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August 2016
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हिन्दी साहित्य के संदर्भ में इस बात का रोना रोया जाता है कि पाठक नहीं है। खासकर बालकों के संदर्भ में। लेकिन यह धारणा पूरी तरह सत्य नहीं है। अध्ययन की वृति कम अवश्य हो रही है, लेकिन हालात ऐसे नहीं है कि यह बिल्कुल मर चुकी है। अच्छा लिखा जाए और उसे विद्यालयों, पुस्तकालयों की मदद से सर्वसुलभ करवाया जाए तो परिणाम बहुत अच्छे आ सकते हैं। ईमानदार और योग्य प्रकाशक उचित दामों में इसे जनता व छात्रों तक पहुंचा सकते हैं। सब के सहयोग से एक जमीन तैयार करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए व्यवसाय करने वालों को देखिए। वे जनता की आवश्यकताओं और रुचियों को पहचानते हैं। फिर उन के अनुकूल उत्पाद तैयार करके बाजार में उतारते हैं। यह सब एक संगठित तरीके से करते हैं। पाठ्यप्रेमी एकजुट हो जाएं तो इस दिशा में अच्छा काम हो सकता है। हमारे किसी सुदूर गाँव में एकाध शराब की (वैध-अवैध) दुकान अवश्य मिल जाएगी, पान-बीड़ी और कोल्ड ड्रिंक्स की दुकानें मिल जाएगी पर पुस्तक-पत्रिका तो क्या किसी अच्छे अखबार की झलक पाने के लिए भी तरस जाएंगें। क्योंकि हमने पठन-पाठन का वातावरण तैयार करने की तरफ ध्यान ही नहीं दिया है। न सरकार ने न सामाजिक संगठनों ने।

मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि सतसाहित्य का अध्ययन करने पर कई प्रकार के विकार दूर रहते हैं। अच्छी सामग्री पढ़ने का मतलब है - लाभ ही लाभ। सही अध्ययन के लिए उचित साहित्य परम आवश्यक है, वरना साहित्य के नाम पर स्तरहीन सामग्री भी बहुलता में पसरी हुई है। बात अगर बच्चों को ध्यान में रख कर की जाए तो बहुत सावधानी की आवश्यकता है। उन्हें सारहीन, ऊबाऊ और गैर जरुरी चीजें पढ़ने को मिली तो उनके अध्ययन की रुचि नष्ट होना स्वाभाविक है। उनकी मनोदशा के अनुकूल साहित्य उपलब्ध करवाना हम सब का कर्तव्य है, यानि अभिभावक, अध्यापक और लेखक-प्रकाशक। माता पिता का फर्ज़ होना चाहिए कि वे अपने बच्चों को अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करें।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है उसकी रुचियों में भिन्नता आती जाती है। वह जिज्ञासु होने के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक परिवर्तनों से भी गुजरता है। तदअनुसार उसे अध्ययन सामग्री मिलनी चाहिए। अगर हमने पढ़ने-पढ़ाने को गैरजरुरी कार्य समझा तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। बच्चों में यह आदत डालने का अर्थ है कि हम एक अच्छे जीवन की नींव तैयार कर रहे हैं। दैनिक अनुशीलन से उनकी एकाग्रता में वृद्धि होगी, जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में उसे सफलता दिलाएगी। प्रसिद्ध लेखिका मृदुला गर्ग ने कहा है कि साहित्य को जीवित रखने के लिए सबसे जरुरी है, किशोरों में उसे लोकप्रिय बनाना। इस बात का भी ध्यान रखना है कि स्कूलों में जो साहित्य पढ़ाया जा रहा है , वह बोझिल न हो और अप्रासांगिक कथ्यों पर न हो कर आज के जीवन पर हो, जिससे उसमें बच्चों की रुचि बने। किशोर अवस्था में ही साहित्य पढ़ने की नींव पड़ती है। वरना ताउम्र यह दिलचस्पी आदत नहीं बन पाती।

हिन्दी साहित्य को पढ़ने वाले पहले भी थे , आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। बस शर्त यही है कि लेखन प्रभावशाली हो। पाठक की रुचियों का परिष्कार हो, उसे प्रेरणा मिले, स्वस्थ मंनोरजन मिले। बोझिल, पहेलीनुमा और अत्यधिक विद्वता से लदा लेखन आम पाठकों को साहित्य से बांध नहीं सकता। उसमे यदि पढ़ने की आदत का विकास नहीं होगा तो वह पूरी तरह गुणवान और अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी नहीं बन सकता। नेहरु ,गांधी जैसे शताब्दी पुरुषों की घोरत्तम सफलता के पीछे उनकी अध्ययन प्रवृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अधिकाँश विद्वानों के अनुसार साहित्य का कोई न कोई उद्देश्य होता है। और उसका सर्वप्रथम लक्ष्य यही है कि मानव उसका साथ पा कर अपनी रुचियों, जीवनशैली और कार्यशैली को सुधारे। ऐसे साहित्य का स्वागत अवश्य होता है, इसी कारण प्रेमचन्द, शरतचन्द्र , जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकार आज भी खूब पढ़े जाते हैं। अच्छा साहित्य रचने वालों को आज भी पढ़ा जाता है। एक लेखिका ने सही कहा है कि कुछ पन्ने पढ़ लेने पर आगे पढ़ना ही न चाहे या हिन्दी के कुछ लेखकों को पढ़ लेने पर हिन्दी साहित्य के प्रति अरुचि हो जाए तो क्या लेखक दीमकों के लिए लिखेंगे?

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हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक-मल्लाह -134102

जिला पंचकूला (हरियाणा)

m 9896547266

देखिये, ये जो हमारा इण्डिया है न इसमें मुख्यतः दो तरह के डैड पाये जाते हैं। एक आइडियल डैड जो बड़े - बड़े शहरों में होते हैं और दूसरा अड़ियल डैड जो गाँव देहात में होते हैं।

आइडियल डैड काफी फ्रेंडली होते हैं अगर उनका बच्चा कुछ गलती करे तो सॉफ्टली "सॉरी" बोलने को बोलते हैं। मार्क्स कम आये तो प्यार से "कॉन्फिडेंस बूस्टअप" करते हैं। बच्चा कोई प्राइज जीते तो कहीं घूमने का प्रॉमिस" करते हैं वहीँ इसके विपरीत अड़ियल डैड काफी खूंखार और हिंसक प्रवृति के होते हैं अगर गलती से बच्चे से कुछ शरारत हो जाये तो जमके कुटइया करते हैं।

आइडियल डैड से बच्चे "डिस्कशन" और "डिबेट" करते हैं वहीं अड़ियल डैड से आप भर मुंह खुलके बात भी नहीं कर सकते वरना बत्तीसी ऑड या इवन कोई भी नम्बर में बाहर आ सकती है केजरीवाल जी के कार पर्यावरण नियम का उल्लंघन करते हुए।

आइडियल डैड अपने बच्चों के साथ "जोक्स शेयर" करते हैं साथ में हँसते है "फन" करते हैं वहीँ अड़ियल डैड इनसब चीजों को भारतीय संस्कृति के विरुद्ध मानते हैं।
आइडियल डैड से बच्चे टीवी रिमोट के लिए लड़ बैठते हैं वहीँ इसके उलट किसी का क्या मजाल की कोई अड़ियल डैड से आँख भी मिला ले लड़ना तो दूर की बात है, भूतो न भविष्यति।

आइडियल डैड जब कभी गुस्सा होते हैं तो अंग्रेजी में "व्हाट द हेल इज दिस!! शीट!! शीट!!! इडियट " आदि बोलकर रुक जाते हैं वहीं अड़ियल डैड गुस्सा होने पर धुयाँधार भोजपुरी में राम-भजन सुनाते हुए कुछ शारीरिक श्रम लपड़म-थपड़म आदि कर जाते हैं।

आइडियल डैड अपने बच्चों को सोसाइटी पार्क में साईकिल सिखाते हैं। सिखने के दरम्यान अगर थोड़ी सी भी खरोच आ जाए तो फर्स्ट एड करते हैं या डॉक्टर के पास ले जाते हैं l वहीं अड़ियल डैड के डर से बच्चे चोरी-छुप्पे गाँव के किसी प्रतिबंधित क्षेत्र खलिहान,पोखर का ढलान आदि जगहों पर साईकिल सीखते हैं। इसमें भी अगर सीखने के दरम्यान कहीं कट-फट जाता है और अड़ियल डैड को पता चल जाता है तो जमकर थुरईया करते हैं "फर्स्ट एड" और "चिकत्सीय उपचार" के नाम पर ।

कोई आगंतुक मिलने पर आइडियल डैड अपने बच्चे को "हाय, अंकल! हाउ आर यू" कहने को कहते हैं वहीं अड़ियल डैड "पाँव छूकर परनाम" करने को कहते हैं।

भारत निर्माण में आइडियल डैड से कहीं ज्यादा अड़ियल डैड का योगदान रहा है। अड़ियल डैड को ये भय बना होता की कहीं उनका बच्चा बिगड़ न जाए इसलिए इतनी कठोरता व शख्ती रखते हैं ।

अब हमारा भारत इण्डिया बन रहा है। गांवों का शहरीकरण और नवीनीकरण हो रहा है। अब अड़ियल डैड न के बराबर बचें है।जो बचे भी हैं वो टीवी,अखबार,मोबाईल आदि के माध्यम से आइडियल बन रहे हैं। पता नहीं जो संस्कार,अनुशासन और भावुकता का सृजन अड़ियल डैड की अनेकों पीढ़ियों ने साधनों व विकल्पों के अभाव में खुद को जला कर - तपा कर किया है उसका क्या होगा ?

खैर, बदलते इण्डिया को आइडियल डैड मुबारक!!! :)

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(किस्सा - ए - रिन्द )

मधेसर बाबा अपने ज़माने के मशहूर पियक्कड़ रह चुके हैं। उम्र अस्सी साल के करीब है और हालत यह की कब गांववालों को ब्रह्म-भोज का सरप्राइज दें दे ये पंडी जी का पंचांग भी परफेक्टली अनुमान नहीं लगा सकता। बिहार में शराबबंदी क्या हुई मानो पियक्कड़ों के कंठों की नसबंदी कर दी गई । गले को जो तराई शराब से मिलती थी वो किसी और दूसरी चीज से मिल सकती है भला क्या ?

आज के चार माह पूर्व जैसे ही उनके तिलक में मिली तिरसठ साल पुरानी फिलिप्स के रेडियो पर शराब बंदी की आकाशवाणी हुई वैसे ही वो रेडियो समेत अपने खटिया से लोघड़ाकर गिर पड़े । गिरने का 'मंजर' इतना भयावह था की उनका समस्त 'अस्थि-पंजर' विस्थापित हो गया। उसी दुर्घटना में उनका दाहिना हाथ भी चार जगह से फ्रैक्चर हो गया और तीन-चार दांत भी जो बचे थे वो भी उदर में समाहित हो गए । मतलब अस्सी के उम्र में उनको टोटल अस्सी फ्रैक्चर हुआ ।

कहा गया है कि बुढ़ापे में टूटी हुई हड्डी और जवानी में टूटे हुये दिल,ये दोनों का कभी भी सही से मरम्मत नहीं होता। कोई डॉक्टर या शायर कितना भी जतन कर ले वो जुड़कर अपने पहले वाले रूप में नहीं आते और उम्र भर के लिए अपने टूटन का दर्द छोड़ जाते हैं l

शराबबंदी वाले दिन से ही मधेसर बाबा मरणासन्न में हैं और हरिबंस जी की मधुशाला पढ़-पढ़कर अपने दिल को बहला रहे हैं। दुनिया में सौ किसिम के धर्म हैं,पांच सौ किसिम के धार्मिक स्थल और हजार प्रकार की धार्मिक ग्रन्थें। लेकिन मेरे गाँव के समस्त पियक्कड़ों का सिर्फ एक ही धर्म है पियांकी और उनका एक ही ग्रन्थ है हरिबंस जी की "मधुशाला"।

मधेसर बाबा अपने दलान में खटिया पर लेटे हैं।दर्द से कराह रहे हैं और मधुशाला की पंक्ति लगातार सुर-ताल में गाते जा रहे हैं " अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला"।आसपास कोई नहीं है सिवाय उनके शेरुआ कुत्ते के। कुत्ते की हालत भी लगभग मधेसर बाबा जैसी ही हो गई हैं क्योंकि उसे भी आजकल शराब नसीब नहीं हो रहा है । मधेसर बाबा अपने बचे बोतल में से दो-चार बून्द उसके मुंह में चुआ देते थे तो वो भी टनटन रहता था। लेकिन वह भी आजकल मूर्छित रहता है पिछले दस दिन से भौंकना बंद कर दिया है और इसी कारण परसों रात में जादो जी का भैंस जो उनके बेटे को दहेज़ में मिली थी उसको कोई बच्चा समेत चुरा ले गया। किसी चोर का क्या मजाल था की शेरुआ के रहते गाँव में घुंस जाये और चोरी हो जाए।

मुझे गली से गुजरते हुए देख मधेसर बाबा "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला" का गायन पाठ बीच में ही स्थगित कर पूरे फेफड़े का जोर लगा के कहते हैं अरे गनेसबा! सुनो इधर जरा। अब वो बुला लिए तो जाना लाजिमी है क्योंकि वो मेरे बचपन के लंगोटिया इयार हैं। मैं उनके पास जाता हूँ। प्रणाम-पाति करके खटिया के सिरहाने बैठकर उनका सर सहलाने लगता हूँ। बचपन में जब भी सर सहलाता था वो रुपया- दो रुपया दे दिया करते थे पतंग-धागे के लिए।

मैं सर सहलाने लगता हूँ वो फिर से वही पंक्ति "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला" गाना शुरू कर देते हैं। मैं झुंझलाकर कह बैठता हूँ, क्या बाबा आप भी एक साधारण सी पंक्ति को बार-बार पढ़ रहे हैं। आगे की पंक्तियाँ पढ़िए न !
मधेसर बाबा लंबी उम्र की थकान आँखों में भरते हुए गहरी साँस तानकर कहते हैं अब" न रहे वो पीनेवाले,अब न रही मधुशाला"। इसी पंक्ति में पूरी मधुशाला और मेरी जिनगी का सार छुपा है बेटा। मैंने कहा, अच्छा ऐसा भी क्या है इस पंक्ति में?
वो कहते हैं ध्यान से सुनो क्या ख़ास है इस पंक्ति में l हरिबंस बचन जी कहते हैं, "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला" l

मतलब अब पहिले जैसा पीनेवाले नहीं रहे। हमारे जमाना के लोग गजब पियांकी करते थे। अब हमहिं को देख लो पुरे सौ बीघा हमको जमीन मिला था बाँट के अपने पूर्वजों से लेकिन पी-पी के हम तीस बीघा कर दिए। पुरे सत्तर बीघा बेचकर अपने किडनी-लिवर का दारु से पटवन कर दिए ।तुम आजकल के लौंडे क्या पियांकी करोगे! अरे, बहुत कमाओगे तो तीस-पैंतीस हजार इसी रुपया में तुमको शहर के घर का किराया देना होगा,अपने बाइक का पेट्रोल भरबाना होगा ,बीबी के ब्यूटी-पार्लर का खर्च भी मेंटेन करना होगा और बच्चा लोग के स्कूल का फ़ीस भी देना होगा।

अब तुम्हीं हिसाब लगा लो महीना में कितना का पियांकी कर पाओगे सही से । बहुत एक्सेस कर पाओगे तो तीन हजार न चार हजार। इतना तो हमरा रोज का डोज था। क्योंकि हम अपने बेटे के पढाई-लिखाई और पत्नी के सिंगार-पटार जैसे फालतू चीजों पर कभी एक कौड़ी भी नहीं खर्च किये। सम्पूर्ण जिंदगी तन-मन-धन सबकुछ पियांकी पर न्योछावर किये। चखना में हमेशा केसर-बादाम ही खाये।

एक बात और है बेटा! तुम युवाओं में दारु पचाने का क्षमता भी नहीं है। एक बोतल बियर या छोटा पउआ में घोलट जाते हो,सुध ही नहीं रहता और फेसबुक पर गाली-गलौच कर बैठते हो। एक हम थे जो अपना बियाह में मड़वा पर फुल पी के बैठे थे। सिंदूर भी दिए थे उस समय फुल पी के टुन्न थे और सबसे मजेदार बात की किसी को भनक तक नहीं लगने दिए थे की पिये हुए हैं। अपने तीनों बेटे और सातों बेटियों का समधी मिलन भी फुल टुन्न होके किये थे। मुंह तक नहीं महका था हमारा क्योंकि तुमलोग की तरह गंध छुपाने के लिए हम क्लोरोमिंट-विक्स का चॉकलेट नहीं खाते थे बल्कि भर मुंह केसर फांकते थे। तुम्हारा केसर फांकने का औकात ही नहीं है ।

आज के तुम युवाओं का शरीर भी नहीं रहा पहले के लोगों जैसा। एक महीना सही से पीया नहीं की लिवर-किडनी सब में डिफेक्ट आने लगता है। एक हम हैं जिसका शरीर भले ही लचर-पचर हो गया है लेकिन गुर्दा-लिवर अभी भी अस्सी के उम्र में सलामत है।

अब "मधुशाला" भी नहीं रहा पहिले जैसा। जगह-जगह मधुशाला के नाम पर बियर-बार खुल गया है। बीयर-बारों में पियांकी के नाम पर जिस्म-फरोशी का अवैध धंधा चल रहा है। हमारे ज़माने में मधुशाला में शुद्ध पियांकी होता था। किसी का क्या मजाल था की साकी को कोई टच भी कर दे।

इसीलिए कहते हैं "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला"।

उनकी बात खत्म होते ही मैंने कहा हाँ बाबा आप सही कहे, अब न रहे वो पीनेवाले ... अचानक पीछे से मेरे पिताजी दस्तक देते हुए कहते हैं क्या रे नालायक, क्या बात हो रही है? अब न रहे वो पीनेवाले? :O

मैंने झट से टॉपिक चेंज किया और बोला जी पिताजी वो गु .... गु ...
( मैंने बोलते हुए अक्सर फंस जाता हूँ :( )

पिताजी ने कहा, छी!!! ... छी!!!! "गू" पीने की बात हो रही है निठाह बुड़बक हो?
मैंने कहा नहीं वो गू ... गू .. गुस्सा पीने की बात हो रही है " अब न रहे वो पीनेवाले" मतलब अब के युवा पहले के लोग जैसा गुस्सा पीने में असक्षम हैं और बात-बात पर अपना आपा खो बैठते हैं। पहले वाले लोगों की तरह सहिष्णु और  संस्कारी नहीं हैं।

पिताजी खुश होते हुए बोले, वाह! तुम बहुत समझदार हो मैं हमेशा तुमपर गलत संदेह करता हूँ। वैसे अभी घर जाओ मम्मी भात पीने के लिए कब से बुला रही है।
मैंने कहा भात पीने के लिए? भात तो खाया जाता है न!

पिताजी बोले, हाँ! भात आजतक खाया ही जाता था लेकिन आज दस दिन बाद गाँव में बिजली आई और तुम्हारी मम्मी टीवी देखने के चक्कर में तीन सिटी की जगह सात सिटी लगबा दी। कूकर में पूरा भात लस्सी बन गया है । जाओ जाकर पीओ l

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सूरज सर पर चढ़ आया है। चमचमाती धूप की किरणें फर्श, दीवान, बिस्तर से आगे बढ़ते बढ़ते त्यागी जी के लौकिक और पारलौकिक ज्ञान, सम्पन्नता और वैभव से दमकते चेहरे पे पड़ने लगी हैं। “उर्मिला; ज़रा गुनगुना पानी लेकर आना, पीने के लिए”। त्यागी जी ने उठते ही अपनी धर्मपत्नी को आवाज लगायी।

रामेश्वर दास त्यागी, एक ऐसा नाम जिसकी पूरे शहर में एक प्रतिष्ठा है। इनके समाज परक लेख और वक्तव्य कई लोगों के लिए जीवन का फलसफ़ा बन चुके हैं। इनकी लिखी पिछली किताब “जातिवाद - राष्ट्रोन्नति में प्रधान बाधा” को तो पाठको के बीच हाथों हाथ लिया गया, आज भी देश के हर कोने से उस किताब के लिए बधाई संदेश और धन्यवाद पत्र आते हैं इनके घर।

कल रात त्यागी जी अपनी नयी किताब “हम में समाज और समाज में हम” के प्रकाशक से मिलकर घर काफी देर से लौटे; इसी वजह से आज देर तक सोते रहे। वैसे त्यागी जी अमूमन सुबह 7 बजे तक तो जाग ही जाया करते हैं।

श्रीमती जी के लाये हुये पानी को पीने के बाद त्यागी जी पूर्व की दीवार में बनी बड़ी सी खिड़की का ग्लास खोलकर बाहर देखने लगे हैं। बाहर वही धीरे धीरे रेंगता छोटी बड़ी गाड़ियों का मेला और उनके हॉर्न्स की न रुकने वाली आवाजें जैसे एक दूसरे से तेज हॉर्न बजाने की प्रतियोगिता चल रही हो।

त्यागी जी खिड़की का ग्लास और पर्दा बन्द कर डाइनिंग रूम में आ गये हैं जहाँ सोफे पे बैठा उनका 15 साल का इकलौता बेटा ललित पढ़ाई कर रहा है। ललित भी अपनी पूरी क्लास में अव्वल आता है जो त्यागी जी के आत्म गौरव को और बढ़ा देने के लिए पर्याप्त है।

ललित के सर पे हाथ फेरते हुये त्यागी जी स्नानागार को ओर बढ़ जाते हैं। लौटते ही वो अपने छोटे भाई को फोन लगाते हैं, और उससे कहते हैं कि वो ज्यादा परेशान न हो वो स्वयं परसों इन्दौर आकर स्वाती बिटिया से बात कंरेगे और उनको यकीन है कि वो अपने ताऊ जी की बात नहीं टालेगी। असल में त्यागी जी के छोटे भाई की बड़ी बेटी स्वाती जो वनस्पति विज्ञान से एम.एस.सी. कर रही है, ने दो दिन पहले ही अपने पिता को बताया कि वो सुमित नाम के एक लड़के से प्यार करती है जो उसके ही साथ पढ़ा है और अभी हाल ही में उसने आईएएस का मेंस क्वालीफाई कर लिया है और इन्टरव्यू की तैयारी कर रहा है। त्यागी जी और उनके छोटे भाई को इस शादी से कोई समस्या न होती अगर सुमित उनसे नीची जाति का न होता। त्यागी जी भोजन करते हुये घड़ी की तरफ देखते हैं जो 11:45 बजा रही है। त्यागी जी का ड्राइवर नीचे गाड़ी में बैठा उनका इंतज़ार कर रहा है। आज दोपहर 12:30 बजे विश्वविद्यालय में पुरस्कार वितरण कार्यक्रम से पहले त्यागी जी का भाषण रखा गया है।

“उर्मिला, ललित कहाँ है, अपने रूम में पढ़ रहा है क्या?” त्यागी जी ने घर से निकलते निकलते उन्हें दरवाजे तक छोड़ने आई अपनी पत्नी से पूछा। “वो अपने दोस्तों के साथ खेलने निकल गया है साइकिल लेकर” पत्नी का जवाब आते ही त्यागी जी ने अपनी चाल तेज करते हुये घड़ी देखी, 12:10 बज रहे थे।

दोपहर का वक्त है सड़क पे उतनी भीड़ नहीं जितनी 9 बजे से 11 बजे तक रही थी। 4 मिनट की ड्राइविंग के बाद हाईवे आ गया है इस हाईवे पे 7-8 मिनट के सफर की दूरी पर विश्वविद्यालय है।

ड्राईवर ने अचानक गाड़ी की रफ्तार धीमी कर दी है, ये देखते हुये की हाईवे के बाईं ओर 4-6 गाड़ियां और 20-22 लोगों की भीड़ इकट्ठी है। “अरे दिनेश, गाड़ी मत रोको। हम वैसे भी लेट हो रहे हैं। देखो! ये संसार है। ये सब तो होता ही रहता है। संसार के हाथ में पड़ी समय की माला में सुख - दुख रूपी मनके पड़े हुये हैं, और कुछ नहीं।” त्यागी जी ने ड्राइवर से कहा।

दरअसल त्यागी जी किसी भी भाषण से पहले मन की एकाग्रता चाहते हैं, इसीलिए उन्होंने गाड़ी में बैठते ही अपना फोन भी साइलेण्ट मोड पे कर लिया था।

विश्वविद्यालय का सभागार कुलपति, अध्यापकों, पत्रकारों और करीब 3500 विद्यार्थियों से भरा हुआ।

हमेशा की तरह त्यागी जी के भाषण ने पूरे सभागार को जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो। हर किसी पे उनकी ओजपूर्ण, तार्किक वाणी और अद्भुत शाब्दिक ज्ञान से भरी भाषाशैली का एक सा असर हो रहा है।

भाषण के दौरान ही त्यागी जी ने पानी पीने के बाद अपना मोबाइल अपनी जेब से निकाल कर पोडियम पे रखा, देखा 4 मिस्ड कॉल्स पड़ी हुई है। इससे पहले वो देख पाते कि ये मिस्ड कॉल्स किसकी हैं, उनके मोबाइल में डिसप्ले हुआ “उर्मिला कालिंग..” वो फोन काट देते हैं और अपनी बात पूरी करते हैं। दो मिनट के बाद उनकी दायीं तरफ के दरवाजे से उनका ड्राइवर दिनेश उनकी तरफ दौड़ता हुआ आता है। उसके दायें हाथ में उसका मोबाइल और चेहरे पे अजीब सी कई पर्तें हैं। कुछ विषाद की, कुछ विस्मय की, कुछ आत्म ग्लानि की, कुछ भय की भी। वो आकर त्यागी जी से कहता है..“सर... सर वो, ललित बाबा की हाईवे पे एक्सीडेण्ट में डेथ हो गई है।” त्यागी जी निढाल होकर मंच से जमीन पर गिर पड़े हैं; कभी न उठने के लिए। शायद समय की माला में पड़ा दुख का ये मनका त्यागी जी को बहुत भारी पड़ गया है।

- “भरत त्रिवेदी”

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  ---प्रेम तत्वामृत----

               भारत ही नहीं अपितु विश्वभर में प्रेम के अधीक्षक श्रीकृष्ण ----राधा  व कृष्ण माने जाते हैं , वे प्रेम के पर्याय हैं अतः राधा व कृष्ण के तत्व द्वारा यहाँ पर प्रेम के दोनों  मूल भावों की विवेचना की जायगी .....


******राधा तत्वामृत*****


                    -------राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव----
        ------राधा एक कल्पना है या वास्तविक चरित्र, यह सदियों से तर्कशील व्यक्तियों विज्ञजनों के मन में प्रश्न बनकर उठता रहा है| अधिकाँशतः जन राधा के चरित्र को काल्पनिक एवं पौराणिक काल में रचा गया मानते हैं | कुछ विद्वानों के अनुसार कृष्ण की आराधिका का ही रुप राधा हैं। आराधिका शब्द में से अ हटा देने से राधिका बनता है। राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था। यहाँ राधा का मंदिर भी है। राधारानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है।
       ------- यह आश्चर्य की बात हे कि राधा-कृष्ण की इतनी अभिन्नता होते हुए भी महाभारत या भागवत पुराण में राधा का नामोल्लेख नहीं मिलता, यद्यपि कृष्ण की एक प्रिय सखी का संकेत अवश्य है। राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया।  कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेम-भाव में और भी वृद्धि हुई। दोनों का पुनर्मिलन कुरूक्षेत्र में बताया जाता है जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृन्दावन से नंद, राधा आदि गए थे।
           -------यहाँ पर हम वस्तुतः राधा शब्द व चरित्र कहाँ से आया इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे | प्रयत्न ही कर सकते हैं, यद्यपि यह भी एक धृष्टता ही है  क्योंकि भक्ति प्रधान इस देश में श्रीकृष्ण (श्री राधाजी व श्री कृष्ण ) स्वयं ही ब्रह्म व आदि-शक्ति रूप माने जाते हैं अतः सत्य तो वे ही जानते हैं |
         ****** राधा का चरित्र-वर्णन, श्रीमदभागवत में स्पष्ट नहीं मिलता ....वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है....राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ‘गीत-गोविन्द’ से मिलता है|
                           

-----वेदों में राधा शब्द -----
      -------सर्व-प्रथम ऋग्वेद के भाग-१ /मंडल १,२ ...में ...राधस शब्द का प्रयोग हुआ है  ....जिसे वैभव के अर्थ में प्रयोग किया गया है......      -------ऋग्वेद के २/म.३-४-५ में ..सुराधा ...शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है...सभी देवों से उनकी अपनी संरक्षक शक्ति का उपयोग करके धनों की प्राप्ति व प्राकृतिक साधनों के उचित प्रयोग की प्रार्थना की गयी है| ऋग्वेद-५/५२/४०९४..में -- राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....
------अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन  व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है |  एवं.....
“गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव: नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |”
------कृष्ण = क्र = कार्य = कर्म -----राधो  = अराधना, राधन ( गूंथना ), शोध, शोधन, नियमितता, साधना ...अर्थात ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई  = ...कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई |        इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते पिवा त्वस्य गिर्वण (ऋग्वेद ३. ५ १. १ ०) ---ओ राधापति ( इंद्र – बाद में विष्णु ) वेद मन्त्र भी तुम्हें जपते हैं। उनके द्वारा सोमरस पान करो।       -------विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य  राधस : सवितारं नृचक्षसं  (ऋग्वेद १ २ २.  ७). -------ओ सब के हृदय में विराजमान सर्वज्ञाता दृष्टा जो हमारी आराधना सुनें हमारी रक्षा करो।            त्वं नृचक्सम वृषभानुपूर्वी : कृष्नास्वग्ने अरुषोविभाही ...(ऋग्वेद )
--------इस मन्त्र में श्री राधा के पिता वृषभानु का उल्लेख किया गया है जो अन्य किसी भी प्रकार के संदेह को मिटा देता है ,क्योंकि वही तो राधा के पिता हैं।        ------यस्या रेणुं   पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त :   ---(अथर्ववेदीय राधिकोपनिषद ) ----राधा वह शख्शियत है जिसके कमलवत  चरणों की रज श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक अपने माथे पे लगाते हैं।
       ******तमिलनाडू की गाथा के अनुसार --दक्षिण भारत का अय्यर जाति समूह, उत्तर के यादव के समकक्ष हैं | एक कथा के अनुसार गोप व ग्वाले ही कंस के अत्याचारों से डर कर दक्षिण तमिलनाडू चले गए थे | उनके नायक की पुत्री नप्पिंनई से कृष्ण ने विवाह किया --- श्रीकृष्ण ने नप्पिंनई को ७ बैलों को हराकर जीता था | तमिल गाथाओं के अनुसार नप्पिनयी नीला देवी का अवतार है जो ऋग्वेद की  तैत्रीय संहिता के अनुसार  ---विष्णु पत्नी सूक्त या अदिति सूक्त या नीला देवी सूक्त में राधा ही हैं जिन्हें अदिति –दिशाओं की देवी भी कहते हैं | नीला देवी या राधा परमशक्ति की मूल आदि-शक्ति हैं –अदिति ...|     ---------श्री कृष्ण की एक पत्नी कौशल देश की राजकुमारी---नीला भी थी, जो यही नाप्पिनायी ही है जो दक्षिण की राधा है | एक कथा के अनुसार राधाके कुटुंब के लोग ही दक्षिण चले गए अतः नप्पिंनई राधा ही थी |


                              -----पुराणों में श्री राधे :-----
       --------वेदव्यास जी ने श्रीमदभागवतम के अलावा १७ और पुराण रचे हैं इनमें से छ :में श्री राधारानी का उल्लेख है। यथा राधा प्रिया विष्णो : (पद्मपुराण ) राधा वामांश संभूता महालक्ष्मीर्प्रकीर्तिता (नारद पुराण ) तत्रापि राधिका शश्वत (आदि पुराण ) रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने (मत्स्य पुराण १३. ३७ ) राध्नोति सकलान कामान तेन राधा प्रकीर्तित :(देवी भागवत पुराण )    -----यां गोपीमनयत कृष्णो (श्रीमद भागवतम १०.३०.३५ ) ---श्री कृष्ण एक गोपी को साथ लेकर अगोचर हो गए। महारास से विलग हो गए। गोपी, राधा का एक नामहै| ----अन्याअ अराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर :    -(श्रीमद भागवतम ) ----इस गोपी ने कृष्ण  की अनन्य भक्ति( आराधना) की है। इसीलिए कृष्ण उन्हें अपने (संग रखे हैं ) संग ले गए, इसीलिये वह आराधिका ...राधिका है |
--------- वस्तुतः ऋग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति = रयि (संसार, ऐश्वर्य, श्री, वैभव) +धा (धारक, धारण करने वालीशक्ति) से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ज्ञान मार्गीकाल में सृष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष, परमात्मा रूप में वर्णन हुआ तो  समस्त संसार की धारक चितशक्ति, ह्लादिनी शक्ति, परमेश्वरी राधा का आविर्भाव   हुआ|
        ----भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण  कहा गया तो उनकी मूल कृतित्व - काल, कर्म, धर्म व काम के अधिष्ठाता हुए—कालरूप- कृष्ण व  उनकी सहोदरी (साथ-साथ उदभूत)  राधा-परमेश्वरी......कर्म रूप - ब्रह्मा व  नियति (सहोदरी)....  धर्म रूप-महादेव  व श्रद्धा (सहोदरी)  .....एवम  कामरूप-अनिरुद्ध  व  उषा ( सहोदरी )---- इस प्रकार राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति (ब्रह्मसंहिता)  है।        ------वही  परवर्ती साहित्य में.... श्रीकृष्ण  का लीला-रमण व  लौकिक  रूप के  आविर्भाव  के  साथ  उनकी साथी, प्रेमिका, पत्नी  हुई  व  ब्रजबासिनी रूप  में  जन-नेत्री।
------भागवत-पुराण ...मैं जो आराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है ......
  किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्री कृष्ण महारास  के  मध्य  में  लोप होते   समय  साथ  ले  गये थे  जिसे  ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यह वही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द  के रचयिता विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्रीकृष्ण  (पुरुष)  की रसेश्वरी (प्रक्रति) राधा....के रूप मेंकल्पित व प्रतिष्ठित किया।


                        -------महाभारत में राधा ------
-------- उल्लेख उस समय आ सकता था जब शिशुपाल श्रीकृष्ण की लम्पटता का बखान कर रहा था| परन्तु भागवतकार निश्चय ही राधा जैसे पावन चरित्र को इसमें घसीटना नहीं चाहता होगा, अतः शिशुपाल से केवल सांकेतिक भाषा में कहलवाया गया, अनर्गल बात नहीं कहलवाई गयी|         -------- कुछ विद्वानों के अनुसार महाभारत में तत्व रूप में राधा का नाम सर्वत्र है क्योंकि उसमें कृष्ण को सदैव श्रीकृष्ण कहा गया है | श्री का अर्थ राधा ही है जो आत्मतत्व की भांति सर्वत्र अंतर्गुन्थित है, श्रीकृष्ण = राधाकृष्ण |
       ******श्री कृष्ण की विख्यात प्राणसखी और उपासिका राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थी। राधा कृष्ण शाश्वत प्रेम का प्रतीक हैं। राधा की माता कीर्ति के लिए 'वृषभानु पत्नी' शब्द का प्रयोग किया जाता है। राधा को कृष्ण की प्रेमिका और कहीं-कहीं पत्नी के रुप में माना जाता हैं। राधा वृषभानु की पुत्री थी। पद्म पुराणने इसे वृषभानु राजा की कन्या बताया है। यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहा था, इसे भूमि कन्या के रूप में राधा मिली। राजा ने अपनी कन्या मानकर इसका पालन-पोषण किया। यह भी कथा मिलती है कि विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा। तभी राधा भी जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठलोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की सखी थी और उसका विवाह रापाण अथवा रायाण नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। अन्यत्र राधा और कृष्ण के विवाह का भी उल्लेख मिलता है। कहते हैं, राधा अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी।       ---------यह भी किम्बदन्ती है कि जन्म के समय राधा अन्धी थी और यमुना में नहाते समय जाते हुए राजा वृषभानु को सरोवर में कमल के पुष्प पर खेलती हुई मिली। शिशु अवस्था में ही श्री कृष्ण की माता यशोदा के साथ बरसाना में प्रथम मुलाक़ात हुई, पालने में सोते हुए राधा को कृष्ण द्वारा झांक कर देखते ही जन्मांध राधा की आँखें खुल गईं |
        ****** महान कवियों- लेखकों ने राधा के पक्ष में कान्हा को निर्मोही जैसी उपाधि दी। दे भी क्यूँ न ? राधा का प्रेम ही ऐसा अलौकिक था...उसकी साक्षी थी यमुना जी की लहरें, वृन्दावन की वे कुंजवे गलियाँ  वो कदम्ब का पेड़, वो गोधुली बेला जब श्याम गायें चरा कर वापिस आते वो मुरली की स्वर लहरी जो सदैव वहाँ की हवाओं में विद्यमान रहती थी ।        ------राधा जो वनों में भटकती, कृष्ण कृष्ण पुकारती, अपने प्रेम को अमर बनाती, उसकी पुकार सुन कर भी ,कृष्ण ने एक बार भी पलट कर पीछे नही देखा। ...तो क्यूँ न वो निर्मोही एवं कठोर हृदय कहलाए ।
             *******किन्तु कृष्ण के हृदय का स्पंदन किसी ने नहीं सुना। स्वयं कृष्ण को कहाँ कभी समय मिला कि वो अपने हृदय की बात..मन की बात सुन सकें। जब अपने ही कुटुंब से व्यथित हो कर वे प्रभास -क्षेत्र में लेट कर चिंतन कर रहे थे तब 'जरा' के छोडे तीर की चुभन महसूस हुई। उन्होंने देहोत्सर्ग करते हुए 'राधा' शब्द का उच्चारण किया। जिसे 'जरा' ने सुना और 'उद्धव' को जो उसी समय वह पहुँचे..उन्हें सुनाया। उद्धव की आँखों से आँसू लगतार बहने लगे। सभी लोगों को कृष्ण का संदेश देने के बाद जब उद्धव राधा के पास पहुँचे तो वे केवल इतना कह सके ---" राधा, कान्हा तो सारे संसार के थे ..”
      --------किन्तु राधा तो केवल कृष्ण के हृदय में थी…....कान्हा के ह्रदय में तो केवल राधा थीं ....
******समस्त भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को शाश्वत प्रेम की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।
-------बरसाना के श्रीजी के मंदिर में ठाकुर जी भी रहते हैं | भले ही चूनर ओढ़ा देते हैं सखी वेष में रहते हैं ताकि कोई जान न पाये | महात्माओं से सुनते हैं कि ऐसा संसार में कहीं नहीं है जहाँ कृष्ण सखी वेश में रहते हैं | जो पूर्ण पुरुषोत्तम पुरुष सखी बने ऐसा केवल बरसाने में है | अति सरस्यौ बरसानो जू | राजत रमणीक रवानों जू || जहाँ मनिमय मंदिर सोहै जू |

  ****श्रीकृष्ण तत्वामृत*****
                    -----वो कृष्णा है ----.
****वो गाय चराता है, गोमृत दुहता है...दधि खाता है...उसे माखन बहुत सुहाता है ...वह गोपाल है.....गोविन्द है.....वो कृष्ना है .......
-------गौ अर्थात गाय, ज्ञान, बुद्धि, इन्द्रियां, धरतीमाता ....अतः वह बुद्धि, ज्ञान , इन्द्रियों का, समस्त धरती का (कृषक ) पालक है –गोपाल,  वह गौ को प्रसन्नता देता है (विन्दते) गोविन्द है ..... दधि...अर्थात स्थिर बुद्धि, प्रज्ञा ...को पहचानता है...उसके अनुरूप कार्य करता है वह दधि खाता है ...
------माखन उसको सबसे प्रिय है .....माखन अर्थात गौदुग्ध को बिलो कर आलोड़ित करके प्राप्त उसका तत्व ज्ञान पर आचरण करना व संसार को देना उसे सबसे प्रिय है ..
        ***** “सर्वोपनिषद गावो दोग्धा नन्द नन्दनं “    ...सभी उपनिषद् गायें हैं जिन्हें नन्द नंदन श्री कृष्ण ने दुहा ....गीतामृत रूपी माखन स्वयं खाया, प्रयोग किया ....संसार को प्रदान करने हेतु.....
**** वह बाल लीलाएं करता हुआ कंस जैसे महान अत्याचारी सम्राट का अंत करता है ...
****वो प्रेम गीत गाता है वह गोपिकाओं के साथ रमण करता है, नाचता है , प्रेम करता है , राधा का प्रेमी है, कुब्जा का प्रेमी है  ...मोहन है ...परन्तु उसे किसी से भी प्रेम नहीं है...निर्मोही है ...वह किसी का नहीं .. वह सभी से सामान रूप से प्रेम करता है ..वह सबका है और सब उसके ...
****वो आठ पटरानियों का एवं १६०० पत्नियों का पति है, पुत्र-पुत्रियों में, संसार में लिप्त है  ...परन्तु योगीराज है, योगेश्वर है |
****वो कर्म के गीत गाता है एवं युद्ध क्षेत्र में भी भक्ति व ज्ञान का मार्ग, धर्म की राह दिखाता है ,,,गीता रचता है ....
----  वो रणछोड़ है ...वो स्वयं युद्ध नहीं करता, अस्त्र नहीं उठाता, परन्तु विश्व के सबसे भीषण युद्ध का प्रणेता, संचालक व कारक है | ---अपने सम्मुख ही अपनी नारायणी सेना का विनाश कराता है, कुलनाश कराता है... ---काल के महान विद्वान् उसके आगे शीश झुकाते हैं ...
    ------------वो कृष्णा, कृष्ण है श्री कृष्ण है ...............
****वह कोइ विशेषज्ञ नहीं अपितु शेषज्ञ है उसके आगे काल व ज्ञान स्वयं शेष होजाते हैं | ---------- वह कृष्ण है ..........
       @@@@@  कर्म शब्द कृ धातु से निकला है कृ धातु का अर्थ है करना।  इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ कर्मफल भी होता है।
       -----कृ से उत्पन्न कृष का अर्थ है विलेखण......आचार्यगण कहते हैं.....     ‘संसिद्धि: फल संपत्ति:’ अर्थात फल के रूप में परिणत होना ही संसिद्धि है और ‘विलेखनं हलोत्कीरणं ”         अर्थात विलेखन शब्द का अर्थ है हल-जोतना |..जो तत्पश्चात  अन्नोत्पत्ति के कारण ..मानव जीवन के सुख-आनंद का कारण ...अतः कृष्ण का अर्थ.. कृष्णन, कर्षण, आकर्षक, आकर्षण  व आनंद स्वरूप हुआ... | ----वो कृष्ण है
          ------ 'संस्कृति'   शब्द भी ….'कृष्टि' शब्द से बना है, जिसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की  'कृष'   धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है- 'खेती करना', संवर्धन करना, बोना आदि होता है। सांकेतिक अथवा लाक्षणिक अर्थ होगा- जीवन की मिट्टी को जोतना और बोना। …..‘संस्कृति’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय "कल्चर" शब्द ( ( कृष्टि -कल्ट  कल्चर ) भी वही अर्थ देता है। कृषि के लिए जिस प्रकार भूमि शोधन और निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है, उसी प्रकार संस्कृति के लिए भी मन के संस्कार–परिष्कार की अपेक्षा होती है।
     ____अत: जो कर्म द्वारा मन के, समाज के परिष्करण का मार्ग प्रशस्त करता है वह कृष्ण है... |   'कृष' धातु में 'ण' प्रत्यय जोड़ कर 'कृष्ण' बना है जिसका अर्थ आकर्षक व आनंद स्वरूप कृष्ण है..
         ---वो कृष्ना है...कृष्ण है .....
****शिव–नारद संवाद में शिव का कथन ---‘कृष्ण शब्द में कृष शब्द का अर्थ समस्त और 'न' का अर्थ मैं...आत्मा है .इसीलिये वह सर्वआत्मा परमब्रह्म कृष्ण नाम से कहे जाते हैं| कृष का अर्थ आड़े’.. और न.. का अर्थ आत्मा होने से  वे सबके आदि पुरुष हैं |"..    -----..अर्थात   कृष का अर्थ आड़े-तिरछा और न (न:=मैं, हम...नाम  ) का अर्थ आत्मा ( आत्म ) होने से  वे सबके आदि पुरुष हैं...कृष्ण हैं| क्रिष्ट..क्लिष्ट ...टेड़े..त्रिभंगी...कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा का यही तत्व-अर्थ है...
             **** कृष्ण = क्र या कृ = करना, कार्य=कर्म …..राधो  = आराधना,  राधन, रांधना, गूंथना, शोध, नियमितता , साधना....राधा....         गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:         नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |...ऋग्वेद
---ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई = कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई ....साधना के बिना कर्म सफल कब होता है ... वो राधा है                   ****राध धातु से राधा और कृष धातु से कृष्ण नाम व्युत्पन्न हुये|  राध धातु का अर्थ है संसिद्धि ( वैदिक रयि= संसार..धन, समृद्धि एवं धा = धारक )... ----ऋग्वेद-५/५२/४०९४--    में  राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन  व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है | ****नारद पंचरात्र में राधा का एक नाम हरा या हारा भी वर्णित है...वर्णित है | जो गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय में प्रचलित है| अतः महामंत्र की उत्पत्ति....
**** हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे          हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे// ----            -------सामवेद की छान्दोग्य उपनिषद् में कथन है...                  ”स्यामक केवलं प्रपध्यये, स्वालक च्यमं प्रपध्यये स्यामक”....
    ----श्यामक अर्थात काले की सहायता से श्वेत का ज्ञान होता है (सेवा प्राप्त होती है).. तथा श्वेत की सहायता से हमें स्याम का ज्ञान होता है ( सेवा का अवसर मिलता है)....यहाँ श्याम ..कृष्ण का एवं श्वेत राधा का प्रतीक है |
       ****नास्ति कृष्णार्चंनम राधार्चनं बिना ......
             ------जय कन्हैयालाल की ...जय राधा गोविन्द की -----.

समीक्षा

'अकाल में उत्सव '

उपन्यास

उपन्यासकार - पंकज सुबीर

समीक्षक – सरस दरबारी

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पंकज सुबीर जी की अब तक की सारी कृतियाँ पढ़ चुकी हूँ . हर कृति को एक ही सिटिंग में ख़त्म किया. उनकी गठी हुई शैली और मारक बिंब उनके लेखन को इतना रोचक बना देते हैं कि किताब के पन्ने खुद ब खुद पलटते जाते हैं .


अकाल में उत्सव पढ़ते वक़्त शुरुआत में दिमाग कई बार भटका, और उसे बार बार बाँधकर फिर पात्रों के बीच घसीट कर लाना पड़ा , पर जब कहानी ने गति पकड़ी, तो फिर किताब हाथ से नहीं छूटी. कहानी ख़त्म होते होते नौकरशाहों की पूरी कौम से नफरत हो गयी. नीचता की हर पराकाष्ठा लाँघकर भी यह कैसे सर उठाकर समाज में सम्माननीय व्यक्तियों की तरह जीते हैं, देखकर, पूरे सिस्टम से आस्था उठ गयी.


एक पूरी बिसात बिछी हुई है, सबके खाने तय हैं और सत्ता करती है सुनिश्चित किसे हाथी बनाना है, किसे घोडा , किसे ऊँट - और एक आम आदमी, एक गरीब किसान, उनकी चालों में फँसकर, अपनी जान से हाथ धोकर , उनकी शह और मात का बायस बनता रहता है. न जाने कितने किसान इस सियासी खेल में, काल का ग्रास बन गए , बनते जा रहे हैं .
इस किताब की विशेषता है, इसके मारक वाक्य, जो लेखक बीच बीच में धीरे से कह जाते हैं, और यही वाक्य इस पूरी कहानी का मर्म हैं .
" छोटा किसान जब तक लड़ सकता है, तब तक किसान रहता है और फिर हारकर मज़दूर हो जाता है"


जब बीवी के शरीर से वह आखरी गहना भी उत्तर जाता है, तब किसान पूरी तरह से टूट जाता है। जब परंपराएं मजबूरी की भेंट चढ़ जाती हैं, जब कोई सहारा शेष नहीं बचता, जब फसल भी ओले और बेमौसम बरसात की भेंट चढ़ जाती है , जब क़र्ज़ की सिल्ली के बोझ से साँसें उखड़ने लगती हैं, तब वह किसानी छोड़, मज़दूर बनने पर विवश हो जाता है , क्योंकि पेट की आग कभी किसी की सगी नहीं होती. एक ऐसा सच जो गले में दर्द की गाँठ सा अटक जाता है .


" किसान के जीवन में बढ़ते दुःख उसकी पत्नी के शरीर पर घटते ज़ेवरों से आँक लिए जाते हैं”.
बदहाली में यही गहने तो उसके और उसके भूखे परिवार के लिए एकमात्र सहारा होते हैं, भूखे पेट में निवाला होते हैं . हर गहना, फसल कटने पर , फिर छुड़वा लेने की मंशा से गिरवी रखा जाता है, पर अंतत: उसी साहूकार की तिजोरी का निवाला बन जाता है. और दोहरी तिहरी मार से बेदम होता किसान टुकड़े टुकड़े बिखरता जाता है.
"धृतराष्ट्र को हर युग में देखने के लिए संजय की आवश्यकता पड़ती थी, पड़ती है और पड़ती रहेगी".


ओले और बेमौसम बारिश से नष्ट हुई फसल के नुक्सान का आंकलन राजधानी में बैठी सरकार, अपने नियुक्त किये लालची , घुरघों द्वारा – करती है। बिना सच झूठ जाने। सही तो है , बगैर तंत्र के सत्ता पंगु थी और सदा रहेगी.
" क्रूरता आपको बहुत सारी इमोशनल मूर्खताओं से बचा लेती है ".


