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भारत: जहां ईश्वर भी देता है नास्तिक होने का विकल्प / अविनाश त्रिपाठी

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धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता भारत की सर्वकालिक चलने वाली बहस है। नास्तिकता भी इसका एक पहलू है। भारत में धर्मनिरपेक्षता या नास्तिकता की नींव हाल-फिलहाल की नहीं है। इसका एक लंबा इतिहास है। इतिहास से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य के भारत के वैचारिक ताने-बाने को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं।

मीरा ने ईश्वर की प्रेमी और पति के रूप में उपासना की। तो सूरदासजी ने ईश्वर के बाल रूप की उपासना की। तुलसीदासजी ने ईश्वर को मर्यादापुरोषत्तम में देखा। तो गोरू गोविंद सिंह जी ने ईश्वर के मातृ रूप को मानकर चंडी चरित्र लिखा। तो वहीं कबीर दास जी ने ई्श्वर को निर्गुण निराकर माना। इस देश में आप और मैं बाध्य नहीं है, ना कभी थे। ईश्वर के किसी एक नाम या गुण की उपासना करने के। यहां हमेशा यह आजादी दी गई कि ईश्वर की चाहे जिस रूप की, चाहे जिस गुण की पूजा की जाए....और अगर कोई ईश्वर को ही ना माने तो ईश्वर और मनुष्य में से वो ईश्वर है जिसे अपना अस्तित्व समाप्त करना पड़ेगा, मनुष्य को नहीं।

मथुरा में एक बालक (कृष्ण) ने यह कहकर ईश्वर (इंद्र) की उपासना करने से मना कर दिया कि इस ईश्वर की उपासना से बेहतर है कि हम इस पर्वत (गोवर्धन) की पूजा करें। जिसमें उगने वाली घास हमारी गाय खाती हैं और उसी से हमारा जीवन चलता है। किसी ने कृष्ण पर ईशनिंदा का आरोप नहीं लगाया।

बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों धर्म नास्तिक धर्म माने जाते हैं। दोनों धर्म मानते हैं कि वेद ईश्वर की वाणी नहीं हैं। मतलब हजारों सालों से इस देश में वैदिक संस्कृति के साथ ऐसे दर्शन भी साथ-साथ चल रहे हैं जो वेद में विश्वास नहीं करते। अपवाद छोड़ दें तो शायद ही यह कभी यह टकराव की कारण बना हो।

हिंदू दर्शन के छह मुख्य दर्शन में से एक दर्शन सांख्य दर्शन है जिसके प्रवर्तक कपिल मुनि है। कपिल मुनि को अनीश्वरवादी माना जाता है। सांख्य दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति भगवान के द्वारा नहीं मानी गयी है बल्कि इसे एक विकासात्मक प्रक्रिया के रूप में समझा गया है और माना गया है कि सृष्टि अनेक अनेक अवस्थाओं से होकर गुजरने के बाद अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई है।

सांख्य दर्शन मानता है कि संसार में उपस्थित हर वस्तु की रचना या तो मनुष्य ने की है या प्रकृति ने की है। तीसरा कोई रचयिता नहीं है। यानी बिल्कुल शुरूआत से नास्तिक दर्शन भारत के वैचारिक पटल पर चल रहा था।

गीता में दूसरे अध्याय में एक श्लोक है।

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।

अर्थ- भगवान कहते हैं- किंतु यदि तू (अर्जुन) इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो ! तू इस प्रकार शोक करने को योग्य नहीं है।

इससे कूल भगवान आपको कहीं नहीं मिल सकते। भगवान कृष्ण बिल्कुल यह नहीं कह रहे कि अगर अर्जुन तूने यह नहीं माना कि आत्मा बार-बार जन्म लेती है और बार-बार मरती है तो मैं तेरी गर्दन काट दूंगा या तूझे नर्क में जलाउंगा।

वो कह रहे हैं कि तू नहीं मानता बिल्कुल मत मान तू यह मानता कि आत्मा एक बार जन्म लेती है एक बार मरती है। (मतलब पुन: जन्म नहीं मानता, पाप-पुण्य नहीं मानता, मोक्ष नहीं मानता) तो भी कोई दिक्कत नहीं है। बस अपने कर्तव्य से मत हट, युद्ध मत छोड़।

