विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

अब डर लगता है ...... / लक्ष्मी यादव

शाम ढलते ही शहर की सुनसान और रौशन गलियों में एक खौफ हर लड़की के मन में पसर जाता है। सन्नाटे के साये में खूब फलता फूलता है एक अजीब तरह का खौफ जो डराता है कविता, आशा टीना, सीमा जैसी न जाने कितनी ही मासूमों को जिनके नाम कुछ भी हो सकते हैं, इसने नाम परेशानी और खौफ़ को कोई फर्क नहीं पड़ता। दरिंदगी और वहशियत में लिपटी घटिया मानसिकता न जाने किस बात से इतनी चोट खायी हुई है कि बदले बच की भावना में मासूम बच्चियों तक को अपनी विकृत मानसिकता की दरिंदगी से नहीं छोड़ती। ऐसे खौफ़ के डर से अब हर उम्र की आधी आबादी रोजाना रूबरू होती है।ये आधी आबादी जो सम्पूर्ण मानवता की जननी है। लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है की जिस आधी आबादी के साथ इतनी अमानवीय घटनाएं हो रही हैं ..बजाय मासूमों के बचाव और सुरक्षा को ध्यान में रखने के हमारा समाज अपराधियों पालने में लगा है .. पीडितायें खौफ में जीती है और अपराधी बेख़ौफ़ घूमता है। अपराधियों पर पुलिस और समाज दोनों लगाम नहीं लगा पाते लेकिन बेटियां घर में कैद हो जाती हैं।

“यत्र नारी पूज्यते रमंते तत्र देवता” कहते हैं जहां नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का वास होता है और भारत तो देव भूमि है जहां भगवान् श्री राम और भगवान् श्री कृष्ण ने जन्म लिया। ऐसे देवताओं की जन्मभूमि वाले देश में आज एक स्त्री का मान सम्मान और उसकी इज्ज़त आबरू सुरक्षित क्यूँ नहीं है ये सोचने वाली बात है।

एक स्त्री के लिए समाज में अपने लिए कुछ कर गुजरने के समक्ष चुनौतियाँ क्या पहले कम थी जो अब ये असुरक्षा एक नई चुनौती के रूप में सामने है। देश में लिंग भेद की समस्या पहले से विद्यमान है। बेटियों को कोख में मार देने की कुरीति ख़त्म होने का नाम नहीं लेती… इससे इतर जो बेटियाँ पैदा भी हुई उनको लड़नी होती है अपनी बुनियादी जरूरतों की लड़ाई। शिक्षा की लड़ाई अपने नैतिक मूल्यों की लड़ाई। पढ़ाई के लिए पहले घर में लड़ो फिर खानदान फिर समाज से। शिक्षा की इस लड़ाई में यदि जीत हो भी गयी तो लड़ाई यहाँ ख़त्म नहीं होती बल्कि आग़ाज़ हो जाता है एक और लड़ाई का.... आत्मनिर्भर बनने की लड़ाई.. क्यूंकि जहां एक ओर बेटे को शिक्षा इस लिए दी जाती है की वो पढ़ लिखकर नौकरी करेगा ..वही बेटियों को पढ़ाकर कही तो अहसान का नाम दे दिया जाता है तो कही अच्छा रिश्ता पाने की होड़ में एक प्लस पॉइंट मान लिया जाता है और बेटी को मजबूर किया जाता है की वो अपनी मेहनत और लगन से अर्जित की गयी विद्या और डिग्री को सिर्फ नुमाइश का टुकड़ा मान मर्यादा की कठपुतली बन समाज की पुरानी भेड़चाल में शामिल होने को तैयार हो जाए। यदि कोई बेटी अपनी इस आत्मनिर्भर बनने की अदद ख्वाहिश को पूरा करने के लिए लड़ने को एक बार फिर सर उठाती है और अपने बुलंद हौसले के कारण जीतती है तो भी इस जीत के साथ उसकी लड़ाई का अंत नहीं होता।

