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हास्य-व्यंग्य / लाली-माँ‘ की ‘लाली‘ की महिमा / अशोक जैन पोरवाल

(माया-मोह वाली लोगों की लालची प्रवृत्तियों के कारण हमारे देश में भी मायावी संन्यासिनों, तथा-कथित माताओं, स्व-घोषित गुरूमाँओं, जगतगुरू माताओं एवं वर्ड फेमस मदर्स आदि की श्रृंखलाओं में लगातार नित्य नई-नई माँओं के नाम जुड़ते चले जा रहे है. ऐसा ही एक नाम ‘बूढ़ी-घोड़ी, लाल-लगाम‘ पकड़कर.........अपने शरीर पर मेकअप पोतकर...........एक नई-नवेली दुल्हन की तरह सज-धजकर और ‘लालीमाँ‘ बनकर भी जुड़ा है. इतना ही नहीं बल्कि, उनकी ‘लाली‘ तक भी चिपककर जुड़ गई हैं. आईये, जानते हैं, उन ‘लालीमाँ की लाली की महिमा को‘.)

सतयुग में अपनी धर्म पत्नी को छोड़कर समस्त नारियों को माँ अथवा बहिन या फिर बेटी के रूपों में ही देखा जाता था. उन्हें देवी तुल्य समझा जाता था. पूजा जाता था. किंतु, फिर भी उनकी संख्या सीमित ही हुआ करती थी. कलयुगी मायावी संन्यासिनों.........तथा-कथित माताओं की तरह असीमित नहीं होती थी.

सतयुग की देवी माँएं अपनी वर्षों की तपस्या करने के बाद स्वर्गलोक में प्रगट हुआ करती थी. जबकि कलयुगी देवी माँएं बरसाती मेंढ़कियों की तरह रातों-रात नजर आ जाती है. सतयुग की अधिकांश देवी माताएँ अपने गृहस्थ्य जीवन में रहते हुए भी पूर्णतः संयमित जीवन व्यतीत करती थी. जबकि कलयुगी देवी माँएं पूर्णतः भोग-विलास में लिप्त होते हुए अपने गृहस्थ जीवन का भी भरपूर आनंद उठाती रहती हैं.

सतयुग की माताएँ अपनी ही तरह देवपुत्र अथवा देवी पुत्री तुल्य संतानों की मंगल कामनाएँ करती हुई अपनी श्रेष्ठ संतानों को जन्म देती थी. जबकि कलयुगी........कलमुंही एवं वासनामयी ‘बिन-फेरे, हम तेरे‘ वाली फ्री स्टाईल में रहने-सोने के कारण बनी मम्मियाँ अपनी अनचाही संतानों को या तो पैदा होने से पूर्व ही अपने गर्भ में मरवा देती है. अथवा पैदा होने के बाद कूडे़ के ढ़ेरों में फेंक देती है.

कहने का आशय सिर्फ यही हैं. कि, सतयुग की देवी माँओं और कलयुगी तथा-कथित माँओं में जमीन-आसमान का अंतर नहीं बल्कि, ‘पाताल-आसमान‘ का अंतर होता है।

खैर साब, अब मैं आपको अपनी औकातानुसार देखे गए लालीमाँ के एक स्वप्न के बारे में बतलाना चाहता हूँ. जिसे जानकर आपके चेहरों पर भी लाली छा जाएगी है

‘‘रात कली इक ख्वाब में आई

और गले का हार हुई.

सुबह को जब हम नींद से जागें......‘‘

उक्त मेरे जमाने का फिल्मी-गीत प्रायः मैं गुनगुनाता ही रहता हूँ साथ ही अपने जमाने के टेपरिकार्ड पर सोने से पहले सुनता भी रहता हूँ . यह सोचकर कि हो सकता हैं, आज रात मेरे सपने में भी कोई कली अथवा कोई मुरझाया सा फूल ही आ जायें? और मेरे ब्लैक एण्ड व्हाईट सपने की दुनिया को रंगीन बना जायें.

पिछली रात भगवान ने मेरी वर्षों पुरानी उक्त मनोकामना को पूरी करते हुए सपने में मुझे ‘लालीमाँ‘ नामक एक तथा-कथित देवी को भेज दिया. जिन्हें देखते ही उनका आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु मैंने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया और उन्हें उठाकर एक ओर एकांत में बनी चौकी ले गया. ताकि उन पर अपनी औकातानुसार ‘रैपिड-फायर‘ की स्टाइल में फटाफट प्रश्नों की बौछारें कर सकूं उनका ‘इन्टरव्यू‘ ले सकूं. और फिर शुरू हो गया उनका इन्टरव्यू कुछ इस तरह सेः-

प्रश्न: भक्तगणों की ‘लालीमाँ‘ आई लाइक यू. सर्वप्रथम आप यह बतलाईये कि आपका नाम ‘लालीमाँ‘ कैसे पड़ा ?

उत्तर: देखिये, मेरे घर में मेरा नाम ‘लल्ली‘ था. स्कूल में मेरा पूरा नाम ‘ललिता-गौर‘ था. इसलिए मेरे आश्रम के भक्तगणों ने मेरा नाम ‘लालीमाँ‘ रख दिया.

प्रश्न: आपकी उम्र कितनी होगी ?

उत्तर: आपको इतना भी तमीज नहीं हैं कि, किसी भी नारी से विशेषकर मुझ जैसी सुदंर सी नारी से उसकी उम्र नहीं पूछी जाती हैं.

प्रश्न: आपकी शिक्षा कहां तक हुई हैं ?

उत्तर: कौन सी शिक्षा ? कागजी डिग्री वाली या प्रेक्टिकल लाइफ वाली ? अथवा आध्यात्मिक जीवन वाली या ‘हैप्पी-फैमली-लाइफ‘ वाली ?

प्रश्न: अपनी सबसे उच्च-शिक्षा के बारे में ही बतला दीजिये ?

उत्तर: यू.सी.आई.एम. फुल्ली प्रेक्टीकली एण्ड हैप्पी फैमिली लाइफ में इंजाय करने वाली एक वर्किंग-वुमन हूँ. इसलिये मैं अपने भक्तों की ‘नस-नस‘ को पहचान लेती हूँ. उनकी दुखती एवं कमजोर नसों पर अपना हाथ रख देती हूँ. जिससे मुझे यह अहसास हो जाता है, कि कौन-कितने पानी में हैं ? किसकी कितनी आर्थिक औकात है ? भला अब आप ही बतलाईये कि मेरी यह शिक्षा उच्च स्तर की है अथवा नहीं ?

प्रश्न: प्रायः देवी माँओं का ड्रेसकोड सफेद, गेरूआ, केसरिया अथवा औरेंज कलर का होता है. फिर आपने अपना ड्रेस कोड रेड कलर (लाल रंग) का ही क्यों चुना ?

उत्तर: चूंकि, सभी मर्द (नई नवेली दुल्हन का ड्रैसकोड) रेड-कलर ही सर्वाधिक पसंद करते हैं. जो कि उत्तेजनात्मक ‘कामदेव‘ का प्रिय रंग माना जाता है. बस, इसलिए मैंने भी यही रंग चुना.

प्रश्न: आप अपने जिस्म पर इतना अधिक मेकअप पोतने के बाद......मेरा मतलब है, बनी-ठनी होकर हीं अपने भक्तों के बीच क्यों आती हो ? सादगी से क्यों नहीं ?

उत्तर: (मुस्कुराते हुए) क्योंकि, मैं भी ‘सत्यम-शिवमं-सुन्दरमं‘ में विश्वास रखती हूँ.

प्रश्न: सुना है, अपने दयालु कार्यक्रम के दौरान आपका एक दिन का श्रृंगार (मेकअप) का खर्चा ही 25 से 30 हजार रूपये हो जाता है. इतना ही नहीं आपके वस्त्रों एवं पहनने जाने वाले नवीनतम गहनों का खर्चा भी लाखों रूपये तक पहुंच जाता है. आखिर इतना पैसा आपके पास आता कहां से है ?

उत्तर: सीधी सी बात है. मैं अपने भक्तों पर दया करती हूँ. बदले में वे मुझ पर तोहफों एवं रूपयों की बारिश कर देते है.

प्रश्न: यह भी सुना है कि, आप अपने अति विशिष्ट एवं अति धनी भक्तों की माँग पर जब आप दूसरे शहरों में जाती है, तो वहां आप फाइव स्टार होटल में अपने परिवार के सदस्यों के साथ ठहरती है. साथ ही अपना ‘आशीर्वाद नुमा आइटम डांस‘ करने के लिए भी विशाल एवं भव्यता पूर्ण मंच की माँग करती है ? ऐसा क्यों ?

उत्तर: हां, ऐसा करती हूँ. इसमें गलत क्या है ? मेरा लिविंग स्टैडंर्ड ही फाइव स्टार कैटेगिरी का है.

प्रश्न: आपके एक हाथ में ‘त्रिशूल‘ और दूसरे हाथ में ‘डमरू‘ ही सदैव क्यों रहता हैं ?

उत्तर: सॉरी, आपने ध्यान से नहीं देखा उन चीजों को. मेरे एक हाथ में त्रिशूल नहीं बल्कि ‘चाऊमिन‘ जैसी लम्बी-लम्बी चीजों को ही आराम से‘ खाने के लिए एक बड़ा सा कांटा होता हैं और मेरे दूसरे हाथ में डमरूनुमा शक्ल का मेकअप-किट रखने का बाक्स होता है. जिससे कि मैं अपनी ‘लालीमा‘ और अपने होंठों की ‘लाली‘ को मेन्टेन करती हूँ.

