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प्राची - जुलाई 2016 / उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन / सुमन

शोध आलेख

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन

सुमन

''उत्पना द्राविडे साहं वृद्धि कर्नाटके गता

क्वाचित् क्वाचित् महाराष्ट्रे गुर्जर जीर्णतां गता.

तत्र धीरे कलेयोगात पाखण्डे खण्डिताक का.

दुर्बलांह चिरंयाता पुत्रम्याम् सह मन्दताम्.

वृंदावनं पुनः प्राप्य नवी नैव सरूपिणी.

जांत युवती, सम्यक् श्रेष्ठ रूपा तु सांप्रतम्...''

''श्रीमद्भागवत्माहात्म्य' में वर्णित इस श्लोक में भक्ति एवम् भक्ति आंदोलन के प्रवाह को इंगित किया गया है. इस श्लोक से ज्ञात होता है कि भक्ति का उदय द्रविड़ देश में हुआ और भक्ति को दक्षिण से उत्तर तक जाने में अनेक पड़ावों का सामना करना पड़ा और भक्ति कर्नाटक, महाराष्ट्र में विकसित होकर गुजरात में आकर जीर्ण हो गई. पुनः वृंदावन में संजीवनी रस पाकर लहलहा उठी और यहीं से श्रेष्ठता को प्राप्त हुई.

भारतीय मध्यकाल का भक्ति-आंदोलन न केवल हिंदी साहित्य बल्कि भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना है, बल्कि यह आंदोलन अपने समय और समाज के लगभग सभी आयामों को स्पर्श करता है और मध्ययुगीन जड़ता के दौर में प्रगतिशील विचारों को प्रस्तावित करता है. यह ऐसा आंदोलन है, जिसमें समूचा देश और उसके लोग, क्षेत्र, भाषा, जाति,

धर्म-संप्रदाय आदि का भेद मिटाकर इसमें एक साथ शिरकत करते हैं. जाहिर है कि इस आंदोलन की व्यापकता और महत्ता को देखते हुए, इसके उद्भव और विकास के कारणों पर प्रकाश डाला जाए. प्रसिद्ध आलोचक डॉ. शिवकुमार मिश्र से संकेत किया है कि भारत में ऐसे दो बड़े आंदोलन हुए, जो एक समग्र राष्ट के रूप में भारत की पहचान कराते हैं. इनमें प्रथम है भक्ति आंदोलन एवम् द्वितीय है भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन. इनमें से भी भक्ति आंदोलन को महत्वपूर्ण एवम् युगांतरकारी माना गया है, तो इसलिए कि यह एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन है. वस्तुतः यही कारण है कि इस आंदोलन को लेकर विद्वानों में कोई एक राय नहीं है. विद्वानों की राय जानने से पूर्व भक्ति आंदोलन के उद्भव और विकास के कारणों को अवश्य जान लिया जाना चाहिए.

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रादुर्भाव में तत्कालीन सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की विशेष महत्ता रही है. थानेश्वर के राजा हर्षवर्धन सम्पूर्ण उत्तर भारत के अंतिम हिंदू सम्राट थे. उनकी मृत्यु के पश्चात् अराजकता की स्थिति व्याप्त हो गई और परिणाम स्वरूप उनका राजवंश और राज्य दोनों ही धराशायी हो गए थे. उत्तर भारत को विलासिता, हिंसा, युद्ध, उत्पीड़न, शोषण, विच्छृखंलता, अहमन्यता तथा धर्मिक अंधविश्वासों एवम् रूढ़ियों ने शक्तिहीन कर दिया था. इस अराजकता और अनेकता का लाभ उठाकर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने उत्तर भारत में शासन की बागडोर संभाल ली और अपने इस्लामिक सिद्धातों के प्रचार-प्रसार में सफल हुए.

हिंदू समाज जाति-पांति, भेदभाव, छुआछूत, अंधविश्वास, छोटी-छोटी जागीरों में विभाजन, सर्वेसर्वा राजा, सामंती राज में किसान, बुनकर, कुम्हार, माली, मोची, जुलाहा, दलित, पीड़ित, उपेक्षित जनता विशेषकर नारी आदि की कुत्सित हालत, बौद्ध धर्म की विकृ्तियां, तांत्रिक साधना, कौलमार्ग की गुह्यसाधना, इस्लामिक संस्कृ्ति का दबाव आदि के कारण हिंदू जनता के धर्म एवम् संस्कृ्ति के पतन का खतरा कायम हो गया था. हिंदू जनता विशेषकर निम्न, दलित जनता के मन में विद्रोह और नई सामाजिक व्यवस्था को कायम करने का उत्साह जगा और इस उत्साह को उस समय व समाज के निर्गुण एवम् सगुण दोनों भक्ति काव्यधारा के संतों ने अपने नेतृ्त्व में पल्लवित व पुष्पित किया जिसने आगे चलकर स्वतः स्फूर्त भक्ति आंदोलन की नींव बनकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. मुक्तिबोध जी स्वयं कहते हैं-

''भक्ति आंदोलन का जन साधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आंदोलन का नहीं. पहली बार शूद्रों ने अपने संत पैदा किये. अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किये. कबीर, रैदास, नाभा, सीपि, सेना, नाई आदि ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यंभावी था.''1

इस प्रकार ''जाति-पाति पूछै नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई'', कहने वाले, दलितों की मुक्ति का स्वर मुखरित करने वाले निर्गुण काव्यधारा के संत कबीरदास जी, 'अगुनहि सगुनहिं नहीं कछु भेदा' कहने वाले तुलसीदास जी हों या प्रेम से जनता को जागृ्त करनेवाले सूफी संत मलिक मुहम्मद जायसी हों और वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म और सम्प्रदाय की संकुचित धारणाओं पर कड़ी चोट करनेवाले सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव जी हों और स्त्री मुक्ति का स्वर बुलंद करने वाले सूरदास और मीरा आदि लोक विरोधी संत नहीं लोक कल्याणकारी संतों ने भक्ति आंदोलन में अविस्मरणीय योगदान दिया है.

''सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।''

(दुष्यंत कुमार)

इस अविस्मरणीय योगदान के विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता हैः

''इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर आकर जनता के उस बड़े भू-भाग को संभाला जो नाथपंथियों के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्तित्व से शून्य और शुष्क पड़ता जा रहा था. उनके द्वारा यह बहुत आवश्यक कार्य हुआ. इसके साथ ही मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्मगौरव को जगाया और भक्ति के ऊंचे से ऊंचे सोपान की ओर बढ़ाने के लिए बढ़ावा दिया.''2

जैसा कि पहले भी जिक्र किया जा चुका है कि भक्ति-आंदोलन के उद्भव को लेकर विभिन्न आलोचकों की अलग-अलग राय रही है. इनमें सबसे पहले विद्वान डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन का नाम आता है जिन्होंने इस परिघटना के उत्स के विषय में लिखा हैः

''समस्त भारतीय मत-मतांतरों के अंधकार के ऊपर भक्ति एक बिजली की कौंध की तरह दिखाई देती है. कोई हिंदू यह नहीं जानता था कि यह कहां से आई. इसके पहले भारत ने शायद ही इतने विराट आंदोलन को देखा हो.''3

डॉ. ग्रियर्सन के इस विचार से ऐसा लगता है कि वे भक्ति की व्यापकता से परिचित तो हो गए थे, परंतु दुर्भाग्यवश वे इसे ईसाइयत की देन ही मानते रहे. इसका कारण यह है कि वे प्रेम, करुणा, सेवा तथा अहिंसा आदि को ईसाइयत से जोड़ते हैं. परन्तु यह सही नहीं है, क्योंकि ये सभी तत्व हमारी भारतीय संस्कृ्ति में पहले से ही मौजूद हैं और दया व करुणा को गौतम बुद्ध जी बहुत पहले ही व्यक्त कर चुके थे. वैसे भक्ति आंदोलन की पहचान डॉ. ग्रियर्सन ने सबसे पहले की है. उनकी इस बड़ी उपलब्धि को भुलाया नहीं जा सकता. भक्ति आंदोलन के मूलाधार भारतीय संस्कृ्ति है. इसके पक्ष में डॉ. गोपेश्वर सिंह अपनी राय इस प्रकार व्यक्त करते हैंः

''किसी भी आंदोलन या प्रवृ्त्ति के मुख्य और मूल कारण वहां की ठोस भौतिक परिस्थितियों की देन होते हैं. एक क्षेत्र से किसी आंदोलन के पौधे को लाकर तब तक दूसरे क्षेत्र में नहीं लगाया जा सकता, जब तक वहां की मिट्टी और हवा के अनुकूल न हो.''4

यहां शुक्ल जी का यह मत ''भक्ति द्रविड़ उपजी'' खारिज होता जान पड़ता है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस आंदोलन के उदय के दूसरे व्याख्याकार हैं. शुक्ल जी ने भक्ति-आंदोलन एवम् भक्ति साहित्य को हतोत्साहित और पराजित हिंदू जनता की प्रतिक्रिया माना. उन्होंने लिखा हैः ''देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने से हिंदू जनता में गौरव, गर्व और उत्साह का वह अवकाश न रह गया. उनके सामने ही उनके आस्था के केंद्र तोड़े जा रहे थे...ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत ना तो वे गा सकते थे और न ही लज्जित हुए बिना उन्हें सुन सकते थे. और अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की भक्ति और करुणा की ओर जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था.''5

स्पष्ट है कि शुक्ल जी की इतिहास दृष्टि के केंद्र में युगीन परिस्थितियों की प्रमुखता है, इसीलिए यदि वे इसे एक ओर इस्लामिक आक्रमण से जोड़ते हैं तो दूसरी ओर इसे दक्षिण भारत से आया हुआ मानते हैं.

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शुक्ल जी के विचारों की प्रतिक्रिया में ही अपने विचार प्रस्तुत करते हैं. उनका मानना है कि जब मुसलमान हिंदुओं पर अत्याचार करने लगे तो हिंदू जाति निराश होकर भगवान के भजन में लीन हो गई. यह अत्यंत हास्यास्पद बात है. दूसरी बात यदि मुस्लिम आक्रमण इसके उद्भव का कारण होता तो इसे दक्षिण की बजाय सबसे पहले पंजाब व सिंधु में शुरू होना था. उनका यह भी मानना है कि भक्ति अचानक बिजली की चमक के समान भी नहीं फैली, बल्कि इसके लिए भारतीय आकाश पर बहुत पहले से मेघखंड एकल हो रहे थे जिसे डॉ. ग्रियर्सन नहीं देख पाए. कोई भी घटना अचानक नहीं घटती. उसके उद्भव के बीज पहले ही रोपित हो चुके होते हैं, जो अनुकूल हवा-पानी पाकर अंकुरित होते हैं.

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने भक्ति आंदोलन को भारतीय चिंतनधारा का स्वाभाविक विकास बताया और उन्होंने यह भी माना कि यदि मुसलमान ना भी आते तो भी भक्ति का स्वरूप बारह आना वैसा ही होता. यानि चार आने का श्रेय तो वे भी इस्लाम को देते जान पड़ते हैं. डॉ. नामवर सिंह इस चार आने का हिसाब लगाते हुए कहते हैः

''मध्ययुग का मुख्य अंर्तद्वंद्व शास्त्र व लोक के बीच का द्वंद्व है न कि इस्लाम और हिंदू धर्म के संघर्ष का.''6 द्विवेदी जी शास्त्र की इसी लोकोन्मुखता को भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि मानते हैं.

वैसे कुछ भी हो इतना तो तय है कि भक्ति आंदोलन हताशा और निराशा का परिणाम नहीं है. 'संतन को कहां सीकरी सो काम' और 'अबका तुलसी होएंगे नर के मनसबदार' जैसी भावनाओं को व्यक्त करने वाले भक्त संतों/कवियों में एक साहस, जोश, आत्मविश्वास है, इस आंदोलन में एक उमंग है जिसे हताशा के साथ नहीं जोड़ा जा सकता.

भक्ति आंदोलन के उदय को लेकर एक दूसरा मत इतिहासकार डॉ. ताराचंद, डॉ. हुमायूं कबीर और आबिद हुसैन जैसे विद्वानों का है जिन्होंने भक्ति आंदोलन को इस्लामिक प्रभाव से जोड़कर देखा है, किंतु इनका मत भी बहुत एकांगी और एकपक्षीय है. इस तरह का दृ्ष्टिकोण डॉ. रामविलास शर्मा और इरफान हबीब जैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों का भी है, जिन्होंने इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक कारणों को उत्तरदायी माना है. इनका मानना यह है कि इस आंदोलन की मूल विशेषता इसका जनवादी स्वर है. सामंती उत्पीड़न, वर्ण-व्यवस्था, पुरोहितवाद तथा विशेषाधिकारों के विरोध का स्वर इस आंदोलन में सुना जा सकता है.

इस प्रकार सभी आलोचकों के मतों को देखकर यही लगता है कि भक्ति-आंदोलन के उद्भव के पीछे कोई एक नहीं बल्कि कई कारणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. भक्ति भारतीय परंपरा में निरंतर प्रवाहमान रही है. जिसका मूल ोत भारतीय संस्कृ्ति में देखा जा सकता है.

समग्रतः यह कहा जा सकता है कि भक्ति आंदोलन थकी हारी जनता की हताश मनोवृ्त्ति की प्रतिक्रिया नहीं है और ना ही यह कोई आकस्मिक घटना थी. वस्तुतः यह भारतीय भक्ति परंपरा का स्वतःस्फूर्त विकास है जिसे अलवार संतों की भावमयता, सिद्धनाथ संतों के योगमार्ग और वैष्णव आचार्यों के दार्शनिकता से बल मिला. इन सबसे ऊर्जा लेकर यह आंदोलन विकसित हुआ. वैसे इस्लाम की चुनौतियों ने इसके तीव्र प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर दिया.

प्रत्येक परिघटना या आंदोलन अपने पीछे कई पुख्ता सवालों को जन्म देती है. बुद्धिजीवियों या विचारकों के मस्तिष्क में उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ निकालने की जिरह भी जारी है. एक और अहम् सवाल यह है कि क्या यह एक कोरा धार्मिक आंदोलन है?

हिंदी साहित्य में भक्तिकाल और भक्ति आंदोलन को कई बार धार्मिक आंदोलन के रूप में देखने का प्रयास होता रहा है. और यही वजह है कि इसे महज भजन और कीर्तन का आंदोलन मान लिया जाता है. जबकि सचाई यह है कि धार्मिक आवरण में अभिव्यक्त होने वाला यह आंदोलन कोरा धार्मिक आंदोलन नहीं है बल्कि इसका एक सामाजिक-सांस्कृ्तिक पक्ष भी है. इस आंदोलन की महत्ता इस बात से है कि यह धर्म में अभिव्यक्त होकर भी इससे कहीं आगे निकल जाता है. यह वस्तुतः मानवीय सरोकारों का आंदोलन है, जिसकी अनुगूंज समूचे देश में सुनी जा सकती है.

भक्ति-आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता और विडंबना यह है कि वह धर्म के आवरण में अपना स्वरूप ग्रहण करता है. चूंकि इसका बाहरी स्वरूप धार्मिक है, अतः इसे इसी रूप में पहचाना जाता है. किंतु इसके धार्मिक होने के पीछे कई सारे युगीन कारण विद्यमान रहे हैं. भक्ति आंदोलन मध्ययुगीन भारत की महत्वपूर्ण परिघटना है. चूंकि मध्ययुगीन जीवन के केंद्र में धर्म है, अतः जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उसके प्रभाव को देखा जा सकता है. सचाई तो यह है कि इस समय तक धर्म अपना एक सामाजिक गुण प्राप्त कर चुका था और उसे इस समय और समाज के सभी गतिविधियों में पूर्ण स्वीकृ्ति मिल चुकी थी. असल में भारत ही नहीं बल्कि मध्यकाल में समूचे यूरोप व विश्व के अन्य देशों में भी

धर्म की एक विशेष भूमिका नजर आती है.

एंगेल्स ने अपनी पुस्तक 'लुडविन फायरलॉख' में लिखा है कि मध्यकाल में धर्म के साथ विचारधारा के अन्य रूपों दर्शन, राजनीति, विधि आदि सभी को जोड़ दिया था और उन्हें धर्म की उपशाखा बना दिया था. जाहिर है कि ऐसे में उभरकर आने वाला कोई भी जनतांत्रिक आंदोलन धर्म की चाहरदीवारी के भीतर ही अपनी अभिव्यक्ति पा सकता था. इस समय आम जनता की भावनाओं को धर्म से जोड़कर व्यक्त किया गया. इस प्रकार ऐसे परिवेश में भक्ति आंदोलन पर धर्म का हावी होना बहुत स्वभाविक था.

धर्म यदि वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति है तो वह वास्तविक पीड़ा के विरुद्ध प्रतिरोध की अभिव्यक्ति भी है. यह न केवल आश्रय देता है, बल्कि संकल्प का सहारा बनकर भी सामने आता है. भक्तिकाव्य में हम धर्म की इसी अभिव्यक्ति को पाते हैं. श्री के. दामोदरन भी इस आंदोलन के धार्मिक स्वरुप की व्यापकता की ओर इंगित करते हुए कहते हैः

''अपने विकास की एक विशेष अवस्था में धर्म सामाजिक गुण प्राप्त कर लेता है और इतिहास की आर्थिक और सामाजिक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले बन जाता है. इसी रूप में आर्यों के देवताओं ने जो प्रारंभ में प्रकृति की शक्तियों का मूर्तिकरण करते थे, सामाजिक महत्व और सामाजिक गुण अर्जित कर लिए. इस रूपांतरण से लोगों को एक हद तक सांत्वना और काल्पनिक सुख भी मिला और जीवन की कठिनाईयां झेलने में उन्हें आसानी मालूम हुई.''7

धर्म के खिलाफ धर्म का प्रयोग इस काल में केवल हिंदू

धर्म मे ही नहीं हुआ, बल्कि अन्य धर्मों में भी ऐसे ही परिवर्तन का वातावरण बन रहा था. यही वजह है कि यदि सनातन हिंदू धर्म के बाह्यांडबरों के विरुद्ध वैष्णव भक्त संतों ने आवाज लगायी तो इस्लाम की कट्टरता के विरुद्ध सूफियों का आंदोलन चला, ईसाई रहस्यवादी संत अपने धर्म की बुराईयों के विरुद्ध उठ खड़े हुए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस युग में सभी धर्मों में एक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई जो वस्तुतः समय की मांग थी.

धर्म में आस्था या उसे आधार बनाकर कोई आंदोलन खड़ा करना हमेशा सामाजिक प्रगति के प्रतिकूल नहीं रहा है. 19वीं सदी का नवजागरण आंदोलन इसका एक अच्छा उदाहरण है. भक्ति आंदोलन भी किसी संप्रदाय के प्रचार-प्रसार के रूप में सामने नहीं आता. बल्कि वह धार्मिक रूप से शिक्षित होकर अपनी प्रगतिशील भूमिका में सामने आता है. यही वजह है कि यह धर्म के आवरण में होकर भी धार्मिक चौखटों को लांघकर मानवीय संवेदनाओं से जुड़ जाता है.

अगला प्रश्न उठता है कि भक्ति आंदोलन की मूलवर्ती चेतना क्या है? भक्ति आंदोलन के मूल में प्रगतिशील चेतना रही है.

