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तेरे झंडे से मेरा झंडा ऊंचा... / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

० सम्मान को दरकिनार कर ऊंचाई से कर रहे प्रतिस्पर्धा

देश में राजनीति के बल पर अब एक नये शक्ति परीक्षण का दौर चल रहा है। नहीं...नहीं...आप इसे परमाणु परीक्षण से जोड़क़र कतई नहीं देखे। कारण यह कि ऐसे वीर सपूतों की देश में कमी है। पोखरण परमाणु विस्फोट ने देश के सच्चे राष्ट्र भक्त अटल बिहारी बाजपेयी की देशभक्ति को विश्वस्तर पर प्रदर्शित किया था। अब जो दौर चल रहा है कि जिसमें कहीं भी देशभक्ति का जज्बा दिखाई नहीं पड़ रहा है, किंतु खुद को हर किसी से आगे और महान बताने की प्रतिस्पर्धा एक अलग अंदाज में शुरू की गयी है। देश की जनता और अपने राष्ट्रीय ध्वज से अंतरंग स्नेह रखने वाले जज्बाती देश के नागरिकों की भावनाओं को भुनाने वाले अवसरवादी लोग अब देश के राष्ट्रीय प्रतीक को अपनी लोकप्रियता का झंडा गाड़ऩे का नया औजार बना रहे है। मैं साधुवाद देना चाहता हूं देश के एक ऐसे उद्योगपति को जिसने सभी को अपने घरों पर झंडा फहराने का अधिकार दिलाने न्यायालय के द्वार खटखटाए और अंतत: यह हक सभी को प्रदान करा दिया। उसे उद्योगपति ने अपने राष्ट्रीय प्रतीक को कुछ नियम एवं शर्तों के साथ अब चौबीस घंटे फहराते रहने की गौरवशाली स्थिति से भी ला जोड़ा है। सबसे पहले अपनी कर्मस्थली में इसी युवा उद्योगपति ने 100 फीट का राष्ट्रीय ध्वज फहराकर अपनी भावनाओं को गगनचुंबी ऊंचाई देते हुए देशवासियों को राष्ट्रीय प्रेम का पैगाम दिया था। शायद उस वक्त उद्योगपति ने भी इस बात को न सोचा होगा कि झंडे की यही ऊंचाई एक दिन प्रतिस्पर्धा का रूप ले लगी।

आप मुझे अपने राष्ट्रीय प्रतीक की नित नई ऊंचाई से परहेज रखने वाला नागरिक न समझे। मैंने जो देखा उसे कलमबद्ध करने मचल उठा। देश में ऐसे कई मुद्दे है, जिन्हें उठाकर हम अपनी लोकप्रियता या देश प्रेम का इजहार कर सकते है। राष्ट्रीय ध्वज को आपसी राजनीतिक शक्ति का अखाड़ा बनाने वाले लोगों से मुझे सख्त परहेज है। अपने शहर में मैंने नगर पालिक निगम द्वारा स्थानीय जयस्तंभ चौक को सौंदर्यीकृत कर झंडे को 100 फीट की ऊंचाई देते गर्व का अनुभव किया था, किंतु कुछ ही माह में मेरा गर्व से चौड़ा सीना सिकुड़क़र रत्तीभर का हो गया। एक दिन शाम जयस्तंभ चौक के एक पानठेले में मैं जैसे ही पहुंचा, पान लगाने वाले उक्त देशभक्त युवक ने मेरा ध्यान फटे हुए झंडे की ओर आकर्षित कराया। वास्तव में अपने देश के प्रतीक की ऐसी स्थिति मुझसे न देखी गयी और मैंने उस युवक से कह दिया भाई इन्हें माफ कर दो और अपने राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान अपने हृदय में बरकरार रखा। जिसने भी इसे ऊंचाई प्रदान की है, शायद उस तक झंडे की विकृति नहीं पहुंची है। अन्यथा वह भी हमारे देश का नागरिक है। हमें यह भी समझना चाहिए कि लाख रूपये की लागत वाले उक्त तिरंगे के लिए शायद सामान्य सभा में बजट पास कराना पड़े? मेरी भावनाओं और दिल में छिपे दर्द को उस युवक ने भली भांति भांप लिया और विषय को दूसरी ओर मोड़क़र पुन: अपने कर्म को साधने लगा। पाठकों को यह बताने में भी मुझे शर्म महसूस होती है कि विगत लगभग 6 माह से अब झंडा नहीं केवल पाईप का डंडा ही जयस्तंभ चौक की शोभा बढ़ा रहा है।

झंडे की ऊंचाई के बाद यहीं आकर खत्म नहीं हो जाती है। पूरे देश में पहले 100 फीट के झंडे की बात ने हर प्रदेश के मुखिया तक की नींद उड़ा दी। बात विधानसभा तक पहुंची और हमारे प्रदेश के मुखिया जो हर नब्ज को बेहतर टटोल लेते है, उन्होंने इस नब्ज को भी सफलता पूर्वक टटोल ही लिया। यही कारण था कि प्रदेश की राजधानी में इससे कहीं अधिक ऊंचाई वाला झंडा फहराने का निर्णय ले लिया गया। मुझे भी बड़े गर्व का अनुभव हुआ कि मैं उस प्रकार का नागरिक हूं जहां अब लगभग पौने 300 फीट ऊंचा झंडा चांद और तारों से बात करने जा रहा है। एक और गौरवान्वित बात करने वाली बात यह कि जिस विशाल हृदय वाले मुख्यमंत्री ने इसे अपनी राजधानी में गगनाधीन किया, वह मेरे शहर और इसी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है। बात झंडे की ऊंचाई पर बहस की कतई नहीं है। चर्चा तो तब शुरू होती है जब झंडे के प्रति हमारा कर्तव्य और दायित्व दिखावे के रूप में सामने आता है। कई-कई माह तक झंडे वाला स्थान तिरंगा विहीन केवल पाईप के रूप में शोभा बढ़ा रहा होता है। दूसरी मुख्य बात यह कि वर्ष में कम से कम दो बार स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर हम झंडे के प्रति नतमस्तक होकर जहां अपनी राष्ट्रभक्ति का प्रदर्शन करते है, वहीं दूसरी ओर झंडे के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ अपनी आंख बंद कर लेते है। नि:संदेह मेरा इशारा ऐसी स्थिति की ओर है, जो हमारे झंडे को जमीन पर पड़ा देखने के बाद भी उसे उठाने की जुर्रत न करने तक अपनी शान दिखा रहा होता है।

तिरंगे झंडे की ऊंचाई और सबसे अधिक ऊंचाई की प्रतिस्पर्धा के आंकड़े रोज नई इबारत लिख रहे है। भारत वर्ष की आत्मा नई दिल्ली में इसका असर कनाट पैलेस में दिखाई पड़ा, जहां 250 फीट से अधिक ऊंचाई पर झंडा लहराया गया। जिस दिल्ली में भारत वर्ष का भविष्य लिखा जा रहा है, वहां के लिए ऐसा करना निहायत ही उचित भी माना जा सकता है। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा, जैसे नारों से देश के अंदर राष्ट्र प्रेम जगाने वाले नेताजी के नाम से प्रसिद्ध सुभाषचंद्र बोस जी की एक 119वीं जयंती के अवसर पर रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने रांची में पहाड़ी मंदिर जिसे फांसी डोंगरी के नाम से भी जाना जाता है, में भी एक ऐसे झंडे को फहराया। उक्त झंडे की लंबाई 66 फीट और चौड़ाई 99 फीट बतायी जाती है। इस झंडे को जो ऊंचाई खंबे के माध्यम से दी गयी वह भी 293 फीट ऊपर पहुंच गयी। नेताजी की मधुर स्मृति में उक्त तिरंगा जहां फहराया गया, उसे द हैंगिग प्वाईन्ट भी कहा जाता है। कारण यह कि उसी स्थान पर 250 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटकाया गया था। बीते कुछ वर्षों में झंडे की ऊंचाई ही वह उपलब्धि मान ली गयी है, जो हमारी राष्ट्र भक्ति को सामाजिक और राजनैतिक रूप से देशवासियों के समक्ष ला रही है।

तेलंगाना को नये राज्य का दर्जा मिलने के साथ ही प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री ने झंडे की ऊंचाई को ही सबसे अधिक महत्व प्रदान किया। हम मुख्यमंत्री की भावनाओं को नमन करते है, किंतु साथ ही राज्य की उसी ऊंचाई और विकास की उम्मीद करते है जो एक प्रतियोगी रूप में झंडे के रूप में अपनाई गयी है। प्रथम मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने राज्य की राजधानी हैदराबाद में 300 फीट ऊंचा तिरंगा लहरा दिया। इसे संजिवैय्या पार्क हुसैन सागर हैदराबाद में 2 जून 2016 को फहराया गया। हम यह जानते है कि तिरंगे से बड़ी शान और तिरंगे से बड़ा अभिमान हिन्दुस्तान में और कुछ नहीं है। तब राज्य और एवं केंद्र में बैठे देश के कर्णधारों से हम यही उम्मीद कर सकते है कि जिस तिरंगे की शान के लिए हमारे हजारों सैनिकों ने अपनी जान कुर्बान कर दी किंतु उसे झुकने नहीं दिया। कुछ ऐसा ही पागलपन इन नेताओं की आत्मा में भी प्रवेश कर जाये। केवल उसी स्थिति में हम गर्व से पूरे विश्व के सामने चौड़े सीने के साथ खड़े होकर कह सकेंगे कि ‘तेरे झंडे से मेरा झंडा ऊंचा।’ आज की वर्तमान स्थिति में हर पल झंडा अपमानित होता है, जब एक अबला अपना स्वाभिमान खेा बैठती है। झंडे की रूह कांप उठती है, जब भ्रष्ट्राचार में लिप्त नेता संसद और विधानसभाओं में देशभक्ति पर आधारित भाषण झाड़ता है और जब पूरे देश को अन्न खिलाने वाला किसान कर्ज में डूबकर अपनी गर्दन लंबी कर लेता है।

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(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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(मप्र में वल्लभ भवन के सामने भी यही हाल है. 300 फुट का पोल नंगा खड़ा है. झंडा कई बार चढ़ा, कई बार फटा. फजीहत से उबरने, झंडे का टंटा ही खत्म कर दिया- अब पोल ह पोल है. दरअसल, सारा मामला कमीशन की 'स्कीम' का ही प्रतीत होता है! - सं)

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