प्रश्न: आप ‘देवीमाँ‘ हीं क्यों बनी ? ‘रंभा अथवा मेनका‘ समान अप्सरा भी बन सकती थी ?

उत्तर: देखिये, आप तो जानते ही है कि, आजकल रंभा, मेनका का जमाना नहीं रहा है. आजकल बाबाओं और देवीमाँओं की टी.आर.पी चल रही हैं. फिर भी हमारे देश में बाबाओं की तुलना में देवीमाँओं का परसेन्टेंज बहुत ही कम हैं. 50 प्रतिशत तो क्या 33 प्रतिशत भी नहीं है. जबकि प्रायः सभी क्षेत्रों में महिलाओं का स्थान इतना तो सुरक्षित रहता ही हैं बस, नारी-जाति की उन्नति के लिए एवं देवीमाँओं की कमी को पूरा करने के लिए मैं देवी माँ के रूप में ‘लालीमाँ‘ बनी.

प्रश्न: आपकी (हॉबी) कौन-कौन सी हैं ?

उत्तर: मेरी ‘हॉबी‘ ही मेरी पहचान हैं. जैसे-नौटंकी करना पाश्चात्य संगीत को कान फोडू आवाज में सुनते हुए डांस करना. लोगों की और अपनी होठों की ‘लाली‘ को हमेशा बरकरार रखना. आदि-आदि.

प्रश्न: आप यात्राएं कैसे करती है ? पैदल अथवा वाहन में ? या फिर डोली अथवा गोदी में ?

उत्तर: मुझे अपने अतिप्रिय भक्तों की गोदियों में बैठकर कुछ कदमों की दूरी की यात्रा करना बहुत ही अच्छा लगता है दूरी की यात्रा मैं प्राईवेट जेट अथवा हेलीकॉप्टर से करती हूँ.

प्रश्न: धनी, पढ़े-लिखें एवं विशेष हस्तियाँ (सेलेब्रिटीस्) तक आपके भक्त बनने के लिए कैसे अथवा किन-कारणों से खींचे चले आते हैं ?

उत्तर: यह एक बहुत बड़े राज की बातें हैं. किंतु, फिर भी मैं तुम्हारे माध्यम से भविष्य में नई-नवेली बनने वाली देविमाँओं को संदेश स्वरूप बतला देती हूँ. मेरे भक्त मेरी कुछ विशेषताओं.......मेरे कुछ विशेष कारणों से खींचे चले आते हैं. जैसे:-

पब्लिसिटीः- जोकि मुख्यतः दो तरह से होती है. पहली, भक्तों द्वारा हमारा मौखिक प्रयास. दूसरी, ‘पैसा फेंक, तमाशा देख‘ वाली स्टाइल में टी.वी. चैनलों वालों को पैसा फेंको और फिर अपना आइटम दिखलाओ.......नौटंकी करो. भक्त का आकर्षण- मेरा और मेरे आश्रम का बहुत बड़ा ताम-झाम.....झॉकी का होना.

निशुल्क सेवाएँः- हमारे आश्रम से भक्तों को दी जाने वाले अनेकों छोटी-मोटी निशुल्क सेवाओं का होना. चमत्कारिक ढंग से सम्मोहन करना. पूर्व निर्धारित भक्तों के प्रश्नों का अत्यन्त ही प्रभावशाली ढंग से उत्तर देना. भक्तों, से उनकी स्थानीय अथवा प्रांतीय भाषाओं में ही बाते करना. आदि-आदि कारणों से हमारे पास सेलेब्रिटिस तक खींचीं चली आती है

प्रश्न: हमारे देश में तथा-कथित देवीमाँओं का भविष्य कितना सुरक्षित हैं ?

उत्तर: जब तक हैं, लोगों में अंध-विश्वास एवं लालची-प्रवृत्तियाँ, तब तक किसी भी देवीमाँ की ‘लाली‘ को कोई बंदा खराब नहीं कर सकता है इस प्रकार कहा जा सकता हैं, कि उनका भविष्य पूरे सोलह आने सुरक्षित है.

प्रश्न: अंत में, मैं जानना चाहता हूँ कि (आपकी) ‘लालीमाँ की ‘लाली‘ की महिमा‘ का क्या राज है?

उत्तर: (मुस्कुराते हुए) ‘ओनली, बी पॉजिटिव थिकिंग एण्ड परफेक्ट कॉन्फीडेंस ही मेरी ‘लाली‘ की महिमा का राज है.

‘‘चलो उठो जल्दी से. क्या लालीमाँ......लालीमाँ चिल्ला रहे हो ?‘‘ कहते हुए मेरी श्रीमती जी ने मुझे स्वप्नलोक की दुनिया से अलग किया. और मुझे किचिन की बंद पड़ी ‘नाली‘ को तुरंत ही साफ करने का आदेश भी दिया.

//समाप्त//

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साहित्यिक परिचय

नाम    :     अशोक जैन 'पोरवाल' मो0 09098379074/08518852924
शिक्षा    :     एम. काम./एम. ए. (हिन्दी साहित्य एवं मनोविज्ञान)
संप्रति    : स्वेछिक अवकाश (बैंक) वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कार्य  
संम्पर्क    : ई-8/298, आश्राय अपार्टमेंट,फ्लेटनं.एस-2त्रिलोचनसिंहनगर (त्रिलंगा)(शाहपुरा)भोपाल-462039(म.प्र.) 
जन्म तिथि : 14 नवम्बर 1956 (भोपाल) प्रथम प्रकाशन : महाविद्यालिन पत्रिका में कहानी (1970)
ई-मेल    : ashokjainporwal@gmail.com <mailto:ashokjainporwal@gmail.com>  ashokjainporwal@yahoo.in <mailto:ashokjainporwal@yahoo.in> , 
सृजन     :    (1) मेरी 51 प्रतिनिधि लघुकथाएँ        (2) मेरे 21 प्रतिनिधि हास्य-व्यंग्य  (गद्य)
(3) मेरी 21 प्रतिनिधि कहानियाँ        (4) मेरे 111 हाइकु (संग्रह)

अखिल भारतीय स्तर पर प्राप्त साहित्यिक सम्मान एवं पुरस्कारः-
1    कला-मंदिर (स्थापित 1951) (भोपाल) द्वारा ''साहित्य कला मनीषा सम्मान (2005)
2    रेखा-सक्सेना स्मृति पुरस्कार (मुंबई) द्वारा कहानी 'नारीमन' (2006)
3    सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी (खण्ड़वा) द्वारा ''श्रेष्ठ लघुकथाकार'' (2008)
4    शबनम साहित्य परिषद (सोजत सिटी/राजस्थान) द्वारा ''हाइकु सम्मान'' (2009)
5    सरिता लोक सेवा संस्थान (सुल्तानपुर/उ.प्र.) द्वारा सर्वोच्च कीर्ति भारती सम्मान (2009)
(50 वर्ष से अधिक आयु पर) ''व्यंग्य (गद्य)'' विधा पर।
6    हिन्दी वेबसाइट स्वर्ग विभा नवी/मुंबई द्वारा स्वर्ग विभा तारा राष्ट्रीय सम्मान (2010)
''गद्य'' (आलेख लेखन) विधा पर।

निम्नलिखित मासिक व्यवसायिक पत्रिकाओं में 2012 से नियमित प्रकाशन(मुख्यतः हास्य-व्यंग्य (गद्य)और सामाजिक एवं मनोविज्ञानिक आलेखों का) नई दिल्लीः-(1)मेरी-सजनी   (2)''गृहलक्ष्मी''/(3)जहनवीं/लखनऊ (4)' दिव्यता/(5)''सुपर-आइडिया''नोयडाः-''वुमन ऑन टॉप''।

साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन :- सार्थक(मुबंई)/नारी-अस्मिता (बडोदरा)    /साहित्य-वाटिका (बीगापुर/उन्नौ)/साहित्य-त्रिवेणी (कोलकता)/नारायणीयम् (ठाणे)/वैश्य परिवार (कानपुर) नवल (नैनीताल)/ प्रेरणा-अंशु (उद्यमसिंह नगर)/ अविराम (रूड़की/हरिद्वार)/लोक गंगा (देहरादून)/सरस्वती सुमन (देहरादून)/
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दैनिक समाचार पत्रों में पूर्व प्रकाशन : संस्करण/दैनिकझ भास्कर (जन जागृति संस्करण ''मधुमिता'' इन्दौर/भोपाल/ग्वालियर/रायपुर) में  (2009 - 11) में 70 से अधिक लघुकथाओं का प्रकाशन)/ नई दुनिया (नायिका) में लघुकथा एवं आलेख साथ ही ''अधबीच'' (व्यंग्य) का प्रकाशन/ पत्रिका (राजस्थान पत्रिका) 'परिवार' में लघुकथाओं का प्रकाशन/ पीपुल्स  समाचार (2009-10) में एवं राज एक्सप्रेस (2005) डेढ़ वर्षों तक निरंतर लघुकथाओं एवं आलेखों का प्रकाशन/ दैनिक जागरण में धार्मिक लेखों का प्रकाशन।

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