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जूठा आम / कहानी / गोविन्द वल्लभ पंत

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जूठा आम

माया केवल हंस देती थी। मेरे प्रश्नों का मुझे सदा यही उत्तर मित्रता था। जब वह मेरे सामने से चली जाती थी, तब मैं उसके हास्य में अपने अर्थ को टटोलता था। भ्रांत भिखारी भी उस दिन में, जो उसके लिए रात के समान है, क्या इसी तरह अपना पथ खोजता होगा?

मैं एक भग्न कुटीर में रहता था। सामने ही उसकी सुविशाल अट्टालिका थी। उस प्रासाद की सर्वोच्च मंजिल के बरामदे में चिकें पड़ी हुई थीं। शायद माया अपने दो हाथों से कभी-कभी एकाध तीलियां तोड़ दिया करती थी। चिक का एक कोना खुल गया था। उसी कोने से, उसी की- लापरवाही से एक दिन मैंने उसे देख लिया! वह एक दिन वहां पर फिर आई, मैंने फिर देखा। मैं उसे पहचान गया, वह मुझे पहचान गई।

इसके बाद वह वहां नित्य कुछ देर के लिये आती थी। मैं बड़ी देर तक प्रतीक्षा करता था। प्रतीक्षा कभी विफल न गई।

मैंने जितनी बार उसके स्वर्गीय रूप के दर्शन किए, उतनी ही बार उसमें कुछ-न-कुछ नवीनता अवश्य पाई। उसका विश्वमोहन हास्य मुझे अपने नाम की तरह खूब अच्छी तरह याद है, किन्तु मुझे याद क्या, मालूम भी नहीं, उसका कंठ कितना करुण और कोमल था।

मैं उसकी वाणी को सुनने के लिए बड़ा ही उत्सुक था, किन्तु वह पाषाण-नहीं, नहीं, सुवर्ण की प्रतिमा कभी बोली ही नहीं। मैंने बड़े-बड़े उपाय किए; पर उसके अधरों से मुस्कान निकली, शब्द नहीं निकले; चित्र देखा, संगीत नहीं सुना; भाव मिला, अर्थ नहीं पाया; मेरे नेत्र कृतकृत्य कान अतृप्त ही रहे। ' कमी-कभी मेरे कर्णद्वय मुझसे कानाफूसी कर लगते- 'तू बहरा तो नहीं है?'

जो भी हो, लोग कहते हैं-जीवन की सबसे प्रिय वस्तु, मनोहर घटना अच्छी तरह याद रहती है; पर मुझे वह भयानक संध्या अभी की तरह खूब याद है।

आह! वह ग्रीष्म की संध्या थी। तापतप्त भूमि पर पान छिड्‌क कर मैं भोजन बना रहा था। अचानक सूर्योदय हुआ। चिक के पास मुझे माया दिखाई दी। वह आम चूस रही थी। आम मधुर था, उससे हजार गुना माधुर्य माया की मुस्कान में था? होठों में ऐसी माधुरी रखकर भी माया न जाने क्यों आम चूस रही थी। ' माया ने आम चूस-चूसकर उसके छिलके दूर फेंक दिए। वह जानती . थी, यदि उसके जूठे आग का एक भी छिलका मेरी रसोई में गिर जाय तो वह अपवित्र हो जायगी। मैं समझता था, यदि उसका एक भी बूटा छिलका -मेरी रसोई में गिर जाय तो वह पवित्र हो जायगी।

माया गुठली चूस रही थी। अचानक! गुठली उसके मुंह से फिसल 'गई। माया को एकाएक यह ध्यान हुआ कि वह गुठली मेरी रसोई में गिरेगी। वह उसको सम्हालने को बढी। गुठली गिरी, उसी के साथ माया भी। माया .की असावधानी से गुठली गिरी और विश्व की असावधानी से माया। संसार! क्या माया अब तेरे किसी काम की न थी। उस कलिका का अभी विकास भी कहां हुआ था, मूढ!'

गुठली और माया मेरे समीप कठोर भूमि पर गिर पडे। मेरे ऊपर वज्र गिर पड़ा। मैंने देखा, माया मूर्च्छित हो गई थी।.

क्षण-भर में ही उसके माता-पिता वहां पर दौड़े आए।

पंखा करने पर माया ने आंखें खोलीं, सबके प्राण में प्राण आए। माया ने अधर खोले, -मुझे जीवन मिला, अधरों में कंपन हुआ, माया ने कहा-'गुठली जूठी नहीं .थी .।' इसके बाद माया ने होंठ बद कर लिए, आंखें बन्द कर लीं। फिर माया -कुछ न बोली। उसके वह स्वर अंतिम हुए। माया सदा के लिए चली गई। चारों ओर से 'गुठली जूठी नहीं थी' यही प्रतिध्वनित हो रहा था। जड़-जीव एक-एक कर मुझसे कहने लगे-'गुठली जूठी नहीं है। ' सारा संसार एक स्वर से कहने लगा-'गुठली जूठी नहीं है।'

माया फिर कहीं नहीं दिखाई दी। बहुत दिन तक उसकी खोज मेँ इधर-उधर पागलों की तरह घूमता रहा, कहीं उसका निशान नहीं मिला। संसार में जब मेरे लिए कोई आकर्षण नहीं रहा, तब मैं उसका त्याग' कर निर्जन वन में रहने लगा। माया की वह जूठी गुठली मेरी एकमात्र संगिनी थी। मैंने माया को पाने की चेष्टा की, नहीं मिली। शांति खोजी. वह भी नहीं मिली।

एक दिन श्याम मेघ आकाश से वारिसिंचन कर रहे थे। मैंने अपना समस्त मोह त्याग कर: वह गुठली जमीन में बो दी। कुछ दिन बाद अंकुर निकल आया। मैँने अनवरत परिश्रम कर उस अंकुर की रक्षा की। कुछ काल में वह अंकुर एक विशाल वृक्ष में परिणत हो गया।

अचानक एक मधु-वसंत में उसमें बौर निकल आये। उस समय मैंने देखा, मानो माया अपने हास्य को लेकर आ गई है। कोकिला उसमें विश्राम कर कूकने लगी, मानो वही माया का स्वर था। प्रत्येक बौर में आम निकल आए, मानो माया कहने लगी-आम जूठा नहीं है।'

उसी वृक्ष के नीचे अब मेरी कुटी है। उस वृक्ष के ऊपर मैंने पक्षियों को घोंसला बनाने और आराम करने की आज्ञा दे रक्खी है। नीचे छाया में मैं प्रत्येक तापतप्त बटोही से कुछ देर आराम करने का अनुरोध करता हूं।? हर साल आम की फसल में प्रत्येक पथिक को मैं एक-एक आम देता हूँ। जिस समय वे उसे खाते हैं, समझता हूं आम झूठा नहीं है।

साल में एक बार आम्र-मंजरियों की आड से झांक कर माया मुझे; दर्शन देती है। उससे कहता हूं-'माया!'

वह लज्जित हो जाती है और पत्तों के घूंघट को अधिक खींच लेती- है मैं कहता हूं -'क्यों माया, इतनी लज्जा क्यों ?'

वह कहती है-अब मेरा विवाह हो गया।'

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