यह संभवत: विश्व का अकेला उदाहरण होगा जहां ईश्वर स्वयं मनुष्य को नास्तिक होने का विकल्प दे रहे हैं। लेकिन इन बातों को वर्तमान से सीधा कैसे संबंध है। किसी समाज का वर्तमान स्वरूप कैसा है ये इन बातों पर निर्भर करता है उसके पूर्वज, उसका दर्शन और इतिहास उसे क्या बता रहा हैं क्या सिखा रहा हैं।

भारत का निकट इतिहास देखिए, पारसी ईरान से भारत आए। भारतीयों ने पूछा तुम कौन..  उन्होंने कहा जी हम पारसी..जी हम आग को पूजते हैं... इधर वालों ने कहा होगा हम तो रोज सुबह हवन ही करते हैं हमने से ज्यादा आग को कौन पूजता होगा। स्वागत है। सबसे पहले मुसलमान केरल आए। इन्होंने पूछा- तुम कौन जी हम तो निर्गुण निराकार ईश्वर अल्लाह को मानते हैं। निराकार ईश्वर को तो हम भी मानते हैं। स्वागत है। मूर्तिपूजक आए। तिबब्ती आए कि तुम कौन जी बौद्ध....बौद्ध! गौतम को तथागत बनाया हमने तुम भी आ जाओ...कम्यूनिस्ट आए कि तुम कौन नास्तिक...नास्तिक अरे कपिल मुनि से चार्वाक से पुराने नास्तिक थोड़ी होंगे, तुम भी आ जाओ... दुनिया में पहली बार कम्युनिस्ट सत्ता में चुनाव जीतकर केरल में ही आए। और यह सब तब हो रहा था जब ना तो फ्रांस की क्रांति हुई थी और ना ही संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया था।

भारत की ही यह वैचारिक श्रेष्ठता है कि विश्व का सबसे पुराना धर्म वैदिक धर्म, हिंदू धर्म भारत से शुरू हुआ। तो वहीं विश्व का सबसे नया धर्म सिख धर्म भी भारत से ही शुरू हुआ। दुनिया की सबसे पुरानी धार्मिक किताब माने जाने वाले वेद भारत में लिखे गए तो दुनिया के सबसे नए भगवान सांई बाबा भी यहीं पर हुए। दुनिया में किसी एक देश में एक धर्म को मानने वाले सबसे ज्यादा लोग (करीब 90 करोड़ हिंदू) भारत में हैं। तो दुनिया की सबसे छोटा धार्मिक समुदाय पारसी भी भारत में ही हैं।

विश्वास कीजिए यह सब इसलिए नहीं है क्योंकि भारत मधुमक्खी का छत्ता है अगर सिर्फ यह कारण होता तो दुनिया में दो-चार छत्ते और होते। यह इसलिए है क्योंकि यहां हमेशा कही गई बात में कुछ जोड़ने की, उसे नकारने की और नई बात कहने की गुंजाइश बनी रहती है। इंद्र को नकारने वाले कृष्ण भगवान बन गए तो एक समय आने पर आर्य समाज ने ही यह कह दिया कि राम और कृष्ण भगवान थे ही नहीं, महापुरुष थे। सोवियत संघ में कम्यूनिस्ट शासन के दौरान कोई मार्क्स के विचार को नकारकर कोई नया विचार देने की सोच भी नहीं सकता था। चीन में आज भी कोई माओ को नकार नहीं सकता। अगले हजार सालों में भी अरब में कई नया धार्मिक विचार शुरू नहीं होगा...लेकिन भारत...मेरा मानना है कि यह देश अगले हजार साल में दुनिया को कम से कम दो-तीन नए भगवान (सांई बाबा के बाद) और एक दो नए धार्मिक दर्शन दे देगा और नास्तिकता तो साथ चल ही रही रही है। बशर्ते कि इसकी जमीन बंजर ना हो।

आज जो छद्म प्रगतिशीलता- छद्म धर्मनिऱपेक्षता हमें सिखाई जा रही वो इस देश की वैचारिक जमीन को सिर्फ बंजर करेगी। वो सिर्फ एक भगवान और एक विचारधारा की तानाशाही को ही अंत में थोपेगी।

गर्व से कहिए आप भारतीय हैं। क्योंकि सिर्फ यही वो जगह है जहां ईश्वर भी मनुष्य को नास्तिक होने का विकल्प देता है।

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