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चीनी कहानी / जब मैं लाल आकाश वाले गांव में थी / तिंग लिंग

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तिंग-लिंग''

चीन की साम्यवादी महिला-लेखकों में सबसे प्रसिद्ध लेखिका का साहित्यिक नाम । का जन्म हुनान प्रान्त में हुआ । अनेक साम्यवादी नेताओं को जन्म देने का श्रेय इस प्रान्त को है । जनवादी चीन के राष्ट्रपति माओत्सेतुंग का जन्म भी इसी प्रान्त में हुआ था ।'' एक सम्पन्न जमींदार परिवार में जन्म लेने के बाद तिंग लिंग ने छोटी अवस्था में ही अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया । साहित्य के मार्क्सवादी दृष्टिकोण को अपनाने से पहले उन्हें एक लम्बा मार्ग तय करना पड़ा । सन् १९२३ में ही तिग-लिंग का सम्पर्क चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन मंत्री चू चियू पाई से अपनी एक घनिष्ठ सखी वांग चुन हुंग द्वारा हो गया था । इस सहेली की मृत्यु से तिंग-लिंग को गहरा मानसिक आघात पहुँचा जिसके फलस्वरूप उन्होंने 'एक औरत' और ‘सौफी की डायरी' की रचना की जिनमें किशोरावस्था के मानसिक उद्वेगों तथा दोनों सखियों के पारस्परिक स्नेह का वर्णन है ।

पेकिंग में आपकी भेंट हू ये पिंग से हुई । बाद में दोनों का विवाह हो गया । इसी बीच आपका सम्पर्क उपन्यासकार शेंग-सुंग वेन से हुआ और पति-पत्नी दोनों ने वामपक्षी पत्रिका 'श्वेत और श्याम' निकालने में सहयोग दिया ।

कोमिन्तांग के प्रतिक्रियावादियों द्वारा तेईस वर्ष की छोटी अवस्था में ही हूं ये पिंग मौत के घाट उतार दिये गये । तिग-लिंग के रोष का पारावार न रहा । वे जी जान से कोमिन्तांग-विरोधी प्रचार-कार्य में जुट गई और साम्यवादी पत्रिका ध्रुवतारा' की सम्पादिका बन गई । प्रकाशन के एक वर्ष बाद ही इस पत्रिका को दमन का शिकार होना पढ़ा ।

इसी समय से तिग-लिंग के विचारों पर कम्युनिस्ट दृष्टिकोण का पूरा प्रभाव दिखाई देने लगता है । उनकी प्रारंभिक रचनाओं में पाई जाने वाली बुर्जुआ भावुकता का स्थान वर्ग-संधर्ष में सर्वहारा वर्ग के प्रति उनके स्पष्ट समर्थन ने ले लिया । उनकी सबसे अधिक उल्लेखनीय कहानी 'पानी' जो सन् १९३१ में छपी थी, उनके इस दृष्टिकोण- परिवर्तन का प्रतीक है । इस कहानी में बाढ़-पीड़ित किसानों के महान प्रयत्नों का सजीव चित्रण हुआ है ।

सन् १९३३ में कोमिन्तांग के नीली वर्दी वाले सिपाहियों ने तिंग- लिंग को अपहरण करके नान्किंग में कैद कर दिया, जहाँ से तीन वर्ष बाद वे भाग निकलीं और आकर येनान के एक साम्यवादी केन्द्र में उन्होंने आश्रय लिया । चीन की जन-स्वातंत्र्य सेना की शिक्षा तथा अनुशासन के फलस्वरूप की साहित्यिक चेतना और भी गहरी हो गई । जापान-विरोधी युद्ध में सक्रिय भाग लेने के कारण आपको समूचे संघर्ष का प्रत्यक्ष अनुभव रहा है जैसा कि उनकी बाद में अत्यन्त लोक-प्रिय कहानी 'जब मैं लालआकाश वाले गाँव में थी' से स्पष्ट है ।

तिग-लिंग की अन्य उल्लेखनीय कृतियों में सन् १९५० में प्रकाशित 'उत्तरी शेन्सी की हवा और सूरज' तथा उनका उपन्यास ‘सांग्‌कन नदी के किनारे' सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं ।

जब मैं लाल आकाश वाले गाँव में थी

जापान-विरोधी युद्ध के दौरान मुझे आठवीं जनवादी सेना के साथ मोर्चे पर रहने का अवसर मिला । एक बार पतझर के मौसम में हम सुदूर उत्तर के किसी प्रान्त में थे । दुर्भाग्य से मैं बीमार पड़ गई और अभी पूरी तरह स्वस्थ भी न हो पाई शी कि जिले के राजनीतिक विभाग के अध्यक्ष कामरेड मो यू ने मुझे पास ही के किसी गाँव में जाकर आराम करने का आदेश दिया । वैसे तो मेरी सेहत काफी सुधर चुकी थी, लेकिन एक लेखिका की दृष्टि से मैं यह अवसर नहीं खोना चाहती थी, क्योंकि इतने सुरम्य स्थान में जाकर मैं आसानी से अपने पिछले तीन महीनों की डायरी को दुबारा ठीक ढंग से लिख सकती थी । इस लिए मैं लाल! आकाश वाले गांव में जाने के लिए खुशी-खुशी राजी हो गई । यह गांव वहाँ से करीब दस मील' की- दूरी पर था । मुझे वहाँ पन्द्रह दिन गुजारने थे ।

चूँकि हमारे पास घोड़े नहीं थे, इसलिए वहाँ पहुँचने में पूरा दिन लग गया । मेरे साथ प्रचार-विभाग की एक महिला साथी भी थी । मेरा विचार है कि वह किसी विशेष काम के लिए वहाँ जा रही थी । लेकिन वह मितभाषी थी, इसलिए रास्ते में हमारी विशेष बातचीत नहीं हुई । इसके अलावा उसकी चाल भी कुछ बेढब थी, क्योंकि उसके पाँव बचपन में बाँधे जा चुके थे । मेरा शरीर भी बीमारी के कारण अभी शिथिल था । हम लोग तड़के ही चल पड़े थे, लेकिन उस गाँव तक पहुँचते-पहुँचते सूरज पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा था ।

दूर: से देखने पर तो यह गाँव भी अरि गाँवों की तरह ही दिखाई देता था । पर मैं जानती थी कि इस गाँव में एक सुन्दर रोमन कैथोलिक गिरजे की इमारत और चीड़ का एक छोटा-सा वन अभी तक मौजूद है, और मुझे ऐसी जगह ठहराया जायगा, जहाँ से गिरजे का दृश्य समग्ररूप से दिखाई देगा । गिरजे के चिन्ह तो अभी देखने में नहीं आये थे लेकिन पहाड़ी के ढलवान पर बनी गुफाओं की साफ-सुथरी कतारें दिखाई देने लगी छ-। । जरूर ही इनमें लोग रहते होंगे, मैंने सोचा । उनके द्वारों पर लगी सदाबहार की सघन लताएं रह-रह कर झूम उठती थीं । गाँव के आसपास की बड़ी सड़क पर अनेकों वेदवृक्ष भी लगे थे । सारा. दृश्य इतना रमणीय था कि मैं मन ही मन वहाँ दो सप्ताह के लिए टिकने के विचार मात्र से पुलकित हो उठी ।

अचानक ही मुझे अपनी साथिन के कमजोर पैरों का ख्याल हो आया । मैंने उसे कुछ देर रुक कर विश्राम करने की सलाह दी । ''हम यहाँ आ तो पहुँचे ही है, क्यों न आगे चलने से पहले थोड़ा सुस्ता ले ?'' वैसे तो अपनी साथिन द्वारा दिये गये विवरण को सुनकर मैं मन ही मन इस गाँव के निवासियों से परिचित हो चुकी थी । लेकिन गाँव में घुसने पर हमें कोई औरत, मर्द या कुत्ता भी न दिखाई दिया । हवा के तेज झोंकों से सिर्फ कुछ पत्ते उड़कर हमारे पैरों पर गिर रहे थे ।

''यहाँ पहले एक प्राइमरी स्कूल हुआ करता था ।'' आह कुई ने मुझे चलते-चलते बताया । ''लेकिन पिछले साल जाने से पहले जापानी शैतान इसको तहस-नहस कर गये । उन सीढ़ियों की ओर देखो । पहले वह एक बड़े हॉल से जुड़ी हुई थीं ।'' मेरी साथिन आवेश में आ गई थी, और दिन भर की चुप्पी की कमी अब पूरी कर रही थी । काँटों से भरे एक चौरस मैदान की ओर इशारा करते हुए उसने कहा, डेढ़ साल पहले इस जगह कितनी रौनक रहती थी! खाना खाने के बाद हमारे साथी यहीं बैठ कर हँसते-खेलते थे । ''

कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर आवेश में आ गई । उसे सारी स्थिति पर मानो खीज-सी आ रही थी । ' 'क्या बात है कि आज आस- पास कोई भी नहीं दिखाई देता? हम पहले किधर जायें? गाँव के दफ्तर की ओर या पहाड़ी पर?'' फिर मानो अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं देते हुए उसने कहा ' 'मैं पहाड़ी का रास्ता तो जानती हूँ, फिर भी पूछताछ कर लेना ठीक रहेगा । और हमें अपने सामान का पता ई कर लेना चाहिए । ''

गाँव के दप्‌तर की दीवार पर अनेक नोटिस चिपके हुए थे ले किन कमरे में मौत का सा सन्नाटा था । सात या आठ मेजें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं, लेकिन वहाँ भी कोई नहीं दिखाई दिया । कुछ देर बाद किसी के पाँव की आहट सुनाई दी । एक आदमी तेज चाल से वहाँ से गुजरा । उसने कनखियों से हमारी ओर देखा, फिर जैसे कुछ पूछने के लिए उसके क़दम जरा सा रुके लेकिन न जाने क्या सोचकर वह चुपचाप दरवाजे की ओर चल दिया । हमने फौरन उसे वहीं जा घेरा । हमारे पूछताछ के जवाब में उसने विवश होकर इतना ही कहा, ' 'सब लोग कहाँ गये? सब के सब गाँव के पश्चिमी हिस्से में चले गये हैं और सामान? अरे हाँ, कुछ सामान यहाँ आया था, बहुत देर पहले, उसे पहाड़ी के ऊपर मा ल्यू के घर पहुँचा दिया गया है । '' इतना कहकर वह हमारी ओर टुकर- टुकर ताकने लगा ।

जब हमें मालूम हुआ कि वह किसानों के जापान-विरोधी संगठन का सदस्य है तो हमने उससे रास्ता दिखाने का आग्रह किया । साथ ही मैंने एक स्थानीय कामरेड के लिए लिखा हुआ परिचय-पत्र उसके हाथों में पकड़ा दिया । उसने कहा कि वह पत्र तो पहुंचा देगा, लेकिन हमारे साथ जाना उसके लिए कठिन है । और फिर मानो हम दोनों से पीछा छुड़ाने के लिए वह जल्दी-जल्दी वहाँ से चल दिया ।

गाँव की सड़कें सुनसान थीं । कुछ घरों के दरवाजे खुले थे और कुछ के बन्द । हमने कुछ खिड़कियों से झाँक कर अन्दर देखा तो निवा अंधेरे के कुछ न दिखाई पड़ा । हम चाहते थे कि कोई ऐसा आदमी मिले जिससे हम रास्ता पूछें । लेकिन किससे पूछे, कुछ समझ में न आता था । सौभाग्य से आह कुई इस गाँव से भली-भाँति परिचित थी, और हम दोनों ने पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया । सर्दियों के दिन छोटे होते हैं, इसलिए जल्दी ही अंधेरा पड़ने लगा ।

पहाड़ी विशेष ऊंची नहीं थी । कुछ दूर चढ़ने के वाद हमें रास्ते में बहुत-सी गुफाएँ दिखाई दीं । कुछ लोग सामने के बने चबूतरों पर खडे थे ।

यद्यपि आह कुई को भलीभाँति मालूम था कि हम 'अपनी मंजिल के काफी निकट आ पहुंचे हैं तो भी वह हर किसी से मा ल्यू के घर का पता पूछती जाती थी, ''क्या मा ल्यू के घर का यही रास्ता हैं मेहरबानी करके हमें मा ल्यू के घर का रास्ता बता दीजिए ।'' एकाध बार उसने यह भी पूछा, ''क्या आपने मा ल्यू के घर किसी को सामान ले जाते देखा है? क्या वह घर पर ही है ?''

सब लोगों ने सन्तोषजनक उत्तर दिए और हमें विश्वास दिलाया कि हम ठीक रास्ते पर ही जा रहे हैं । उनकी सहायता से हम लम्बी चढ़ाई पार करके पहाड़ी की सब से ऊंची चोटी तक पहुँचे जहाँ ल्यू दम्पति रहते थे । हमें देखते ही उनके कुत्तों ने भोंक कर हमारा स्वागत किया ।

फौरन ही कुछ लोग दिखाई दिये । जब उन्हें हमारे आने का समाचार मिला तो दो और आदमी वहाँ आ गये और मशाल की रोशनी में हमें बायीं ओर की गुफा में ले गये । गुफा में कोई फर्नीचर नहीं था, लेकिन बीचों-बीच बनी काँग' पर मेरा बिस्तर, छोटा चमड़े का बक्स रखा था । आह कुई का सामान भी वहीं था ।

आह कुई वहाँ की कई औरतों से परिचित थी इसलिए वे सब की सब पुल-मिल कर बातें करने में तल्लीन हो गई । कुछ देर बाद औरतें उसे घसीट कर अपने साथ ले गई । मैं अकेली रह गई थी । मैंने सोने के लिए अपना बिस्तर ठीक किया, और इस नई जगह में अजनबीपन का अनुभव करने लगी. । अभी मैं सोने के लिए बिस्तर पर लेटी ही थी कि झुण्ड की झुण्ड औरतें गुफा में घुस आयीं । उनमें से एक के हाथ में तरकारी की बड़ी-सी हँडिया थी, आह कुई, मा ल्यू और एक नन्ही लड़की के हाथों में प्याले, लकड़ी के चम्मच और प्यास और लाल-मिचों से भरी एक तश्तरी को नीचे रखकर लड़की बाहर चली गई और दूसरे ही क्षण जलते हुए कोयलों की एक अँगीठी लेकर लौट आई ।

उन्होंने मेरी जी-जान से खातिर की और बार-बार तरकारी खाने का आग्रह करने लगीं । कई स्त्रियों ने बड़े दुलार से फेरे शरीर पर हाथ फेरा । लेकिन कुछ देर बाद ही वह अपनी पहले वाली बातचीत में पुन: तल्लीन हो गई । मा ल्यू और उसकी पतोहू कांग पर जा बैठे । उनकी मुँख-मुद्राएँ अत्यन्त रहस्यमय थीं मानों वे आपस में किसी भेद का आदान- प्रदान कर रही थीं । पहले तो मुझे सन्देह हुआ कि शायद वे मेरे बारे में कानाफूँसी कर रही हैं, लेकिन अगले ही क्षण ख्याल आया कि मेरे आने 'से इतनी तीव्र उत्सुकता का जगना असंभव है । इसके अलावा मैं व्यर्थ ही बाल की खाल निकालना भी नहीं चाहती थी । इसलिए मैंने चुप रहना ही ठीक समझा । लेकिन उन लोगों की बातों का कोई सिर-पैर समझ में न आता था । विशेषकर मा ल्यू बड़े ही रहस्यमय ढंग से धीमे स्वर में कुछ फुसफुसा रही थी । आह कुई की चुप्पी तो जैसे काफूर हो गई थी । उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व बदल-सा गया था । उसके बोलने के ढंग से कार्य-कुशलता का आभास मिलता था । वह बड़ी संजीदगी से हर मामले में अपनी राय दे रही थी । साथ ही साथ औरों की बातें भी ध्यान से सुनती जाती थी । मैं उसके चेहरे को देख कर जान गई कि वह काम की बातों को फौरन पकड़ लेती है । बाकी औरतें बीच-बीच में टीका-टिप्पणी कर देती थीं । लेकिन अधिकतर वे आह कुई के शब्दों को सतर्क- होकर सुन रही थीं ।

अचानक ही कुछ शोर-गुल सुनाई पड़ा । लोगों के झुण्ड के झुण्ड गिन में खड़े चिल्ला रहे थे । मा ल्यू झटपट कांग से उतर कर सब औरतों समेत गुफा के बाहर भागी । मैं भी हैरानी से उनके पीछे हो ली । इस समय बाहर घोर अन्धकार छाया था । सिर्फ लाल कागज' की बनी दो लालटेनें रह-रह कर टिमटिमा रही थीं । मैं भीड़ में घुस गई, लेकिन मुझे कुछ भी नहीं दिखाई दिया । लोगों की बातचीत सुन कर मेरी ईरानी और भी बढ़ गई ।

''क्या तुमने उसे देखा ?''

''क्यों नहीं, लेकिन मुझे डर-सा लगा ।''

''काहे का डर? आखिर वह भी तो और औरतों कीं तरह एक औरत ही है । क्या वह पहले से अधिक सुन्दर नहीं दिखाई देती ?''

मैं समझी कि यह बातचीत किसी नई दुलहिन के बारे में थी । लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला । फिर मैंने सोचा कि हो सकता है कि किसी कैदी स्त्री के बार में ये लोग बातें कर रहे हों । लेकिन यह बात भी न थी । मैं चुपचाप लोगों के पीछे चलकर बीच की गुफा में पहुँची । लोगों के चेहरों पर मशालों की धुएँ से भरी रोशनी पड़ रही थी । मैं टकटकी लगाकर उनकी ओर देखती रही, लेकिन मामला कुछ समझ में न आया । मैं अपना-सा मुँह लेकर वहाँ से खिसक आई । कुछ मिनटों में ही सारा गिन खाली हो गया । बाकी लोग भी बाहर आ रहे थे ।

लोगों की हलचल के कारण मेरे लिए शान्तिपूर्वक सोना असम्भव हो गया था । इसलिए मैंने गुफा में लौट कर अपना चमड़े का सन्दूक खोला और बारी-बारी से सब चीजें बाहर निकालने लगी । सफर की थकान के बावजूद नये अनुभवों की कल्पना से ही मेरे मन को एक नई स्फूर्ति मिली ।

मैं अभी इसी उघेड़-बुन में थी कि समय का सही उपयोग कैसे किया जाय, क्योंकि मैंने अगले दिन से ही लिखने का पक्का इरादा बना रखा था, कि इतने में एक आवाज सुनाई पड़ी । ''अभी तक नींद नहीं आई, कामरेड ?''

मेरे जवाब देने से पहले ही आगन्तुक कमरे में दाखिल हो चुका था । मैंने बीस वर्ष के एक सुसंस्कृत किसान को अपने सामने खड़ा पाया ।

''मुझे अध्यक्ष मो का पत्र कुछ देर पहले ही मिला है ।'' उसने मुझे आश्वासन देते हुए कहा । ''और स्थानों की अपेक्षा यहाँ अधिक शान्ति है । मा ल्यू आपकी देख-भाल करेंगी । यदि किसी चीज की जरूरत हो .तो आप निस्संकोच उनसे कह दें । अध्यक्ष मो ने अपने पत्र में लिखा है कि आपका इरादा यहाँ केवल पन्द्रह दिन टिकने का है । पर यदि आपकी इच्छा हो तो आप जरूर कुछ दिन और ठहरें । मैं बगल वाले हाते में रहता हूँ । अगर जरूरत पड़े तो आप यहाँ से किसी के हाथ भी सन्देश भेजकर मुझे बुलवा सकती हैं ।''

उसे मेरे साथ एक ही काँग पर बैठने में कुछ संकोच-सा अनुभव हुआ, न ही कमरे में बैठने के लिए कोई स्टूल था; इस लिए मजबूर होकर मुझे काँग से नीचे उतर कर उसके पास खड़ा होना पड़ा ।

आहा'', मैंने कहा, ''तो आप ही कामरेड मा हैं, आपको मेरा भेजा हुआ पत्र मिल गया ।'' मुझे सहसा ख्याल आया कि वह अभी मिडिल स्कूल का विद्यार्थी ही था, लेकिन तो भी इस गांव में उसे महत्वपूर्ण पद सौंपा गया था ।

उसने मेरे खुले हुए सन्दूक में पड़े कागजों की ओर देखकर कहा, ''मुझे मालूम हुआ है कि आपने ढेर-सी किताबें लिखी हैं लेकिन हमारे यहाँ तो आपकी किताबें बिकने के लिए कभी नहीं आई इसी लिए मैं अभी तक आपकी कोई किताब नहीं पढ़ पाया ।''

इसके वाद हम काफी देर तक गाँव में राजनीतिक सिद्धान्तों की शिक्षा के प्रबन्ध के बारे में बातें करते रहे और उसने इस कार्य में मेरी सहायता माँगी ।

''सांस्कृतिक मनोरंजन की समस्या हमारे लिए एक अच्छी-खासी सरदर्दी है, उसने स्वीकार किया ।

अगर मैं इस श्रेणी के नौजवानों से परिचित न होती तो शायद उसकी बातों में अधिक दिलचस्पी लेती । लेकिन मोर्चे पर रहने के कारण मेरा सम्पर्क इतने अधिक लोगों से हुआ है कि यह जानते हुए भी कि वह मुझसे इतने भिन्न है, मुझे उनकी बातों पर अधिक हैरानी नहीं होती । इसी लिए उसकी समस्याओं के बारे में कोई पूछताछ करने की बजाय मैंने उन बातों के वारे में पूछना ही अधिक उपयुक्त समझा जो मेरे दिमाग में चक्कर काट रही थीं ।

''अभी किस बात पर इतना शोरगुल मचा था? '

''मा ल्यू के पति की भतीजी अभी लौटकर आई है । मुझे तो सपने में भी ख्याल नहीं आ सकता था कि वह चेन-चेन इतनी प्रसिद्ध वीरांगना बन जायगी ।'' अचानक ही मुझे लगा कि उसकी. आँखों में से स्नेह और उल्लास की किरणें फूटने लगी हैं । मैं कुछ पूछने ही वाली थी कि उसने समझाते हुए कहा, ''वह अभी जापानियों के यहां- से लौटी है । वहाँ वह साल भर तक हमारे लिए काम करती रही ।''

!

आह '' मैं अपने आश्चर्य को दबाने में असमर्थ थी ।

वह अभी मुझे और बातें बताने को ही था कि इतने में बाहर से किसी के पुकारने की आवाज सुनाई दी और वह चला गया । जाने से पहले उसने वायदा किया कि वह अवश्य ही अगले दिन चेन-चेन को मुझसे मिलने के लिए भेजेगा । वह चाहता था कि मैं चेन-चेन पर विशेष ध्यान दूँ क्योंकि उसके पास काफी सामग्री है ।'' शायद उसका मतलब मेरे लिए उपयुक्त साहित्यिक सामग्री से था ।

उस रात को आह कुई बड़ी देर से लौटी और बिस्तर पर लेटने के बाद भी वह इधर-उधर कर-, बदलती और ठंडी साँसे भरती रही । मैं बहुत थकी हुई थी, फिर भी शाम की घटना को जानने की उत्सुकता मेरे मन में बराबर बनी थी । लेकिन आह कुई से मैं कोई बात न निकाल पाई ।

''नहीं कामरेड, मैं आपको नहीं बता सकती'', उसने एक लम्बी साँस लेकर कहा । ''इस समय मेरा चित्त ठिकाने नहीं है । शायद मैं कल आपको इस सम्बन्ध में कुछ बता सकूँ । हाय! हम औरतों को क्या कुछ बर्दाश्त नहीं करना पड़ता ?''

फिर उसने अपने मुँह पर चादर तान ली और चुपचाप लेट गई । अब उसकी ठंडी साँसे भी बन्द हो गई थीं, मालूम नहीं, उसे कब नींद आ गई ।

दूसरे रोज जब मैं तड़के ही सैर करने के लिये निकली, तो मैंने अपने-आपको गाँव में पाया । एक पंसारी की दुकान देख कर मैंने सोचा कि कुछ देर वहीं सुस्ता लूंगी, और पुलाव में डालने के लिये ढेर-सी खजूरे ले जाकर मा ल्यू को सौंप दूँगी । मैंने दुकान वालों से कहा कि वे खजूरे पहुंचाने के लिये किसी आदमी को मेरे साथ घर तक भेज दें । ज्यों ही दुकानदार को यह मालूम हुआ कि मैं मा ल्यू के यहाँ ठहरी हूँ, उसने अपनी छोटी-छोटी चतुराई से भरी आँखें मेरी ओर घुमाई और रहस्यमय ढँए से पूछा, ''क्या आपने मा ल्यू की भतीजी को देखा? सुनते हैं ।के उसकी नाक बीमारी से गल गई है-यह सब उन्हीं जापानी राक्षसों की करतूत है !'' फिर उसने दुकान के भीतर से अपनी पत्नी को आवाज दी, ''जरा देखो तो उस लड़की की हिम्मत! क्या मुँह लेकर घर लौटी है! बूढ़े बाप ल्यू-फू-शेंग को अच्छा इनाम दिया है, उसकी सुलच्छनी बेटी ने!

''वह नेकबख्त तो पहले दिन से ही तेज थी'', उसकी पत्नी अपने कपड़ों को संभालती हुई दुकान में दाखिल हुई । ''तुम्हें याद नहीं, वह कितनी उछल-कूद मचाया करती थी? सिया-पो के पीछे तो वह हाथ धो कर पड़ी थी । वाप रे बाप! इतने गजब की आशनाई! अगर वह बेचारा गरीब न होता तो वह कभी की उससे शादी कर डालती !''

''जितने मुँह, उतनी बाते !'' दुकानदार ने बड़ी ही कठिनाई से निन्दा करने का लोभ संवरण करते हुए कहा, फिर उसने कुछ जोर दे कर कहा, ''कहते है, कि वह कम से कम एक सौ आदमियों के हाथों से गुजर चुकी है । इसके अलावा उसने एक जापानी अफसर से भी शादी की थी । ऐसी कुलटा औरतों को वापिस घर में नहीं घुसने देना चाहिए । मैं चुपचाप अपने गुस्से को पीकर वहाँ से चली आई, क्योंकि जरा- सी: देर और रुकने से लड़ाई-झगड़ा हो जाता । लेकिन वहाँ से पीठ मोड़ते ही मुझे ऐसा लगा कि वह मूछों पर ताव देकर सन्तोष-भरी हंसी हँस रहा है ।

गिरजे वाली सड़क की नुक्कड़ पर दो औरतें पानी लेकर घर लौट रही थीं । वहाँ भी यही चर्चा सुनाई दी ।

एक ने कहा, ''उसने पादरी लू के पास जाकर सन्यासिनी बनने की आज्ञा माँगी! जब पादरी तू ने इसका कारण पूछा तो वह फफक-फफक कर रोने लगी । कौन जानता है कि उसके साथ क्या-क्या बीत चुकी है! अब तो वह एक घिसे हुये जूते से भी गई गुजरी है !''

.. दूसरी ने जवाब दिया ''मुझे कल किसी ने बताया था कि वह लंगड़ा कर चलती है । हाय री दैय्या, वह किस मुँह से लोगों के सामने आती है ?'' ''सुनते है कि उसने एक उँगली में सोने की अँगूठी पहन रखी है- जरूर किसी न किसी शैतान से भेट मिली होगी !''

. ''और तो और, वह तातुँग तक हो आई है! और शैतानों की भाषा भी बोल लेती है ।''

मुझे सैर पर जाने से कोई मानसिक शान्ति नहीं मिली । गुफा में वापिस आकर देखा तो आह कुई अभी बाहर से नहीं लौटी थी । इस लिये मैं चुपचाप अकेली बैठकर एक किताब पढ़ने लगी ।

मुझे सख्त बेचैनी हो रही थी । गुफा में दिलचस्पी के लायक कोई चीज न थी । सिर्फ अनाज रखने की दो फटी-पुरानी बोरियाँ जो मैल के कारण काली पड़ गई थी एक कोने में पड़ी थीं । खिड़की पर लगा कागज कई स्थानों पर से फट गया था । खिड़की से बाहर झाँककर देखा, तो आकाश का रंग मटमैला था । परसों जैसी भूप का कहीं पता न था, और चौरस जमीन घुली-पुती-सी दिखाई दे रही थी । फीके आकाश की पृष्ठभूमि में सूखे पत्ते वाली टहनियों की सजावट हो रही थी । रह-रहकर हवा की सरसराहट, सन्नाटे को भंग कर रही थी ।

आंगन सुनसान पडा था ।

मैंने अपना छोटा सा सन्दूक खोला और कागज कलम बाहर निकाली । सोचा, चलो खाली बैठने की अपेक्षा दो खत ही लिख डालूं । आह कुई अभी तक क्यों नहीं लौटी? मैं यह बात बिल्कुल भूल गई थी, कि उसे यहाँ काम करने के लिये भेजा गया है, न कि मेरा साथ देने के लिये ।

। सर्दियों के दिन छोटे होते हैं, लेकिन वह दिन तो गर्मियों के दिनों से भी. अधिक लम्बा था ।

कुछ देर बाद मुझे कल रात वाली छोटी लड़की की एक झलक दिखाई दी, और मैं उसको बुलाने के लिए काँग से कूद कर नीचे उतरी । लेकिन उसने मेरी ओर केवल मुस्करा दिया और पड़ोस को किसी गुफा में गायब हो गई । तब में आंगन में कुछ देर तक टहलती रही और मैंने एक गरुड़ को उड़कर गिरजे के पीछे जंगल की ओर जाते देखा । और मैं आंगन के विशाल वृक्षों को एकटक निहारती रही ।

आंगन के अन्तिम छोर पर पहुँच कर मुझे किसी के रोने का स्वर सुनाई दिया । ऐसा लगा मानो कोई स्त्री अपनी व्यथा को दबाने की चेष्टा कर रही है । रह-रह कर वह नाक से सूं-सूं करती थी, पर फिर भी उसकी सिसकियाँ फूटी पड़ती थीं ।

मैंने अपने मन पर काबू करना-चाहा और अपने को स्मरण दिलाया कि मैं इस स्थान पर क्यों आई हूँ-आराम करने और अपनी खोई शक्ति को पुन: पाने के लिए । इसके अलावा मुझे पहले से निश्चित किये हुए प्रोग्राम के अनुसार ही चलना चाहिए । इस लिए मैं गुफा में वापस लौट गई, लेकिन मेरा मन उद्विग्न बना रहा । मैंने-अपनी कापी में जो नोट लिख रखे थे और जिन्हें मैं सैकड़ों बार पढ़ चुकी थी, वे गड़ही के पानी की तरह निःस्वाद और फीके लगे ।

यह एकरसता तब भंग हुई जब उस नन्हीं बालिका को साथ लिए श्रीमती ल्यू मिलने के लिए आई । कुछ देर में ही उनकी पतोहू भी आ गई । वे सब काँग पर रखी जलते कायलों की अंगीठी के इर्द-गिर्द पाल्थी मार कर बैठ गए ।

''तब किसी को किसी दूसरे की देख-संभाल करने की फुरसत न थी'', श्रीमती ल्यू ने लाल आकाश वाले गाँव पर हुए डेढ़ बरस पहले के जापानी हमले की ओर संकेत करके कहा । ''यहाँ पहाड़ी पर हम कुछ अच्छी स्थिति में थे-कम से कम यहाँ से भाग निकलना आसान था । नीचे गाँव में तो शायद सभी के सभी जापानियों के घेरे में फंस गये थे । बाद में हमें पता चला कि मेरी भतीजी उस विदेशी पादरी के पास सन्यासिनी होने गई थी-अनेकों अफवाहें उड़ाई जा रही थीं-उसका पिता पश्चिमी वेद-वृक्ष गाँव के एक चावलों के व्यापारी लड़के के साथ उसकी शादी तो कर रहा था । उस लड़के की उमर तीस के करीब थी, और वह शादी-शुदा था । पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और अब मेरी भतीजी उसकी दूसरी पत्नी बनने वाली थी । वे सब खाते-पीते सम्पन्न लोग थे । हमें इस सम्बन्ध से बड़ा सन्तोष था, लेकिन चेन-चेन न मानी, और पिता के बार-बार अनुरोध करने पर रोने लगी । पिता भी अपनी जिद का पक्का था । उसने कहा कि मैं तुम्हारी हर बात मान सकता हूँ, पर यह नहीं । अपने बेटे की मृत्यु के बाद उसकी हमेशा से यह इच्छा रही थी कि अपनी बेटी की शादी किसी अच्छे घर में करे । कौन जानता था कि चेन-चेन पहाड़ी लाँघ कर गिरजे तक दौड़ी हुई जायेगी । इस तरह वह आग में कूद पड़ी । जरा सोचिए तो, माँ-बाप को कितना दुख हुआ होगा?

''क्या अभी-अभी उसकी माँ रो रही थी ?'' मैंने पूछा ।

हाँ वही थी ।

''और तुम्हारी भतीजी का क्या हाल है ?''

''अरे उसका क्या? आखिर है तो कच्ची उमर की छोकरी ही । पिछली रात जब वह लौटकर आई तो ढाड़े मार-मार कर रो रही थी । लेकिन अब वह ऐसी खुश-खुश दिखाई देती है जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं । इस वक्त वह किसी जलसे में गई हुई है । अभी अठारह साल की ही है ।''

''क्या यह बात सच है कि उसने एक जापानी से शादी की थी ?'' ''निश्चित रूप' से कहना कठिन है । कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता । जितने मुँह उतनी बातें सुनने में आती हैं । लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वह भयानक रोग से पीड़ित है । वह ऐसे-ऐसे स्थानों में रही है, जहाँ अपनी पवित्रता की रक्षा करना उसके लिए संभव न था । मेरा ख्याल है कि अब व्यापारी के लड़के ने भी रिश्ता तोड़ लिया है । आखिर शैतानों के यहाँ रही औरत को कौन चाहेगा? यह तो पक्की बात है कि उसे बीमारी है । पिछली रात उसने खुद इस बात को माना था । इतनी देर घर से बाहर रहने के कारण उसमें जमीन-आसमान का अन्तर आ गया है । वह जापानियों की चरचा इतने सरल भाव से करती है जितने सरल भाव से हम चावल खाते हैं । अठारह वर्ष की उमर और शरम-हया का नामोनिशान नहीं ।''

उसकी बहू ने टोक कर कहा, सियाता-पाओ भी तो आज यहीं था ।'' उसने प्रश्न-वाचक दृष्टि से सास को देखा ।

सिया-ता-पाओ कौन है ?'' मैंने पूछा ।

मां ल्यू ने जवाब दिया, ''वह नीचे की मिल में काम सीखता है । स्कूल में वह करीब एक साल तक चेन-चेन का सहपाठी रहा था । दोनों

की खूब पटती थी, लेकिन उसके माँ-बाप गरीब हैं । उनकी हालत हमसे भी गई बीती है । शायद इसी वजह से वह चेन-चेन के साथ अधिक नहीं खुला । दरअसल? तो हमारी चेन-चेन उसे अपनी उंगली पर नचाया करती थी । लेकिन उसके सन्यास लेने की इच्छा का कारण कुछ और ही था । जापानी जब चेन-चेन को पकड़ ले गये तो सिया-ता-पाओ कई बार उसके मां-बाप से मिलने गया । चेन-चेन के पिता ने जब उसे देखा तो उनके गुस्से का कोई ठिकाना न रहा । उन्होंने उसे जी भर के कोसा । वह बेचारा चुपचाप सुनता रहा । जापानियों द्वारा पहली बार गांव से खदेड़ दिये जाने के बाद वह फिर वापस लौट आया । वह लड़का बड़ा नेकदिल और सीधा है । अब वह आत्म-रक्षा-सेना में हवलदार के पद पर है । जहाँ तक मेरा अन्दाज है, वह आज फिर चेन-चेन से शादी करने का प्रस्ताव लेकर मेरी भाभी से मिलने आया था । ले किन भाभी फफक-फफक कर रोने लगी और जाते समय सिया-ता-पाओ भी रो रहा था । '' ' ''क्या उसे तुम्हारी भतीजी की दुर्दशा का हाल! मालूम हो गया?''

''क्यों नहीं? गाँव का हर बच्चा सारी घटना से परिचित है । जहाँ देखो यही चर्चा है । ''

उसकी बहू ने दुबारा टोक कर कहा, ' 'सब यही कहते है कि सिया- ता-पाओ बेवकूफ है । ''

''मगर दिल का तो अच्छा है '' मां ल्यू ने तपाक से जवाब दिया । ''कम से कम मुझे तो इन दोनों की शादी में कोई एतराज नहीं । रहा रुपये-पैसे का सवाल, सो तो जब से जापानियों ने यहां झाडू फेरा है, किस की हालत खस्ता नहीं रही? बातचीत से तो ऐसा लगता है कि भाई और भाभी भी इस रिश्ते का विरोध नहीं करेंगे । ता-पाओ के अलावा इस लड़की से और शादी करेगा भी कौन? अगर उसे बीमारी न होती, तो भी. उसकी शोहरत सुनते ही लोग भाग खड़े होते । ''

छोटी लड़की भी बड़ी देर से बातचीत में शरीक होना चाहती थी । उसने छूटते ही सिया-तामाओ का बखान कर डाला । ' 'जब वह यहां आया था तो उसके बदन पर नीली फतूही और भूरी गरम टोपी थी । '' मुझे कुछ ख्याल-सा आया कि सुबह सैर पर जाते समय, एक इसी तरह का आदमी दिखाई दिया था । वह मेरी गुफा के सामने वाले गिन ' में चहल कदमी कर रहा था, और उसके चेहरे-मोहरे से गंभीरता और. चतुराई टपकती थी । वापसी पर मैंने उसे फिर देखा । वह चीड़ के जंगल'. में से निकल कर बाहर आ रहा था । मैंने सोचा कि वह घर का कोई आदमी या पड़ोसी होगा, इस लिए उस पर विशेष ध्यान न दिया । मुझे लगा कि वह इतना बुरा लड़का नहीं है ।

न जाने क्यों मां ल्यू का दुखड़ा सुनने के बाद मेरी मानसिक शान्ति भंग हो गई । मेरे मन में इतनी हलचल क्यों मच रही थी । मैं किसी विशेष व्यक्ति से मिलने के लिए उत्सुक नहीं थी, लेकिन मेरे मानस-पट पर अनेकों चित्र उभरने लगे । ये चित्र इतने शक्तिशाली थे कि इनसे पीछा छुड़ाना कठिन हो गया ।

शायद आह कुई मेरी मानसिक स्थिति को ताड़ गई थी । उसी शाम को वह मेरी गुफा में आई । उसके पीछे कोई और व्यक्ति भी था । मैं उस समय गुफा में अकेली थी । लेम्प जलाने के बाद मैंने आग पर अभी पानी की केतली चढ़ाई ही थी कि इन लोगों के कदमों की आहट सुनाई दी ।

' 'कामरेड देखिये आपसे मिलने कोई आया है । '' आह कुई ने अपना वाक्य अभी खतम भी न किया था कि उसके स्वर की गंभीरता में से एक हल्की हँसी फूट निकली ।

मैंने आगे बढ्‌कर नवागन्तुक से हाथ मिलाया । मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि उसके हाथ अंगारे की तरह गरम थे । दोनों आकर कांग पर बैठ गये और मैंने देखा कि उसकी पीठ के पीछे बालों का एक लम्बा गुच्छा लटक रहा है ।

जिस गुफा को मैं इतना सुनसान और नीरस ' समझती थी, उस लड़की को वह बहुत दिलचस्प जगह मालूम हो रही थी । वह अपनी कोहनी टेक कर आराम से बैठ गई और नजर घुमा कर चारों ओर देखने लगी । अन्त में उसकी दृष्टि मेरे चेहरे पर आकर टिक गई । मुंह पर परछाईं पड़ने के कारण उसकी आँखें और भी लम्बी लग रही थीं । लैम्प की रोशनी तथा जलते हुए अंगारों के प्रकाश में उसकी आँखें उन झरोखों की तरह लग रही थीं जो सूरज की किरणें पड़ने से झिलमिला उठते हैं -वह इतनी स्वच्छ और निष्कपट थीं ।

मुझे खुद नहीं समझ आया कि बातचीत कैसे शुरू की जाय । आखिर मैं किस ढंग से वात करूँ जिससे उसके जख्म फिर हरे न हो जायें और उसके आत्म-सम्मान को चोट न पहुँचे? मैंने केतली में से एक प्याला चाय उँडेली ।

आखिरकार चेन-चेन ने ही चुप्पी तोड़ा । ''क्या आप दक्षिण की रहने वाली हैं? मेरा ऐसा अनुमान है क्योंकि आप हमारे प्रान्त वासियों जैसी नहीं लगतीं ।''

''क्या तुमने बहुत-से दक्षिण वासी देखे हैं ?'' मैंने यह सोचकर कि उसने बात का जो सिलसिला छेड़ा है, उसी का सूत्र पकड़कर चलना उचित होगा, उससे प्रश्न किया ।

''नहीं'' उसने सिर हिलाकर जवाब दिया । वह अब भी उसी निष्कपट भाव से मेरी आँखों में आँखें डालकर देख रही थी । ''मुझे सिर्फ इने-गिने दक्षिणवासियों से मिलने का मौका मिला है । वे हम लोगों से बहुत भिन्न है । मुझे आपके प्रान्तवासी बेहद पसन्द हैं । आपके यहाँ की औरतें ढेर की ढेर किताबें पड़ती हैं । वे हमारी तरह जाहिल नहीं । काश, मै भी आपसे कुछ सीख सकती । क्या आप मुझे पढ़ायेगी ?'' मैंने सिर हिलाकर हामी भरी । उसने छूटते ही कहा, ''जापानी. औरतें भी ढेर की ढेर किताबें पड़ती हैं । जापानी सिपाही भी अपने पास अच्छे लिखे हुए पत्रों को संभाल कर रखते हैं । उनमें से कुछ पत्र तो उनकी पत्नियों च. होते हैं, कुछ उनकी प्रेमिकाओं के और कुछ ऐसी -लड़कियों के जिनसे वे परिचित भी नहीं । पत्रों के अन्दर उन लड़कियों के चित्र लगे होते हैं । जिन्हें देखकर उन्हें रोमांच हो आता है । सचमुच यह कितनी अजब बात है कि ऐसे खौफ़नाक आदमी जिनका काम ही मरना-मारना है, इतना भी नहीं जानते कि उन्हें बुद्‌धू बनाया जा रहा है । वे उन पत्रों को अपनी सबसे क़ीमती धरोहर समझकर सदा छाती से चिपकाए फिरते हैं ।''

''अच्छा, तो जापानी भी बोल सकती हो ?'' मैंने पूछा । उसके चेहरे पर घबराहट की एक- रेखा-सी खिंच गई । लेकिन इस बात को खुले ढंग से कुबूल करने के बाद उसने तत्काल ही जवाब दिया, ''एक साल तक उन लोगों के साथ अनेक स्थानों पर घूमते रहने के कारण मैं थोड़ी-बहुत सीख ही गई हूं । उन लोगों की भाषा जानने के अनेकों लाभ थे ।''

''क्या तुम उनके साथ बहुत-सी जगहों पर घूम आयी हो ?''

नहीं, मैं किसी एक रेजिमेन्ट के साथ नहीं रही, लोगों का ख्याल है कि मैं एक जापानी अफसर की बीवी रह चुकीं हूँ । लेकिन दरअसल में दो बार घर भाग आई थी । यह तीसरी बार है । पिछली 'बार उन्होंने मुझे जबर्दस्ती भेजा था । मैं इंकार नहीं कर सकी । लेकिन अब वह मुझे फिर नहीं भेजेंगे । वे मेरी बीमारी का इलाज करना चाहते हे । मैं भी माँ-बाप की चिन्ता करते-करते इसी बहाने उनसे मिल लेती हूँ । मेरी समझ में नहीं आता कि माँ का क्या करूं । जब उसे मालूम हुआ कि उसकी बेटी खो गई है तो उसने रो-रोकर अपनी आँखें अन्धी कर डाली । लेकिन अब मेरे लौट आने के बाद भी उसका रोना वैसे ही जारी है ।

''तुम्हें बहुत-से कष्ट झेलने पड़े होंगे ।''

कष्ट का नाम सुनते ही आह कुई के चेहरे पर व्यथा की एक झलक दिखाई दी । उसकी आँखों में आँसू छलक आये । यह कल्पना करना भी असंभव है कि नारी का जीवन कितना बड़ा अभिशाप है । ''अपनी बात जारी रखो चेन-चेन,'' उसने बड़े दुलार से चेन-चेन का कन्धा सहला कर आग्रह किया ।

''कष्ट और कटुताएं चेन-चेन ने मानो किसी गहरे सोच में पड़कर इन शब्दों को दुहराया । ''अब मैं कुछ नहीं जानती । कई चीजें एक समय के लिए कष्टदायी थीं, लेकिन अब वे वैसी नहीं लगतीं । कुछ ऐसी भी थीं जिन्हें मैं आसानी से झेल गई । पर अब उनका ख्याल आते ही मेरा कलेजा धक् से रह जाता है । एक वर्ष के अन्दर ही यह सब घटनाएँ स्मृति में धुँधली हो गई । जब मैं घर लौटी तो लोग मेरी ओर आँखें 'फाड़-फाड़ कर देखने लगे । अपने ही गाँव को देखिये । कुछ लोग मुझसे स्नेह करते हैं और कुछ मुझे घृणा की दृष्टि से देखते हैं । लेकिन सब का व्यवहार ऐसा है जैसे में उनके लिए कोई अजनबी हूँ । यहाँ तक कि मेरे अपने सगे-संबंधी भी ऐसा ही करते हैं । मैंने कई बार उन्हें छिप-छिप कर अपनी ओर ताक-झांक करते देखा है । कोई भी मुझे पहले वाली चेन- चेन नहीं समझता । मगर क्या सचमुच मैं इतना बदल गई हूँ? मैंने खुद भी इस बारे में बहुत सोचा है और इसी नतीजे पर पहुंची हूँ कि मैं बिलकुल नहीं बदली । हो सकता है कि सिर्फ मेरा दिल पहले से कुछ ज्यादा सख्त हो गया हो । आखिर ऐसे कटु अनुभवों में से गुजरने के लिए दिल और दिमाग का सख्त हो जाना स्वाभाविक बात है ।''

मुझे सब से अधिक हैरानी तो इस बात से हुई कि चेन-चेन के चेहरे पर उस भयानक बीमारी का एक भी लक्षण न दिखाई देता था । उसके गाल एक गुलाबी आभा से चमक रहे थे और उसका स्वर रजत घंटी की तरह मीठा और स्पष्ट था । उसके व्यवहार में किसी प्रकार की घबराहट या अपराध की भावना नहीं झलकती थी । न ही वह फूहड़ और असंस्कृत थी । उसकी निश्चिन्त सरलता से कोई भी यह अनुमान लगा सकता था कि इस लड़की को जीवन में कभी किसी प्रकार की चिन्ता से पाला नहीं पड़ा । मैं यह सब देखकर चकित-सी रह गई, और उससे उसकी बीमारी के बारे में पूछे बिना न रह सकी ।

'जिन्दगी में ऐसा ही होता है, ' उसने सरलता से जवाब दिया । ' 'भला आप ही बताइये कि आप मुझसे भी कठिन परिस्थितियों का सामना कैसे कर लेती हैं । फिर भी आप गर्व से सिर ऊँचा करके बहादुरी से चलती हैं! आप मौत का भी सामना कर सकती हैं! लेकिन मैं अब इस ढंग से नहीं सोचती । जहाँ तक हों सके इन्सान को आखिरी दम तक जीने की कोशिश करनी चाहिए, इसी लिए जब इन लोगों ने मेरा इलाज करने का फैसला किया तो में झटपट मान गई । पिछले कुछ दिनों से तो मुझे अपनी बीमारी का ख्याल भी नहीं आता । मुझे दो इन्जेक्शन और खाने के लिए कुछ गोलियां दी गईं । उस समय तो कुछ फायदा हुआ लेकिन पतझर आते-आते मेरी हालत फिर बिगड़ गई । मैं अन्दर ही अन्दर गलने लगी, और बदक़िस्मती से उसी मौके पर मुझे जरूरी खबरें भेजने का काम सौंपा जाता । न ही में अपनी जगह पर किसी और को भेज सकती थी, इसलिये मुझे रातभर दस मील का सफर करके घर जाना पड़ता था । अक्सर अन्धेरे में मैं रास्ता भूल' जाती और ठोकर खा कर गिर पड़ती । जी में आता कि वहीं सुस्ता लूं लेकिन हर समय दिल में जापानियों का डर बैठा रहता, कि कहीं वे शैतान मुझे देख न लें । देरी हो जाने के डर से में फिर उठ खड़ी होती । एक ' बार तो थकावट से चूर होकर मुझे पूरे एक सप्ताह के लिये चारपाई की शरण लेनी पड़ी थी । आखिरकार मरना भी कौन सा आसान है?''

चेन-चेन अपनी बातों के बीच में थोड़ी-थोड़ी देर बाद रुक जाती . थी और उसकी आँखें रह-रह कर आह कुई और मेरे चेहरे पर टिक जातीं । शायद वह यह जानना चाहती थी कि हमारे ऊपर उसकी बातों का क्या असर पड़ा है । लेकिन संभवत: इसलिए भी कि ऐसे मौलिक अनुभव को सुनाने के लिए बीच-बीच में ठहरना जरूरी था । उसने जरूर आह कुई के चेहरे की दशा देख ली होगी । आह कुई की टिप्पणियाँ अगाध सहानुभूति से सराबोर थीं, लेकिन जब उसने अपनी आदत के अनुसार चुप्पी साध ली, तो उसकी आँखों से आँसू बहने. लगे ।

मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा कि चेन-चेन को यह नहीं मालूम बिक हम अपने को उसकी स्थिति में रख कर सोचने की कोशिश कर रहे थे । अपनी कल्पना से हम उसकी समूची वेदना को उतनी ही गहराई से अनुभव कर रहे थे । उसका एक-एक शब्द दिल की गहराइयों से निकल? रहा था और अपनी निष्कपट सरलता के कारण उससे सत्य की अनुगूँज सुनाई देती थी- । अगर वह पूरी कहानी उतनी सच्चाई से न सुनाती, या ऐसी निस्संगता न बरतती मानो किसी और की कहानी सुना रही है तो शायद हमारे ऊपर इतना गहरा प्रभाव न पड़ता, और इकट्ठे बैठ कर रो लेने के वाद कहानी के समाप्त होने पर शायद हम चैन की साँस लेते । आखिरकार आह कुई रोने लगी और उल्टे चेन-चेन उसे तसल्ली देने लगी । चेन-चेन से कहने के लिए मेरे मन में लाखों बातें. उमड़ रही थीं लेकिन मैं एक को भी व्यक्त न कर पाई । चेन-चेन के जाने के बाद में एक घण्टे तक लैम्प की मन्द रौशनी में कुछ पढ़ने की कोशिश करती रही । मैंने इस डर से कि कहीं आह-कुई का चेहरा न दिखाई दे जाये, जान-युग कर अपनी रखें किताब में गड़ा दीं ।. मैं उससे एक शब्द भी न बोली, हालाँकि उसके बार-बार करवटें बदलने और सर्द आहें भरने की आवाज सुन कर मैं यह जान गई थी कि उसके लिये सोना दुश्वार हो रहा है इस मुलाकात के बाद चेन-चेन मुझे मिलने के लिये हर रोज आने लगी । वह घंटों बैठी मुझ से बातें करती रहती । अपनी बातें बताने के बाद वह अक्सर मुझ से नई-नई बातों के बारे में पूछती, उसे दक्षिण- वासियों में बहुत दिलचस्पी थी । कभी-कभी तो उसके लिये मेरी बातों को समझना कठिन हो जाता, विशेषकर नये विषयों पर । तो भी वह बड़ी तल्लीनता से मेरी बातें सुनती थी ।

वह एक बार मेरे साथ पहाड़ी के ढलवान पर सैर करने भी गई थी । रास्ते में अनेकों नवयुवक मिले जिनका नाम मोर्चे पर. जाने वालों की सूची में लिखा था । वे चेन-चेन से बड़ी आत्मीयता से बातें करने लगे, उनके व्यवहार से मालूम होता था कि वे चेन-चेन के कई गुणों पर मुग्ध हैं । लेकिन गाँव के दुकानदार की किस्म के कई लोगों ने हमारे गुजरने पर नाक-भौं सिकोड़ी । चेन-चेन के प्रति उनकी घृणा तो इस सीमा पर पहुंच चुकी थी कि वे सिर्फ इसी लिये, कि मैं भी उसके साथ थी, मुझे भी हिकारत भरी आँखों से देख रहे थे । औरतों का रवैया तो और भी बुरा था, क्योंकि वे मन ही मन चेन-चेन से अपनी तुलना करके अपनी प्रतिष्ठा-तथा सच्चरित्रता पर फूली न समाती थीं । उन्हें इस वात का गर्व था कि उनका सतीत्व सुरक्षित है और उनके साथ कभी भी बलात्कार नहीं हुआ ।

आह कुई के चले जाने के बाद हमारी घनिष्ठता और भी बढ गई, एक-दूसरे को देखे बगैर चैन न पड़ता । वह रक्त-मांस की सजीव पुतली थी । वेदना और सुख-दोनों का अनुभव वह गहराई से कर सकती थी! उसकी आत्मा स्वच्छ और निर्मल थी ।

चेन-चेन के साथ बात-चीत करने में मेरा बहुत सा समय बीत जाता । लेकिन में ऐसा महसूस करती कि मैं बहुत-कुछ सीख रही हूँ और उस वातावरण से मेरा स्वास्थ्य भी सुधर रहा है । लेकिन दिन जल्दी- जल्दी बीत रहे थे । मुझे ऐसा लगा कि शायद चेन-चेन का पूरी तौर से में विश्वास नहीं प्राप्त कर पाई । किन्तु मुझे इस वात से निराशा नहीं हुई, ना .ही मैंने उसके दिल की गहराई में झांकने की कोशिश की' । क्योंकि मेरा ऐसा ख्याल था कि हर इन्सान के दिल में एक-न-एक ऐसा राज जरूर छिपा होता है, जिसे वह गैरों के सामने नहीं खोल सकता चूंकि और लोगों का इस राज से विशेष संबंध नहीं होता, इसलिए इस राज का व्यक्ति के अन्य गुणों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

. मेरे जाने के दिन करीब आ गये थे । इसलिए मुझे चेन-चेन के बारे में चिन्ता होने लगी । वह हर समय इस तरह बेचैन रहती थी, मानो उस के दिल पर कोई भारी बोझ हो । वह पहले ही की तरह मेरी गुफा में आती लेकिन शांतिपूर्वक' बैठने की बजाय इधर-उधर चहल-कदमी करती रहती और कुछ ही मिनटों बाद वहां से चली जाती । मुझे मालूम था कि इन दिनों उसकी भूख बहुत ही कम हो गई थी, और अक्सर वह खाना नहीं खाती थी । चूँकि जबरदस्ती उसका विश्वास प्राप्त करना उचित न समझ कर मैंने उसे इधर-उधर की बातों में लगाना चाहा; लेकिन ऐसा लगता कि वह आशा भरी दृष्टि से मेरी और देख रही है । फिर दूसरे ही क्षण वह उदासीनता का अभिनय करके अपनी सारी चिन्ताओं पर परदा डाल लेती थी । मैंने इस बात को घोर से देखा कि वही होशियार-सा दिखाई देने वाला लड़का-जिसका नाम लोग चेन-चेन के साथ लेते थे, चेन-चेन की माँ के शयन-गुफा से निकलकर बाहर आया । मुझे उसके साथ इसलिए हमदर्दी थी कि वह चेन-चेन के बारे में सब बातें विशेषकर उसके रोग के बारे में भी सब कुछ जानते हुए भी उससे मिलने लिए इच्छुक था । लोकनिन्दा की परवाह न करते हुए उसने चेन-चेन के माँ-बाप से चेन-चेन के साथ शादी करने का प्रस्ताव किया । उसकी इस बात से यह स्पष्ट था कि वह अपनी जिम्मेदारी को समझता है विशेषकर ऐसे समय में जब कि उसकी प्रेयसी को उसकी आवश्यकता .हो । जहाँ तक चेन-चेन का सम्बन्ध था उसके व्यवहार में यह बात प्रकट नहीं हुई थी कि उसे सुरक्षा की जरूरत हैं या वह इस बात की इन्तजार में है की कोई पुरुष आकर उससे शादी का प्रस्ताव करे । तो भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसके घावों को भरने के लिए असाधारण स्नेह, .समझदारी तथा सहानुभूति की जरूरत थी । मेरे जी में तो आया कि एक कोने में जाकर जी भरकर रो लूं और उसके बाद चेन-चेन की खादी की दावत में शामिल होऊँ । मेरे जाने से पहले' ही इस खुशखबरी के आने की सम्भावना थी । लेकिन ''चेन-चेन के मन में कैसे विचार उठ रहे हैं,'' मैंने अपने से पूछा तो भी मुझे पक्का भरोसा था कि जल्द ही सब मामला तय हो जायेगा, इसलिए यह सोचकर मैं निश्चिन्त हो गई । मा ल्यू, उसकी बहू और नन्ही सी लड़की अक्सर मेरी गुफा में आती रहती थीं । उन्होंने कई बार मुझ से चेन-चेन के विवाह के सम्बन्ध में बातचीत करने की कोशिश की । वे मुझे चेन-चेन के बारे में नई-नई बातें बताती थीं लेकिन मैंने कभी उन्हें बहुत जुबान खोलने का. मौका नहीं दिया । मेरा ख्याल था कि मान लीजिए कि मेरी सहेली मुझ से अपना कोई राज छिपाकर रखती है, तो मेरे लिए यह अनुचित होगा कि मैं उससे इस विषय में सीधा सवाल करूँ या और दुनिया भर में इस की चर्चा करती फिरूँ । क्योंकि ऐसा करने ऐसे बदनामी के साथ-साथ' हमारी मित्रता को भी ठेस लग सकती है ।

एक रोज साँझ के झुटपुटे में सारा गिन उसी तरह भीड़ से भर गया जिस तरह चेन-चेन के आने के रोज भर गया था । पास-पड़ोस के लोग सर हिला-हिला कर काला-हंसी कर रहे थे । उनके बोलने के ढंग से सही बात का अनुमान लगाना कठिन था, क्योंकि कुछ लोग उदास .दिखाई देते थे और कुछ की बाछें खिली हुई थीं, मानों कोई तमाशा देख रहे हों । कोहरे से भरे ठण्डे वातावरण में रह-रह कर उनके मुंह से भाप सी निकल रही थी । कुछ लोग अपने कन्धे हिला रहे थे और कुछ बात सुनने की चेष्टा में नीचे की ओर झुके हुए थे । एक-आध ने तो साफ सुनने के लिए कानों पर हाथ भी धरा हुआ था । उन सब के काना- फूंसी और आँख मटकाने के ढंग से ऐसा लगता था कि वह किसी मनोरंजक स्थिति का आनन्द ले रहे हैं ।

चेन-चेन की माँ की गुफा में शोर मच रहा था । अचानक ही मुझे चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनाई दीं । कोई पुरुष, सम्भवत: चेन-चेन का पिता कुछ कह रहा था और चीनी के बर्तन चकनाचूर किये जा रहे थे । मेरे लिये अपने ऊपर और अधिक काबू पाना कठिन हो गया और मैं भीड़ को चीरती हुई वहाँ पहुंची ।

चेन-चेन की माँ ने मुझे देखते ही कहा ''अच्छा हुआ, आप आ पहुँचीं'' चेन-चेन को समझाने में हमारी कुछ मदद कीजिये ।'' उसके स्वर में आग्रह था ।

चेन-चेन एक कोने में खड़ी थी । उसके बाल बिखरे हुए थे और आँखे खूँखार हो रही थीं । मैं उसके सामने जाकर खड़ी हो गई, तो भी उसने मुझे नहीं पहचाना । शायद उस समय वह मुझे अपना दुश्मन समझते हुए मेरी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहती थी । वह इतनी बदल गई थी कि उसे देखकर उसकी पहली स्फूर्ति तथा सजीवता का अनुमान लगाना भी कठिन था । इस समय वह पाशविक प्रतिहिंसा से धधक रही थी । लेकिन मुझे अभी तक यह न पता लगा था कि आखिर उसकी इस असीमित घृणा का पात्र कौन व्यक्ति है?

''अरी जालिम छोकरी, तुझे कुछ अन्दाज भी हैं कि तेरे मां-बाप ने पिछले डेढ़ वर्ष में कितने कष्ट झेले हैं ?'' उसकी मां बार-बार अपनी जाँघों को पीट कर रुंधे हुए गले से कह रही थी । बोलते समय उसकी आँखों से आंसू ढलक-ढलक कर नीचे काँग पर गिर रहे थे । उसका चेहरा भी आंसुओं से भीग गया था और जब वह काँग से उतरने के लिये नीचे झुकी तो कुछ बूँदें गालों से गिर कर फर्श पर चू पड़ी ।

आस पड़ोस की औरतों ने इस डर से कि कहीं वह मारपीट पर उतारू न हो जाये उसे एक ओर धकेल दिया । उसका रौद्र रूप देखकर मैं दँग रह गई । मैं उससे कहना चाहती थी कि ऐसी स्थिति में शोर शराबा मचाने से कोई लाभ नहीं, लेकिन साथ ही मैंने यह भी अनुभव किया कि उसकी वर्तमान मानसिक स्थिति में अगर मैं उससे कुछ कहूंगी भी तो उसका कोई असर नहीं पड़ेगा ।

उसका पति हतबुद्धि हो गया था । वह देखने में बूढ़ा और दुर्बल' लग रहा था और लगातार आहें भर-भर कर अपना सिर हिला रहा था । सियाना-पाओ उसके पास ही बैठा था । उसके चेहरे पर घोर निराशा का भाव था । बोलो, जवाब दो! जवाब दो !'' चेन-चेन की माँ ने चीख कर कहा ।'' क्या अपने बूढ़े माँ-बाप पर दया करके तुम्हारे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलता !''

उसे सान्त्वना देने के लिए औरतें समझा रही थी', ''वह हमेशा तो ऐसी हठी नहीं बनी रहेगी । कुछ देर बाद तो समुद्र का ज्वार भी उतर जाता है ।''

पर मुझे साफ नजर आ रहा था कि उनकी आशाओं के अनुसार इस मामले का अन्त न होगा । चेन-चेन की मुख-मुद्रा से साफ झलकता था कि न तो उसके दिल में किसी के लिए दया है और न वह किसी की दया की भूखी है । उसने अपना इरादा पक्का कर लिया था । इस वार समुद्र का ज्वार नहीं उतरेगा । वह दाँत भींच कर उनके प्रस्ताव का अन्त तक विरोध करेगी ।

बहुत-कुछ कहने-सुनने के बाद मैंने उन्हें इस बात पर राजी कर लिया कि वह चेन-चेन को शाम तक के लिए अपने हाल पर छोड़ दें ताकि वह आकर मेरी गुफा में आराम कर ले । इस तरह मैंने उन औरतों से तो उसका पिण्ड छुड़ा लिया लेकिन उसने मेरे साथ न आकर वहाँ से छूटते ही भागकर पहाड़ी का रास्ता पकड़ा ।

गिन में अभी भी भीड़ जमा थी । लोगों को उम्मीद थी कि अभी और नोंक-झोंक चलेगी ।

''उस लड़की के मन में सरूर समाया है, सच !''

अजी, वह तो हम किसानों से नफरत करती है !''

''सूप बोले तो बोले पर अब चलनी भी बोलने लगी जिसमें बहतर छेद हैं । दरअसल' शिकायत करने का हक तो सिया-ता-पाओ को है ।''

वहाँ से गुजरते समय मैंने ऐसे ही दुर्वचन सुने । लेकिन जल्द ही यह देखकर कि अब तमाशा खत्म हो गया, पड़ोसी अपनी-अपनी गुफाओं को वापस चले गये ।

मैं कुछ देर तक तो आंगन में खड़ी सोचती रही, फिर मैंने पहाड़ी पर उस दिशा में ही जाने का निश्चय किया जिधर चेन-चेन गई थी । पहाड़ी की चोटी पर लम्बे-लम्बे चीड़ के वृक्षों की छाया में असंख्य' समाधियाँ बनी हुई थीं । चारों ओर पत्थर के स्मारक बने हुए थे । इनमें से बहुत सें टूट चुके थे, और उनके टूटे टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे ।' इस स्थान की निर्जन वायु मन में अवसाद भर देती थी । इतनी निस्तब्ध शान्ति छायी थी कि हवा के झोंकों में पत्तों का मर्मर भी न सुनाई देता था । मैंने चेन-चेन का नाम पुकार-पुकार कर यह शान्ति भंग कर दी । पहाड़ी की एक बगल से दूसरी बगल तक मैं पुकारती फिरी । प्रतिध्वनियां मेरी पुकारों का उत्तर देतीं और पुन: पहाड़ियों में निबिड़ शान्ति छा जाती । इस समय तक अस्त होते सूरज की आखिरी किरणें भी डूब चुकी थीं, केवल एक हल्का धुँधलका-सा बाकी रह गया था, जो पहाड़ियों के गर्तों में और घना होकर बसता जा रहा था ।

मेरी समझ में न आता था कि में आगे बढूँ या वहीं रुक कर चेन- चेन का इन्तजार करूँ । इस विकल्प की दशा में मैं वहीं एक हूटे स्मारक के पत्थर पर बैठ गई ।

वहाँ से मैंने एक छाया को पहाड़ी पर चढ़ते हुए देखा, और कुछ देर में ही मैंने उस व्यक्ति को पहचान लिया । वह सिया-ता-पाओ 'था । मैं यह सोचकर चुप रही कि वह मुझे वहाँ देखे बिना ही गुजर जायेगा । लेकिन जाहिर है कि उसने मुझे दूर से ही देख लिया था ।

मुझे विवश होकर उसे बुलाना पड़ा । ''क्या तुम उसकी तलाश में हो? मुझे तो उसका कहीं चिन्ह भी नहीं दिखाई दिया ।''

जहाँ मैं बैठी थी वहाँ आकर वह सूखी घास पर मेरे कदमों में पाल्थी मारकर बैठ गया । सचमुच ही वह बहुत कम उम्र का दिखता था । उसकी भौंहें पतली और लम्बी थीं और आँखें बड़ी-बड़ी थीं जिनमें इस समय पीड़ा का भाव झलक रहा था । उसने अपना छोटा सा मुख इस समय कसकर बन्द कर रखा था । उसके मुख पर चमक और उल्लास की मुद्रा भी कभी झलक सकती है; मैंने सोचा, लेकिन इस समय तो उसकी आकृति चिन्ताग्रस्त हो रही थी । मैंने देखा कि उसकी नाक से वफादारी का भाव टपकता था, लेकिन इससे उसे कौन-सा लाभ हो सकता था? ''दुखी मत हो'' उसको धीरज बँधाने के लिए मैंने जबर्दस्ती अपने को मजबूर करके कुछ सान्वना के शब्द कहे । ''शायद वह कल तक ठीक हो जाय । आज शाम को मैं उससे अच्छी तरह बात करूँगी । '' ' कल-कल-वह हमेशा मुझ से नफरत ही करती रहेगी । मैं जानता हूँ कि उसे मुझसे नफरत है, '' वह भर्राये स्वर में फूट पड़ा, और उसकी आवाज में दर्द था ।

' 'नहीं,' ' मैंने इन्कार किया । ' 'उसने कभी किसी के खिलाफ नफरत नहीं दिखायी । '' और अपनी स्तुति को टटोल कर मैंने अनुभव किया कि मैंने झूठ नहीं कहा है ।

' 'वह आपसे नहीं कहेगी । वह किसी से न कहेगी । लेकिन वह मुझे कभी माफ नहीं कर सकती । ''

उसकी भावना की उग्रता से किंचित चकित होकर मैंने पूछा, ' 'आखिर वह तुमसे क्यों नफरत करती होगी?''

............ 'सुनिये,' ' हठात् मुड़कर मेरे मुख पर टकटकी बाँधते हुए उसने उत्तर दिया, ' 'सोचिए .तो, में छोटी उम्र का था और गरीब भी-क्या में उसको !

लेकर भाग जा सकता था? क्या इसमें मेरा दोष था? बताइये '' लेकिन मेरा उत्तर सुनने की प्रतीक्षा किये बिना ही वह कहता गया जैसे अपने आप को ही सुना रहा हो,' ' गलती मेरी थी, निश्चय ही गलती मेरी हुई थी । तो उसको मैंने ही बर्बाद किया । अगर मुझ में इतना ही साहस होता तो वह कभी भी......'' फिर अपना स्वर बदल कर वह बोला, ''मैं उसके स्वभाव से खूब परिचित हूँ । वह मुझसे कयामत तक नफरत करती जायेगी । बताइये, मैं क्या करूँ? वह मुझसे क्या चाहती है? में उसे किस तरह सुखी बना सकता हूँ? मेरे जीवन की कोई कीमत नहीं । काश मैं उसके किसी काम आ सकता । क्या आप मुझसे कुछ नहीं बता सकतीं? मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि आखिर क्या करूँ । इस व्यथा को मैं कैसे झेल सकूंगा? इससे तो यही ज्यादा अच्छा होता कि जापानी दरिन्दे मुझे घसीट ले जाते और खत्म कर देते । ''

वह अभी अपनी बात जारी रखता लेकिन अँधेरा बढ़ रहा था, इसलिए मैंने उससे लौट चलने का प्रस्ताव किया । कुछ कदम चलने के कद वह अचानक ठिठककर रुक गया और कहने लगा कि उसे पहाड़ी की चोटी से कुछ आवाजें सुनाई दे रही हैं । मैंने उसे जाने दिया और तब तक उसके पीछे देखती रही जब तक कि वह चीड़ के जगंल में आँखों से ओझल नहीं हो गया ।

जब मैं पहाड़ी से नीचे उतरी तो अंधेरा हो चुका था । उस रात मैं बड़ी देर से सोयी, लेकिन उन दो व्यक्तियों की कोई खबर नहीं आई । न मुझे यही पता चला कि उन पर क्या बीती ।

दूसरे दिन तड़के ही मैंने अपनी चीजें चमड़े के सन्दूक में बन्द की और अपना वोरिया-बिस्तर समेटा । कामरेड मा सामान उठवाने में मेरी मदद के लिए आने का वायदा कर गया था' । अब मैं किसी सूरत में और अधिक नहीं रुक सकती थी, क्योंकि हाल ही में खबर मिली थी कि दुश्मन-अर्थात् जापानी हमारे खिलाफ मोर्चेबन्दी कर रहे थे और विभाग के अध्यक्ष मो ने आज्ञा निकाली थी कि तमाम जख्मी और बीमार साथियों को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाय । मेरे सामने एक ही चारा रह गया था कि मैं मोर्चे से दूर स्थित राजनैतिक विभाग के पास चली जाऊँ, लेकिन मेरे मन में भारी उथल-पुथल मच रही थी । क्या मैं

कुछ दिन और यहाँ ठहरने का आग्रह करूँ? दूसरे ही क्षण ख्याल आया कि गड़बड़ी की हालत में अपनी बीमारी के कारण मैं दूसरों पर भार डालने के अतिरिक्त उनके और किसी काम न आ सकूँगी । मान लो मैं यहाँ से चली जाऊँ तो फिर लौटना कब संभव होगा? मैं अपने बिस्तर पर गत्थी मारे इसी उधेड़बुन में थी कि अचानक किसी के दबे पांव गुफा

में आने की आहट हुई ।

चेन-चेन एक छलाँग में उछल कर मेरे साथ काँग पर आ बैठी । मैं नै एक ही नजर में देख लिया कि उसका चेहरा कुछ सूज-सा गया था । और जब आगपर हाथ सेंकते समय मैंने उसका हाथ छुआ तो: आज फिर पाया कि वह अँगारे सा तप रहा था । उसे छू कर ही मुझे_ मालूम हुआ कि उसकी बीमारी कितनी गंभीर है ।

''चेन-चैन !'' मैंने उससे कहा, ''देखो, अब मैं यहाँ से जा रही हूँ । न जाने फिर कब मुलाकात हो । कभी-कभी अपनी तथा अपनी माँ की कुशल के बारे में समाचार भेजती रहना ।''

''मैं भी ठीक यही आपसे कहने आई थी । उसने बीच में टोककर कहा ।'' मैं भी कल यहाँ से चली जाऊंगी, जितनी जल्द इस जगह से छुटकारा मिले, उतना ही अच्छा ए ।'

तुम सचमुच जा रही हो?

''निश्चित रूप से ।'' उसने जवाब दिया । उसकी पुरानी सजीवता फिर लौट आई थी । और एक अजब सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर खेल' रही थी ।'' ये लोग मुझे इलाज करवाने लेग- लिए शहर भेज रहे हैं ।''

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई । सोचा चलो अच्छा है, इकट्‌ठे सफर करने का अवसर मिलेगा । मैंने भी एक दिन अधिक रुकने का फैसला किया ।

''क्या तुम्हारी मां को इस बात का पता है ?'' मैंने पूछा ।

''पूरी तौर से नहीं ।'' उसने जबाव दिया । ''उसका ख्याल है कि मैं इलाज के लिए जा रही हूँ इसलिए जल्द ही लौट आऊँगी । यह सोचकर अब वह अधिक शोर नहीं मचायेगी ।''

उसके गहरे आत्मविश्वास को देखकर मैं मन ही मन पिछली शाम की घटना से उसकी तुलना करने लगी । मुझे अचानक सिया-ता-पाओ के शब्द स्मरण हो आये, जो उसने चेन-चेन के विषय में कहे थे । मैंने हिम्मत बाँध कर पूछा, ''क्या तुम्हारी शादी तय हो गई है ?''

''भला शादियाँ भी कहीं ऐसे तय होतीं ?'' उसने तपाक से जवाब दिया ।

''अच्छा तो तुम माँ की सलाह पर राजी होने लगी हो ?'' मैंने जानबूझ कर उसके भावी जीवन के सम्बन्ध में अपनी सदभावनाएं प्रकट नहीं कीं । मैं सिया-ता-पाओ के व्यक्तित्व के विषय में अधिक नहीं सोचना चाहती थी, तो भी मैं उसके सुख की कामना करने लगी ।

''माँ की सलाह ?'' चेन-चेन ने क्रोध से आगबबूला होकर कहा । वह फिर आवेश में आ गई थी । ''भला मैं उसकी सलाह क्यों लूं (ई क्या वह कभी मेरी सलाह लेती है ?''

''तो तुम्हें सचमुच गई सिया-ता-पाओ से सख्त नफरत है ?''

उसने बहुत देर तक चुप रहने के बाद कुछ सोचकर गम्भीर शान्त स्वर में जवाब दिया, ''नफरत की बात तो मैं नहीं जानती । लेकिन मैं बीमारी से पीड़ित हूँ । कितने जापानी दरिन्दे मेरे साथ रह चुके हैं, इसकी गिनती मैं स्वयं नहीं कर सकती । इसलिए मैं अपवित्र हूँ । यही कारण है कि मैं इस दशा में सुख खोजने के लिए उत्सुक नहीं हूँ। एक पति के साथ रहने की बजाय मेरे लिए यही बेहतर होगा कि मैं अपरिचितों के .साथ रहूं अब मुझे ये लोग शहर के अस्पताल में भेज रहे हैं । वहीं रहूंगी । सुनते है कि शहर में ढेर से स्कूल हैं । शायद मैं भी किसी में भरती हो सकूँ । कहते हैं कि वहां हर किसी को भरती कर लेते हैं । यहाँ रह कर मेरी किसी से नहीं पट सकती । तो फिर क्यों न हर किसी. को अपने ढंग से जिन्दगी बसर करने की आजादी हो? उसी में सब का कल्याण है । मेरा सवाल है कि ऐसा करने से मैं किसी को कोई हानि नहीं पहुँचा रही । न ही मैं स्वार्थवश अपना सुख खोज रही हूँ । फिर भी अगर लोग सोचते हैं कि मैं कच्ची उम्र की और नासमझ हूँ या उद्दण्ड स्वभाव की हूँ-तो सोचा करें! मुझे क्या गरज पड़ी है कि उनसे सिर-खपाई करती फिरूँ । आखिर उन्हें इससे क्या लेना-देना कि मैं वास्तव में क्या सोचती हूँ ।'' मैं यह देख कर दंग रह गई कि उसने कितनी जल्दी सब बातें तै कर डालीं । मुझे उसकी आत्मा की गहराइयों की एक और झलक मिली और मैं गहरे सोच में डूब गई । लेकिन उस समय तो मैंने केवल उसके निश्चय का समर्थन मात्र किया ।

मैं और अधिक रुकने का विचार छोड़कर उसी रोज वहाँ से चली आई । परिवार के सारे लोग मुझे विदाई देने आये थे, लेकिन सिया-ता- पाओ फिर दिखाई नहीं दिया ।

मुझे चलते समय किसी बात का खेद न था क्योंकि मैं उसके मविष्य के वारे में आश्वस्त थी । हम जल्द ही फिर मिलेंगे । फिर मिलेंगे और साथ-साथ काम करेंगे ।

पहाड़ी से उतरते समय कामरेड मा मेरे साथ थे । चेन-चेन ने अपने भावी जीवन की योजनाओं के वारे में जो कुछ मुझे बताया था, उन्होंने भी उसकी सचाई की साक्षी दी ।

लाल आकाश वाले गाँव की ओर पीठ कर के जब मैंने उस लम्बी, धूलभरी सड़क का सामना किया उस समय मेरे मन में यह भावना जाग रही थी कि चेन-चेन और उसके जैसी असंख्य दूसरी लड़कियों के साथ हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जो अपनी संभावनाओं के कारण उज्जल है ।

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(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया से साभार)

अनुवाद - शिवदान सिंह चौहान व विजय चौहान

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