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श्रेष्ठ बौद्ध कहानियाँ / प्रिय वस्तुएँ दुःख का कारण होती हैं / व्यथित हृदय

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वह एक गृहपति था, था जाति का वैश्य । उसके एक लड़का था । लड़का था उसके प्राणों का दुलारा, उसकी आँखों की पुतली । वह उसी को देखकर जीता था, उसी को देखकर सुख से जीवन के दिन बिताता था । पर दुर्भाग्य! एक दिन लड़का उसकी सुख की दुनिया उजाड़कर इस संसार से चल बसा । गृहपति उसके वियोग में पागल हो गया ।

वह एक दिन, पर्यटन करता हुआ श्रावस्ती जा पहुँचा । उस समय श्रावस्ती के जेतवन में भगवान् बुद्ध निवास करते थे । वह भगवान् बुद्ध के पास गया और उन्हें आदर से प्रणाम कर एक ओर बैठे गया ।

भगवान् ने उसके उदार चेहरे .की ओर देखकर कहा- ''गृहपति! तेरी इंद्रियाँ कुछ चंचल मालूम पड़ती हैं । क्या इंद्रियों में कुछ विकार उत्पन्न हो गया है? ''

''महाराज! '' गृहपति ने उत्तर दिया-''मेरी इंद्रियों में विकार क्यों न पैदा हो जाय? क्यों न उनमें चंचलता आ जाय? हाय, मेरा प्यारा, इकलौता बेटा, मेरी सुख की दुनिया उजाड्‌कर इस संसार से चल बसा' । मैं उसी के वियोग में मर रहा, उसी के शोक में गली-कूचों में भ्रमण कर रहा हूँ ।'' ठीक है गृहपति! '' भगवान् बुद्ध ने कहा-'''संसार में दुःख, शोक और सब विपत्तियां भी अपनी प्यारी वस्तुओं ही से उत्पन्न हुआ करती हैं! ''

गृहपति कुछ चौंका, उसे कुछ आश्चर्य हुआ । उसने भगवान् बुद्ध की ओर आश्चर्य-भरी दृष्टि से देखकर उत्तर दिया-''ऐसा क्यों महाभाग! भला कहीं प्रिय वस्तुओं से शोक, दुःख और विपत्ति भी होती है? ''

इसके बाद वह वहाँ एक क्षण के लिए भी न रुका और बिना बुद्ध-भगवान् को प्रणाम किये ही वहाँसे चल पड़ा । अभी कुछ ही दूर गया होगा, कि उसे जुआरियों का एक अड्‌डा. मिल-। । कौड़ियों बज रही थीं । जुआरी क्रीड़ा में व्यस्त थे । गृहपति ने वहाँ पहुँचकर निन्दा के स्वर में कहा-''भला, गौतम को तो देखो! वह कहते हैं, संसार में दुःख, शोक और विपत्तियों की उत्पत्ति प्रिय वस्तुओं से हुआ करती है! मुझे तो उनकी बात तनिक भी नहीं रुची ।''

सभी जुआरी एक स्वर में हँसे । सबने ठहाका मारकर उत्तर दिया-''नहीं, गृहपति, तुम ठीक कहते हो । प्यारी वस्तुएँ संसार में सुख और आनन्द के लिए हैं । उनसे दुःख और शोक की कल्पना करना तो निरी मूर्खता है ।''

गृहपति खुशी से फूला न समाया । जुआरियों ने उसकी बात का समर्थन किया! अब क्या चाहिए? वह अपने को ठीक मार्ग पर समझकर, लगा गौतम के इस विचार के विरुद्ध प्रचार करने । बात ही तो है, उसके फैलते कितनी देर लगती है! राजा प्रसेनजित् के कानों में उसकी आवाज पड़ी ।

प्रसेनजित् भी गौतम के इस विचार से आकुल हुआ- घबड़ाया। उसने-शुद्ध-पुजारिन-मल्लिका देवी को बुलाकर कहा- ''मल्लिका! अपने श्रमण गौतम का उपदेश तो सुनो । उन्होंने एक गृहपति वैश्य से कहा है कि संसार में प्रिय वस्तुएँ ही दुःख का कारण हुआ करती हैं? क्या यह ठीक है, मल्लिके मेरी समझ में तो ऐसा कभी नहीं हो सकता ।''

मल्लिका कुछ देर तक चुप रही । इसके बाद उसने सिर ऊपर कर उत्तर दिया-महाराज यदि गौतम भगवान् ने-यह कहा. है, तो ठीक ही होगा ।''

. ठीक ही होगा,'' प्रसेनजित् ने कर्कश स्वर में कहा-''गौतम जो कुछ कहे, तू उस सब का अनुमोदन ही किया करती है, मल्लिका, यह सब तेरा भ्रम है । तुझे भ्रम के इस रास्ते पर जान- बूझकर भटकते हुए देखकर मेरी आँखें जली जा रही हैं । जा, हट जा यहाँ से ।''

मल्लिका प्रसेनजित् की आँखों के सामने से हट गई, पर ? दुख का एक भार हृदय पर लादकर । पर क्या वह चुप रहेगी नहीं, भगवान् बुद्ध के विरुद्ध वह एक शब्द भी सुनना पसन्द नहीं करती! उसने शीघ्र नालिजंघ नामक ब्राह्मण को बुलाकर कहा-''तुम भगवान् बुद्ध के पास-जाओ- और उनके चरणों में मल्लिका का सादर प्रणाम करके कहना कि संसार में प्रिय वस्तुएं और शोक का कारण कैसे आ करती! देखो भू न दुःख हु हैं ल जाना । भगवान् के कहे हुए एक-एक शब्द को हृदय-पट पर अंकित-सा करलेना ।''

नालिजंघ ने बुद्ध के पास जाकर, उन्हें मल्लिका का निवेदन सुना 'दिया । गौतम ने उत्तर में कहा-''हाँ, ठीक है ब्राह्मण, संसार में प्रिय वस्तुएँ ही दुःख और शोक का कारण हुआ करती हैं । इसी श्रावस्ती में कुछ दिन पूर्व एक स्त्री की माता मर गई थी । वह उसके वियोग में इतनी विक्षिप्त बन गई थी कि उसे अपने शरीर का भी ध्यान नहीं रहता था । वह फलों, से, पत्तों से, वृक्षों से, राह चलते मुसाफिरों से-सबसे यह प्रश्न करती थी कि क्या. कहीं तुमने मेरी माँ को देखा है? ऐसा क्यों बाह्मण? इस- लिए कि उसे उसकी माँ बड़ी प्यारी थी । इसी तरह श्रावस्ती की एक स्त्री अपने पीहर. गई । उसके भाई-बन्धु उसे उसके पति से

छीनकर दूसरे के हवाले करना चाहते थे! किन्तु स्त्री को यह स्वीकार न था । उसने अपने पति को यह संदेश दिया । उसके-पति ने इस विचार से कि स्वर्ग में हम दोनों फिर एकसाथ हो जाएंगे, अपनी स्त्री को मारकर, अपनी भी इहलीला समाप्त कर ली ।'' बुद्ध की बातों से नालिजंघ' को बड़ा संतोष हुआ । वह उनके चरणों में आदर-अभ्यर्थना प्रकट कर लौट गया और मल्लिका को उनकी शिक्षा का सारांश बता दिया । मल्लिका सुनकर बड़ी प्रसन्न हुई । वह प्रसेनजित् के पास गई और उनसे कहने लगी : ''महाराज, आज मैं आपको यह बताने आई हूँ कि वास्तव में संसार में प्रिय वस्तुएँ ही दुःख और शोक का कारण द्रुआ करती हैं ।''

प्रसेनजित् सावधान होकर मल्लिका की ओर देखने लगे? मल्लिका ने कहा-''महाराज, आपकी प्रिय पुत्री वज्जिणी आपको प्यारी लगती है न ''

''क्यों नहीं मल्लिके '' प्रसेनजित् ने उत्तर दिया-वह तो मेरी आँखों की पुतली है ।''

तब मल्लिका ने कहा-''यदि वज्जिणी के जीवन पर विपत्तियों का आक्रमण हो तो क्या आप उससे दुःखी न होंगे? '' ''दुखी ही नहीं हूँगा मल्लिके, बल्कि उसे अपने जीवन पर होनेवाला आक्रमण समझूंगा ।''

इसी: भाँति मल्लिका? ने प्रसेनजित् को अत्यन्त प्रिय लगने वाले सेनापति, प्रजाक्षत्रित्व और राजमहिषी तथा कोशल नगरी के सम्बन्ध में भी प्रश्न किये । प्रसेनजित् नेप्र त्येक बार यही उत्तर दिया, कि इन पर दुःख पड़ने से मुझे दुःख ही नहीं होगा, बल्कि उससे मेरे जीवन का अन्त भी हो सकता है'।

मल्लिका मुस्कुराई । उसने राजा के समीप जाकर कहा- ''महाराज! अब तो भगवान् बुद्ध की बात समझ में आ गई न ?'' प्रसेनजित् के ज्ञान-पट जैसे खुल गए । उन्होंने भूल के भार से दबकर कहा-' 'मल्लिका! सचमुच भगवान् बुद्ध जीवन की कसौटी पर खरी उतरने वाली बात ही का सदैव उपदेश दिया करते हैं । आओ, हम-तुम एकसाथ जिधर भगवान् बुद्ध हैं, उसी ओर मुँह करके उन्हें प्रणाम करें!''

प्रसेनजित् और मल्लिका दोनों घुटने टेककर श्रावस्ती की ओर मुँह करके बैठ गए । दोनों के हाथ जुड़े थे, दोनों की आखें बन्द थीं, दोनों की इस हार्दिक भक्ति को देखकर यदि भक्ति भी मन ही मन ईर्ष्या करने लगी हो तो आश्चर्य क्या?

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(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार)

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जिंदगी की सीख देते हैं ये कथाएं .
बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..

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