370010869858007
Loading...

पुस्तक समीक्षा – हास्य-व्यंग्य : “अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा”

image

ऐसा तो नहीं ही है कि स्त्रियों में सेंस-ऑफ़-ह्यूमर की कमी होती हो – शरीर में विटामिन डी की कमी की तरह? फिर, हिंदी में (और इतर भाषाओं में भी,) हास्य-व्यंग्य लेखिकाओं का घोर अकाल क्यों है? बहुत-बहुत याद करने पर भी गिनती उंगलियों में ही क्यों सिमट जाती है?

image

मगर इधर कुछ आस-सी बंधी है. कुछ अरसा पहले ही शेफाली पाण्डे का हास्य-व्यंग्य संकलन “मजे का अर्थशास्त्र” आया था, और हाल ही में आरिफा एविस का एक व्यंग्य संकलन “शिकारी का अधिकार” प्रकाशित हुआ था. और अब हैटट्रिक की तरह, पल्लवी त्रिवेदी का हास्य-व्यंग्य संकलन आया है – “अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा”. उम्मीद करें कि महिला व्यंग्यकारों का दबदबा दिन-दूने तरीके से बढ़े.

बहुधा नारी-वादी लेखन की बातें होती रही हैं. व्यंग्य की बात करें तो यदि “नारी” रचित हास्य-व्यंग्य होगा तो निश्चित ही उसमें अलग एंगल होगा, अलग तड़का होगा. यह बात बहुत कुछ ठीक भी है. पल्लवी त्रिवेदी के व्यंग्य में भाषा शैली से लेकर विषय-विन्यास तक सब कुछ एक अलग तरह के फ्लैवर में है, जिससे पारंपरिक व्यंग्य से ऊबे-ऊंघे पाठक में सहसा जागृति सी आती है. नए, नायाब तरह का व्यंग्य दोपहर के चाय की तरह ताज़गी प्रदान करता है. उदाहरण के लिए इस संकलन के कुछ शीर्षक को ही लें जो इस कथ्य के प्रमाण जैसे हैं –

एक थी बार्गेनर

लेने-देने की साड़ियाँ

पुष्पचोर गैंग

काये सुनीता

कथा कॉकरोच और कॉकरोचनी की

भग गई कलमुंही

आदि..

संकलन के प्रथम व्यंग्य – “घासीराम मास्साब की ज़िंदगी का एक दिन” का प्रारंभिक पैराग्राफ है –

“आज नल आने का दिन है.

मोहल्ले में एक दिन छोड़कर नल आता है. नल आने का दिन घासीराम मास्साब की कसरत का दिन भी होता है. पूरी टंकी भरने के लिए डेढ़ सौ बाल्टी भरकर ऊपर दूसरी मंजिल पर लाना कोई जिम जाने से कम है क्या? हाँ.. ये अलग बात है कि इस कसरत से मास्साब के दाहिने हाथ की मसल तो सॉलिड बन गई पर बायां हाथ बेचारा मरघिल्ला सा ही है सो अब मास्साब फुल बांह की बुश्शर्ट ही पहनते हैं.”

घर गृहस्थी की दैनंदिनी समस्याओं के निचोड़ से निकला इस किस्म का मारक व्यंग्य पुरुषों की लेखनी से शायद ही निकल पाए. और, स्टाइल यानी शैली भी सरल सुंदर. माशाअल्लाह! नमूना देखिए :

“...देवनागरी में असंभव पर जोर डाले जाने का कोई रास्ता नहीं है. अगर रोमन में लिख रहे होते तो कैपिटल में लिखकर जताते कि हम इस शब्द पर कितना जोर डाल रहे हैं. अगर बोल कर कह रहे होते तो असंभव के चारों अक्षरों के बीच दो-दो सेकण्ड का पॉज देते. ख़ैर इतनी व्याख्या का अर्थ चूंकि आपको यह बताना है कि हमने किस वज़नदारी के साथ इस विचार को ख़ारिज किया इसलिए अब आप समझ जाइए बस...”

इस व्यंग्य संकलन के शीर्षक चयन के बारे में पल्लवी त्रिवेदी ने संकलन की अपनी भूमिका में बताया है किस तरह ऊहापोह के बीच यह शीर्षक फाइनल किया गया. मगर इस संकलन का सही शीर्षक “काये सुनीता” बेहतर हो सकता था – इस संकलन के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य में से एक. कथावस्तु व्यंग्यात्मक होते हुए भी हृदयस्पर्शी और अंत तो ओ-हेनरी की किसी कहानी की तरह चमत्कृत करती हुई.

संग्रह के व्यंग्य पठनीय हैं और किताब का गेटअप आकर्षक, कागज और छपाई उम्दा है. अलबत्ता किताब के फ़ॉन्ट आकार बड़े होते हुए भी इसमें लाइन व पैराग्राफ स्पेसिंग की समस्या है जिससे स्पीड रीडिंग में समस्या आती है. बावजूद इसके किताब संकलन योग्य है.

कोई डेढ़ सौ पृष्ठों की इस किताब में 25 व्यंग्य संकलित हैं, और मूल्य वाजिब है – 150 रुपए. इस किताब को  प्रकाशक रूझान पब्लिकेशन की साइट

http://rujhaanpublications.com/

से ऑनलाइन प्राप्त किया जा सकता है.

- रवि रतलामी

समीक्षा 8852216622581428268

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव