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हिन्दी सम्मेलन / व्यंग्य / अशोक जैन पोरवाल

 

(10 वॉ विश्व हिन्दी सम्मेलन जिसका मुख्य विषय रखा गया, 'हिन्दी के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए क्या करना है? इस पर मंथन के लिए 10 करोड़ रूपयों से भी कहीं बहुत अधिक खर्चा किया गया. सम्मेलन को स्टारों की हैसियत वाला 'शाही उत्सव' बना दिया गया. बजट की बहती गंगा में अनेकों ने अपने हाथों को धोया. 'अर्थ' के इस विशाल यज्ञ में अनेकों ने अपनी-अपनी सेवाओं की आहूतियॉ दी. बदले में उन्हें 'सेवाऍ' भी मिली. अपने-अपने को 'आमत्रंण पत्रों की रेवड़ियॉ' बॉटी गई गरीब हिन्दी भाषा को छोड़कर शेष सभी की 'चांदी' हो गई. आईये, पढ़ते हैं, 'खट्ठी-मीठी, कड़वी-तीखी' इस रपट को. जिसे प्रस्तुत कर रहे हैं, व्यंग्यकार अशोक जैन 'पोरवाल').

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समस्त हिन्दी भाषी और हिन्दी प्रेमी सज्जनों।

राजा-भोज को ताल की नगरी..............नवाबी नजाकतों और तहजीबों एवं गंगा-जमुना और सरस्वती की संस्कृतियों को छलकने वाला मेरा शहर भोपाल. जिसे 10 से 12 सितम्बर 2015 तक 10 वॉ विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और मुझे उसकी खट्ठी-मीठी, कड़वी और तीखी एक रपट लिखने का.

आप इस रपट को पढ़े इससे पूर्व मैं अपनी और इस रपट की भूमिका स्वरूप अपनी कलम की औकात बतलाना चाहता हूँ. ताकि आप इस रपट को और मुझे अन्यथा न ले बल्कि अपनी मर्जी के अनुसार किसी भी अन्य ढंग से ले ले. सज्जनों, मैं न ही किसी समाचार पत्र का एक पत्रकार हूँ. और न ही किसी टी.वी. चैनल का एक संवाददाता. मैं न ही एक सरकारी अधिकारी हूँ और न ही इस सम्मेलन का विशेष अथवा छोटा-मोटा प्रतिनिधि. मैं न ही हिन्दी साहित्य का स्थापित एक कलमकार हूँ और न ही हिन्दी भाषा का विद्वान. मैं न ही इस सम्मेलन आमंत्रित प्रवक्ता अथवा श्रोता या फिर दर्शक हूँ और न ही बिन बुलाया मेहमान. मैं तो बस सिर्फ.......... हूँ.

आंशिकों का 'दिल है, कि मानता नहीं.' लेखकों-व्यंग्यकारों की 'कलम है. कि मानती नहीं.' 10 वॉ विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी के लिए केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार तक के सभी सम्बंधित सज्जन पुरूष एवं महिलाऍ पधारी. ताकि सम्मेलन पूरी तरह से सफल हो सके. और उनकी नाकें देश-विदेश में ऊंची हो सके. इसके लिए देश के प्रधानमंत्री से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक.......भारत वर्ष के विदेश मत्रांलय से लेकर भोपाल नगर-निगम तक........मुख्यतम अधिकारियों से लेकर निम्न श्रेणी तक के कर्मचारियों तक......विशेष हस्तियों (सेलिब्रेटीस्) से लेकर आम-आदमियों तक. सभी लोगों ने अपनी-अपनी औकातानुसार अपनी-अपनी सेवाएं दी. और मजे भी लिए.

कभी-कभी, किसी-किसी को खट्ठी-मीठी, कड़वी और तीखी प्रतिक्रियाओं का सामना भी करना पड़ा. किंतु फिर भी 10 करोड़ रूपयों से भी कहीं बहुत अधिक (सही राशि की गणना सूचना का अधिकार के अंतगर्त मिलेगी) का बजट होने के कारण सभी की पौ बारह होने लगी. ऑखें चकियानें लगी. लार टपकने लगी. मन मचलने लगा. उमंगें जागने लगी. अधिकांश लोग 'जियो और जीने दो' सिद्धांत-नुमी 'खाओ और खाने दो' के अंदाज में मिल बॉटकर खाने लगे. कुछ शरीफ किस्म के अड़ियल लोग न खाऊंगा और न ही खाने दूंगा की लाइफ स्टाइल में जीने और सम्मेलन में दिखने भी लगे. प्रायः सभी सज्जन पुरूषों को उनकी सेवाओं के बदले मेवाऍ भी मिली. तो कुछ अति सज्जन पुरुषों को नोटों की गड्डियॉ. खैर साब, यह तो अपनी-अपनी किस्मत होती है. कोई राजा-भोज होता हैं तो कोई गंगू तेली. कोई आमंत्रित होता हैं, तो कोई बिना आमंत्रित.

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि, भोपाल नगर निगम के जिम्मे ही इस सम्मेलन की मेजबानी करने की सर्वाधिक जिम्मेदारी पड़ी. तभी तो यहॉ के सभी छोटे-बड़े अधिकारियों एवं कर्मचारियों के दिल से.....मुख से निकली हुई एक ही पंक्ति सुनाई देती रहती है, ''क्या-क्या न सहे हमने सितम आपकी (सम्मेलन की) खातिर''. सचमुच बधाई की पात्र है, नगर-निगम उनकी हिम्मतों की दादें देनी होगी.

भोपाल नगर निगम को भोपाली नवाबी शासक द्वारा नामित 'लाल-परेड़' ग्राउंड (सम्मेलन स्थल) को ही नहीं बल्कि, अधिकांश भोपाल नगरी को स्वच्छ एवं सुंदर बनाना नहीं तो कम से कम दिखलाना तो अवश्य ही था. ताकि सम्मेलन में सम्मिलित हिन्दी भाषा और साहित्य के विद्वानों, सिनेमा और राजनीति की शिखर देशी-विदेशी हस्तियों से विश्व की भीष्णतम भोपाल गैस-त्रासदी (1984) में मारे गए और मरने की अवस्था में पहुंचे हजारों-लाखों लोगों के दर्दों को छूपाया जा सके. उनकी वेदनाओं को दबाया जा सके.

खैर साब, कब तक उस त्रासदी के बारे मिक गैस खाकर और पीकर मरे और गड़े गुर्दों को उखाड़कर उनकी मनहूस बातें की जायेगी? सुना है, 'बारह-सालों में घूरे के दिन भी फिर जाते है. किंतु, कमबक्खत यूनियन कार्बोइड (जहॉ से गैस निकली थी) का घूरा है, कि वो 30-31 सालों बाद भी वहीं का वहीं पड़ा हुआ है. कोई भी सरकार उस घूरे के दिन नहीं फिरवा सकी. क्या करूं विश्व स्तर का सम्मेलन है तो बातें भी तो विश्व स्तर की होनी चाहिये थी. पुनः खैर साब, छोड़िये गिले-शिकवें को चलते हैं सम्मेलन स्थल के बाहर बिना प्रवेश पत्र के.

आईये, सर्वप्रथम मिलते है, श्री निगम बाबू से. जोकि एक प्रसिद्ध स्थानीय समाचार पत्र के पत्रकार है. वे अपने 'निगम सरनेम' के अनुसार ही भोपाल नगर-निगम की विशेष रूप से पत्रकारिता (रिर्पोटिंग) कर रहे हैं, उनकी रिर्पोटिंग के कुछ खट्ठे-मीठे अंश यहॉ प्रस्तुत किये जा रहे हैं -

- हिन्दी सम्मेलन के बहाने टेंडर में गड़बडियों का समागम -

एक ही काम की कई निविदाएं स ई-टेंडर से बचने के रास्ते निकाले

15 दिनों में नियमों में कमी का फायदा उठाकर 80 टेंडर जारी किए.

सम्मेलन 10 सितम्बर से शुरू. किंतु, टेंडर खोले 11 तारीख को.

कुछ टेंडरों में न खुलने की तारीख न कार्यों के समापन की तारीख.

ठेकदारों, इंजिनियरों एवं एम.आई.सी. सदस्यों से लेकर कार्यों को मंजूर करने वाली ऑथरिटी तक को मिलने वाले तय शुदा कमीशन का प्रतिशत.

हिन्दी भाषा में विभिन्न बोर्ड बनवाने ऊंची-ऊंची पानी की टंकियों एवं सड़कों की दिवालों की पुताई-रंगाई चित्रकारियों पर लाखों रूपये खर्च.

शहर के अनेकों बस स्टापों पर पूर्व से बने शेडनुमा बड़े-बड़े ग्लोसाईनों पर एक प्रायोजित कम्पनी का पूर्णतः अंग्रेजी भाषा में विज्ञापन.

प्रदेश के मुखिया सहित कई नेताओं द्वारा सभी लोगों से हिन्दी भाषा में अपने-अपने साईन बोर्ड बनवाने का आग्रह ताकि भोपाल नगरी हिन्दी-नगरी दिखें.

आईये मिलते हैं 'मिस न्यूजी' से :-

मैं :- मिस न्यूजी नमस्कार, सर्वप्रथम आप हमें बतलाऍ कि विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्थापना कब? कहॉ? क्यों? और कैसे हुई?

मिस न्यूजी :- 1910 में इन्दौर में बनी पहली हिन्दी संस्था श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति. जिससे 1918 में गॉधीजी ने हिन्दी को राष्ट्र-भाषा बनाने की बातें की थी. जिसमें कि अभी भी 475 सक्रिय सदस्य है. हिन्दी सम्मेलन का सर्वप्रथम विचार वर्धा (1973) में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की बैठक में आया था. इसलिए नागपुर (1975/महाराष्ट्र) में पहला विश्व सम्मेलन रखा गया. लक्ष्य था- संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को कैसे मान्यता दिलाई जाए? अफसोस है कि इस लक्ष्य को अभी तक प्राप्त नहीं किया जा सका क्योंकि इसके लिए वर्तमान में 129 देशों का सर्मथन चाहिये होता है.

मैं :- विश्व हिन्दी सम्मेलन का अति संक्षिप्त में इतिहास भी लगे हाथों बतला दीजिये?

मिस न्यूजी :- देखिये, पहला विश्वहिन्दी सम्मेलन नागपुर (1975) में तीसरा, दिल्ली (1983) में तथा शेष सभी सात सम्मेलन अभी तक विदेशों में हो चुके है. दसवॉ भोपाल (2015) में आयोजित हो रहा है. जिसमें 39 देशों की नुमाइंदगी, 1500 देश-विदेश के प्रतिनिधि लगभग 2500 म.प्र. के गणमान्य एवं हिन्दी प्रेमी हस्तियॉ शामिल होगी. जिन्हें कि आमंत्रित किया गया है. सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगभग 5000 पुलिस एवं सुरक्षाबल के कर्मियों को रखा गया है.

मैं :- 10 वॉ हिन्दी सम्मेलन का मुख्य विषय क्या रखा गया है?

मिस न्यूजी :- इसका मुख्य विषय है, ''हिन्दी के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए क्या करना है?''

मैं :- इस सम्मेलन को आधुनिक तकनीकों की मदद से किस प्रकार सफल बनाने की तैयारी की गयी है?

मिस न्यूजी :- एक खास मोबाईल एप माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विधि ने तैयार किया गया है 'दृश्यमान' जो कि गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है. इस एप पर हर 15 मिनिट में हिन्दी सम्मेलन के एक से डेढ़ मिनिट के वीडियो अपलोड होंगे. जिसे विश्व में कहीं भी देखा जा सकता है.

मैं :- प्रधानमंत्री ने अपने उद्घाटन भाषण में 56 अंग्रेजी शब्दों का उपयोग किया है. इस संबंध में आप क्या कहना चाहती हैं?

मिस न्यूजी :- देखिये, मैंने तो गिने नहीं है. मैने भी बस आप जैसे लोगों से सुना है. कि उसमें से 32 अंग्रेजी शब्दों का स्वंय प्रधान मंत्री जी ने हिन्दी में अर्थ भी बतला दिया.

मैं :- सुना हैं, हिन्दी पर केंन्द्रित प्रदर्शनीयॉ जो कि आम-आदमियों के लिए भी खुली हुई थी. फिर भी पुलिस वालों ने सुरक्षा की दृष्टि का बहाना बनाते हुए आम-जनता को वहॉ घुसने नहीं दिया. कुछ जैसे-तैसे घूस गए थे. उन्हें पुलिस वालों ने धक्का मारकर निकाल दिया?

मिस न्यूजी :- अरे भईया क्यों पुलिस वालों की बाल की खाल निकाल रहे हो? उनकी कई दिनों की रातों की नीदों के बारे में भी तो सोचो. जो कि उन्हें नहीं मिली.

मैं :- मिस न्यूजी वास्तव में आप न्यूजी है. इतनी महत्वपूर्ण जानकारियॉ देने के लिए आपको मेरी और से बहुत-बहुत धन्यवाद.

आईये अब मिलते है, मि. जुगाडूमल जी से :-

मैं :- मि. जुगाडूमल जी नमस्कार, आपने अपने नाम और अपनी औकात को सार्थक करते हुए किस प्रकार तीन दिवसीय इस सम्मेलन में सम्मलित होने के लिए आमंत्रण पत्र (प्रवेश-पत्र) प्राप्त किया है? जबकि मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी हिन्दी संस्था 'श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति' हिन्दी के अनेकों......यहॉ तक की जिनके बड़े-बड़े चित्र भी सम्मेलन स्थल पर लगे हुए है. उनमें से कई साहित्यकारों को इस सम्मेलन में शामिल होने के आमंत्रण तक नहीं भेजे गये? (मुझे मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है)

मि. जुगाडूमल जी :- भईया, मुझसे जलो मत इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए में ही जानता हूँ कि मैंने कौन-कौन से जुगाडू पापड़ बेले है यह एक राज की बात है कोई दूसरा अच्छा सा ढंग का प्रश्न करना है तो करो नहीं तो मैं चला.

मैं :- सम्मेलन की अवधि में देश-विदेश से आए अतिथि कम और भाजपा नेता......कार्य कर्ता......छुट भैया नेता तक अधिक नजर आए. ऐसा लग रहा था, मानों हिन्दी सम्मेलन कम और भाजपा का सम्मेलन अधिक हो रहा है? अभी तक के हिन्दी सम्मेलनों में तो ऐसा नहीं हुआ? फिर इस बार ऐसा क्यों हुआ?

मि. जुगाडूमल जी :- तुमने फिर वही उटपटॉग प्रश्न किया. मैंने मना किया था न जाओ मैं तुम्हारे बिना सिर-पैर वाले प्रश्नों का उत्तर नहीं देता. कहते हुए वे वहॉ से खिसक लिये.

आईये, मिलते है, श्रीमान खोजी जी से :-

मैं :- श्रीमान खोजी जी नमस्कार, सुना है आप सम्मेलन में कुछ विशेष हस्तियों........कुछ खास समाचारों की खोज कर रहे है. कुछ हमें भी बतलाने का कष्ट करेगें?

श्री मान खोजीजी :- देखिये, हिन्दी के चमकदार (उज्जवल) भविष्य को देखते हुए........व्यापारिक हितों की दृष्टि से.......अपने निजी कारणों से अनेकों लोग हिन्दी से जुड़ने का प्रयास कर रहे है. जैसे- रूस के सेंट पीटर्सबर्ग की कैमिला और कोस्टारिका की ऐटिना भारत में व्यापार करने के लिए तो हॉलैंड की पेत्रा डेक्कर अपनी भारतीस सास से हिन्दी में बातें करने के लिए हिन्दी सीख रही है. जबकि कनाड़ा की 30 हिन्दी पुस्तकों की लेखिका एवं सपांदक स्नेह ठाकुर एंव भारत (आगरा) के डा. मुनीशंकर गुणा (रेडियो लॉजिस्ट) हिन्दी भाषा की रक्षा हेतु उल्लेखनीय कर रहे है.

मैं :- साहित्यकार नरेन्द्र कोहली जी ने कहा है कि यहॉ पर पुर्तगाल जैसे छोटे से देश में भी 'माउस' को अपनी भाषा में 'रोटो' नाम दिया है जबकि हमारे देश में उसे कोई हिन्दी भाषी नाम नहीं दिया. ऐसा क्यो? क्या हमारा हिन्दी शब्दकोष इतना छोटा है अथवा हमारी मानसिकता इतनी छोटी है?

श्रीमान खोजी जी :- सही पकड़े है. भाभीजी....मेरा मतलब है, भईया जी.

मैं :- डा. दसनायके मुडियान्सेलाग इंदिरा ने सम्मेलन क दौरान कहा था कि, वे पिछले आठ वर्षों से श्रीलंका के रूहुना विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग खोलने के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि हम एन.सी.ई.आर.टी./सी.बी.एस.ई आदि की परिक्षाओं के कुछ पाठ्यक्रमों में अभी तक हिन्दी भाषा को अनिवार्य नहीं कर पा रहे है. ऐसा क्यों?

श्रीमान खोजी जी :- इस बार भी आप अपना प्रश्न 'सही पकड़े है'

मैं :- लगता है, आप भी भाभीजी के साथ घर पर बैठकर टी.वी. पर एक प्रसिद्ध कामेडी सीरियल अवश्य ही देखते होंगे. तभी तो आप बार-बार 'सही पकडे हैं' कहते रहते हैं.

श्रीमान खोजी जी :- हॉ, हॉ मिसेज अंगूरी भाभी की तरह पूरी तरह से सही पकड़े हैं. अच्छा तो हम चलते हैं, बस पकड़ना है.

आईये अब अंत में मिलते हैं, मियां खबरी खॉ भोपाली से :-

मैं :- मियॉ खबरी खॉ भोपाली, सलाम! तुमने इस सम्मेलन में कौन-कौन सी चटपटी खबरें जुटाई है? जरा हमें भी फरमाईयेगा.

मियां खबरी :- बस खॅा, खुदा के फजल से मेरी सभी खबरें चटपटी ही नहीं बल्कि, खट्ठी-मीठी, कड़वी और तीखी भी है, किंतु मैं तुम्हें सिर्फ दो ही खबरें बतलाऊंगा. क्योंकि मेरी भी रोजी-रोटी का सवाल है.

पहली कड़वी खबर है- अपन के प्रदेश मुखिया ने यहॉ पर फरमाया था कि मुख्य सचिव से लेकर सभी आला अफसर अब अंग्रेजी में लिखा पढ़ी को अलविदा करेंगे. उनके बीच चिट्ठियॉ हिन्दी में ही लिखी जाएगी. अरे खॉ भाई मियॉ, एक हफ्ते के भीतर ही उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव ने इन्दौर की देवी अहिल्या यूनिर्वसिटी द्वारा भेजी गई हिन्दी में ऑडिट रिपोर्ट को लौटाकर उसे अंग्रेजी में प्रस्तुत करने को कहा. ऐसे में हमारे मुखिया की तो थू-थू हो गई न?

दूसरी मीठी खबर है- स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था कि ''पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र होती है, यह बात तो पूरे सोला आने सच्ची है. किन्तु, पुस्तकें सजा होने से भी बचाती है. या यू कहे कि पुस्तकों को पढ़ने की अपराधियों को सजा भी दी जा सकती है. लो पढ़ो इस खबर को-ईरान का गोन्बद ए काबुस शहर/जज का नाम कासीम नकीजा देह के अपराधियों को जेल की सजा सुनाने के बदले उसे कम से कम पॉच इंसानियत एवं नैतिकता भरी किताबें स्वयं खरीदकर और उसे पूर्णतः पढ़ने की सजा देते हैं. तसल्ली के लिए कुछ दिनों बाद उससे उन पुस्तकों से सम्बन्धित प्रश्न भी पूछे जाते है.

काश कि हमारे देश में भी ऐसा नहीं तो कम से कम सभी लोग स्वयं खरीदकर ही पुस्तकें पढ़ने लगे. फ्री में मिलने की लालसा छोड़ने लगे?

10 वॉ विश्व हिन्दी सम्मेलन आज (12 सितम्बर 2015) समाप्त हो गया है. लिहाजा मैंने सर्वप्रथम पॉचों पत्रकारों एवं लेखक मित्रों श्री निगम जी, मिस न्यूजी, मि. जुगाडूमल जी, श्रीमान खोजी जी एवं खबरी खॉ भोपाली से 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन (2018/मॉरीशस) में मिलने का वादा करते हुए सभी से विदाई ली. साथ ही आप सभी लोगों को यह खट्ठी-मीठी रपट सौंपते हुए कहता हूँ ''अलविदा भोपाल......''

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संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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