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सनेही के सपने / कहानी / योगेन्द्र प्रताप मौर्य

सावन की बारिश की बूँदे जब टिप...टिप....करती हुयी चम्पा को भिगोती तो वह आह्लादित हो जाती , और बयार जैसे ही उसके तन को छूती , वह सिहर उठती ।
तो सनेही उसे अपने बाँहों में भर लेता , चंपा चिहुंक उठती । वह सनेही से खुद को छुड़ाकर
मक्के की हरी-हरी पत्तियों में छुप जाती । सनेही को उसे ढूँढने में कठिनाई होती , कारण चम्पा भी हरी साड़ी पहने हुए होती । पर जैसे ही बिजली कड़कती चम्पा डर के मारे सनेही के बाँहो में आ जाती ।

सनेही और चम्पा की छोटी सी दुनिया थी।
एक छोटा सा घर और दस बिस्वा जमींन।
एक नया मेहमान जो जल्द ही इस दुनिया में आने वाला था।

दोनों मक्के की खेत में बैठकर मीठी-मीठी बाते करते ।

"देखना चंपा तुम्हारे जैसी ही सुन्दर सी परी आवेगी तब अपना घर भी किलकारियों से गूंज उठेगा । मैं उसका नाम जूही रखूँगा । तुम चंपा और ओ जूही ,मैं सनेही जूही बिटिया से स्नेह भरी बातें किया करूंगा ।
और भुट्टों को मंडी में बेचकर उसके लिये ढेर सारे खिलौने-कपड़े लाऊंगा"।
चंपा बीच में बात काटते हुए कहती है कि किलकारियाँ तो जरूर गूंजेगी पर परी से नहीं तुम्हारे जैसे राजकुमार से ।

"चल हठ पगली कहीं की"!

फिर दोनों खिलखिलाकर हँसते है ।

तभी बारिश तेज होने लगती है, सनेही चंपा को उठाकर मचान पर बैठा देता है।
और खुद भी मचान पर बैठ जाता है।
तभी अचानक फिर से बिजली कड़कती है चंपा डर के मारे सनेही से लिपट जाती है ।
"अब छोड़ो भी, देखो ओ देख रहा है"

"कौन"

"ओ देखो सुग्गा"

"धत तेरी की"!
फिर सनेही चंपा से बतियाने लगता है।

"चंपा तुमने कभी कुछ माँगा नही"

"क्या मांगती जब खुद ही मिल गया तो"

"अच्छा बताओ क्या माँगा था ? और क्या मिल गया"?

"मैं भगवान से प्रार्थना करती थी कि मुझे ऐसा पति मिले जो मेरी भावनाओं को समझे , उसका कद्र करे। ठीक वैसा ही पति मुझे मिल गया"।

"सचमुच"

"बिलकुल सच्ची"

"पर तुम्हारा पति तो बहुत गरीब है"

"तो क्या हुआ? दिल से तो अमीर है"

"पर दिल से क्या मिलता है"?

"दिल से.. दिल से ही तो प्यार मिलता है ,धन से नहीं"

"अच्छा बताओ तुम्हें मंडी से लौटते वक्त क्या लाऊंगा"?

"मुझे...पानी -पूरी ला देना"

"बस पानी-पूरी ! और कुछ नहीं"

"और कुछ लाना हो तो...सेव वाली नमकीन ला देना"।

"और कुछ बताओ"

"और कुछ नहीं"

"गहने"

"गहने...नहीं -नहीं...ओ तो बड़े महंगे होते हैं"।

"अभी तो देखो मुंशी का कर्ज चुकाना है"

"सही कहती हो चंपा"

"इस बार मुंशी का कर्ज चुका दूंगा"।

"अगली खेती खुद के पैसे से करूंगा"।

सनेही के खेत का मकई इस बार बहुत ही अच्छा हो आया था। लंबे-लंबे, मोटे-मोटे खूंटेे के समान भुट्टे देखते ही बनते थे।
अच्छे भी क्यों न होते क्योंकि सनेही संकर प्रजाति का बीज लाकर बोया था।
का मजाल की एक सुग्गा ,चिरई या नीलगाय भुट्टे को छुआ भी हो। बड़ी मशक्कत से सनेही मक्के के खेत की रखवाली करता था।
बस दस दिन की कसर और रह गया था । भुट्टों की तुड़ाई में। अब तो सनेही उत्सुकता बस रोज-रोज ही मंडी का भाव पता करता था।

दो-तीन दिन बीता होगा कि एक दिन आधी रात को पड़ोस का प्रीतम दौड़ता हुआ ,खेत में आया । और बोला सनेही भैया , भाभी का तबीयत ख़राब हो गया है ।
जल्दी चलिए दाई को बुलाना है ।
सनेही दौड़ता हुआ घर को आया । एक नजर चम्पा को देखा । चम्पा दर्द से तड़प रही थी । सनेही  दाई को बुलाने उनके घर की ओर चला ।

इधर हठी नीलगायों की बड़ी झुण्ड उसके मक्के पर टूट पड़ी । जब तक सनेही वापस लौटता तब तक पूरे खेत का भुट्टा चट हो चुका था । केवल मक्के का  ठूठ पेड़ खड़ा था ।

सनेही समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ ये क्या हो रहा है ? उल्टे पांव वह घर को लौटा । और कपार पर हाथ रखकर बैठ गया ।

उसे चम्पा से कही हुयी बातें याद आ रही थी । सनेही के सपने कांच की तरह टूटकर बिखर चुके थे ।

उसे असहनीय पीड़ा हो रहा था। जैसे कि उसके शरीर के एक-एक रोयें उखाड़े जा रहे हो। और ओ हाथ पर हाथ रखकर बैठा हो सिवाय आह.. उह.. इह.... के।

थोड़ी देर में बच्चे की रोने की आवाज आती है । दाई बाहर आकर कहती है ।
बधाई हो ! बिटिया हुयी है ।
सनेही के आँखों से आंसू टपकने लगते हैं ।

रचनाकार -
योगेन्द्र प्रताप मौर्य
ग्राम - बरसठी
पोस्ट - बरसठी
जिला- जौनपुर
पिन- 222162
मोबाइल - 8400332294
Gmail - yogendramaurya198384@gmail.com

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