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कसम से वो रातें मस्तानी थीं... / संस्मरण / संजय दुबे

कसम से वो रातें मस्तानी थीं...

संजय दुबे

इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश.

सन 2003 में मैं अमर उजाला कानपुर में था। उन दिनों मैं अपने साथी शांति स्वरूप गौड़ के साथ गोविंदपुरी रेलवे कालोनी में रहा करता था। दोनों लोग अखबार में डेस्क पर थे। शाम को पांच बजे आफिस जाते थे और डेढ़-दो बजे के आसपास छूटते थे। हम दोनों की दोस्ती बड़ी पक्की थी। अब भी है। आफिस में काम समाप्त कर आधी रात के बाद निकलने पर हम दोनों अक्सर या यूं कहिए कि लगभग रोजाना सीधे रूम पर न जाकर जूही रेलवे यार्ड चले जाते थे। कभी मरियमपुर तो कभी बारह खंभे वाली रोड से फजलगंज चौराहा होते हुए रेलवे ओवरब्रिज के नीचे से उछलते-कूदते वहां जाना और रेलवे ट्रैक के ठीक बगल में अंधेरे में बैठकर तेज रफ्तार से भागती ट्रेनों के पहियों के मुवमेंट को देखना बहुत अच्छा लगता था।

रात के समय अक्सर कई बड़ी सुपरफास्ट गाड़ियां गुजरती थीं। कानपुर सेंट्रल स्टेशन नार्थ-सेंट्रल रेलवे जोन में है। वहां लखनऊ और झांसी का रूट भी जुड़ा है। इसलिए हर वक्त कोई न कोई ट्रेन आती-जाती रहती थी। जहां हम बैठते थे वहां से एक फर्लांग की दूरी पर गार्ड रनिंग रूम था। वहीं बगल में एक कैंटीन थी, जहां चाय, समोसे, पपड़ी, मठरी, नमकीन और नशेड़ियों के लिए सिगरेट, गुटका आदि बिकता था। खाली तो हम थे ही। नौकरी कर ही रहे थे। अविवाहित थे, इसलिए किसी भी प्रकार की कोई जिम्मेदारी नहीं थी। सिर्फ मस्ती और मस्तानगी का आलम था।

हां तो हम बताना चाह रहे थे कि हम और हमारे साथी दोनों लोग रात करीब दो-ढाई बजे के आसपास रेलवे ट्रैक से ठीक दो-तीन फीट की दूरी पर एक पत्थर पर रोजाना बैठते और पुरानी फिल्मी गीत गाते-गुनगुनाते थे। इस बीच राजधानी समेत कई बड़ी ट्रेनें तेजी से गुजरती थीं। हम इस इंतजार में रहते थे कि कब ट्रेन गुजरे और हम उसके इंजन से लेकर अंतिम डिब्बे यानी गार्ड के कोच तक के सभी पहियों को देखें। सचमुच बड़ा रोमांचक काम था, लेकिन आसान हर्गिज नहीं था। हमारी आंखों की ठीक सीध में पहिये रहते थे। वहां कोई प्लेटफॉर्म नहीं था। यानि हम ट्रैक के बगल करीब एक फीट नीचे कच्चे रास्ते पर रखे पत्थर पर बैठते थे।

जिस वक्त ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार में आती थी, उस दौरान रात के वक्त रेलवे लाइन के इतने करीब खड़े होना कोई साधारण काम नहीं था। जब ट्रेन करीब आती है तो हवा के झोंके से गिरने का खतरा रहता है। साथ ही ट्रैक स्प्रिंग की तरह ऊपर-नीचे होती है और इसकी वजह से पहिए और ट्रैक से निकली आवाज (अक्सर चिंगारी भी निकलती थी) डरावनी लगती है। जब तक पूरी ट्रेन गुजर न जाए, तब तक उसे देखे बिना चैन नहीं पड़ता था। मेरे साथी को चाय और सिगरेट पीने की जबरदस्त लत थी। मुझे ये दोनों चीज पसंद नहीं थी। फिर भी उनके चक्कर में चाय पी लेता था। और कई दफा साथ में पपड़ी भी खाता था। जूही यार्ड में आने और वहां बैठने का यह काम आफिस की ड्यूटी की तरह था। हम दोनों लोग करीब एक-डेढ़ घंटे तक तो जरूर वहां बैठते थे। हां कभी-कभी इससे ज्यादा हो जाता था, लेकिन इससे कम शायद ही कभी हुआ हो।

यह सिलसिला दो साल तक चला। असल बात यह थी कि मेरे साथी बोलते बहुत हैं और उनकी फिलासफी को सुनना सबके वश की बात नहीं थी। मैं इस काम में उनकी बड़ी मदद करता था। वह बोलते जाते और मैं डंके की चोट पर उनकी हां में हां मिलाता जाता था। बहुत ज्यादा बोलने वाले लोग एक बीमारी के लिए तो सचमुच कारगर दवा हैं। वे सुनने वाले को बाकी चीजें (खासकर दिमाग में टेंशन देने वाली बातें) सोचने का अवसर ही नहीं देते हैं। इससे वह अपने सभी प्रकार के दुख-दर्द को भूला रहता है। वैसे तो हमें कोई टेंशन नहीं थी, लेकिन अखबारी काम तो टेंशन का दूसरा नाम ही होता है। इसलिए उस टेंशन को ये मित्र दूर किए रहते थे।

खैर वहां से निपट कर जब हम रूम की ओर बढ़ते तो ओवरब्रिज से जाने की बजाए हम रेलवे लाइन को ही पार कर कालोनी की तरफ जाते थे। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता था कि एक तो ढेर सारी लाइनों को पार करने में जोश जैसा महसूस होता था और दूसरा कालोनी की सुनसान सड़कों पर आवारा कुत्तों से मुलाकात होती थी। हम यह जानते हुए भी कि आवारा कुत्तों के झुंड से भिड़ना खतरे से खाली नही है, बार-बार उनके बीच से निकलते थे। इससे हम एक अजीब साहस का भाव मन में पाते थे। सच दुस्साहस हम करते ही इसीलिए थे।

आज फिर मन कर रहा है कि वह मस्तानी रात फिर आए। कसम से वे रातें मस्तानी थीं।

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