जहां बेटे को नौकरी मिलने पर इस बात के लिए पूजा और ईश्वर से कामना कर बेटे को आशीर्वाद का तिलक लगाया जाता है वही बेटियों के लिए ऐसा कोई उत्साह बहुत कम देखने को मिलता है। समाज के अधिकांश भाग में आशीर्वाद और तिलक के नाम पर नियमों की लम्बी फेहरिस्त घर का हर सदस्य सुना देता है..घर की बेटी को ... मसलन कितने बजे घर से बाहर जाना है कितने बजे वापस आना है ऑफिस जाकर फ़ोन करना है.. घर आने से पहले तीन बार फ़ोन करना है.... ऑफिस से निकलकर फ़ोन करना है।किसी अजनबी से बात नहीं करना...और सबसे ख़ास बात किसी लड़के से कोई दोस्ती नहीं करनी है ..ऐसी न जाने कितनी और बातें ..जो न बेटी के लिए किसी प्रेरणा की तरह होती हैं और न उसके जॉब प्रोफाइल में काम आने वाली..... न ही किसी दुआ की तरह जो किसी तरह से भी उसकी पहले दिन काम पर जाने के वक़्त बढ़ी दिल की धड़कन को कम कर सके ... लिहाज़ा मायूस सा चेहरा लेकर बेचारी बेटी चल देती है अपने सपनों की उड़ान भरने ....लेकिन सपनों की उड़ान और हकीकत के धरातल में बहुत फर्क होता है...। ...इस सफ़र पर निकलते वक़्त उसको अंदाज़ा भी नहीं होता की उसने अबतक जो लडाइयां लड़ी... जो बातें सुनी स्वयं के लिए... वो महज़ एक प्रोमो था.... पूरी पिक्चर तो अभी बाकी है।

ऑफिस के तमाम अजनबी लोगों के बीच सकुचाई सी बेटी अपनी मेहनत और कार्यकुशलता के दम पर अपने लिए एक ऐसा वातावरण तैयार करती है जहां उसको उसकी लगन के बदले मिल सके आत्मसंतुष्टि आत्म निर्भर होने की.... ये सब तो बेटी को मिल जाता है..... मिलने की वजह भी होती है... उसका होनहार होना, लेकिन इस सबके साथ कुछ और भी मिल जाता है जो अनचाहा होता है, घृणित होता है जिसमें आती है नीचता की बू ... ये बू न जाने कितनी ही बेटियों का पीछा करने लगती है... ऑफिस से घर तक... दिन से रात तक... हकीक़त से सपनों तक ..... कुछ ख़याल मन के किसी कोने में कुछ यूँ बैठ जाते हैं की लाख चाहने पर भी मन से बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेते ... हर लड़ाई में जोश के साथ लड़ने और जीतने वाली बेटी को इन हालात से लड़ने का कोई तरीका नहीं दिखता.... जीतने का हौसला कही से भी आता नहीं दिखता .. दिल और दिमाग हर वक़्त कुछ ऐसे सवालों में डूबे रहते हैं जिनको उसने कभी किसी कक्षा के किसी प्रश्न पत्र में नहीं देखा था.... न उनके जवाब लाख किताबें पढ़ते वक़्त किसी पन्ने पर पढ़ा था ... वो नहीं जानती की जब उसके ऑफिस का कोई सहयोगी उसके तन बदन को देख अप्रत्यक्ष रूप से टीका टिपण्णी करे तो वो क्या जवाब दे ... जब उसका बॉस उसकी सैलरी बढाने के नाम पर उसको अपने गेस्ट हाउस ले जाने की बात कहे तो वो क्या कहे ....सुनसान रास्ते पर चलते हुए .... न जाने कितनी ही दर्जन आँखें उसका पीछा करती हैं ..... उन आँखों में दरिंदगी भरे सवालों के वो क्या जवाब दे ... हर रोज़ एक अग्नि परीक्षा पार कर घर आई थकी मांदी बेटी किसी से कुछ कहना भी चाहे तो न जाने किस असुरक्षा के डर से होंठ सिल जाते हैं .. आत्मनिर्भरता के सपनों की दीवारों में जैसे कोई दीमक सी लग जाती है जो धीरे धीरे सारे सपनों को ही खोखला कर देती है। जो बेटी घर के लिए.. परिवार.. समाज.. देश के लिए कुछ कर गुजरने का सपना आखों में लिए कभी मुस्कुराया करती थी अब उसके चेहरे पर एक अंतहीन उदासी चिपक जाती है जो किसी कम्पनी के फेश वाश और फेयर नेस क्रीम से भी नहीं छूटती .... चाहे लाख कोशिश करती रहे कोई बेटी .... और अगर किसी दिन कोई बेटी सीता की इस अग्नि परीक्षा में फेल हो जाये....किसी हादसे की शिकार हो जाए उसके आत्मसम्मान के टुकड़े हो जायें ... तो एक खौफ का घना कोहरा ढक लेता है बाकी सब बेटियों के मन को ..... खौफ ये भी की अब किसकी बारी होगी... खौफ ये भी की... अब घर से कल निकलेंगी की नहीं क्यूंकि नियमों की फेहरिस्त में जुड़ गया है ... एक नया नियम ... कोई बात सुनी... तो घर से निकलना बंद ......... एक हद तक सहने के बाद आखिरकार न जाने कितनी बेटियाँ हार मान लेती हैं और कह देती हैं खुद से ....नहीं डरी थी अब तक...पर अब डर लगता है !.......

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget