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साम्प्रदायिकता की समस्या और प्रेमचंद / मनोज कुमार झा

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31 जुलाई जन्मदिवस पर विशेष

साम्प्रदायिकता की समस्या और प्रेमचंद

- मनोज कुमार झा

प्रेमचंद ने साम्प्रदायिकता की समस्या पर काफी विचार किया है। आज की तरह उस समय भी राजनीति में साम्प्रदायिकता का बोलबाला काफी बढ़ा हुआ था। ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ में प्रेमचंद लिखते हैं, “साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है।” यह लेख 1934 में लिखा गया था। जाहिर है, स्वाधीनता आन्दोलन के उस दौर में साम्प्रदायिकता की चुनौती प्रबल थी। एक तरफ जहां अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनता का संघर्ष तेज होता जा रहा था, वहीं विभाजनकारी ताकतें धर्म के नाम पर लोगों में घृणा के बीज बो रही थी, ताकि स्वाधीनता आन्दोलन में फूट पड़ सके। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की कुख्यात नीति के तहत धर्म के आधार पर देश की जनता को बांटने की साजिश रची थी। यह नीति उन्होंने 1857 के प्रथम मुक्ति-संग्राम के बाद अपनाई, जिसने अंग्रेजों के दहला दिया था। 1857 के मुक्ति-संग्राम में हिन्दुओं और मुसलमानों ने एक साथ कंधे से कंधा मिला कर अंग्रेजों से लोहा लिया था। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति बेहद कारगर साबित हुई। लार्ड कर्जन जब वायसराय बन कर आया तो उसने इसी साम्प्रदायिक नीति के तहत 1905 में बंगाल का विभाजन करवाया और उसी की शह पर मुस्लिम लीग भी बनाई गई। बंगाल का विभाजन पूरी तरह साम्प्रदायिक आधार पर किया गया था। इसका जोरदार विरोध हुआ। बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन शुरू हो गया। आखिरकार, अंग्रेजों को यह विभाजन वापस लेना पड़ा और बंगाल एक हुआ, लेकिन अंग्रेजों ने साम्प्रदायिकता की जो विष-बेल बोई, वह आज भी फल-फूल रही है।

अंग्रेजों ने न सिर्फ मुस्लिम लीग को खड़ा किया, बल्कि छुपे तौर पर उन्होंने हिन्दुओं को भी इसी किस्म का संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया और हिन्दू महासभा जैसा संगठन सामने आया। भूलना नहीं होगा कि राष्ट्रवाद एक ऐसी आधुनिक अवधारणा थी, जिसमें धर्म और धार्मिक संकीर्णता के लिए कोई स्थान नहीं था। यूरोप में राष्ट्रवाद चर्च की सत्ता के खिलाफ संघर्ष कर के ही विकसित हो सका था और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा भी वहीं विकसित हुई थी। पर अपने भारत को गुलाम बनाए रखने और आजादी के लिए होने वाले संघर्ष को दिग्भ्रमित और दिशाविहीन करने के लिए अंग्रेजों ने यहां धार्मिक समूहों को विशेष पहचान दे दी। परिणास्वरूप हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र जैसी घोर अवैज्ञानिक अवधारणा सामने आई। उल्लेखनीय है कि अन्य राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ प्रेमचंद ने इस अवधारणा का बहुत विरोध किया। उन्होंने धर्म, संस्कृति और राष्ट्रवाद के फर्क को समझाने की कोशिश की। उल्लेखनीय है कि धर्म और संस्कृति के नाम पर अंग्रेजों के चाटुकार जनता को साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष में अलग-थलग करने और गुमराह करने की कोशिश करते थे। जनान्दोलनों को भटकाने के लिए आज भी ऐसा किया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने आप को एक सांस्कृतिक संगठन बताता है। इसका भी निर्माण अंग्रेजों की छत्रछाया में हुआ था और इस बात के प्रमाण हैं कि इस संगठन को अंग्रेजों का संरक्षण हासिल था। बहरहाल, साहित्य के मोर्चे पर प्रेमचंद ने इस बात को भली-भांति समझ लिया था। उन्होंने इस फरेब की असलियत को उजागर करते हुए लिखा, “संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है, लेकिन ईसाई संस्कृति और मुस्लिम या हिन्दू संस्कृति नाम की कोई चीज़ नहीं है। हिन्दू मूर्तिपूजक है तो क्या मुसलमान क़ब्र पूजक और स्थान पूजक नहीं है? ताजिये को शरबत और शीरीनी कौन चढ़ाता है? मस्ज़िद को ख़ुदा का घर कौन समझता है? अगर मुसलामानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ़्र समझता है तो हिन्दुओं में भी एक सम्प्रदाय ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रंथों को गपौड़े समझता है।“

प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि धर्म क्या है, संस्कृति क्या है और जनता की वास्तविक ज़रूरत क्या है। वे लिखते हैं, “ये ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। ये आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके,जिससे ये अंधविश्वास और ये धर्म के नाम पर किया गया पाखंड या नीति के नाम पर गरीबों को दुहने की व्यवस्था मिटाई जा सके।” जाहिर है, वे असल मुद्दे की बात करते हैं। कहना नहीं होगा कि आज भी जब देश को आजाद हुए 70 साल हो गए, जनविरोधी ताकतें ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की तरह ही धर्म के नाम पर जनता को बांट कर राजनीतिक लाभ ले रही हैं और सत्ता हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं। दुखद है कि आज देश की सत्ता पर ऐसी ताकतें काबिज़ हैं जो खुले तौर पर साम्प्रदायिक विचारधारा में यकीन करती हैं। ऐसे समय में, प्रेमचंद को याद करने का मतलब है कि साम्प्रदायिकता पर उनके विचारों को समझने की कोशिश की जाए और जो भी जनधर्मी साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी हैं, वे इस प्रश्न पर जनता के बीच जागरूकता के प्रसार का संकल्प लें। खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है। भूलना नहीं होगा कि तमाम प्रतिरोध के बावजूद अंग्रेज अपनी साम्प्रदायिक नीति को कार्यान्वित करने में सफल रहे, जिसके परिणामस्वरूप देश का विभाजन हुआ। यह दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ। इसके विघटनकारी प्रभाव आज भी दिखाई पड़ रहे हैं। यह भारतीय राजनीति, संस्कृति और समाज का कैंसर बन चुका है। प्रेमचंद ने इसके बारे में पहले ही आगाह किया था और लोगों को सच्चाई बताई थी। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि प्रगितिशील साहित्य आन्दोलन इस चुनौती का सामना करने में असफल रहा।

प्रेमचंद ने साफ शब्दों में लिखा था, “जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न तो अवकाश है और न ज़रूरत। ’संस्कृति’ अमीरों का, पेट भरों का, बेफ़िक्रों का व्यसन है, दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है। उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्क्षित थी, तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जाग्रत होती जाती है, वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो राजा बन कर, विद्वान् बन कर, जगत सेठ बन कर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज्यादा चिंता है जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरानी संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आंखें बंद किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।“

जाहिर है, प्रेमचंद ने यह समझ लिया था कि अंग्रेजों ने संस्कृति के नाम पर, धर्म के नाम पर जिस साम्प्रदायिक नीति को बढ़ावा दिया है, वह जनता को पराधीन बनाए रखने के लिए। आज स्वाधीन भारत के शासक भी यदि धर्म को राजनीति से जोड़ते हैं और साम्प्रदायिकता की नीति के तहत जनता को अलग-थलग करते हैं तो इसके पीछे उनका स्पष्ट उद्देश्य है जनता को सामाजिक-आर्थिक तौर पर पराधीन बनाए रखना। अगर लोगों को साम्प्रदायिक आधार पर बांट दिया जाएगा, तो वह असल मुद्दे की पहचान नहीं कर पाएगी और सामाजिक-आर्थिक समता के लिए संघर्ष से दूर ही रहेगी। इस बीच, उसका हर स्तर पर शोषण जारी रहेगा, पर वह इसे भी समझ पाने में असमर्थ रहेगी। ऐसे में, आज साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों का यह सबसे बड़ा दायित्व हो जाता है कि वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनचेतना जागृत करने के लिए काम करें और एक व्यापक सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हो सके। तभी आगे की राह खुल सकती है। राजनीति संकीर्णता और स्वार्थ के दलदल में फंस चुकी है। ऐसे में, अब साहित्य ही नई दिशा दिखा सकता है। प्रेमचंद ने लिखा था – “साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है।“
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