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कहानी / इंजिनियर्स बेटियाँ / महेश कुमार गोंड 'हीवेट'

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अरे घंटे भर से फ़ोन बज रहा है, उठाते क्यों नहीं हो ?’ मेरा भाई मुझे झकझोर कर जगाते हुये चिल्लाया। मैं अपनी बिस्तर से उठता, उससे पहले ही उसने फ़ोन को मुझे थमाते हुये कहा, ‘ ये पता नहीं कौन है ? जो नये नम्बर से कब से फ़ोन कर रहा है।’ अब मैं फ़ोन उठाते ही, फ़ोन करने वाले को डांट देना चाह रहा था, कि उसने मेरी दोपहर की इतनी खूबसूरत नींद को भला बर्बाद कैसे किया ?

‘हैल्लो, कौन ? ’ अपने पूरे गुस्से को इन्हीं दो शब्दों को बोलने में लगा दिया।

‘हैल्लो, बाबू! मैं मम्मी बोल रही हूं। अपने फोन में पैसा नहीं था न, तो ये कमली भाभी के नम्बर से फ़ोन की हूँ। ज़रा उधर से फ़ोन मिलाओ। एक जरुरी काम है।’ उधर से मेरी माँ की आवाज आयी। इस समय माँ की आवाज में थोड़ी घबराहट थी। जिसे मैं भांप नहीं पा रहा था। क्योंकि अभी भी नींद मुझ पर हावी थी। फिर भी माँ के कथनानुसार मैं अपनी ओर से माँ को फ़ोन मिलाने लगा।

‘ओ हो माँ ! तुम तो मुझे सोने भी नहीं देती हो। शाम को तो मैं फ़ोन करता ही न ! फिर क्यों जगा दिया मुझे ? इतना अच्छा सपना देख रहा था। आपने सब बिगाड़ दिया।’ माँ ने जैसे ही फ़ोन उठाया मैंने एक ही सांस में अपनी पूरी नाराजगी जाहिर कर दिया।

‘अच्छा ! तो तुम दिन में ही सपने देख रहे थे। जरा हमें भी तो पता चले कि किस सपने के लिये मेरा लाल मुझ पर इतना लाल हो रहा है।’ माँ ने अपने दुलार भरे लहजे में मुझसे पूछा।’

‘अरे माँ, वो कमली भाभी की चुलबुली है न ! वहीं सपने में आयी थी और बता रही थी कि उसने पांचवीं की परीक्षा पास कर ली है। कह रही थी कि, ‘चाचू, अब आप की तरह इंजीनियर बनने के लिये लखनऊ कब जाना पड़ेगा ? ’ मैं उत्सुकता से बोलता चला जा रहा था।

‘अब लखनऊ नहीं बल्कि स्वर्ग जाना पड़ेगा। ये तुमने उसको सपने में ही क्यों नहीं बता दिया ?’ माँ ने एक अजीब भाव से मुझे बीच में ही रोकते हुये बोल पड़ी। जिसे मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था। ‘माँ ! चुप हो जाओ। भला, उस छोटी-सी बच्ची ने तुम्हारा क्या बिगाड़ दिया ? जो उसके लिये ऐसे बोल रही हो ?’ मैं अपनी माँ पर जोर से चिल्लाया।

‘भला मेरा क्या बिगाड़ेगी वो नन्हीं-सी जान ! बस उसके प्राण बच जाये ! सभी लोग तो बस यहीं मना रहें हैं।’ माँ ने अपने रुधे हुये स्वर में कहा। ‘अरे, ये अचानक क्या हो गया उसको ?’ मैंने घबराते हुये पूछा।

‘कल शाम को चुलबुली अपने छोटे भाई मंटू के साथ पढ़ रही थी। फिर दोनों आपस में एक पेंसिल को लेकर लड़ने लगे। फिर क्या ! उसके पिता भग्गू को तो जानते ही हो कि बस मंटू ही उसकी आँखों का तारा है। चुलबुली को तो बस ऐसे देखता है कि अब खाये कि तब खाये। क्या किया जाये, बस उसका इतना ही कुसूर है की वह एक लड़की है।’ माँ धीमी गति से एक-एक वाक्य को बोले जा रही थी।

‘अरे, फिर हुआ क्या ? ये तो बताओ ? ये कहानी किसे सुना रही हो मुझे पता नहीं है क्या ?’ मैंने माँ पर जोर डालते हुये चिल्लाया।

‘फिर क्या हुआ ! उसके किताबों को उसने चूल्हे में डाल दिया। इतने से जब उसका जी न भरा तो उस नन्हीं-सी बच्ची पर जानवरों की तरह लात-घूंसे बरसाने लगा। वह तब तक उसको घसीटता रहा जब तक उसके मुंह से आवाज निकलना बंद न हो गया। फिर वह रात भर बुखार से तपती रही। भग्गू दवा लाना तो दूर, उसको देखने तक नहीं गया। अब वह जीवन रेखा हॉस्पिटल में अपनी साँसे गिन रही है। किसी को पहचान भी नहीं पा रही है। अभी दो घंटे पहले एक बार होश आया था तो बस बाबू चाचू, बाबू चाचू बोल रही थी। फिर बेहोश हो गयी। तुम जल्दी से आ जाओ बेटा, कहीं ऐसा न हो कि चुलबुली एक सपना ही बनकर रह जाये। मुझे बहुत घबराहट हो रही है। ’ माँ इतना सब कहते-कहते रो पड़ी। इस समय मैं एकदम घबराया हुआ था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि भग्गू जैसे अनपढ़ गवांर के लिये कौन-सी गाली का प्रयोग करना उचित होगा। दिमाग में बस एक ही बात चल रही थी, कि किसी भी तरह जल्दी से घर पहुँच जाऊं।

लगभग दो घंटे के बाद, शाम के 5 बजे, मैं लखनऊ जंक्शन पर पहुँच गया था। स्टेशन के सभी प्लेटफ़ॉर्म,विश्रामालय एवं स्टेशन के बाहर का खाली क्षेत्र खचा-खच प्रतियोगी परीक्षार्थियों द्वारा भरा पड़ा था। जहाँ कुछ लोग अखबार बिछाकर अपने बैग का तकिया लगाये लूसेंट व किरण पब्लिकेशन की पुस्तकों से विगत वर्षों के पूछे गये प्रश्नों को सामूहिक रूप से दोहरा रहे थे। वहीं कुछ लोगों का एक समूह सातवाँ वेतन आयोग, विजय माल्या व खेल जगत की ज्वलंत बिन्दुओं पर अपने-अपने ज्ञान का प्रदर्शन कर रहे थे।

लगभग आधे घंटे तक एक लम्बी लाइन को झेलने के बाद मैं एक साधारण टिकट लेने में सफल हुआ। अब बिना कोई देर किये मैं प्लेटफ़ॉर्म संख्या पांच की ओर भागा, क्योंकि ट्रेन के आने में कुछ ही देर रह गया था। इतनी भीड़ भरी हालातों के बीच भी मेरा ध्यान चुलबुली पर से क्षण-भर के लिये नहीं हट पा रहा था। कुछ ही समय बाद लखनऊ से चलकर वाराणसी को जाने वाली ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आकर लगी। यात्रियों व परीक्षार्थियों की बिहड़ भीड़ ट्रेन में चढ़ने के लिये दौड़ पड़ी। काफी मशक्कत करने के बाद मैं ट्रेन के गेट तक पहुँच पाया। परन्तु अब अन्दर घुसने का मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। तभी पंद्रह-बीस परीक्षार्थियों की एक झुण्ड मेरे पीछे से घुसने लगा। इसी झुण्ड के धक्कों का सहारा पाकर मैं भी डिब्बे के अन्दर कदम रख सका। मैं अब अन्दर घुसते ही खिड़की के पास वाली सीट लेकर आराम से बैठ जाना चाह रहा था।

‘कोई गेट को अन्दर की ओर खोलो मेरा हाथ दब रहा है।’ तभी मेरे पीछे से किसी लड़की की आवाज आयी। मैं तुरंत पीछे मुड़कर देखा तो एक लड़की का हाथ गेट में दब रहा था। इस समय उसके पास चीखने-चिल्लाने के अलावां कोई दूसरा चारा न था। मैं तुरंत गेट की ओर लपका और दूसरे लोगों को धक्का देते हुये गेट को अन्दर की ओर खोलने लगा। गेट के आस-पास के लोगों को भ्रम हुआ कि वह लड़की मेरे ही साथ है। कुछ ही क्षणों के बाद उसका हाथ बाहर निकल गया था। फिर मैं बिजली की गति से अपने लिये खिड़की के पास वाली सीट की ओर दौड़ा।

लगभग पंद्रह मिनट बीत चुका था। मैं अपनी मनचाही सीट पर बैठ चुका था। प्यास के मारे मेरा गला सूख रहा था। इसलिये खिड़की से बाहर झांककर पानी बेचने वाले को आवाज देने लगा। परन्तु कोई पानी वाला दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ रहा था। कुछ देर बाद एक पानी वाला दिखाई भी पड़ा तो उस बिहड़ भीड़ की वजह से वह मेरे पास तक पहुँचने में असफल रहा।

‘इसमें ठंडा पानी है। आप पी सकते हैं।’ तभी मेरी ओर पानी की एक बोतल को बढ़ाते हुये किसी ने विनम्रता से कहा। मैं चौक गया और अपने सामने वाली सीट पर नज़र दौड़ाई। अरे, ये वहीँ लड़की है जिसका हाथ अभी थोड़ी देर पहले गेट में हाथ दबने से मैंने बचाया था। पिछले आठ सालों में माँ सैकड़ों बार समझा चुकी थी कि ट्रेन में किसी अनजान व्यक्ति का न तो कुछ खाओ और न ही किसी को कुछ खिलाओ। फिर भी आज मैं उस पानी की बोतल को ले लेना ही उचित समझा। क्योंकि अब पानी के बिना रहा नहीं जा रहा था। ‘थैंक यू, मैडम।’ पानी पीने के बाद उसको बोतल पकड़ाते हुये मैंने विनम्रतापूर्वक कहा।

‘थैंक यू टू !’ एक हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ कहते हुये, वह अपना बोतल लेकर बैग के पॉकेट में रखने लगी। मैं तुरंत ही समझ गया कि उसने मुझे गेट वाली घटना के लिये ‘थैंक यू ’ कहा है।

थोड़ी ही देर बाद हमारी ट्रेन तेज गति को पकड़ चुकी थी। अब अंधेरा हो चुका था और खिड़की से आने वाली ठंडी-ठंडी हवा, उस प्रचंड गर्मी को मात दे रही थी। वह अपनी खिड़की से बाहर की ओर देख रही थी। इस समय मैं भी खिड़की से बाहर ही देख रहा था। लेकिन मेरे दिमाग में चुलबुली ही घूम रही थी। ‘भग्गू जैसे लोग आखिर बेटियों से इतना नफरत क्यों करतें हैं ? ये लोग ऐसा क्यों सोचतें हैं कि सिर्फ बेटे ही उनके बुढ़ापे की लाठी हैं और बेटियां उन पर एक बोझ हैं।’ ऐसे ही तमाम सवाल मेरा मन मुझसे पूछ रहा था,जिसका मेरे पास कोई जवाब न था। ट्रेन अपनी तेज रफ़्तार से बिना रुके चली जा रही थी। एक स्टेशन, फिर अगला स्टेशन फिर उसके अगला स्टेशन .........

अब ट्रेन को लखनऊ से चले हुये लगभग तीन घंटे हो गये थे। मुझे एक बार फिर से प्यास लग रही थी। मेरी निगाहें एक बार फिर उस बैग के पॉकेट में रखे हुये बोतल को निहारने पर मजबूर थीं। लेकिन उस पानी की बोतल को मैं मांग सकूँ, इसके लिये मेरा संकोची स्वभाव आज्ञा नहीं दे रहा था।

‘शायद आपको प्यास लगी है ! इसमें अभी और पानी बचा है। आप पी लीजिये।’ अचानक उस लड़की ने एक बार फिर मेरी तरफ पानी की बोतल को बढ़ाते हुये कहा। अभी तक तो कोई पानी बेचने वाला नहीं आया था। इसलिये एक बार फिर से उसके बोतल को थामना ही पड़ा। ‘एक बार फिर से शुक्रिया, मैडम’ मैंने बोतल को वापस करते हुये कहा, हिंदी में कहा।

लगभग पांच मिनट तक कुछ सोचने के बाद उसने मुझसे पहला सवाल करते हुये पूछा ,‘किस डिपार्टमेंट का पेपर देने जा रहें हैं आप ?’

’नहीं, मैं कोई पेपर देनें नहीं बल्कि अपने घर जा रहा हूँ। मैं पिछले साल पहले से ही लखनऊ मेट्रो में जूनियर इंजीनियर हूँ। कुछ जरुरी काम से तत्काल जाना पड़ रहा है। वैसे आप कौन-सा पेपर देनें जा रहीं हैं ?’ मैंने अपने जवाब में उससे सवाल करते हुये कहा। इस समय आस-पास के बैठे लोग धीरे-धीरे नींद की आगोश में आ रहे थे। अपने खिड़की के पास वाली सीट पर से जितने लोगों को मैं देख पा रहा था। बस मेरे सामने की सीट पर बैठी वह लड़की ही ऐसी थी, जिस पर नींद का असर अभी नहीं हो रहा था। ‘तो आप पहले से ही इंजिनियर साहब हैं। वेरी गुड, उसने मुस्कुराते हुये कहा। ‘वैसे मैं पेपर देने नहीं बल्कि पेपर देकर अपने घर जा रही हूँ। सिचाई विभाग का पेपर देने लखनऊ आयी थी। आज पहला पेपर था और कल दूसरा पेपर होगा। लेकिन पहले ही दिन का पेपर इतना ख़राब हुआ कि कल का पेपर देने का कोई फायदा ही नहीं है। सो, घर लौट जाना ही बुद्धिमानी लगा।’ अब वो थोड़ा गंभीर होते हुये बोली।

‘वैसे आपने डिप्लोमा कहाँ से किया है ? और कब के पासआउट हैं ?’ एक मित्रवत भाव से उसने अगला सवाल किया।

‘मैंने हीवेट से इलेक्ट्रिकल ब्राँच में 2011 बैच का पासआउट हूँ।’ मैंने जवाब में कहा।

‘अरे,मैं भी 2011 बैच की पासआउट हूँ, सिविल ब्रांच, गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक लखनऊ से।’ अपनी बारी का फायदा उठाते हुये वह चौंककर बोली। अब कुछ देर तक वह न जाने किस सोच में डूबी रही। फिर अचानक से कहने लगी कि, ‘ मैं अभी सोच रही थी कि, कितनी अजीब बात है न ? आप लड़कों को आगे बढ़ाने के लिये माँ-बाप क्या-क्या नहीं करतें ? तभी तो, आप जैसे लड़के अपनी जीवन में सफल हैं और हम जैसी लड़कियां बस हालातों से जूझ रहीं हैं। हम लड़कियां तो हैं ही बस दूसरों पर बोझ बनने के लिये। हमारा कुसूर ही यहीं होता है कि हम लड़की हैं। और जानतें हैं, यह ओंछी सोच उन लड़कियों के लिये और भी दुःखदायी होती है,जिनका सम्बन्ध मुस्लिम धर्म से होता है।’वह एक ही साथ लगातार बोले जा रही थी। वह इस तरह से अपनी बात को मुझसे बता रही थी कि मानों वह मुझसे बताने की जगह शिकायत कर रही हो।

‘एक मिनट मैडम, मुझे नहीं लगता कि आपके तथ्यों में ज़रा-सी भी सच्चाई है। सफलता सिर्फ मेहनत करने वालों को प्राप्त होती है। वह इस बात से कोई इत्तेफाक नही रखती कि मेहनत करने वाला लड़का है या लड़की। रही बात माँ-बाप की, तो कोई माँ-बाप यह नहीं चाहता कि बेटे सफलता की उचाईयों को चूमें और बेटियां गड्ढे में गिर जायें। और हाँ, जहाँ तक बात रही मुस्लिम सम्प्रदाय की, तो किसी धर्म विशेष को इसके लिये जिम्मेदार ठहराना, आपकी व्यक्तिगत सोच को दर्शाता है।’ उसको बीच में ही रोकते हुये मैं अपनी बातों को रखना शुरू कर दिया। अब ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम दोनों अभी कुछ ही समय पहले मिलें हैं। इस समय हम दोनों के चेहरे पर एक प्रतियोगात्मक भाव को स्पष्ट दिख रहा था। हम दोनों के बीच एक गंभीर विषय पर बहस छिड़ चुकी थी। इन कुछ क्षणों के लिये मैं खुद को, चुलबुली की हालातों से दूर महसूस कर रहा था।

तभी मेरी तरह उसने भी मुझे बीच में ही रोककर बड़े ही हाज़िरजवाबी के साथ पलटवार किया, ‘आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं कि सफलता सिर्फ मेहनत करने वालों को पहचानती है। लेकिन ये तो आपको भी पता होगा कि मेहनत करने के लिये उचित अवसर का मिलना भी तो जरुरी होता है। इस समाज में, ये अवसर तो बस आप लड़कों को ही दिया जाता है न ? आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि नाइंटी-नाइन परसेंट लड़कों की पढाई पूरी होने के बाद माँ-बाप चाहतें हैं कि उनका लड़का आगे की सरकारी नौकरियों की तैयारी करे। उसकी शादी के बारे में तब तक नहीं सोचते जब तक कि वह आपकी तरह कुछ बन नहीं जाता। जबकि नाइंटी-नाइन परसेंट लड़कियों के माँ-बाप उनकी पढाई पूरी होने के चार महीने पहले से ही उनके लिये रिश्ते ढूंढने लगते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि लड़की भी गवर्नमेंट जॉब की तैयारी करे, और तब तक उसकी शादी न करें। जब तक वह कुछ बन न जाये। ये हंड्रेड परसेंट सही आकड़ें हैं। इन्हें आप झुठा साबित नहीं सकते। फिर भी बताइये, आप इस पर क्या कहना चाहतें हैं ?’ अपनी पारी को बड़ी गंभीरता से समाप्त करते हुये उसने मुझसे सवाल किया। उसके द्वारा दिये गये वे तार्किक जवाब मेरे पक्ष को कमजोर कर रहे थे। क्योंकि उसकी इन बातों में काफी कुछ सच्चाई नज़र आ रहा था। जिसे मैं भी भली-भांति जानता था। ‘मैडम, मैं आपकी इन तार्किक बातों से काफी हद तक सहमत हूँ। लेकिन लड़कियों की इस दशा के लिये किसी धर्म अथवा संप्रदाय को दोषी ठहराना। ये बात कुछ समझ में नहीं आयी ?’ मैंने व्यंग्यात्मक रूप से एक बार फिर से गेंद को उसके पाले में डालते हुये कहा।

‘ये हुई न बात ! मुझे पूरा भरोसा था कि आपका अगला सवाल यहीं होगा। खैर, मैं आपके इस भ्रम को भी खंडित करती हूँ।’ बड़े ही सधे शब्दों के साथ उसने एक बार फिर अपने पारी का स्वागत किया, और आगे बोलने लगी,- ‘मैं इस्लाम धर्मं से सम्बन्ध रखतीं हूँ। इस धर्म का सबसे महान एवं पवित्र ग्रन्थ है, कुरआन-ए-शरीफ। हम सभी को, इस पाक ग्रन्थ की दिल से इज्जत करनी चाहिये और इसके द्वारा बताये गये उसूलों पर चलना चाहिये। लेकिन जानतें हैं, पिछली बार जब आपके मेट्रो का पेपर 28 जून को था। तब मैंने भी फॉर्म भर रखा था। लेकिन पेपर के ठीक एक महीने बाद मेरी शादी की तारीख पक्की की गयी थी। और पेपर के दो महीने पहले से ही मुझसे अपने कोर्स के सवालों के बजाय कुरआन-ए-शरीफ पढवाया जा रहा था। क्योंकि लड़के वालों से बोला गया था कि मैं अपने धर्म की बड़ी किताब को पढ़ चुकी हूँ। किसी को भी इस बात की फिकर न थी कि आने वाले पेपर से मेरा कैरियर बन सकता है। पूरे परिवार को बस यहीं नशा था कि मम्मी-पापा के रिटायर होने से पहले किसी भी तरह मेरी शादी हो जाये, बस ! फिर भी किसी तरह जिद करके पेपर दे पायी, और सेलेक्ट होने में बस पांच नम्बर से रह गयी। आज शादी को हुये भी एक साल हो गये। इस एक साल में बड़ी मुश्किल से आज दूसरी बार पेपर देने आ पायी हूँ। वो भी सेंटर लखनऊ मिला था, तब आना संभव हो सका। पहले अपने ही माँ-बाप, साल भर का समय देकर तैयारी नहीं करने दिये। आज घर से बाहर एक विषय की कोचिंग करने चली जाओ तो सास-ससुर की मर्यादा टूटने लगती है। आखिर एक लड़की करे तो क्या करे ? मैं भी एक इंजिनियर बन सकती हूँ। आखिर इस बात को मैं कैसे साबित करूँ ? अब तो बस एक ही काम बचा है, कि अपने लेमिनेटेड सर्टिफिकेट पर जूठे बर्तन रखकर साफ़ करूँ।’ इस समय वह काफी भावुकता के साथ बोले जा रही थी। उसके मन का दर्द, उसके चेहरे पर साफ़ झलक रहा था। मैं बीच में ही उसको रोकते हुये सहानुभूति के साथ कहा, ‘प्लीज, अब आप शांत हो जाइये। मैं ये मानता हूँ कि आपको एक लड़की होने के कारण भेदभाव का शिकार होना पड़ा है। मैं ये भी मानता हूँ कि आपमें क्षमताओं कमी नहीं है। कमी है तो बस आपके पास अवसर की, जो पहले आपके अपने ही माँ-बाप नहीं दे पाये और अब ससुराल वाले नहीं देना चाहते।’ वो एकदम शांत मन से मुझे सुन रही थी। मैं और आगे बोलता चला जा रहा था कि, ‘और रही बात इस्लाम धर्म की, तो मैं आपको बता दूं कि कोई धर्म बुरा नहीं होता। आपकी तरह इस समाज में न जाने कितनी लड़कियां हैं। जो इस भेदभाव को झेलती चली आ रहीं हैं। तो क्या वे सारी लडकियां इस्लाम धर्म से ही हैं ? ऐसा बिलकुल नहीं है। इस समाज के कुछ निम्न-स्तरीय सोच के माँ-बाप को ढाल बनाकर किसी धर्म को बदनाम मत कीजिये।’ अब वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी। अपनी बातों को मजबूती से रखने के बाद, मैं भी शांत हो गया। अब हमारी वाद-विवाद प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी थी। एक बार फिर से हम दोनों अपने-अपने खिड़की से बाहर, पीछे की ओर तेज भागती हुई दृश्यों को देखने लगे। लगभग दो घंटे के बाद हम दोनों वाराणसी जंक्शन के बाहर ऑटो स्टैंड पर खड़े थे। ‘चलिये सर, अच्छा समय निकल गया। अगर कोई बात बुरी लगी हो तो माफ़ कीजियेगा।’ वो अपने बैग को कंधे पर रखते हुये मुस्कुराकर बोली।

‘अरे नहीं मैडम, इसमें बुरा लगने वाली कोई बात ही नहीं थी।’ मैंने भी मजाकिया लहजे में जवाब दिया।

‘अच्छा तो चलती हूँ इंजीनियर साहब, बाय।’ एक बार फिर मुस्कुराकर कहते हुये वह एक रिक्शे पर बैठकर चल दी। अब मैं भी अपने बस अड्डे की ओर भागा। मानों, एक बार फिर से चुलबुली की यादें मुझे परेशान करने लगीं हों।

सुबह के आठ बजे, मैं जीवन रेखा हॉस्पिटल जाने वाली बस में बैठ चुका था। तभी मेरी फ़ोन की घंटी एक बार फिर बजनी शुरू हुई। ये माँ की कॉल आ रही था। उन्होंने बताया कि तुम सीधे हॉस्पिटल मत जाना। वहां कोई नहीं मिलेगा। सब लोग घर आ चुके हैं। तुम भी सीधे घर ही आ जाओ।

अगले दो घंटे बाद मैं घर पहुँच चुका था। छोटे भाई से पूछने पर पता चला कि माँ छत पर है। मैं फ़ौरन छत पर पहुंचा। ‘चुलबुली के घर पर कोई दिख नहीं रहा है। सभी लोग हॉस्पिटल से आये नहीं क्या ?’ माँ का चरण स्पर्श करते हुये, मैंने पूछा। ‘सब लोग, एक घंटे पहले ही वहां से निकल चुके थे। चुलबुली एकदम ठीक हो गयी है। बस, सब लोग उसको लेकर आते ही होंगे।’ माँ ने मेरी ओर नाश्ते की प्लेट को बढ़ाते हुये कहा। पता नहीं क्यों मुझे माँ के बातों पर यकीन नहीं हो रहा था। मन न करते हुये भी मैंने थोड़ा-सा नाश्ता किया,और अपने छत पर से ही चुलबुली के घर को निहारने लगा। मेरा मन बस इसी सोच में डूबा था कि जैसे ही उसके दरवाजे पर गाड़ी आकर रुकेगी, मैंने तुरंत उसके पास चलूँगा।

अब तो लगभग दो घंटे बीत चुके थे। मुझसे और इन्तजार नहीं हो पा रहा था। तभी किसी गाड़ी के उसके दरवाजे पर आकर रुकने की आवाज सुनाई दी। अब मैं तुरंत छत की सीढियों से नीचे की ओर दौड़ा। इस समय मैं बिना एक क्षण भी देर किये चुलबुली के पास पहुँच जाना चाह रहा था। मैं जल्दी-जल्दी सीढियों से उतरते हुये, आँगन में पहुंचा। अब मेरे सामने बाहर का गेट दिख रहा था, जिसे मैं तुरंत पार कर जाना चाह रहा था। अगले दो सेकंड में मैं गेट पर पहुँच चुका था। लेकिन ये क्या ? गेट पर तो ताला लगा पड़ा था। ‘अरे ये ताला किसने बंद कर दिया है ? सब पागल हो गये हैं क्या ?’ खूब जोर से चिल्लाते हुये मैं वापस आँगन में लगे खूँटी की ओर चाबी लेने के लिये भागा। तभी मुझे कमरे में किसी के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। जब मैं कमरे में पहुंचा तो देखा कि माँ रो रही थी। मैं कुछ पूछता कि उससे पहले ही माँ कहने लगी कि, ‘कहाँ दौड़ा जा रहा है तू ? चुलबुलिया को तो सब लोग हमेशा के लिये छोड़ आये। अब तू उससे बस सपने में ही मिल पायेगा। कल जब मैंने तुमको आने के लिये फ़ोन किया था। उसके दो घंटे बाद ही चुलबुलिया हमेशा के लिये सो गयी थी। पुलिस व समाज के भय से मुहल्ले के लोगों ने मिलकर रातों-रात उसको पार कर आये।’

अगले बीस मिनट बाद, मैं उल्टे पाँव चलकर फिर से छत पर आ गया था। इस समय मैं भले ही शांत, गुमसुम-सा चारपाई पर लेटा था। लेकीन मेरे मन में तमाम सवाल, हिलोरे मार रहे थे। मैं ये सोचे जा रहा था कि, ‘आखिर चुलबुली के साथ ऐसा क्यों हुआ ? वो तो अपने पिता भग्गू से तो बहुत प्यार करती थी। अभी दो ही महीने पहले की तो बात है। जब आधी-रात को भग्गू पेट की दर्द से तड़प रहा था। उस समय भी चुलबुली ही तो मेरे घर पर रोते हुये आयी थी कि, ‘चाचू, पापा को जल्दी दवा को ले जाओ।’ क्या भग्गू को कभी बिटिया का यह प्यार नहीं दिखाई नहीं दिया ? भग्गू जैसे गवांर के नज़र में एक लड़की होना, क्या इतना बड़ा अपराध है ?

अब एक बार फिर से उस ट्रेन वाली लड़की की छाया स्वतः मेरे दिमाग में उभरकर आ रही था। उसके द्वारा कही गयी एक-एक तार्किक बात, मेरे मन को अशांत कर रहे थे। एक अनपढ़ गवांर इंसान अपनी बेटी को ही मार देता है। जबकि एक पढ़ा-लिखा गंवार इंसान अपनी बेटी के सपनों को मार देता है। शायद यहीं एक कॉमन बात होती है दोनों में ! यहीं सोचते-सोचते मैं एक बार फिर से गहरी निद्रा में डूब गया।

महेश कुमार गोंड ‘हीवेट’

ग्राम - धनैता, पोस्ट - डोमनपुर

जिला - मीरजापुर (उत्तर-प्रदेश )

पिन कोड - 231306

मोबाइल नंबर - +91-9651764863

ई – मेल : author4949@gmail.com

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