एक बहुत ही दुखद मोड़ कहानी का, जब अपनी पत्नी का आखरी ज़ेवर उसके पाँव की तोड़ी , वह सुनार के पास बैठा पिघलवा रहा है. चाँदी की हर रिसती बूँद के साथ उससे जुडी मीठी यादें धुआं होती जा रही है, एक गरीब किसान की भावनाओं का भी कोई मोल नहीं. सुनार जानता है , कि किसान बहुत मजबूरी में ही गहना तुड़वाता है , उसके आँसू भी उससे छिपे नहीं रहते. पर उसे क्रूर होना पड़ता है, हर इमोशनल मूर्खता से बचे रहने के लिए। एक और निष्ठुर सच।


दो दृश्य इस कहानी में लेखक ने अपने कौशल से कालजयी कर दिए हैं.
एक जब वह अपनी पत्नी कमला का आखरी गहना गलवाने सुनार के पास जाता है. उस गहने से जुडी अनगिनत मीठी यादें आँसू बनकर उसके कुर्ते की आस्तीन में जज़्ब होती जाती हैं, उस दर्द की तरह जो उसके भीतर एक आग सा सब कुछ जलाता जाता है। चाँदी की तोड़ी की हर रिसती बूँद, राम प्रसाद का सीना छेदती जाती है , और वह दुखों के महासागर में डूबता उतराता विलाप करता जाता है . कितना करुण है वह दृश्य.


और दूसरा जब वह अपनी पत्नी को बैठाकर, कलेक्टर के दफ्तर से माँगकर लाये हुए पकवान खिलाता है. दुनिया के मशहूर रोमांटिक सीन्स भी इस एक दृश्य के आगे फीके पड़ जाएंगे . लेखक की कलम ने स्याह रंगों में भी ऐसे रंग भर दिए हैं जो दुरूह है, उस लिपि कुटिया में इतने पुखराज बिखेर दिए हैं , जिनकी आभा कभी फीकी नहीं हो सकती. लेखक ने उस प्रेम मय पल को अमर कर दिया है.


एक बदसूरत सच्चाई को कितनी खूबसूरती से पेश किया जा सकता है, वह ‘अकाल में उत्सव’ को पढ़कर जाना।

इस खूबसूरत कलाकृति के लिए पंकज सुबीर जी को अनंत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।

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सरस दरबारी (https://www.facebook.com/saras.darbari)

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मैं बिलकुल हट्टा-कट्टा हूं । देखने में मुझे कोई भला 'आदमी रोगी नहीं कह सकता । पर मेरी कहानी किसी भारतीय विधवा से कम करुण नहीं है, यद्यपि मैं विधुर नहीं हूं । मेरी आप लगभग पैंतीस साल की है । आज तक कभी बीमार नहीं पड़ा था । लोगों का बीमार देखता था तो मुझे बड़ी इच्छा होती थी कि किसी दिन में भी बीमार पड़ता तो अच्छा होता ।

यह तो न था कि मेरे बीमार होने पर भी दिन में दो बार बुलेटिन निकलते । पर इतना अवश्य था कि मेरे लिए बीमार पड़ने पर हंटले पामर के बिसकुट- जिन्हेँ साधारण अवस्था में घरवाले खाने नहीं देते - दवा की बात और है - खाने को मिलते । यूडी. कलोन' की शीशियां सिर पर कोमल-करों से बीवी उंड़ेल कर मलती और सबसे बड़ी इच्छा तो यह थी कि दोस्त लोग आकर मेरे सामने बैठते और गंभीर मुद्रा धारण करके पूछते, कहिए किस की दवा हो रही है? कुछ फायदा है?

जब कोई इस प्रकार से रोनी सूरत बनाकर ऐसे प्रश्न करता है तब मुझे बड़ा मजा आता है और उस समय में आनंद की सीमा के उस पार पहुंच जाता हूं जब दर्शक लोग उठकर जाना चाहते हैं पर संकोच के मारे जल्दी उठते नहीं । यदि उनके मन की तसवीर कोई चित्रकार खींच दे तो मनोविज्ञान के 'खोजियों' के लिए एक अनोखी वस्तु मिल जाए ।

हां, तो एक दिन हाकी खेलकर आया । कपड़े उतारे स्नान किया । शाम को भोजन कर लेने की मेरी आदत है, पर आज मैच में रेफ्रेशमेंट जरा ज्यादा खा गया था इसलिए भूख न थी । श्रीमती जी ने खाने को पूछा । मैंने कह दिया कि आज स्कूल में मिठाई खाकर आया हूं कुछ विशेष भूख नहीं है । उन्होंने कहा ''विशेष न सही, साधारण सही । मुझे आज सिनेमा जाना है । तुम अभी खा लेते तो अच्छा था । संभव है मेरे आने में देर हो । '' मैंने फिर इंकार नहीं किया, उस दिन थोड़ा ही खाया । बारह पूरियां थीं और वही रोज वाली आध पाव मलाई । मलाई खा चुकने के बाद पता चला कि 'प्रसाद' जी के यहां से बाग बाजार का रसगुल्ला आया है । रस तो होगा ही । कल संभव है, कुछ खट्टा हो जाए । छ: रसगुल्ले निगलकर मैंने चारपाई पर धरना दिया । रसगुल्ले छायावादी कविताओं की भांति

सूक्ष्म नहीं थे, स्थूल थे । एकाएक तीन बजे रात को नींद खुली । नाभि के नीचे दाहिनी ओर पेट में मालूम पड़ता था, कोई बड़ी-बड़ी सुइयां लेकर कोंच रहा है । परंतु मुझे भय नहीं मालूम हुआ, क्योंकि ऐसे ही समय के लिए औषधियों का राजा, रोगों का रामबाण, अमृतधारा की एक शीशी सदा मेरे पास रहती है । मैंने तुरंत उसकी कुछ बूंदें पान कीं । दोबारा दवा पी । तिबारा । पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा की सार्थकता उसी समय मुझे मालूम हुई । प्रातःकाल होते-होते शीशी समाप्त हो गई । दर्द में किसी प्रकार कमी न हुई । प्रातः काल एक डाक्टर के यहां आदमी भेजना पड़ा ।

रायबहादुर डाक्टर विनोदबिहारी मुकर्जी यहां के बड़े नामी डाक्टर हैं । पहले जब प्रैक्टिस नहीं चलती थी तब आप लोगों के यहां मुफ्त जाते थे । वहां से पता चला कि डाक्टर साहब नौ बजे ऊपर से उतरते हैं । इसके पहले वह कहीं जा नहीं सकते । लाचार दूसरे के पास आदमी भेजना पड़ा । दूसरे डाक्टर साहब सरकारी अस्पताल के सब-असिस्टेंट थे । वे एक एक्के पर तशरीफ लाए । सूट तो वे ऐसा ही पहने हुए थे कि मालूम पड़ता था, प्रिंस आफ वेल्स के वेलेटों में हैं । ऐसे सूट वाले का एक्के पर आना वैसा ही मालूम हुआ जैसा लीडरों का मोटर छोड्‌कर पैदल चलना । मैं अपना पूरा हाल भी न कह पाया था कि आप बोले, ''जबान दिखाइए'' । प्रेमियों को जो मजा प्रेमिकाओं की आँखें देखने में आता है, शायद वैसा ही डाक्टरों को मरीजों की जीभ में आता है । डाक्टर महोदय मुस्कराए । बोले, ' 'घबराने की कोई बात नहीं है । दवा पीजिए । दो खुराक पीते-पीते आपका दर्द वैसे ही गायब हो जाएगा, जैसे हिंदुस्तान से सोना गायब हो रहा है । '' मैं तो दर्द से बेचैन था । डाक्टर साहब साहित्य का मजा लूट रहे थे । चलते-चलते बोले, ''अभी अस्पताल खुला न होगा नहीं तो आपको दवा मंगानी न पड़ती । खैर, चन्द्रकला फारमेसी से दवा मंगवा लीजिएगा । वहां दवाइयां ताजा मिलती हैं । बोतल में पानी गर्म करके सेंकिएगा । '' दवा पी गई । गर्म बोतलों से सेंक भी आरंभ हुई । सेंकते-सेंकते छाले पड़ गए । पर दर्द में कमी न हुई ।

दोपहर हुई शाम हुई । पर दर्द में कमी न हुई, हटने का नाम तो दूर । लोग देखने के लिए आने लगे । मेरे घर पर मेला लगने लगा । ऐसे-ऐसे लोग आए कि कहां तक लिखें । हां, एक विशेषता थी । जो आता एक न एक नुस्खा अपने साथ लेता आता था । किसी ने कहा, अजी, कुछ नहीं हींग पिला दो, किसी ने कहा, चूना खिला दो । खाने के लिए सिवा जूते के और कोई चीज बाकी नहीं रह गई जिसे लोगों ने न बताई हो । यदि भारतीय सरकार को मालूम हो जाए कि देश में इतने डाक्टर हैं तो निश्चय है कि सारे मेडिकल कालेज तोड़ दिए जाएं । इतने खर्च की आखिर आवश्यकता ही क्या है?

कुछ समझदार लोग भी आते थे, जो इस बात की बहस छेड् देते थे कि असहयोग-आंदोलन सफल होगा कि नहीं, ब्रिटिश नीति में कितनी सच्चाई है, विश्व आर्थिक

सम्मेलन में अमेरिका का भाषण बहुत स्वार्थपूर्ण हुआ इत्यादि । मैं इस समय केवल स्मरण-शक्ति से काम ले रहा हूं । तीन दिन बीत गए । दर्द में कमी न हुई । कभी-कभी कम हो जाता था; बीच-बीच में जोरों का हमला हो जाता था, मानो चीन-जापान का यद्ध हो रहा हो ।

तीसरे दिन तो यह मालूम होता था कि मेरा घर क्लब बन गया है । लोग आते मुझे देखने के लिए, पर चर्चा छिड़ती थी कि पंडित बनारसीदास ने इस बार किसको पछाडा, प्रसाद जी का अमुक नाटक स्टेज की दृष्टि से कैसा है, हिंदी के दैनिक पत्रों में बड़ी अशुद्धियां रहती है, अब देश में अनारकिस्ट नहीं रह गए है, लार्ड विलिंगडन अब ब्रुकबांड चाय नहीं पीते, छतारी के नवाब टेढ़ी टोपी क्यों लगाते है 'और राय कृष्णदास हफ्ते में नौ बार दाढ़ी क्यों बनवाते है; .अर्थात लार्ड विलिंगडन और महात्मा गांधी से लेकर रामजियावन लाल पटवारी तक की आलोचना यहां बैठकर लोग करते थे । और यहां दर्द की वह दर्दनाक हालत थी कि क्या लिखूं । मुझे भी कुछ बोलना ही पड़ता था । ऊपर से पान और सिगरेट की चपत अलग, भला दर्द में क्या कमी हो । बीच-बीच में लोग दवा की सलाह और डाक्टर बदलने की सलाह और कौन डाक्टर किस तरह का है, यह भी बतलाते जाते थे ।

आखिर में लोगों ने कहा कि तुम कब तक इस तरह पड़े रहोगे । किसी दूसरे की दवा करो । लोगों की सलाह से डाक्टर चूहानाथ कतरजी को बुलाने की सबकी सलाह हुई । आप लोग डाक्टर साहब का नाम सुनकर हंसेंगे । पर यह मेरा दोष नहीं है । डाक्टर साहब के मां-बाप का दोष है । यदि मुझे उनका नाम रखना होता तो अवश्य ही कोई साहित्यिक नाम रखता । परंतु ये यथानाम तथा गुण । आपकी फीस 'आठ रुपए थी और मोटर का एक रुपया अलग । आप लंदन के एफआरसीएस. थे ।

कुछ लोगों का सौंदर्य रात में बढ़ जाता है, डाक्टरों की फीस रात में बढ़ जाती है । खैर, डाक्टर साहब बुलाए गए । आते ही हमारे हाल पर रहम किया और बोले, मिनटों में दर्द गायब हुआ जाता है, थोड़ा पानी गरम कराइए, तब तक यह दवा मंगवाइए । एक पुर्जे पर आपने दवा लिखी । पानी गर्म हुआ । दो रुपए की दवा आई । डाक्टर बाबू ने तुरंत एक छोटी-सी पिचकारी निकाली; उसमें एक लंबी सूई लगाई, पिचकारी में दवा भरी और मेरे पेट में वह सूई कोंचकर दवा डाली ।

यह कह देना आसान है कि मेरा कलेजा निगाहों के नेजे के घुस जाने से रेजा-रेजा हो गया है, अथवा उनका दिल बरूनी की बरछियों के हमले से टुकड़े-टुकड़े हो गया है, पर अगर सचमुच एक आलपीन भी धंस जाए तो बड़े-बड़े प्रेमियों को नानी याद आ जाए, प्रेमिकाएं भूल जाएं । डाक्टर साहब कुछ कहकर और मुझे सांत्वना देकर चले गए । इसके बाद मुझे नींद आ गई और मैं सो गया । मेरी नींद कब खुली कह नहीं सकता, पर दर्द में कमी हो चली थी और दूसरे दिन प्रातःकाल पीड़ा रफूचक्कर हो गई थी ।

कोई दो सप्ताह मुझे पूरा स्वस्थ होने में लगे । बराबर डाक्टर चूहानाथ कतरजी की दवा पीता रहा । अठारह आने की शीशी प्रतिदिन आती रही । दवा के स्वाद का क्या कहना । शायद मुर्दे के मुख में डाल दी जाए तो वह भी तिलमिला उठे । पंद्रह दिन के बाद मैं डाक्टर साहब के घर गया । उन्हें धन्यवाद दिया । मैंने पूछा कि अब तो दवा पीने की कोई आवश्यकता न होगी । वे बोले, 'यह तो आपकी इच्छा पर है । पर यदि आप काफी एहतियात न करेंगे तो आपको अपेंडिसाइटीज' हो जाएगा । यह दर्द मामूली नहीं था । असल में आपको सीलियो सेंट्रिक कोलाइटीज' हो गया था । और उससे 'डेवेलप' कर पेरिकार्डियल हाइहेट्‌यूलिक स्टमकालिस' हो जाता, फिर ब्रह्मा भी कुछ न कर सकते । मालूम होता है कि आपकी श्रीमती बड़ी भाग्यवती हैं । अगर छ: घंटे की देर और हो जाती तो उन्हें जिंदगी भर रोना पड़ता । वह तो कहिए कि आपने मुझे बुला लिया । अभी कुछ दिनों आप दवा कीजिए । ''

डाक्टर महोदय ने ऐसे-ऐसे मर्जों के नाम सुनाए कि मेरी तबीयत फड़क उठी । भला मुझे ऐसे मर्ज हुए जिनका नाम साधारण क्या बड़े पढ़े-लिखे लोग भी नहीं जानते । मालूम नहीं, ये मर्ज सब डाक्टरों को मालूम हैं कि केवल हमारे डाक्टर चूहानाथ को ही मालूम हैं । खैर, दवा जारी रखी ।

अभी एक सप्ताह भी पूरा न हुआ था कि दो बजे को एकाएक फिर दर्द रूपी फौज ने मेरे शरीर रूपी किले पर हमला कर दिया । डाक्टर साहब ने जिन-जिन भयंकर मर्जों का नाम लिया था उनका स्वरूप मेरी तड़पती हुई आंखों के सामने नृत्य करने लगा । मैं सोचने लगा कि हुआ हमला किसी उन्हीं में से एक मर्ज का । तुरंत डाक्टर साहब के यहां आदमी दौड़ाया गया कि इंजेक्शन का सामान लेकर चलिए । वहां से आदमी बिना मांगी पत्रिका की भांति लौटकर आया कि डाक्टर साहब कहीं गए हैं । इधर मेरी हालत क्या थी उसका वर्णन यदि सरस्वती शार्टहैँड से भी लिखे तो संभवत: समाप्त न हो । एयरोप्लेन के पंखे की तेजी के समान करवटें बदल रहा था । इधर मित्रों और घरवालों की कांफ्रेंस हो रही थी कि अब कौन बुलाया जाए, पर डिसार्मार्मेंट कांफ्रेंस' की भांति कोई न किसी की बात मानता था, न कोई निश्चय ही हो पाता था । मालूम नहीं, लोगों में क्या बहस हुई, कौन-कौन प्रस्ताव फेल हुए, कौन-कौन पास । जहां मैं पड़ा कराह रहा था उसी के बगल में लोग बहस कर रहे थे । कभी-कभी किसी-किसी की चिल्लाहट सुनाई दे जाती थी । बीमार मैं था, अच्छा-बुरा होना मुझे था, फीस मुझे देनी थी, परंतु लड़ और लोग रहे थे । मालूम होता था कि उन्हीं लोगों में से किसी की जमींदारी कोई जबरदस्ती छीने लिए जा रहा है । अंत में हमारे मकान के बगल में रहने वाले पंडित जी की विजय हुई और आयुर्वेदाचार्य, रसज्ञ-रंजन, चिकित्सा-मार्तंड, प्रमेह-गज-पंचानन, कविराज पंडित सुखडी शास्त्री के बुलाने की बात तय हुई । आधा घंटा तो बहस में बीता । खैर, किसी तरह से कुछ तय हुआ । एक सज्जन उन्हें बुलाने के लिए भेजे गए । कोई पैंतालीस मिनट बीत गए, परंतु वहां से न वैद्यजी आए, न भेजे गए सज्जन का ही पता चला ।

एक ओर दर्द इनकम टैक्स की तरह बढ़ता ही चला जा रहा था, दूसरी ओर इन लोगों का भी पता नहीं । और भी बेचैनी बढ़ी । अंत में जो साहब गए थे वे लौटे, वैद्य जी ने बडे गौर से पत्र देखा और कहा कि 'अभी बुद्ध क्रांति-वृत्त में शनि की स्थिति है, एकतीस पल नौ विपल में शनि बाहर हो जाएगा ओर डेढ़ घड़ी एकादशी का योग है, उसके समाप्त होने पर मैं चलूंगा । आप आधा घंटे में आइएगा । सुनकर मेरा कलेजा कबाब हो गया । मगर वे कह आए थे, अतएव बुलाना भी आवश्यक था । मैंने फिर उन्हें भेजा । कोई आधे घंटे बाद वैद्य जी एक पालकी पर तशरीफ लाए । आकर आप मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गए । .आप धोती पहने हुए थे और कंधे पर एक सफेद दुपट्टा डाले हुए थे । इसके अतिरिक्त शरीर पर सूत के नाम पर कैवल जनेऊ था, जिसका रंग देखकर यह शंका होती थी कि कविराज जी कुश्ती लड़कर .आ रहे है ।

वैद्य जी ने कुछ और न पूछा-पहले नाड़ी हाथ में ली । पांच मिनट तक एक हाथ की नाड़ी देखी, फिर दूसरे हाथ की । बोले ''वायु का प्रकोप है, यकृत से वायु घूमकर पित्ताशय में प्रवेश कर अंत्र में जा पहुंची है । इससे मंदाभि का प्रादुर्भाव होता है और इसी कारण जब भोज्य पदार्थ प्रतिहत होता है तब शूल का कारण होता है । संभव है, मूत्राशय में अश्मन भी एकत्र हो । '' कविराज जी मालूम नहीं क्या बक रहे थे और मेरी तबीयत दर्द और क्रोध से एक दूसरे ही संसार में हो रही थी ।

आखिर मुझसे न रहा गया । मेंने एक सज्जन से कहा, ' 'जरा आलमारी में से आपटे का कोष ता लेते आइए' ' यह सुनकर लोग चकराए । कुछ लोगों को संदेह हुआ कि अब में अपने होश में नहीं हूं । मैंने कहा, ' 'दवा तो पीछे होगी, मैं पहले समझ तो लूं कि मुझे रोग क्या है पंडित जी कहने लगे, ' 'बाबू साहब, देखिए आजकल के नवीन डाक्टरों को रोगों का निदान तो ठीक मालूम ही नहीं, चिकित्सा क्या करेंगे । अंग्रेजी पढ़े-लिखों का वैद्यक-शास्त्र पर से विश्वास उठ गया है । परंतु हमारे यहां ऐसी-ऐसी औषधियां हैं कि एक बार मृत्युलोक से भी लौटा लें । मुहूर्त मिल जाना चाहिए । और अच्छा वैद्य मिल जाना चाहिए । '' इसके पश्चात वैद्य जी चरक, सुश्रुत, रसनिघंटु, भेषजदीपिका, चिकित्सा-मार्तंड के श्लोक सुनाने लगे । और अंत में कहा, ' 'देखिए, में दवा देता हूं और अभी आपको लाभ होगा । परंतु इसके पश्चात आपको पर्पटी का सेवन करना होगा । क्योंकि आपका शुक्र मंद पड़ गया है । गोमूत्र में आप पर्पटी का सेवन कीजिए, फिर देखिए दर्द पारद के समान उड़ जाएगा और गंधक के समान भस्म हो जाएगा । लिखा है

गोमूत्रेण समायुक्ता रसपर्पटिकाशिता ।

मासमात्रप्रयोगेण शूल सर्वे विनाशयेत् । ।

मैँनें कहा, ' 'शुक्र अस्त नहीं हो गया, यही क्या कम है । पंडित जी गोमूत्र पिलाइए और गोबर भी खिलाइए । शायद आप लोगों के शास्त्र में और कोई भोजन रह ही नहीं गया है । इसी कारण से आप लोगों के दिमाग की बनावट भी विचित्र है । खैर, पंडित जी ने दवा दी । कहा कि अदरख के रस में इस औषधि का सेवन करना होगा । खैर, साहब, फीस दी गई, किसी प्रकार वैद्य जी से पिंड छूटा । दो दिन दवा की गई । कभी-कभी तो कम अवश्य हो जाता था, पर पूरा दर्द न गया । सीआईडी. के समान पीछा छोड़ता ही न था । वैद्य जी के यहाँ जब आदमी जाता तब कभी रविवार के कारण, कभी प्रदोष के कारण और शायद त्रिदोष के कारण ठीक समय से दवा ही नहीं देते थे ।

अब वैसी बेचैनी नहीं रह गई थी, पर बलहीन होता गया । खाना-पीना भी ठीक मिलता ही न था । चारपाई पर पड़ा रहने लगा । दिन को मित्रों की मंडली आती थी । वह आराम देती थी कम, दिमाग चाटती थी अधिक । कभी-कभी दूर-दूर से रिश्तेदार भी आते थे । और सब लोग डाक्टरों को गाली देकर और मुझे बिना मांगी सलाह देकर चले जाते थे । मैं चारपाई पर 'इंटर्न' था । आखिर मेरा विचार हुआ कि फिर डाक्टर साहब की याद की जाए । जिस समय मैं यह जिक्र कर रहा था एक कांग्रेसमैन' बैठे हुए थे । यह सज्जन अभी जेल से लौटे थे । मुझे देखने के लिए तशरीफ लाए थे । बोले, ''साहब आप लोगों को देश का हर समय ध्यान रखना चाहिए । ये डाक्टर सिवा विलायती दवाओं के ठीकेदार के और कुछ नहीं होते । इनके कारण ही विलायती दवाएं आती है । आप किसी भारतीय हकीम अथवा वैद्य को दिखलाइए । '' ऐसी खोपड़ी वालों से मैं क्या बहस करता? मैंने मन में सोचा कि वैद्य महाराज को तो मैंने देख ही लिया । कुछ और रुपयों पर ग्रह आया होगा, हकीम भी सही ।

एक की सलाह से मसीहुअ हिंद, बुकराते जमां, सुकरातुश्शफा जनाब हकीम आलुए बुखारा साहब के यहां आदमी भेजा । आप फौरन तशरीफ लाए । इस जमाने में भी जब तेज-से-तेज सवारियों का प्रबंध सभी जगह मौजूद हैं, आप पालकी मेँ चलते हैं । मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि पालकी रख दी जाती है अथवा कहार कंधे पर ले लेता है और हकीम साहब उसमें टहला करते हैं । मेरा मतलब यह है कि जब किसी के यहां आप बुलाए जाते हैं तब पालकी के भीतर बैठकर आप जाते हैं ।

हकीम साहब आए । यद्यपि मैं अपनी बीमारी का जिक्र और अपनी बे-बसी का हाल लिखना चाहता हूं पर हकीम साहब की पोशाक और उनके रहन-सहन तथा फैशन का जिक्र न करना मुझसे न हो सकेगा । सर्दी बहुत तेज नहीं थी । बनारस में यों भी तेज सर्दी नहीं पड़ती । फिर भी ऊनी कपड़ा पहनने का समय आ गया था । परंतु हकीम साहब चिकन का बंददार अंगा पहने हुए थे । सिर पर बनारसी लोटे की तरह टोपी रखी हुई थी । पांव में पाजामा ऐसा मालूम होता था कि चूडीदार पाजामा बनने वाला था, परंतु दर्जी ईमानदार था । उसने कपड़ा चुराया नहीं, सबका सब लगा दिया; अथवा यह भी हो सकता है कि ढीली-मोहरी के लिए कपड़ा दिया गया हो और दर्जी ने कुछ कतर-ब्योंत की हो और चुस्ती दिखाई हो । जूता कामदार दिल्ली वाला था, मोजा नहीं था । रूमाल इतना बड़ा था कि अगर उसमें कसीदा कढा न होता तो मैं समझता कि यह रूमाल मुंह अथवा हाथ पोंछने के लिए नहीं तरकारी बांधने के लिए है । हकीम साहब के दाढ़ी के बाल ठुड्डी की नोंक ही पर इकट्ठे हो गए थे । मालूम होता था कि हजामत बनाने का बुला है । हकीम साहब पतले-दुबले इतने थे कि मालूम पड़ता था, अपनी तंदुरुस्ती आपने अपने मरीजों को बांट दी है । हकीम साहब में नजाकत भी बला की थी । रहते थे बनारस में, मगर कान काटते थे लखनऊ के ।

आते ही मैंने सलाम किया, जिसका उत्तर उन्होंने मुस्कराते हुए बड़े अंदाज से दिया और बोले, ' 'मिजाज कैसा है?

मैंने कहा, ''मर रहा हूं । बस, आपका ही इंतिजार था । अब यह जिंदगी आपके ही हाथों में है । ''

हकीम साहब ने कहा, ' 'या रब! आप तो ऐसी बातें करते हैं गोया जिंदगी से बेजार हो गए हैं । भला ऐसी गुफ्तगू भी कोई करता है । मरें आपके दुश्मन । नब्ज तो दिखलाइए । खुदावंदकरीम ने चाहा तो आननफानन में दर्द रफूचक्कर होगा । ''

मैंने कहा, ' ''अब आपकी दुआ है । आपका नाम बनारस में ही नहीं, हिंदुस्तान में लुकमान की तरह मशहूर है, इसीलिए आपको तकलीफ दी गई है ।

दस मिनट तक हकीम साहब ने नब्ज देखी । फिर बोले, ' मैं यह नुस्सा लिखे देता हूं । इसे इस वक्त आप पीजिए, इंशा अल्लाह जरूर शफा होगी । मैंने बगौर देख लिया । लेकिन आपका मेदा साफ नहीं है और सारे फसाद की बुनियाद यही है । ''

मैंने कहा, ' 'तो बुनियाद उखाड़ डालिए । किस दिन के लिए छोड़ रहे हैं । ''

हकीम आलू बुखारा साहब बोले, ' 'तो आप मुसहिल ले लीजिए । पांच रोज तक मुंजिज पीना होगा इसके बाद मुसहिल । इसके बाद मैं एक माजून लिख दूंगा । उसमें जोफ दिल, जोफ दिमाग, जोफ जिगर, जोफ मेदा, जोफ चश्म, हर एक की रियायत रहेगी । '' मुझसे न रहा गया । मैं बोला, ' 'कई जोफ आप छोड़ गए, इसे कौन अच्छा करेगा ।' ' हकीम साहब ने कहा, ' 'जब तक मैं हूं आप कोई फिक्र न कीजिए । ''

एक सज्जन ने उनके हाथों में फीस रखी । हकीम साहब चलने को तैयार हुए । उठे । उठते-उठते बोले, जरा एक बात का ख्याल रखिएगा कि आजकल दवाइयां लोग बहुत पुरानी रखते हैँ । मेरे यहां ताजा दवाइयां रहती हैं ।

मैंने उनकी दवा उस दिन पी । वह कटोराभर दवा जिसकी महक रामघाट के सिवर से कंपिटीशन के लिए तैयार थी, किसी प्रकार गले के नीचे उतार गया, जैसे अहत्कार लोग अंग्रेजों की डांट निगल जाते हैं । दूसरे दिन मुंजिज आरंभ हुआ । उसका पीना और भी एक आफत थी । मालूम पड़ता था, भरतपुर के किले पर मोरचा लेना है । मेरी इच्छा हुई कि उठाकर गिलास फेंक दूं पर घरवाले जेल के पहरुओं की भांति सिर पर सवार रहते थे । चौथे दिन मुसहिल की बारी आई । एक बडे से मिट्टी के बंधने से दवा मुझे पीने को दी गई । शायद दो सेर के लगभग रही होगी । एक छ गले के नीचे उतरा होगा कि जान-बूझकर मैंने करवा गिरा दिया । बधना गिरते ही असफल प्रेमी के हृदय की भांति चूर-चूर हो गया और दवा होली के रंग के समान सबकी धोतियों पर जा पड़ी । उस दिन के बाद से हकीम साहब की दवा मुझे पिलाने का फिर किसी को साहस न हुआ । खेद इतना ही रह गया कि उसी के साथ हकीम साहब वाला माजून भी जाता रहा ।

दर्द फिर कम हो चला । परंतु दुर्बलता बढ़ती जाती थी । कभी-कभी दर्द का दौरा अधिक वेग से हो जाता था । अब लोगों को विशेष चिंता मेरे संबंध में नहीं रहती थी । कहने का मतलब यह है कि लोग देखने-सुनने कम आते थे । वही घनिष्ठ मित्र आते थे । घरवालों को और मुझे भी दर्द के संबंध में विशेष चिंता होने लगी । कोई कहता कि लखनऊ जाओ, कोई एक्स-रे का नाम लेता था । किसी-किसी ने राय दी कि जल-चिकित्सा कीजिए । एक सज्जन ने कहा, यह सब कुछ नहीं, आप होमियोपैथी इलाज शुरू कीजिए, देखिए कितनी शीघ्रता से लाभ होता है । बोले, ' 'साहब, इन नन्हीं-नन्हीं गोलियों में मालूम नहीं कहां का जादू है । साहब जादू का काम करती है, जादू का । ''

एक नेचर-क्योर वाले ने कहा कि आप गीली मिट्टी पेट पर लेपकर धूप में बैठिए, एक हफ्ते में दर्द हवा हो जाएगा । हमारे ससुर साहब एक डाक्टर को लेकर आए । उन्होंने कहा, ' 'देखिए साहब! आप पढ़े-लिखे आदमी हैं । समझदार हैं। मैं बीच में बोल उठा, ' 'समझदार न होता तो भला आपको कैसे यहां बुलाता । ''

डाक्टर महोदय ने कहा, ' 'दवा तो नेचर की सहायता करने के लिए होती है । आप कुछ दिनों तक अपना 'डायट' बदल दीजिए । मैंने इसी डायट पर कितने ही रोगियों को अच्छा किया है । मगर हम लोगों की सुनता कौन है । असल में आपमें विटेमिन 'एफ' की कमी है । आप नीबू नारंगी, टमाटो, प्याज, धनिया के रस में सलाद भिगोकर खाया कीजिए । हरी-भरी पत्तियां खाया कीजिए । ''

मैंने पूछा, ' 'पत्तियां खाने के लिए पेड पर चढ़ना होगा । अगर इसके बजाय घास बतला दें तो अच्छा हो । जमीन पर ही मिल जाएगी । ''

इसी प्रकार जो आता इतनी हमदर्दी दिखलाता था कि एक डाक्टर, हकीम या वैद्य अपने साथ लेता आता था ।

खाने के लिए साबूदाना ही मेरे लिए अब न्यामत थी । ठंडा पानी मिल जाता था, यह परमात्मा की दया थी । तीन बजे एक पंडित जी महाराज आकर एक पोथी में से बड़-बड़ पाठ किया करते थे और मेरा मरज खाते थे । शाम को एक पंडित और आकर मेरे हाथ में कुछ धूल रख जाते कि महामृत्युंजय का प्रसाद है । इसी बीच में मेरी नानी की मौसी मुझे देखने आई । उन्होंने बडे प्रेम से देखा । देखकर बोलीं, ' 'मैं तो पहले ही सोच रही थी कि यह कुछ ऊपरी खेल है ।' ' मैंने पूछा, ' 'यह ऊपरी खेल क्या है नानीजी । '' बोलीं, ' 'बेटा, ' 'सब कुछ किताब में ही थोड़े लिखा रहता है । यह किसी चुडैल का फसाद है । '' मेरी स्त्री और माता की ओर दिखाकर कहने लगीं, 1 'देखो न इसकी बरौनी कैसी खड़ी है । कोई चुडैल लगी है । किसी को दिखा देना चाहिए' ' ।

मैंने कहा, ' 'डाक्टर तो मेरी जान के पीछे लग गए हैं! क्या चुडैल उनसे भी बढ्‌कर होगी । '' जब सब लोग चले गए तब मेरी स्त्री ने कहा, ' 'तुम लोगों की बात क्यों नहीं मान लिया करते? कुछ हो या न हो, इसमें तुम्हारा हर्ज ही क्या है । कुछ खाने की दवा तो देंगे नहीं । परमात्मा की आज्ञा तो टाली जा सकती है, परंतु अपनी या मैं तो कहूंगी किसी भले आदमी की स्त्री की आज्ञा कोई भला आदमी नहीं टाल सकता । मैंने कहा- 'तुम लोगों को जो कुछ करना है करो, मगर मेरे पास किसी को मत बुलाना । कोई ओझा या भूत का पचड़ा मेरे पास लेकर आया तो वही सन् 2 में मुजफ्फरपुर सम्मेलन में जो चप्पल पहनकर गया था उसी से में उठकर मरम्मत करने लगूंगा । '' श्रीमती जी बोलीं, अजी वह कोई ओझा थोड़े ही है । एम.ए. पास है । कुछ समझा होगा तभी तो यह काम करते हैं । कितनी स्त्रियां रोज उनके पास जाती हैं, कितने पुरुष जाते है । बड़े वैज्ञानिक ढंग से उन्होंने इसका अन्वेषण किया है । ''

मेरे दर्द में किसी विशेष प्रकार की कमी न हुई । 'ओझा से तो किसी प्रकार की आशा क्या करता । पर बीच-बीच में दवा भी होती जाती थी । अंत में मेरे साले साहब ने बड़ा जोर दिया कि यह सब झेलना इसीलिए है कि तुम ठीक दवा नहीं करते । होमियोपैथी चिकित्सा शुरू करो, सारी शिकायत गंजों के बाल की तरह गायब हो जाएगी । मैंने भी कहा, ''मुर्दे पर जैसे बीस मन वैसे पचास । ऐसा न हो कि कोई कह दे कि अमुक 'सिस्टम' का इलाज छूट गया । ''

अब राय होने लगी कि किस होमियोपैथ को बुलाया जाये । हमारे मकान से कुछ दूरी पर होमियोपैथ डाकिया था । दिनभर चिट्ठी बांटता था, सवेरे और शाम दो पैसे पुड़िया दवा बांटता था । सैकड़ों मरीज उसके यहां जाते । बड़ी प्रैक्टिस थी । एक और होमियोपैथ थे । चार पैसे फर्मा दिन में पुस्तकों का अनुवाद करते थे और प्राय: सायं होमियोपैथी से चार-छ: आने पैदा कर लेते थे । एक मास्टर भी थे जो कहा करते थे कि सच पूछो तो जैसी होमियोपैथी मैने 'स्टडी' की है, किसी ने नहीं की । कुछ बहस के बाद एक डाक्टर का बुलाना निश्चित हआ ।

डाक्टर महोदय आए । आप भी बंगाली थे । आते ही सिर से पांव तक मुझे तीन-चार बार ऐसे देखा मानो मैं होनोलूलू से पकड़कर लाया गया हूं और खाट पर लिटा दिया गया हूं । इसके पश्चात मेडिकल सनातन-धर्म के अनुसार मेरी जीभ देखी । फिर पूछा, ' 'दर्द ऊपर से उठता है, कि नीचे से, बाएं से कि दाएं से, नोचता है कि कोचता है; चिकोटता है कि बकोटता है; मरोड़ता है कि खरबोटता है । '' मैंने कहा कि मैंने तो दर्द की फिल्म तो उतरवाई नहीं है । जो कुछ मालूम होता है, मैंने आपसे कह दिया । डाक्टर महोदय बोले ' 'बिना सिमटाम के देखे कैसे दवा देने सकता है । एक-एक दवा का भेरियस सिमटाम होता है । '' फिर मालूम नहीं कितने सवाल मुझसे पूछे । इतने सवाल तो आईसीएस. 'बाइवावोसी' में भी नहीं पूछे जाते । कुछ प्रश्न यहां अवश्य बतला देना चाहता हूं । मुझसे पूछा, ' 'तुम्हारे बाप के चेहरे का रंग कैसा था । के बरस से तुमने सपना नहीं देखा । जब चलते हो तब नाक हिलती है या नहीं । किसी स्त्री के सामने खडे होते हो तब दिल धड़कता है कि नहीं? जब सोते हो तब दोनों आखें बंद रहती हैं कि एक । सिर हिलाते हो तो खोपड़ी में खटखट आवाज आती है कि नहीं । मैंने कहा, ' 'आप एक शार्टहैंड राइटर भी साथ लेकर चलते हैं कि नहीं । इतने प्रश्नों का उत्तर देना मेरे लिए असंभव है । ''

फिर डाक्टर बाबू ने पचीसों पुस्तकों का नाम लिया और बोले, ' 'फेरिंगटन यह कहते हैं, नैश यह कहते हैं, क्लार्क के हिसाब से यह दवा होगी । डाक्टर साहब पंद्रह-बीस पुस्तकें भी लाए थे । आधा घंटे तक उन्हें देखते रहे । तब दवा दी । आपकी दवा से कुछ लाभ अवश्य हुआ, पर पूरा फायदा न हुआ । मैंने अब पक्का इरादा कर लिया कि लखनऊ जाऊं । जो बात काशी में नहीं हो सकती, लखनऊ में हो सकती है । वहां सभी साधन हैं ।

सब तैयारी हो चुकी थी कि इतने में एक और डाक्टर को एक मेहरबान लिवा लाए । उन्होंने देखा, कहा, ' 'जरा मुंह तो देखूं । '' मैंने कहा, ' 'मुंह-जीभ जो चाहे देखिए । '' देखकर बड़े जोर से हंसे । मैं घबराया । ऐसी हंसी केवल कवि-सम्मेलन में बेढंगी कविता पढ़ने के समय सुनाई देती है । मैं चकित भी हुआ । डाक्टर बोले, ' 'किसी डाक्टर को यह सूझी नहीं । तुम्हें 'पाइरिया' है । उसी का जहर पेट में जा रहा है और सब फसाद पैदा कर रहा है' ' मैंने कहा, ' 'तब क्या करूं?'' डाक्टर साहब ने कहा, 'इसमें करना क्या है? किसी डेंटिस्ट के यहां जाकर सब दांत निकलवा दीजिए । '' मैंने अपने मन में कहा, ' 'आपको तो यह कहने में कुछ कठिनाई ही नहीं हुई । गोया दांत निकलवाने में कोई तकलीफ ही नहीं होती । '

खैर, रातभर मैंने सोचा । मैंने भी यही निश्चय किया कि यही डाक्टर ठीक कहता है । डेंटिस्ट के यहां से पुछवाया । उसने कहलाया कि तीन रुपए फी दांत तुड़वाने में लगेंगे । कुल दांतों के लिए छानबे रुपए लगेंगे । मगर मैं आपके लिए छ: रुपए छोड़ दूंगा । इसके अतिरिक्त दांत बनवाई डेढ सौ अलग । यह सुनकर पेट के दर्द के साथ-साथ सिर में भी चक्कर आने लगा । मगर मैंने सोचा कि जान सलामत है तो सब कुछ । इतना और खर्च करो । श्रीमती से मैंने रुपए मांगे । उन्होंने पूछा, ' 'क्या होगा?'' मैंने सारा हाल कह दिया । वे बोलीं, ' 'तुम्हारी बुद्धि कहीं घास चरने गई है क्या? किसी कवि का तो साथ नहीं हो गया है कि ऐसी बातें सूझने लगी हैं । आज कोई कहता है दांत उखड़वा डालो । कल कोई कहेगा सारे बाल उखड़वा डालो; परसों कोई डाक्टर कहेगा नाक नोचवा डालो, आंख निकलवा दो । यह सब फजूल है । तुम सुबह टहला करो, किसी एक भले डाक्टर की दवा करो । खाना ठिकाने से खाओ । पंद्रह दिन में ठीक हो जाओगे । मैंने सबका इलाज भी देख लिया । '' मैंने कहा, ' 'तुम्हें अपनी ही दवा करनी थी तो इतने रुपए क्यों बरबाद कराए?''

कुछ दिन के बाद मैंने समझा कि स्त्रियों में भी बुद्धि होती है । विशेषत: बीस साल की आयु के बाद ।

 

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(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार)

सुशील कुमार की कविताएँ

एक अदने की बात

 

हे महान साहित्य सम्राटो ।

मत रौंदो अपने अहंकार के तले।

नन्हे पौधों की कोपलों को।

 

तुम्हारे ताज में अकादमी ,पद्मश्री,नोबल सजे हैं।

सम्मानों से लदा है तुम्हारा अहंकार।

साहित्य तुम से शुरू होकर तुम पर ही ख़त्म हो रहा है।

 

तुम्हारी सैकड़ों पुरुस्कृत किताबों के नीचे।

मेरे दबे शब्द निकलने की कोशिश करते हैं।

लेकिन तुम्हारी बरगद सी शाखाएं।

फुंफकार कर सहमा देती हैं मेरे अस्तित्व को।

 

एक फुनगे की तरह निकलने की मेरी कोशिश को।

कुचल देती है तुम्हारी हाथी पदचाप।

तुम नहीं सुनना चाहते एक छोटे फूल की बात।

क्योंकि तुम्हारे अहंकार के बगीचे में।

 

फैली नागफनी लहूलुहान कर देती हैं स्वयं तुम्हें भी।

अपने कृतित्व के पिंजरे में कैद ,वंचित हो तुम।

बाहर खुली फ़िज़ाओं की भीनी खुश्बुओं से।

पथ प्रदर्शन करने वाला तुम्हारा व्यक्तित्व।

आज पहाड़ की तरह खड़ा है रास्ते में।

 

(यह भाव किसी के लिए व्यक्तिगत नहीं है वर्तमान व्यवस्थाओं पर एक व्यंग है।  )

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भूख

 

(रामेन्द्र कुमार की कहानी END and MEANS के हिस्से का काव्य रूपांतरण )

 

बिरजू।

एक चोर।

सिद्ध स्वामी अरवसु।

प्रवचन का पड़ा प्रभाव।

बन गया स्वामी का शिष्य।

एक दिन स्वामी के आदेश पर रात में।

ढूंढ़ने गया लकड़ी एक गांव में कड़कड़ाती ठण्ड थी।

बंद थे दरवाजे सभी घरों के सिर्फ एक झोपड़ी से रोशनी आ रही थी।

देखा एक अजीब दृश्य एक औरत चूल्हे के सामने बैठी थी।

और गर्म तवे पर छिड़क रही थी पानी बार बार।

एक कोने में भूखे नंगे बच्चे सिमटे सो रहे थे।

बिरजू ने पूछा देवी यह क्या कर रही हो।

बोली घर में नहीं है अन्न का दाना।

तवे पर पानी छिड़क कर।

उन्हें आभास दिला रही हूँ।

कि खाना पक रहा है।

और वो सो जायेंगे।

इस आभास में।

भूखे पेट।

निःशब्द।

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*दाना दुःख है मुझे*

 

प्रश्नों पर प्रश्नचिन्ह।
उत्तरो पर पहरे हैं।
देश मेरा आगे बढ़ रहा है।
दाना मांझी गिड़गिड़ा रहा है।
अस्पताल के भेड़िये लगा रहे हैं ठहाका।
बेटी माँ की लाश के पास बैठी रो रही है।
अमंग देई की लाश कैसे जायेगी साठ मील दूर।
दाना के पास जेब में नहीं है फूटी कौड़ी।
लाश को कपडे में लपेट कर ।
रस्सी से बांध कर कंधे पर उठा कर।
रोती बेटी का हाथ थाम कर।
चल पड़ता है दाना अपने गांव की ओर।
सभ्य समाज के ठेकेदार सड़क के दोनों ओर से।
देख रहे थे उस ठठरी को कांधे पर।
थोथी संवेदनाओं का लगा था अम्बार।
दाना का निस्पृह भावहीन चेहरा
तिल तिल कर खोल रहा था पोल।
मरती हुई मानवी संवेदनाओं की।
ख़बरों के ठेकेदार खींच रहे थे फोटो।
अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिये।
कोस रहे थे सोतीे सरकारों को।
दे रहे थे दुहाई सत्य बोलने की।
बारह किलो मीटर तक एक गरीब की लाश।
बनी रही थियेटर सब देख रहे थे तमाशा।
सरकारें सोती रहीं ।
मीडिया चिल्लाता रहा।
सभ्य समाज हँसता रहा।
बेटी रोती रही।
दाना कंधे पर लाश ढोता रहा।
मेरा देश आगे बढ़ता रहा।

* दाना मांझी

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बस्ती आज सुबह सुबह चंदा के विलाप से दहल गई. उसका पति सांप के डसने के कारण मर गया था. यह मजदूरों की बस्ती थी जो छोटे मोटे काम कर जैसे तैसे पेट पालते थे. अभाव तथा दुःख से भरे जीवन में मर्दों के लिए दारू का नशा ही वह आसरा था जहाँ वह गम के साथ साथ खुद को भी भूल जाते थे. औरतें बच्चों का मुख देख कर दर्द के साथ साथ अपने मर्दों के जुल्म भी सह लेती थीं. 

चंदा का ब्याह अभी कुछ महीनों पहले ही हुआ था. उसके पति को भी दारु पीने की आदत थी. वह रोज़ दारू पीकर उसे पीटता था. कल रात भी नशे की हालत में घर आया. उसने चंदा से खाना मांगा. चंदा ने थाली लाकर रख दी. एक कौर खाते ही वह चिल्लाने लगा "यह कैसा खाना है. इसमें नमक बहुत है." इतना कह कर वह उसे पीटने लगा. लेकिन कल हमेशा की तरह पिटने के बजाय चंदा ने प्रतिरोध किया. नशे में धुत् अपने पति को घर के बाहर कर वह दरवाज़ा बंद कर सो गई. कुछ देर दरवाज़ा पीटने के बाद उसका पति बाहर फर्श पर ही सो गया. 

सुबह जब चंदा उसे मनाकर भीतर ले जाने आई तो उसने उसे मृत पाया. उसके मुंह से झाग निकल रहा था और शरीर पर सांप के डसने का निशान था.

चंदा के घर के सामने बस्ती वाले जमा थे.रोते चंदा के आंसू सूख गए थे. दुःख की जगह चिंता ने ले ली थी. घर में कानी कौड़ी भी नहीं थी. ऐसे में अपने पति की अर्थी का इंतजाम कैसे करेगी. उसने सोचा कि बस्ती वालों से पैसे मांग ले पर किससे मांगती. सभी घरों की हालत तो एक जैसी थी.

 

परिचय
नाम - आशीष कुमार त्रिवेदी

जन्म तिथि - 7-11-1974

शिक्षा - B .COM [1994]

पेशा- प्राइवेट टयूटर

अपने आस पास के वातावरण को देख कर मेरे भीतर जो भाव उठते हैं उन्हें लघु कथाओं एवं लेख के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।

C -2072 इंदिरा नगर

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युग युग की कहानियाँ

संकलन - शांता रगाचारी

चित्रांकन - पी खेमराज

अनुवाद - मोहिनी राव

प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया

प्राचीन काल में राजा लोग केवल शौक के लिए ही शिकार नहीं करते थे । बनैले पशुओं को खत्म करना भी उनका उद्देश्य था ताकि वे वानप्रस्थियों को परेशान न करें । जब कभी कोई राजा शिकार पर जाता तो दरबारियों, सैनिकों और सेवकों का बड़ा दल भी उसके साथ होता ।

महाभारत के वीर नायक अभिमन्यू के पुत्र राजा परीक्षित एक दिन एक हिरन का पीछा कर रहे थे । निशाना बांधकर तीर जो उन्होंने चलाया तो हिरन घायल हो गया, लेकिन मरा नहीं । शिकार का नियम है कि जानवर की जान ले लो, मगर उसे पंगु बना कर मत छोड़ दो । किसी जानवर को घायल और पीड़ा से छटपटाता छोड़ देना अधर्म माना जाता था और अब भी माना जाता है । जब हिरन घायल हो गया तो राजा उसको मारकर कष्ट से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से उसका पीछा करते-करते जंगल के बिल्कुल भीतर पहुंच गये । उनके साथी .कहीं पीछे छूट गये थे । राजा थक गये थे । उनको बड़े जोरों से भूख और प्यास लग रही

थी । लेकिन उन्होंने संकल्प कर रखा था कि जब तक हिरन को पीड़ा से छुटकारा नहीं दिला देंगे, वापस नहीं लौटेंगे ।

अचानक राजा ने देखा कि पेड़ों के बीच एक खाली स्थान है । वहां एक वृद्ध ब्राह्मण गऊओं को सानी-पानी दे रहे थे । राजा ने उनके पास जाकर पूछा, ' 'ब्राह्मण देवता, मैं अभिमन्यु का पुत्र और इस राज्य का शासक हूं । मैं एक घायल हिरन की तलाश में हूं । वह इस ओर तो नहीं आया? आपने तो नहीं देखा?''

