विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

हरा भरा स्वर्ग ---केरल / गीता दुबे

image

मित्रों संग जब केरल जाने का प्लान बना तो सबसे पहले मुझे झुमरू और झुमरी का ख्याल हो आया कि पूरे एक सप्ताह ये मेरे बिना कैसे रहेंगे? झुमरू और झुमरी मेरे दो प्यारे-प्यारे खरगोश हैं जिन्हें घर में आये अभी दो ही महीने हुए थे और जिन्हें खाना-पीना देने के अलावा उन्हें पुचकारना उनसे बातें करना मेरी और उनकी दिनचर्या में शामिल थे| खैर उनकी व्यवस्था कर हम केरल के लिए निकल पड़े| जमशेदपुर से सुबह 6 बजे की स्टील एक्सप्रेस से हमें कोलकाता जाना था कोलकाता से हमारी उड़ान बैंगलोर की थी फिर बैंगलोर से रेल यात्रा कर हमें कोयम्बटूर जाना था| अभी सूरज की किरणें पूरी तरह से धरती को स्पर्श नहीं कर पाई थीं, हम घर से रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े थे, मैं सुबह की स्वच्छ, ठंडी हवा को भरपूर महसूस कर रही थी तब तक अचानक जोर की आवाज हुई और हमारी गाड़ी लड़खड़ाते हुए रुक गई, कार का टायर फट चुका था, सभी के चेहरे उतर गये लेकिन मेरे पति और उनके मित्र ने मिलकर कुछ ही देर में स्टेपनी लगा दी और हम समय से पहले स्टेशन पहुँच चुके थे| उस दिन मुझे यह एहसास हुआ कि यात्रा के दौरान समय से कुछ पहले निकलना आपको किस तरह सुरक्षित रखता है|

image

केरल भारत की दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य बसा एक राज्य है| यहाँ की भाषा मलयालम और इसकी राजधानी त्रिवेंद्रम है| कोयम्बटूर रेलवे स्टेशन पर उतरते ही हमें यह स्वीकारने में तनिक भी देर नहीं लगी कि केरल भारत का सबसे साफ-सुथरा राज्य है, इतना साफ- सुथरा रेलवे स्टेशन मैंने भारत में अब तक नहीं देखी थी| केरल में सौ प्रतिशत साक्षरता है, यहाँ बेटियों की संख्या बेटों से अधिक है, शिशुओं की मृत्यु दर सबसे कम है और शासन व्यवस्था एकदम दुरुस्त है|

मुन्नार

----

कोयम्बटूर स्टेशन से हमने टैक्सी ली और मुन्नार के लिए चल पड़े| मुन्नार केरल के इडुक्की जिले में है, समुद्र तट से इसकी ऊँचाई लगभग 1600 मीटर है| हमारी टैक्सी घने जंगलों के बीच से गुजर रही थी, ड्राइवर वेंकट ने बताया कि इस जंगल में जंगली हाथी,बाघ,हिरन सभी जंगली जानवर हैं लेकिन वे सड़क के किनारे नहीं आते| वेंकट ने हमें यह भी बताया कि कुख्यात डाकू वीरप्पन अपने अंतिम दिनों में इसी जंगल में छुपा हुआ था| जंगल ख़त्म होने के बाद हवाओं में ठंडक बढ़ने लगी थी| दूर-दूर तक फैले खूबसूरत चाय के बगान, हरी-भरी घाटियाँ, ऊँची-ऊँची चोटियों को देखते हुए हम अपने होटल पहुंचे| यकीन मानिए मुन्नार में कदम रखते ही हम एकदम तरोताजा हो गये, सारी थकान छूमंतर हो गई| मुन्नार एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है, प्रकृति ने खुलकर अपनी खूबसूरती यहाँ बिखेरी है| मुन्नार चाय-बागानों और गरम मसालों की खेती के लिए भी जाना जाता है| दूसरे दिन हम मुन्नार स्थित कोलूकुकुमालाई की टी-फैक्ट्री देखने गये, यहाँ हमने टाटा की न सिर्फ चायपत्ती तैयार की जाने की पूरी प्रक्रिया देखी बल्कि उस ठंढे मौसम में पहाड़ पर गर्म-गर्म ताजे चाय की चुस्की भी ली| कोलुकुकुमालाई जाने के रास्ते में हमने कई छोटे-बड़े झरने देखे और पहाड़ों से निकले पानी को छूकर उसकी ठंढक को महसूस किया| टी- फैक्ट्री देखने के बाद हमारा गाइड श्रीधर हमें मसालों के बगान में ले गया| यहाँ हमने छोटी इलायची, खसखस, सुपारी के पेड़ देखे, पूरा बगान इलायची की खुशबु से महक रहा था| अगली सुबह हमें मुन्नार को अलविदा कहकर ऐलेप्पी जाना था|

ऐलेप्पी

----

मुन्नार से ऐलेप्पी की दूरी लगभग 175 किलोमीटर है| हम टूरिस्ट बस से ऐलेप्पी जा रहे थे, हमारे बस में कुछ विदेशी पर्यटक भी थे उनसे बात-चीत के दौरान पता चला कि वे हॉलैंडवासी हैं और उनका 6 लोगों का समूह एक महीने के लिए भारत भ्रमण पर आया है, उन्होंने यह भी बताया कि हॉलैंड में भारत घूमने का बड़ा क्रेज है| ऐलेप्पी पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई थी होटल तक हमारी बस नहीं जा सकती थी, हमें अपने होटल छोटी सी नदी पार करके ही जाना था| हमने देखा हमारे होटल के नाम का एक बोट वहाँ मौजूद था, हम सभी उसपर सवार हो गये तब तक मैंने देखा बोट पर चढ़ते समय एक व्यक्ति जिसकी उम्र 60 से 65 के बीच की होगी, उसका पैर फिसल गया और वह बोट में ही गिर गया, साथ चलते व्यक्ति ने यदि उसका हाथ न थामा होता तो वह व्यक्ति नदी में ही गिर पड़ता| गिरने पर उस व्यक्ति के घुटने के नीचे काफी कट चुका था और बहुत खून बह रहे थे| मैंने अपनी फर्स्ट-ऐड किट निकाली और उनकी मरहम-पट्टी की, खून का बहना कुछ कम हो गया था, वे सामान्य होकर हमारे बगलवाली सीट पर बैठ गये, देखने से वे पढ़े- लिखे सभ्य लग रहे थे, हमने पूछा आपके साथ कौन है? जवाब सुनकर मैं दंग रह गई, उन्होंने कहा कोई नहीं, मैं अकेले ही केरल की सैर करने निकला हूँ और मेरे और कुछ पूछने से पहले ही उन्होंने कह डाला मैं न ही किसी रिसर्च के काम से निकला हूँ और न ही हिस्टोरियन हूँ मैं भी आपलोगों की तरह ही एक पर्यटक हूँ| आपलोग मुझे अकेला देख इतना हैरान क्यों हो रहे हैं? फिर भी मैंने पूछ ही डाला घर में कौन-कौन है...पत्नी, बच्चे.. उन्होंने कहा पत्नी तो नहीं रही बच्चे हैं सभी हैं....और उन्होंने संकेत दे दिया कि वे इस विषय पर बातें करना नहीं चाहते| उन्हें याद कर आज भी मन में एक टीस सी उठती है कि हमारा समाज किधर जा रहा है...बड़े- बुजुर्ग अकेले अपने आप को खुश रखने का भरपूर प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन कोई अकेले खुश रह सकता है क्या?

ऐलेप्पी में हरे-भरे धान के खेतों के बीच हैं ऊँचे नारियल के पेड़ और है बैक वाटर्स| समुद्र का वह पानी जो लौटकर जमीन की तरफ आ जाता है उसे बैक वाटर्स कहते हैं| ऐलेप्पी में मीलों तक बैक वाटर्स नदियों का रूप लेकर फैले हुए हैं| इस बैक वाटर्स में एक से एक बढ़िया हाउस बोट हैंजिसमें पांच सितारा होटलों की सारी सुविधाएं मिलेंगी| हाउस बोट पानी के भीतर धीरे-धीरे घुमाती है,कई पर्यटक ऐसे हाउस बोट होटलों में भी ठहरते हैं जो आपको चौबीसों घंटे धीरे-धीरे घुमाते रहते हैं| हमने सिर्फ एक घंटे की एक फेरी लगाकर हाउस बोट का लुत्फ़ उठाया| हमारे होटल के पास ही एक छोटा सा गाँव था हम अगले दिन गाँव घूमने निकल पड़े, एक व्यक्ति जिसका नाम रमेश था हम उसके घर चले गये, उसके बगान में नारियल के काफी पेड़ थे, सभी पेड़ नारियल से लदे थे, हम छ: लोग थे, चार कुर्सी तो उसके घर में थीं और दो कुर्सी वह पड़ोस के घर से मांग लाया, हमें बैठाकर वह तुरत नारियल के पेड़ पर चढ़ गया और हम सभी को मीठी डाब पिलाकर हमारा स्वागत किया| जीविका के बारे में उसने बताया कि डाब और डाब के छिलके की रस्सी बनाकर वह बेचता है| किसी तरह गुजारा हो जाता है, चलते समय जब हम उसे पैसे देने लगे तो उसने यह कहते हुए पैसे लेने से इनकार कर दिया कि अतिथि से भी कोई पैसे लेता है क्या? उसके त्याग को मैं कभी नहीं भूल सकती, हमारी संस्कृति इन्हीं लोगों ने तो जीवित रखी है|

यात्रा के पांचवें दिन ऐलेप्पी से विदा लेने का समय आ गया, मुझे भी झुमरू और झुमरी को देखने की बेचैनी हो चली थी घर का दरवाजा खोलते ही मैंने देखा दोनों ड्राइंग रूम के कारपेट पर फुदक रहे थे, उनकी लाल-लाल प्यारी आखों ने एक झटके से मुझे देखीं फिर दोनों सोफे के नीचे लोप हो गये|

 

गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखण्ड

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget