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सीताराम साहू की कविताएँ

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मुझको ऐसे न विसराओ मेरे प्रभु , जिससे मन में तेरी
याद कर न सकूं ।
अपनी माया से इतना रिझाओ नहीं, मन से तुमसे मैं फरियाद कर न सकूं।
दर्द होता नहीं आदमी को अगर ,कुछ न चलता पता बीत जाती उमर ।
दर्द में चैन ढूंढो मेरे साथियों ,नींद से जाग जाओ मेरे हम सफर ।
दर्द ओर चेन में भाव दो एक सा, सुख दुख में तुम्हें बिसरा न सकूं । अपनी माया से, ,,,,


मन में मेरे लगा दो मिलन की लगन, दूर क्यों हो खड़े
कुछ तो बोलो सजन ।
जीना मर-मर के अब मैं नहीं चाहता, पास आओ मिटा दो हिय की तपन ।
बिन तुम्हारे ये जीवन नहीं चाहिए, पास आओ कभी दूर जा न सकूं ।अपनी माया से इतना, ,,,,,,,


आंख हर पल तुम्हें ही निहारा करे,वाणी हर पल तुम्हें ही पुकारा करे।
कर करे काम केवल तुम्हारे लिए, मन तेरा रूप हर पल विचारा करे ।
मेरे भावों में ऐसे समा जाइये ,चाहकर भी तुम्हें बिसरा न सकूं ।अपनी माया से इतना, ,,,,,,,,,,


वाणी में प्रेम का तत्व उपहार दो,हर ह्दय में भरा प्यार ही प्यार हो ।
जिस तरफ देखूं कोई न दुखिया दिखे, ऐसा सुखमय प्रभु तेरा संसार हो ।
मुझको केवट सा चरणों का जल दीजिए, प्यार तेरा कभी भी भुला न सकूं । अपनी माया से इतना, ,,,,,,,


कुछ खबर ही नहीं ये है तेरा असर, मैं कहां से हूँ आया ओर जाना किधर ।
लो परीक्षा न मेरी थका हूँ बहुत, पास अपने बिठा लो मेरे हम सफर ।
पास ऐसे बिठालो मुझे प्यार से, चाहकर भी कभी दूर जा न सकूं ।अपनी माया से इतना, ,,,,,,,,,


जन्म मानव का जब दे दिया आपने, मुझको पाला सम्भाला सदा आपने ।
गुण नहीं दुर्गुणों का मैं भंडार हूँ, नाम अपना मुझे दे दिया आपने ।
नाम जब दे दिया गुण भी कुछ दीजिए, पेट प्रजनन में जीवन गवां न सकूं ।


अपनी माया से इतना रिझाओ नहीं, मन से तुमसे मैं फरियाद कर न सकूं ।
मुझको ऐसे न बिसराओ मेरे प्रभु, जिससे मन में तेरी याद कर न सकूं ।
------------------

 

न मैं धान्य धरती न धन चाहता हूँ ।
कृपालु कृपा की किरण चाहता हूँ ।
रहे नाम तेरा वो चाहूँ में रसना,
तुम्हारे ही चरणों में चाहूँगा बसना,
विनय वाणी बोले ऐसी हो रसना,
सुने यश तेरा वो श्रवण चाहता हूँ ।


कृपालु कृपा की किरण चाहता हूँ ।
दया भाव आंखों में आऐ निरंतर,
करे दिव्य दर्शन जो तेरा निरन्तर ,
जिन आंखों में रहना हो तुमको निरन्तर,
वही भाग्यशाली नयन चाहता हूं, ।


कृपालु कृपा की किरण चाहता हूँ ।
है बस लालसा पूजा करलूं तुम्हारी,
दुखियों की सेवा करे हाथ प्यारी,
जिन हाथों को करना हो पूजा तुम्हारी,
वही सेवा लायक मैं कर चाहता हूँ ।
कृपालु कृपा की किरण चाहता हूँ ।


सुन्दर विचारो में जीवन हो पूरा,
विमल ज्ञान धारा से मस्तक हो पूरा,
तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा,
व श्रद्धा से भरपूर मिलन चाहता हूँ ।
कृपालु कृपा की किरण चाहता हूँ ।


सियाराममय सोच होवे हमारी,
मेरे मन के मन्दिर में आओ मुरारी,
मुझे अपने चरणों का बना लो पुजारी,
तुम्हें रात दिन पूजना चाहता हूँ ।
कृपालु कृपा की किरण चाहता हूँ ।


----------------

आज आओ मिले चाँदनी रात है ।


ये हमारी तुम्हारी मुलाकात है ।
हम तो मिलते रहे रात दिन की तरह ,
हम तो मिलते रहे है चमन की तरह,
यूं ही मिलना तो मिलना सा लगता नहीं,
हम तो मिलते रहे एक तन की तरह,
कौन सी तुममें ऐसी अलग बात है ।


जाने कैसी अधूरी मुलाकात है। आज आओ, ,,,


मैं तो आया था तुमने पुकारा नहीं,
मन को भाया था तुमने निहारा नहीं,
मैं तुम्हारा हूँ तुम मानते ही नहीं,
मैं गिरा तुमने मुझको संवारा नहीं,
कौन सी तुममें ऐसी करामात है ।


जाने कैसी अधूरी मुलाकात है ।आज आओ, ,,,,,,


तुमको पाया तो उसकी झलक पा गया,
रात दिन उसके ख्वाबों में मैं खो गया,
तुम तो कहते हो मुझको नहीं चाहते
तुममें ईश्वर की प्यारी झलक पा गया ।
तुम नहीं मानते ये अलग बात है ।


जाने कैसी अधूरी मुलाकात है ।आज आओ, , , , , ,

--


सीताराम साहू,  9755492466

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