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‘‘माहेश्वर तिवारी के रचनाकर्म का षष्ठिपूर्ति उत्सव’’

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मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’ के तत्वावधान में 22 जुलाई, 2016 को नवीन नगर स्थित ‘हरसिंगार’ भवन में विख्यात नवगीतकार डा. माहेश्वर तिवारी के रचनाकर्म की षष्ठिपूर्ति का उत्सव ‘सम्मान समारोह एवं पावस-राग’ के रूप में मनाया गया जिसमें अतिथि साहित्यकारों- सुविख्यात नवगीतकार श्री यश मालवीय (इलाहाबाद), डॉ. राजेन्द्र गौतम (नई दिल्ली), श्री जयकृष्ण राय ‘तुषार’(इलाहाबाद), श्री हरिपाल त्यागी (नई दिल्ली) एवं श्री ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ (मुरादाबाद) को प्रतीक चिन्ह, मानपत्र, अंगवस्त्र, श्रीफल नारियल भेंटकर ‘‘माहेश्वर तिवारी नवगीत सृजन सम्मान’’ से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ सुप्रसिद्ध संगीतज्ञा श्रीमति बालसुन्दरी तिवारी द्वारा लिखित एवं संगीतवद्ध सरस्वती वंदना- ‘शारदे माँ शारदे माँ, ज्ञान का वरदान दे माँ/ज्योति की सरिता बहा दे, नवसृजन का दान दे माँ’ की सुमधुर संगीतमय प्रस्तुति से हुआ। तत्पश्चात कार्यक्रम में उपस्थित स्थानीय एवं अतिथि साहित्यकारों ने डॉ. माहेश्वर तिवारी के रचनाकर्म की 6 दशक लम्बी स्वर्णिम यात्रा पूर्ण होने पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा करते हुए बधाई दी। साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’ के संयोजक श्री योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने कार्यक्रम के संदर्भ में अपने वक्तव्य में कहा कि-‘साहित्यकारों की 60 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर उनका षष्ठिपूर्ति उत्सव मनाए जाने की परंपरा तो रही है लेकिन किसी साहित्यकार के रचनाकर्म का षष्ठिपूर्ति उत्सव संभवतः प्रथम बार मनाया जा रहा है। निश्चित रूप से श्रद्धेय माहेश्वर तिवारी जी का समूचा रचनाकर्म हिन्दी साहित्य की दस्तावेज़ी धरोहर है।’ नई दिल्ली से पधारे वरिष्ठ नवगीतकार एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेन्द्र गौतम ने इस अवसर पर कहा कि-‘ डॉ. माहेश्वर तिवारी हिन्दी साहित्य के अतिमहत्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनके नवगीतों में भाषा का विलक्षण और सटीक प्रयोग तथा जीवन्त ताज़े बिम्बों की उपस्थिति उनकी निजी विशेषता है। उनकी जड़ें अपनी परंपरा और ज़मीन में बहुत गहराई तक मज़बूती के साथ धँसी हुई हैं जहाँ से उनकी रचनाओं को अक्षय जीवनी-शक्ति प्राप्त होती है।’ डॉ. माहेश्वर तिवारी की रचना-यात्रा में सहयात्री रहे कीर्तिशेष श्री उमाकान्त मालवीय के सुपुत्र तथा इलाहाबाद से पधारे वरिष्ठ नवगीतकार श्री यश मालवीय ने इस अवसर पर कहा कि-‘माहेश्वर जी के नवगीत कथ्य और कला के सुन्दर मेल के लिए बार-बार गुनगुनाए जाते हैं, गाए जाते हैं। उनके छोटे-छोटे गीतों में जीवन के राग-रस की भरपूर उपस्थिति रहती है।’

इलाहाबाद से ही पधारे महत्वपूर्ण और चर्चित नवगीतकार श्री जयकृष्ण राय ‘तुषार’ ने इस अवसर पर कहा कि-‘सन् 1951 में सवैया छंद से अपनी सृजन-यात्रा आरंभ करने वाले माहेश्वर जी के नवगीतों की कोमलता, ताज़गी और टटकेपन को उनके सहयात्री रचनाकार बाबा नागार्जुन, धर्मवीर भारती, वीरेन्द्र मिश्र, त्रिलोचन शास्त्री आदि सभी सराहते रहे हैं। माहेश्वर जी के नवगीतों को पढ़ते हुए लगता है कि वे परंपरा के सकारात्मक और प्रासंगिक मूल्यों को आगे बढ़ाकर पुनः प्रतिष्ठित करना चाहते हैं।’ दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध चित्रकार एवं कथाकार वयोवृद्ध श्री हरिपाल त्यागी ने कहा कि-‘हालांकि मैं कविता नहीं लिखता, कहानी और उपन्यास लेख नही मेरे रचनाकर्म के केन्द्र में है लेकिन मैंने माहेश्वर तिवारी को खूब पढ़ा है और मैं हमेशा उनके रचनाकर्म से प्रभावित रहा हूँ। जो संवेदना हम कथाकार लोग तीन-चार पृष्ठ की कहानी में लाने का प्रयास करते हैं, माहेश्वर जी का एक नवगीत उस संवेदना को अधिक प्रभावशाली रूप से अभिव्यक्त कर देता है।’ मुरादाबाद के वरिष्ठ गीतकार श्री ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ ने कहा कि-‘माहेश्वर तिवारी जी सारी दुनिया में प्रसिद्ध हैं, उनके नवगीत देश के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जाते हैं। यह गुरादाबाद के लिए गौरव की बात है, मुरादाबाद के रचनाकारों के लिए गर्व का विषय है। माहेश्वर जी अब मुरादाबाद के पर्याय हैं।’ इस अवसर पर मुरादाबाद के युवा शायर श्री ज़िया ज़मीर ने माहेश्वर तिवारी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित एक नज़्म पेश की-‘तुम्हें मालूम हो शायद/ऋषि नवगीत के हो तुम/तुम्हारा नाम अब नवगीत का पर्यायवाची है/न रुकना है अभी तुमको/न थकना है अभी तुमको/तुम्हें बस लिखते रहना है।’

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र-‘पावस-राग’ में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञा श्रीमति बालसुन्दरी तिवारी द्वारा अपनी संगीत की छात्राओं- संस्कृति, कशिश, ताज़दार, उर्वशी, प्रीति, राशि के साथ माहेश्वर जी के नवगीतों को संगीतवद्ध कर प्रस्तुत किया गया-

‘गीतों भरी सुबह लगती है

रंगों डूबी शाम

याद बहुत आते हैं कल के

रिश्ते और प्रणाम’

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‘बादल मेरे साथ चले हैं

परछाई जैसे

सारा का सारा जग लगता

अँगनाई जैसे’

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इसके पश्चात कार्यक्रम के तृतीय सत्र में वर्षा ऋतु पर केन्द्रित काव्य-पाठ का आयोजन किया गया जिसमें उपस्थित कवियों ने समसामयिक संदर्भों के साथ-साथ वर्षा ऋतु के विभिन्न पहलुओं के चित्र भी अपनी-अपनी कविताओं में उकेरे। इस अवसर पर काव्य-पाठ करते हुए अतिथि रचनाकार इलाहाबाद से पधारे श्री यश मालवीय ने अपना नवगीत प्रस्तुत किया-

‘तुम छत-से छाए, ज़मीन-से बिछे

खड़े दीवारों-से

तुम घर के आँगन, बादल-से घिरे

रहे बौछारों-से’

इलाहाबाद से ही पधारे श्री जयकृष्ण राय ‘तुषार’ ने काव्यपाठ प्रस्तुत किया-

‘नये घर में पुराने एक-दो आले तो रहने दो

दिया बनकर वहीं से माँ हमेशा रोशनी देगी

ये सूखी घास अपने लॉन से काटो न तुम भाई

पिता की याद आएगी तो ये फिर से नमी देगी’

नई दिल्ली से पधारे वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. राजेन्द्र गौतम ने गीत प्रस्तुत किया-

‘हवा चली खनकाती लय-छंदों की पायल

रेशमी फुहारों का उड़-उड़ जाता आँचल

आषाढ़ी अंबर से उतर आज धरती पर

गीत पर्व आया है’

काशीपुर (उत्तराखंड) से पधारी कवयित्री डॉ. ऋचा पाठक ने काव्यपाठ प्रस्तुत करते हुए कहा-

‘शुक्र है कोई जगह बिटिया हुई, ढोलक बजी

बस हुस्न के बाज़ार में में है, पुत्र का होना मना’

सुप्रसिद्ध नवगीतकार डॉ. माहेश्वर तिवारी ने अपना नवगीत प्रस्तुत किया-

‘साधो

गाँव-गेराँव हेराने

भूल गई

होरी, चैती, कमरी,

बिरहा की तानें’

वरिष्ठ गीतकवि श्री ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ ने गीत प्रस्तुत किया-

‘अब तो खुद सचमुच खुद से

बतियाना मुश्क़िल है

फूलों में रहकर भी अब

मुस्काना मुश्क़िल है’

वरिष्ठ शायर डॉ. कृष्ण कुमार ‘नाज़’ ने ग़ज़ल पेश करते हुए कहा-

‘जो खुद उदास हो वो क्या खुशी लुटाएगा

बुझे दिये से दिया किस तरह जलाएगा

कमान खुश है कि तीर उसका क़ामयाब रहा

मलाल भी है कि अब लौटकर न आएगा’

नवगीतकार श्री योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने गीत प्रस्तुत किया-

‘गीतों को सशरीर बोलते

मुस्काते देखा है मैंने

तुमने भी देखा ?’

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अजय ‘अनुपम’ ने मुक्तक प्रस्तुत किया-

‘ड्योढी पर सांकल की आहट नहीं रही

घूंघट उतर गया, शरमाहट नहीं रही

हाय-हलो में सिमट गई दुनियादारी

रिश्तों के भीतर गरमाहट नहीं रही’

वरिष्ठ शायर डॉ. स्वदेश भटनागर ने ग़ज़ल पेश की-

‘किरनों की तरह हँस पड़ा अंदर

कौन सूरज-सा यह उगा अंदर

मोतियों-सा पिरो दिया खुद को

किसने आदाब-सा कहा अंदर

धूप-सा शाख पे मैं बैठा हूँ

बर्फ़-सा कुछ पिघल गया अंदर’

इसके साथ ही सर्वश्री ज़िया ज़मीर, अशोक विश्नोई, डॉ. पूनम बंसल, डॉ. अर्चना गुप्ता, अम्बरीश गर्ग, डॉ. मीना कौल, समीर तिवारी, विवेक निर्मल, मनोज ‘मनु’ आदि ने भी काव्यपाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजसेवी श्री धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने की तथा संचालन संस्था के संयोजक योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ तथा डॉ. कृष्ण कुमार ‘नाज़’ ने संयुक्त रूप से किया। आभार अभिव्यक्ति श्रीमति आशा तिवारी ने प्रस्तुत की।

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-योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’

संयोजक- साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’

पोस्ट बॉक्स नं0-139

मुरादाबाद (उ.प्र.)-244001

मोबाइल-09412805981

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