ब्राह्मण सन्यासी का नाम शमीक था । संयोग से वह उनके मौन रहने का दिन था । उन्होंने राजा के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । ब्राह्मण के उत्तर न देने पर राजा को पहले तो आश्चर्य हुआ फिर उन्होंने सोचा कि शायद वृद्ध ब्राह्मण को सुनायी नहीं देता, और उन्होंने ऊंची आवाज मैं फिर अपना प्रश्न दोहराया । शमीक राजा की ओर देखते रहे लेकिन इस बार भी उत्तर नहीं दिया । राजा ने इतनी देर में यह तो जान लिया था कि सन्यासी बहरे नहीं हैं, क्योंकि इसी बीच एक गाय ने दूध दुहने की बाल्टी को लात मारी और उसकी आवाज सुनकर ब्राह्मण ने फुर्ती से बाल्टी को थाम लिया और उसको उलटने से बचा ३ लिया ।

अब तो राजा को बहुत क्रोध आया । उन्होंने समझा कि ब्राह्मण बहुत धृष्ट है । एक सन्यासी की यह मजाल कि राजा के प्रश्न का उत्तर न दे? राजा ने चीखकर कहा कि यदि उन्होंने उसके प्रश्न का उत्तर न दिया तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा । फिर भी सन्यासी केवल राजा की ओर दुखभरी दृष्टि से ताकते रहे । बोले कुछ भी नहीं ।

क्रोध, में राजा आपे से बाहर हो रहे थे । उन्होंने इधर-उधर देखा कि किस तरह उस धृष्ट ब्राह्मण को अपमानित करें । अचानक उनकी दृष्टि पास ही पड़े एक मरे हुए सांप पर पड़ी । तुरंत ही शाही तलवार म्यान से निकली और बिजली की तरह लपक कर मरे हुए सांप को नोक से उठा लिया । दूसरे ही क्षण सांप हवा में उछला और ब्राह्मण के गले में जा लिपटा ।

राजा हंसे. और इस प्रतीक्षा में खड़े रहे कि ब्राह्मण शमीक कुछ कहेंगे, शायद शाप भी दे दें ।

लेकिन शमीक ने कुछ नहीं कहा । उनके चेहरे पर दुख का भाव भी उसी प्रकार बना रहा । राजा लज्जित होकर लौट पड़े ।

लेकिन एक तीसरा व्यक्ति भी वहां उपस्थित था जो चुपचाप खड़ा यह सब कुछ देख रहा था । वह थे कृश, शमीक के पुत्र मृगी के मित्र । लेकिन राजा या शमीक दोनों में से किसी को यह पता नहीं था । राजा के लौटने के बाद कृश श्रृंगी को यह समाचार देने भागे ।

आखिर जब श्रृंगी मिले तो कृश ने उनसे पूछा, ' 'तुमने उस दिन कहा था कि जंगल- वासियों के लिए सब से पहले भगवान हैं और फिर राजा । कहा था न?''

श्रृंगी दुर्लभ जड़ी-बूटियां जमा किया करते थे । अपना काम करते हुए उन्होंने अनमने भाव से कहा, ' 'हां, कहा तो था । ''

' 'यदि राजा हमारी परवाह न करे, तो हम उसके स्वामीभक्त क्यों हों?'' श्रृंगी ने पूछा ' 'तुम राजा परीक्षित की ही बात कर रहे हो न? वह वानप्रस्थियों का कभी अपमान नहीं करेंगे । क्यों करेंगे भला?''

श्रृंगी के मित्र ने, जो कुछ-कुछ शरारती थे, चालाकी से कहा, ' 'मान लो मैं तुमसे यह कहूं कि मैंने स्वयं अपनी आखों से देखा, तो?''

' 'तो भी मैं तुम्हारा विश्वास नहीं करूंगा, '' श्रृंगी ने तुरंत जवाब दिया । '' अगर तुम अपनी आंखों से इसका प्रमाण देखो तो?''

श्रृंगी ने खीझकर कहा ' 'कैसा प्रमाण? पहेलियां क्यों बुझा रहे हो? साफ-साफ क्यों नहीं कहते क्या बात है? तब शायद मैं उस किस्से को समझ सकूं जो तुम सुनाना चाह रहै हो । ''

' 'यह कोई किस्सा-कहानी नहीं, सच बात है, '' श्रृंगी के मित्र ने उनका हाथ पकड़कर जंगल की ओर खींचते हुए कहा । वे दोनों वहां पहुंचे जहां शमीक समाधि लगाये बैठे थे । मरा हुआ सांप अभी तक उनके गले में लिपटा हुआ था । '' अरे! पिताजी के गले में मरा सांप लिपटा है!'' यह कहते हुए श्रृंगी आगे की ओर लपके । लेकिन उनके मित्र ने उन्हें पीछे खींच लिया ।

' 'हां, यह मरा हुआ सांप ही है' ' उन्होंने व्यंग्य से कहा । ' 'हमारे महाराज, हमारे प्रभु और कृपालु रक्षक राजा परीक्षित ने इसे तुम्हारे पिताजी के गले में डाला । मैंने स्वयं देखा । और जानते हो तुम्हारे पिता का अपराध क्या था जिसके लिए उन्हें यह दंड दिया गया? क्योंकि राजा ने किसी घायल हिरन के बारे में कुछ पूछा और तुम्हारे पिता ने उत्तर नहीं दिया । राजा उनके ऊपर खूब बिगड़े-मैंने स्वयं सुना । उसके बाद अपनी तलवार की नोक से इस मरे सांप को उठाकर तुम्हारे पिता के गले में डाल दिया । लेकिन मानना पड़ेगा-क्या हाथ की सफाई थी वाह!

ऐसा अचूक निशाना साधा कि सांप ठीक-ठीक तुम्हारे पिता के गले में लिपटा! जरा भी चूक नहीं हुई । मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा । '' ' 'लेकिन, '' श्रृंगी ने चकित होकर पूछा, ' 'तुमने आगे बढ्‌कर महाराज ० बताया क्यों नहीं कि आज पिताजी के मौन रहने का दिन है?''

' 'मेरा दिमाग थोड़ा ही खराब था ऐं '' कृश ने मुंह बनाकर उत्तर दिया । ' 'महाराज बड़े क्रोध में थे उस समय और हाथ में नंगी तलवार थी? तलवार ले ही गर्दन पर चल जाती तो?''

श्रृंगी ने प्रेम और गर्व से अपने वृद्ध पिता की ओर देखा । मरा सांप छ० उनको क्रोध आ रहा था ।

' 'महाराज ने मेरे पिता का अपमान करके बहुत बुरा किया, '' उन्होंने कहा । ' 'क्या वह इनके मुख पर यह तेज नहीं देख सके? इनकी आंखों में गरिमा देख सके?''

' 'राजा लोग यह सब कुछ नहीं देखते राजाओं के बारे में अपनी सम्मति को इस संक्षिप्त उत्तर में बता दिया कृश ने ।

पिता के दुबले-सूखे शरीर पर राजा के अपमानजनक आचरण के प्रमाण को श्रृंगी जितना ही देखते, उनका क्रोध उतना ही बढ़ता जाता । आखिर उनसे अब और अधिक नहीं सहा गया और उनका सारा क्रोध शाप बनकर उनके मुंह से फूट पड़ा, '' भले ही राजा हो, लेकिन वह नीच है जिसने मेरे महान पिता के गले में मरा हुआ सांप डाला । उसने मेरे पिता का ही अपमान नहीं किया इन सारे वानप्रस्थियों का अपमान किया है जिन्होंने राजा को कभी कोई हानि नहीं पहुंचायी । मैं राजा को शाप देता हूं । कुरु वंश के उज्वल नाम को कलंकित करने वाले इस अहंकारी राजा की, आज से सात रोज के अंदर, सर्पराज तक्षक के काटने से मृत्यु हो जायेगी । ''

इस भयानक शाप के शब्द दूंगी के मुख से निकले ही थे कि उनके पिता ने विचलित होकर अपनी समाधि तोड़ दी और भय से अपने पुत्र के मुंह की ओर देखने लगे । उनके बेटे ने क्रोध में आकर जो कुछ कह डाला था उससे मानों उन पर वजपात-सा हुआ । अपने मौन को तोड़ते हुए आहत स्वर में बोले, '' श्रृंगी, ' मेरे बेटे, तुमने यह क्या कर डाला? तुमने नेक राजा परीक्षित को शाप दे डाला जिन्होंने सदा हमारी रक्षा की है, जिनकी कृपा से ही हम वन में शांति के साथ निर्भय होकर रह रहे हैं । तुमने किस कारण ऐसा पागलपन किया? क्या सन्यासियों का यही धर्म है? भगवान ही जानता है कि तुम्हारे क्रोध को वश में न रख पाने के कारण कैसा संकट आयेगा, कैसी अराजकता फैलेगी । तुमने राजा परीक्षित को शाप नहीं दिया, सारे राज्य को शाप दे डाला है श्रृंगी । किसी भी दशा में ऐसा करना बहुत ही बुरा होता । राजा परीक्षित के साथ ऐसा करना तो और भी बुरा है क्योंकि वह दंड के भागी नहीं है । ''

श्रृंगी का क्रोध उतर चुका था । पिता की बात सुनकर वह पश्चात्ताप से सिर झुकाये खड़े रहे, फिर रोने लगे ।

' 'दुख की बात है कि तुम शाप को वापस भी नहीं ले सकते, '' शमीक ने दुख से विकल होकर कहा । ' 'तुमने अपने अनुशासन और अपनी विद्वत्ता से यह वरदान पा लिया है कि तुम्हारे मुख से निकली हर बात सच होकर रहेगी । यह जान कर ही मैंने तुम्हें बार-बार समझाया था बेटे, कि बोलने से पहले सौ बार सोच लिया करो । ''

वृद्ध शमीक विचार में डूबे बैठे रहे । फिर अचानक उठकर बोले, ' 'गौरमुख को मेरे पास भेज दो । उसे मैं तुरंत राजमहल भेजूंगा कि वह महाराज को श्राप

की बात बताकर उन्हें सावधान रहने के लिए कह दे ।

राजा परीक्षित ने चुपचाप गौरमुख का '

वह दुखी होकर बुदबुदाये, 'तो वह सन्यासी के मौन का दिन था! मुझे समझ जाना चाहिए था । दोष. मेरा था । लेकिन यह शमीक की दया है जो उन्होंने मुझको सावधान कर दिया । कृपा करके उन्हें मेरा प्रणाम कहना और कहना कि मैं उनका कृतज्ञ हूँ

यह कह कर गौरमुख को तो उन्होंने तुरंत विदा कर दिया और सलाह के लिए अपने मंत्रिमंडल को बुला भेजा । मंत्रियों के आने से पहले राजा ने कश्यप को संदेश भिजवाया कि वह तुरंत महल में आ जायें । कश्यप ब्राह्मण थे और सबसे अधिक विषैले सांप के काटे का भी इलाज कर सकते थे ।

मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद शिल्पी और राज-मिस्री महल में बुलवाये गये और रात ही रात में एक अजीब-सी इमारत खड़ी कर दी गयी-अबस, एक ऊंचे खंभे पर एक बड़ा कमरा । इसी कमरे में राजा रहने लगे-खंभे के नीचे और कमरे के बाहर सशस्त्र संतरी खड़े थे । उनको कठोर निर्देश था कि कोई कीड़ा भी कमरे के अंदर न घुसने पाये । परिवार के लोगों और मंत्रियों को छोड़, राजा के पास जाने की अनुमति किसी को नहीं थी ।

जब कश्यप राजा का आदेश पाकर जल्दी-जल्दी महल की ओर जा रहे थे तो रास्ते में एक बड़ा ब्राह्मण बैठा दिखा । वह बहुत ही दुखी लग रहा था ।

कश्यप ने पूछा, ' 'क्या हुआ, भाई? सड़क के किनारे इस तरह दुखी क्यों बैठे हो?''

ब्राह्मण ने कहा, ' 'वही कारण है जो आपको इस सड़क पर लिये जा रहा है । ''

' 'वही कारण है?'' चकित होकर कश्यप ने पूछा, ' 'पर मैं तो महाराज के दर्शनों के लिए जा रहा हूं । क्या तुम भी वहीं जा रहे हो?''

' हां '' ।

' 'राजा को धमकी दी गयी है कि वे नागराज तक्षक द्वारा काटे जायेंगे । उन्हीं की चिकित्सा के लिए मुझे बुलवाया गया है । लेकिन भला आपको क्या काम वहां?''

' 'मैं उनको मारने जा रहा हूं । '' कहते ही ब्राह्मण ने अपना असली रूप धारण कर लिया । असल में वह सर्पराज तक्षक था ।

' 'यह तो अजीब स्थिति है, '' कश्यप ने कहा । ' 'तुम उन्हें मारने जा रहे हो और मैं जिलाने । हम साथ-साथ चलें या अलग-अलग?''

तक्षक ने पूछा, ' 'क्या आपको विश्वास है कि आप मेरे विष से राजा को बचा सकेंगे?''

' 'हां, '' कश्यप ने बिना किसी संकोच के कहा ।

' 'साबित कीजिए '' तक्षक ने चुनौती दी । ' 'मैं इस पौधे को डसता हूं । देखें आप इसे फिर से जिला सकते है या नहीं । ''

यह कहकर सर्पराज ने अपना मुंह खोला और पौधे को डसकर उसकी जड़ में गहराई तक अपना विष फैला दिया । कुछ क्षणों में पौधा इस प्रकार भस्म हो गया मानों अंदर की आग से जल गया हो । अपने काम से बहुत संतुष्ट होकर तक्षक ने कश्यप से कहा, ' 'चलिए अब अपनी शक्ति आजमाइए । ''

कश्यप ने मुट्‌ठी- भर राख उठा ली, और प्रार्थना की आ में? आखें मूंद कर, उसमें हल्की-सी फूंक मारी । फिर राख को उसी जगह गाड़ दिया जहां से उसे उठाया था । कुछ ही देर में वहां हरा अंकुर निकल आया, फिर उसमें दो हरी पत्तियां फूट निकलीं । फिर हर। तना बढ़ने लगा उसमें नयी-नयी पत्तियां निकलने लगीं और थोड़ी ही देर में पौधा वैसा ही हो गया जैसा पहले था ।

तक्षक पहले तो घोर आश्चर्य से यह सब कुछ देखता रहा, फिर हार मान गया । इस प्रकार की चीज उसके लिए नयी नहीं थी । वह कई साधु-सन्यासियों से मिलता रहता था जो ऐसे करिश्मे करते थे और प्रार्थना के बल पर ही चमत्कार कर दिखाते थे ।

तक्षक ने कश्यप से कहा, ' 'मैं आपकी शक्ति मानता हूं । लेकिन राजा परीक्षित के मामले में इसका प्रयोग मत कीजिएगा । इसका कारण है । '' ' 'क्या कारण है?'' कश्यप ने पूछा ।

' 'पहले मैं आपसे एक प्रश्न पूछता है '' उसने कश्यप से कहा । ' 'क्या आप किसी की होनी में दखल देना उचित समझेंगे?''

' 'नहीं उचित तो नहीं समझता । लेकिन यह होनी नहीं, अभिशाप है जो होनी में दखल दे रहा है । ''

' 'नहीं आपका विचार गलत है, '' तक्षक ने कहा । ' 'मैं राजा को समय से ले मारने के लिए नहीं जा रहा हूं । मैं तो मृत्यु को बुलाने जा रहा हूं क्योंकि उनके भाग्य में यही लिखा है । मुझे यमराज ने भेजा है -जन्म और मृत्यु के लेखे के अनुसार श्रृंगी ने जो कुछ कह डाला वह शाप नहीं, भविष्यवाणी थी । ''

कश्यप गहरे विचार में डूबे खड़े रहे । ' 'तो क्या राजा परीक्षित के भाग्य में लिखा है कि वे सात दिन के भीतर ही मर जायेंगे?'' उन्होंने पूछा '' श्रृंगी ने शाप न दिया होता तो भी क्या यही होता?'

' 'देवताओं ने यही उनके भाग्य में लिखा था. । मैं तो केवल मृत्यु-देवता का दूत हूं समय से पहले ही किसी को समाप्त कर देने का साधन नहीं । '' '' तब तो मैं इसमें हस्तक्षेप नहीं करूंगा '' यह कहकर कश्यप अपने आश्रम वापस चले गये ।

तक्षक बड़ी देर तक राजा के कक्ष में घुसने की तरकीब सोचता रहा । श्रृंगी की भविष्यवाणी के सातवें दिन उसे एक तरकीब सूझी । उसने झटपट अपने कुछ सर्प मित्रों को बुला भेजा और उन्हें आदेश दिये ।

उसने कहा ' 'यह काम धोखे से ही किया जा सकता है । राजा की रक्षा का इंतजाम बहुत पक्का है । ''

उस समय राजा परीक्षित, उनके परिवार के लोग और उनके दरबार इस ब? की खुशी मना रहे थे कि छह दिन बिना किसी संकट के टल गये । सातवां दिन भी समाप्त होनेवाला था । सूर्यास्त के साथ-साथ शाप का भी अंत हे जायेगा और दिन डूबने को कुल एक घंटा बाकी था ।

उस दिन काफी संध्या बीते कुछ साथ-सन्यासी खंभे के नोच खड़े दिखायी दिये । एक ने प्रहरियों से कहा ' 'हम फल-फूल की भेंट लेकर महाराज के आशीर्वाद देने बहुत दूर से आये हैं ।

प्रहरियों ने सन्यासियों के कपड़ों और फल-फूल की टोकरी की अच्छी तरह तलाशी ली । जब संदेह की कोई बात न दिखायी दी तो उन्हें राजा के पास जाने दिया । उन्होंने सोचा शाम का समय करीब-करीब बीत चुका है, राजा को अगर ये सन्यासी आशीर्वाद देने गये तो कोई हर्ज नहीं । सन्यासियों ने फल-फूल की टोकरी राजा को भेंट की उन्हें आशीर्वाद दिया और बाहर चले गये । जंगल में पहुंच कर सन्यासियों ने अपना सर्प का असली रूप धारण कर लिया और जंगल की हरियाली में गायब हो गये ।

सूर्यास्त का समय हुआ । राजा के कक्ष में खुशियां मनायी जा रही थीं । बस थोड़ी देर और, फिर शाप का समय निकल जायेगा, और राजा को नयी आयु मिलेगी ।

राजा ने अपने परिवार और मंत्रियों को बुलाकर कहा, ''सूरज डूब रहा है । आओ, हमारे साथ ये स्वादिष्ट फल खाओ जो कृपालु सन्यासी दे गये हैं । '' दरबारियों ने हाथ बढ़ाकर अपनी-अपनी पसंद का फल उठा लिया । राजा का हाथ एक रसीले आम पर पड़ा । उन्होंने आम चूसा, बड़ा ही स्वादिष्ट था । कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि उसकी गुठली में एक नन्हा सा कीड़ा है । यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी । प्राय: रसभरे आमों की गुठालियों में कीड़े निकल आते थे । राजा ने खिड़की से बाहर अस्त होते हुए सूर्य को देखा और हंसकर उस नन्हे काले कीड़े को लक्ष्य करके बोले, ''अब तक्षक के आने का समय नहीं रहा । बोलो नन्हे कीड़े, तुम जानते हो कि तुम्हारा राजा अपने काम में असफल क्यों हो गया? लेकिन तुम्हें भला क्या मालूम? इसका उत्तर तो तक्षक ही दे सकता है । '' इतना कहना था कि राजा की भय से फैली आंखों ने देखा कि वह नन्हा-सा काला कीड़ा अचानक बढ्‌कर एक बड़ा शानदार नाग बन गया । जैसे-ही सूर्य पश्चिम में डूबा, तक्षक ने अपना विशाल फन फैलाया और राजा परीक्षित को तुरंत डस लिया ।

--

(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार)

दाना मांझी के नाम एक पत्र
भई दाना मांझी
       नमस्कार
       उम्मीद है कि अगले चुनावों तक तुम सुकशल रहोगे। रहना भी चाहिए आखिर चुनाव एक लोकपर्व है और गरीब आदमी पर्वों के बल पर ही जिंदा है। सबसे पहले तुम्हें सलाम कि तुमने कालाहांडी को एकबार फिर टी वी न्युज के लायक बना दिया। टी वी बेचारी गाय पर बहस करते-करते थक गई थी। भूख से हुई मौतों के कारण इसी कालाहांडी ने पूरी दुनिया में यश लूटा था। विदेशी लेखकों ने आकर गरीबी पर किताब लिखी थी। यही कालाहांडी है जिसके लिए कहा गया था कि वहां गरीबी नहीं है।

लोग आम की गुठली खाकर आराम से जी सकते हैं। यह तुमपर भी लागू होता है। गंभीरता से विचार करने पर तुम्हारी गलतियां सामने आती हैं। अस्पताल ने तो वही किया जिसके लिए वह जानी जाती है। एक बच्ची अस्पताल के लाईन में खड़ी थी। उसने दम तोड़ दिया। अस्पताल ने उसका नाम अपने रजिस्टर में दर्ज कर लिया। उसने तुम्हारी पत्नी का नाम भी रजिस्टर में दर्ज कर लिया होगा। उन्हें नाम रजिस्टर में दर्ज करने के एवज करोड़ों रुपये मिल जाते हैं। यह न समझना कि मैं अस्पतालों की निंदा कर रहा हूं।

अस्पताल का काम पोस्टामार्टम करना है। वह जिंदा आदमी को भी मुर्दा मानकर उसके ऑफिसियली डेड होने का इंतजार करते हैं ताकि सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में पोस्टमार्टम किया जा सके। वहां डॉक्टर नाम की मशीने होती हैं जिनका काम मरने के बाद बयान देना होता है। उन्होंने तुम्हारे मामले में भी बयान दिया कि भई गाड़ी के इंतजाम होने तक दाना रुका ही नहीं। बात भी सही है। पहली बात तो तुम्हारी पत्नी को गाड़ी के इंतजाम होने के बाद ही मरना चाहिए था। डॉक्टर आते, कहते, गाड़ी का इंतजाम हो गया तो अपने प्राण छोड़ देती। अस्पताल की गलती तो नहीं दिखती। तुम्हारा दूसरा आरोप कि अस्पताल ने तुमसे सारे पैसे ले लिये। प्रथम दृष्टया यह गलत लगता है क्योंकि तुम्हारे बदन पर कपड़ा है। तुम्हारी पत्नी भी कपड़ों में लिपटी है। तुम्हारी दस साल की बेटी के पांव में एक स्लीपर है। प्राप्त सबूतों से यह साफ हो जाता है कि सरकारी अस्पताल अभी भी संवेदनशील हैं। उनकी मानवता जिंदा है।

मानवता से याद आया कि जो आदमी इस पूरे प्रकरण की वीडियो बना रहा था जो बाद में मीडिया के काम आया। उस महामानव का अभिनंदन तो रामलीला मैदान में पूरी धूमधाम से किया जाना चाहिए। उसने जो वक्त वीडियो बनाने में लिया उतने में दस आदमी एकत्र कर सकता था। वीडियो से तो नहीं लगता कि तुम रात के अंधेरे में हो। यानी दिन के उजाले में राहगीरों के द्वारा तुम्हारी शूटिंग की जा रही थी। रोड के किनारे दर्जनों लोग दिखाई दे रहे हैं। उनका भी अभिनंदन। आज यदि दाना मांझी के नाम पर जुलूस निकालना हो तो हजारों लोग निकल पड़ेंगे लेकिन उस समय सिवा पुरुषोत्तम भाई के कोई आगे नहीं आया। यह जुलूशधर्मी देश है। कभी अभया के नाम पर तो कभी निर्भया के। रेप के समय तो बचाने कोई नहीं आयेगा लेकिन जुलूस में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे।


       तुम्हारी पत्नी ने मरकर एक बार फिर इस बहस का हवा दे दी कि आदिवासी वाकई गरीब ही होते हैं। उन्हें जंगलों में रहने और आम की गुठलियां खाने का शौक नहीं होता। सरकार बेचारी तो जानती ही है लेकिन क्या करे। आदिवासियो के नाम पर तो वोट मिलते नहीं हैं। वोट तो मिलते हैं गाय, तिरंगा, और राम के नाम पर। कांग्रेस की सरकार होती तो मगरमच्छ तुम्हारे साथ जाकर फोटो खिंचवाकर आंसू बहा आये होते। राजधानी में आते ही किसी न किसी परियोजना की शुरूआत तुम्हारे नाम पर किया जाता। वह तुम तक तो कभी नहीं पहुंचता लेकिन कांग्रेसी चुनाव प्रचार में तो काम आ जाता। कांग्रेस हाथ मलकर रह गई होगी। उसके हाथ से इतना हसीन मौका निकल गया।

बहरहाल, सत्ता और सरकार की कोई गलती नज़र नहीं आती। सत्तर साल के बाद एक आदमी की जेब में उसकी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं है तो यह उसकी गलती है। यदि वह गरीब है तो उसने शादी क्यों की ? वह वोटर है वोटर की तरह रहे आदमी बनने की कोशिश न करे। यही सिस्टम के साथ बगावत माना जाता है। सिस्टम के साथ बगावत करने का अर्थ है कि माओवादियों की सूची में नाम दर्ज हो जायेगा। आदिवासी होने का अर्थ तो वैसे भी माओवादी होना ही होता है। आदिवासी गरीब हो तो स्वाभविक है। वह भूख से मरे तो नेचुरल है। वह बारह किलोमीटर अपनी पत्नी की लाश लेकर चले तो दुस्साहसी है।

यह दुस्साहस ,टीवी न्युज के लिए, समाचार बेचने के लिए, साहित्यिक सामग्री के लिए और चुनाव प्रचार के लिए तो ठीक है लेकिन सिस्टम के खिलाफ खड़ा होने की बात गलत है। सिस्टम आज न कल तो सुधर ही जायेगा। इंतजार करना ही सच्चा लोकतंत्र है। यह सरकार आई चली जायेगी। दूसरी आकर चली जायेगी। सत्तर साल गुजरे हैं। एक सौ सत्तर साल गुजर जायेंगे। धैर्य रखो दाना मांझी।

यह कथा तुम्हारी लोगों ने देख ली नहीं तो अनेक दाना होंगे जो चुपचाप अपनी पत्नी की लाश कंधे पर लिये चल रहे होंगे। खैर, पत्र लंबा हो रहा है। टी वी पर आने के लिए बधाई। अब सारी बहस दाना मांझी पर होगी आदिवासी जीवन या कालाहंडी पर नहीं। जय हिंद जय भारत।


                                                शशिकांत सिंह 'शशि'
                                                            जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल-skantsingh28@gmail.com

29 अगस्त खेल दिवस पर विशेष...
खेल संघों में न हो नौकरशाही और राजनीति
० ठोस और पारदर्शी रणनीति की जरूरत


ओलंपिक खेलों के 31वें आयोजन ने हमें इस चिंतन में डाल दिया है कि क्या वास्तव में इस लायक भी नहीं रहे कि एक स्वर्ण पदक पाकर भी गर्व का अनुभव कर सकें! इससे पूर्व सन 2012 में संपन्न ग्रेड ब्रिटेन ओलंपिक ने हमने पहली बार दो रजत और चार कांस्य पदक के साथ कुल 6 पदक पाकर आगामी ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन करने की कसमें खाई थी। इससे एक कदम और पूर्व 2008 में 29वें ओलंपिक आयोजन में बीजिंग में हमने निशानेबाजी में स्वर्ण जीतकर एक नई उम्मीद की जगाई थी। अभिनव बिंद्रा ने अपने निशानेबाजी का लोहा मनवाते हुए स्वर्ण पदक प्राप्त देशों की सूची में भारत वर्ष का नाम जुड़वा दिया। पिछले दो ओलंपिक की तुलना में रियो का 31वां ओलंपिक आयोजन हमारे के लिए शर्मनाक स्थिति का पर्याय रहा है। वह तो थोड़ी किस्मत अच्छी थी कि पीवी सिंधु और साक्षी मलिक ने क्रमश: बैडमिंटन और कुश्ती में रजत और कांस्य जीतकर देश की मिट्टी पलीद होने से बचा लिया। पिछले 3 आयेाजनों में हमने लगातार अपने खेलों और खिलाडिय़ों की कमर टूटते ही देखा है। अब पुन: उस राग को अलाप रहे है कि 2020 के 32वें ओलंपिक टोक्यो में अपनी गलतियों को सुधारते हुए अच्छा प्रदर्शन करेंगे।


भारतवर्ष में खेलों को महत्व देने और खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के उद्देश्य से ही सन 1982 में ‘खेल एवं युवक कल्याण मंत्रालय’ की स्थापना की गयी थी। मुझे नहीं लगता कि अपनी स्थापना के 34 वर्षों बाद भी हम मंत्रालय सरकार की मंशा पर खरा उतरा हो। इस मंत्रालय के अस्तित्व में आने से पूर्व 1970-71 में भारत सरकार के युवा मामले एवं खेल विभाग द्वारा ‘ग्रामीण खेल कार्यक्रम योजना’ ने भी अमलीजामा पहना था। 46 वर्ष बाद उक्त योजना का योगदान खेलों के निखारने में कितना रहा है। इसे ज्यादा बताने की जरूरत शायद नहीं है। कारण यह कि स्थिति आईने की तरह साफ है। खेलों में विशेष कुछ न कर पाने का दर्द समय समय पर योजनाकारों को कुरेदता रहा है। खेलों को वास्तव में संस्कारों की कड़ी मानते हुए सन 1984 में बनायी गयी ‘राष्ट्रीय खेल नीति’ को संशोधित और पुष्ट करते हुए सन 2001 में नई राष्ट्रीय खेल नीति बनायी गयी। इस खेल नीति ने भी खेलों को कितना बढ़ावा दिया, अथवा कितने प्रतिभाशाली खिलाड़ी पैदा किये यह भी स्पष्ट है। इतना जरूर हुआ कि खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए बनायी गयी इन योजनाओं ने खिलाडिय़ों के हौसले जरूर बढ़ाए किंतु लक्ष्य को पाने में हम हर क्षेत्र में असफल ही रहे हैं।


अत्याधुनिक युग में जीवन यापन कर रहे आम लोगों को इस बात पर विश्वास करना होगा कि खेलों का महत्व न तो पहले कम था, और न ही आज। वर्तमान में परिवेश में व बदली जीवन शैली में आज मनुष्य अनेक रोगों से ग्रसित हो रहा है। खेलों द्वारा न केवल हमारी दिनचर्या नियमित होती है, बल्कि उच्च रक्तचाप, ब्लड शुगर, मोटापा, हृदय रोग जैसी बीमारियों की संभावनाएं भी कम होती है। खेल ही एक ऐसी विधा है जिससे हम स्वयं को चुस्त दुरूस्त रख पाते है। साथ ही खेलों कें हमारे अंदर सामूहिक चेतना का विकास होता है। कोई भी खेल अकेले ही नहीं खेला जा सकता है, अन्य साथियों का साथ जरूरी होने से ‘एकला चलो’ की आधुनिक मनोवृत्ति को खारिज कर हमें लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने में खेल का बड़ा सहयोग मिलता रहा है। खेलों के महत्व को समझने के बावजूद वर्तमान समय में खेलों का नकारात्मक पहलू यह है कि मनोरंजन के नये साधनों और भविष्य निर्माण की भाग दौड़ ने खेल मैदानों में उमडऩे वाली खिलाडिय़ों की भीड़ से लेकर दर्शकों तक की संख्या को कम कर दिया है। बच्चे हो या युवा घंटों वीडियो गेम या मोबाईल अथवा कम्प्यूटर पर खेल खेलना पसंद कर रहे है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और घटती नौकरियों ने हमारे युवाओं के माथों पर चिंता की लकीरों को गाढ़ा कर दिया है।


खेल संघों के गैर व्यवसायिक रवैय्ये से आधारभुत ढांचे का विकास नहीं हो रहा है। विकास हो भी तो कैसे? जिन खेल संघों, समितियों तथा संस्थाओं की बागडोर तपे हुए खिलाडिय़ों के हाथों सौंपी जानी चाहिए, वहां नौकरशाह तथा राजनेताओं का बोलबाला है, जिन्हें न तो खेलों की ‘एबीसीडी’ ही आती है और न ही वे यह जानते है कि खेलों की आत्मा क्या होती है? अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न तो हमारे पास संसाधन है और न ही अधोसंरचना। यही कारण है कि ओलंपिक जैसी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में हम एकमात्र स्वर्ण के लिए भी तरस जाते है। खेलों से जुड़ी डोपिंग जैसी विद्रूपताओं ने भी हमारी छवि को धुमिल किया है। शायद इन सारी कमियों को देखते हुए ही सन 1984 में एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में ‘भारतीय खेल प्राधिकारण’ ‘साई’ का गठन खेलों में सुविधाएं बढ़ाने एवं बेहतर प्रबंधन के उद्देश्य से किया गया था, किंतु उसकी भी दुर्दशा या राजनीतिकरण किसी से छिपी नहीं है। खेलों के विकसित करने में जहां सरकारी स्तर पर उदासीनता है, वहीं निजी क्षेत्र भी अपने दायित्वों से भाग रहे हैं।


हमारे देश में खेलों की स्थिति नहीं सुधारी जा सकती, ऐसा मैं नहीं मानता। जहां तक मैं समझता हूं हर खेल विधा में अपना लोहा मनवाने हमें सबसे पहले खेल संघों को राजनीति और नौकरशाहों के शिकंजे से मुक्त करना होगा। वास्तव में देखा जाए तो खेलों को समस्या के जाल में केंद्रीय खेल संघों के गैर जवाबदेह रवैये ने ही उलझाया है। इसे दूर करने के लिए  सूक्ष्म निगरानी एवं सुधारों के उद्देश्य से एक केंद्रीय मॉनिटरिंग संस्थान की स्थापना जरूरी दिखाई पड़ रही है, जो हम अब तक नहीं कर पाये है। भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए आगामी प्रतिस्पर्धाओं में निराशाजनक प्रदर्शन से बचने के लिए हमें ठोस पारदर्शी और दीर्घावधिक रणनीति के तहत योजनाएं बनानी होगी। यदि हमने अपने ऐसे ही प्रयासों अथवा संकल्पों को पंख लगाने का काम पूरा कर लिया, तो निश्चित रूप से विश्व मंच पर अपने देश की प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा पाऐंगे।

                                            
                                                   (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                               जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                                मो. नंबर 94255-59291

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