साधारण जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप यह आंदोलन एक शक्तिशाली सामंत-विरोधी चेतना को लिये हुए था जो धर्म को भी अपने अधिकार में किये हुए था. इस चेतना के विषय में 'मुक्तिबोध' का अपना स्वतंत्र विचार यह थाः

''भक्ति आंदोलन को मूलतः उच्चवर्गों तथा ऊंची कही जाने वाली जातियों के खिलाफ निम्न वर्गों तथा जातियों के आवश्यक विद्रोह के रूप में देखा है...कबीर तुलसीदास आदि संतों के अध्ययन के लिए यह सर्वाधिक आवश्यक है. मैं इस ओर प्रगतिवादी क्षेत्रों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं.''8

यहां भी मुक्तिबोध जी इस आंदोलन के पीछे प्रगतिशील चेतना और प्रगतिवादी संतों या कवियों का ही योगदान मानते हैं, जिसे भारत की करोड़ों जनता का समर्थन मिला और सामान्य जनता धर्म, जाति व संप्रदाय आदि का भेद मिटाकर इसमें शामिल हो गई. यह चेतना और ऐसे संतों की आवश्यकता आज भी जान पड़ती है. आज भी निम्न-वर्ग, स्त्री-वर्ग, दलित एवम् शोषित को एकजुट होने की आवश्यकता है.

इस आंदोलन ने निम्न-वर्गीय जनता को आत्म गौरव प्रदान किया, उन्हें जागृ्त किया. समानता का अधिकार और अनेक प्रकार से अन्य धार्मिक अधिकारों की बात करने वाले इस आंदोलन के बिखरने के आखिर क्या कारण थे? यह आंदोलन बाद में उच्च वर्गों के हाथों में पहुंच गया था और सामंती युग फिर से अपनी जड़ों की मजबूती के साथ खड़ा हो गया और ब्राह्मणवाद फिर से अपना सिर उठाकर खड़ा हो गया. इस आंदोलन के ताप को आगे बरकरार न रख पाने के मूलवर्ती कारणों के विषय में डॉ. शिवकुमार मिश्र लिखते हैं-

''भक्ति आंदोलन के अपने मूलवर्ती ताप को खो देने के कुछ और भी कारण है, मसलन, उच्च वर्गों के हाथ में उसका नेतृ्त्व जाने के परिणामस्वरुप सामंती ताकतों का पुनः अपने को मजबूत करना और संगठित होना. यही नहीं, निम्न वर्गों के बीच से पैदा हुए सेनाध्यक्षों और नेताओं का नए सामंती घराने गठित करना और इस प्रकार ब्राह्मणवाद को पुनः सिरमौर बनाकर पूजना. जिस सामंतवाद को ढहना था उसे ताकत नहीं मिली कि ब्राह्मण और ब्राह्मणोत्तर की भावना फिर से प्रतिष्ठित हो गई और निर्गुण मत की निम्न-वर्गीय जनवादी रुझान तथा दिशा को समाप्त हो जाना पड़ा.''9

श्री के. दामोदरन ने प्रगतिशील चेतना के बिखरने के कारणों को ही भक्ति-आंदोलन के बिखरने के मूल कारण बताये. उन्होंने कहाः ''यह आंदोलन सदा के लिए सामाजिक असमानताओं और जाति प्रथा से उत्पन्न अन्यायों को खत्म नहीं कर सका, तो संभवतः इसका कारण यह था कि कारीगर, व्यापारी और दस्तकार जो इस आंदोलन का मुख्य आर्थिक आधार थे, अब भी कमजोर और असंगठित थे. इससे पहले कि उदीयमान पूंजीपति वर्ग एक वर्ग के रूप में अपना पूर्ण विकास प्राप्त करें, ब्रिटिश पूंजीपतियों ने देश को जीतकर अपने कब्जे में कर लिया और उसे ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग बना लिया.''10

अतः लगभग तीन सौ वर्षों तक भारतीय जीवन को अनुप्राणित करने वाला यह भक्ति आंदोलन एक महान ऐतिहासिक तथा सांस्कृ्तिक, धार्मिक और राजनीतिक परिघटना है. इस आंदोलन में धर्म, समाज, संस्कृ्ति और यहां तक कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित होना पड़ा. इसमें व्यापक जनाधार की दृ्ष्टि से इसमें देश की करोड़ों-करोड़ जनता विभिन्न भू-भागों, प्रांतों, जातियों और संप्रदायों का भेद मिटाकर एक साथ शिरकत करती है. यही कारण है कि इसे मध्ययुग के एक महान जन आंदोलन की संज्ञा भी दी गई है.

भक्ति आंदोलन देश और काल में दीर्धकाल तक व्याप्त आंदोलन था. आज भी भारतीय मानस पर इसका बहुत गहरा प्रभाव होने के कारण स्त्रियां अपने अधिकारों के प्रति अपनी आवाज बुलंद करती हैं. इसका एक सशक्त उदाहरण हाल ही में हुए केरल का 'सबरीमाला मंदिर मामला' है जिसमें स्त्री मंदिर में प्रवेश पाने के लिए प्रयास आज भी कर रही हैं. उन्हें घरों में ही कैद करके रखा जाता रहा है. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने तुच्छ स्वार्थी ब्राह्मणों को फटकारते हुए कहा किः

''हम इस मामले पर संकीर्ण दृ्ष्टिकोण नहीं अपना रहे हैं. हम समानता के अधिकार और धार्मिक परंपरा के अधिकार के बीच संवैधानिक संतुलन कायम करना चाहते हैं. जब वेदों ने भेद नहीं किया तो आप कौन होते हो?''11

स्त्री-स्वतंत्रता के पीछे भक्ति आंदोलन का भी योगदान रहा है और डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी भी इसे स्वीकारते हैं और लिखते हैंः

''भक्ति आंदोलन नारी को घर छोड़कर बाहर आने की प्रेरणा देता है. घर जो नारी-पराधीनता का मध्यकाल में एक प्रतीक बन गया था और आज भी बहुत दूर तक बना हुआ है. धर्म के ही नाक पर सही वह नारी को भी पुरुष का सहभागी बनाकर इस क्षेत्र में उतरता था.''12

''कहीं सर्द खूं में तड़पती है बिजली

इस जमाने का रद्दो बदल कोई लाए''

-शमशेर बहादुर सिंह

सन्दर्भ ग्रन्थः

1 नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंधः गजानन माधव 'मुक्तिबोध', राजकमल प्रकाशन, पृ्ष्ठ संख्या-88

2 जायसी ग्रंथावलीः सं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृ. सं.-1

3 हिंदी साहित्य का इतिहासः आचार्य रामचंद्र शुक्ल, राजकमल प्रकाशन

4 भक्ति आंदोलन का सामाजिक आधारः डॉ. गोपेश्वर सिंह, भारतीय प्रकाशन संस्थान, पृ्. सं.-21

5 हिंदी साहित्य का इतिहासः सं. रामचंद्र शुक्ल, पृ. सं. 39

6 प्राचीन साहित्य का इतिहासः डॉ. राजेश श्रीवास्तव शंबर, कैलाश पुस्तक सदन, पृ. सं.-91

7 भक्तिकालीन कविताः यथार्थ सम्प्रेषण एवम् विश्लेषण- डॉ. क्रांति राजौरिया, पृ्.-25

8 भक्ति आंदोलन का सामाजिक आधारः सं. डॉ. गोपेश्वर सिंह, पृ्. सं.-118

9 भक्तिकालीन कविताः यथार्थ सम्प्रेषण एवम् विश्लेषण-डॉ. क्रांति राजौरिया, पृ्. सं.-31

10 वही, पृ्. सं.-32

11 'जनसत्ता' हिंदी समाचार पत्र, दिनांक 25 जनवरी, 2016.

12 मीरा का काव्यः डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ्. सं.-33, वाणी प्रकाशन

सम्पर्कः 463/7 अशोक मोहल्ला,

भूतों वाली गली, नांगलोई दिल्ली-110041

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