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प्राची - जुलाई 2016 / 'आज के अतीत' की वस्तुपरकता / डॉ. सुचिंता कुमारी

शोध आलेख

'आज के अतीत' की वस्तुपरकता

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डॉ. सुचिंता कुमारी

भीष्म साहनी की आत्मकथा ''आज के अतीत'' की कथावस्तु बहुत ही रोचक, प्रभावपूर्ण एवं सारगर्भित है. इनकी आत्मकथा की बनावट बहुत ही सरल एवं बोधगम्य है. इसमें न कोई क्लिष्टता है और न ही उलझाव भरी शिल्प योजना ही. बल्कि यह तत्व पंजाबी के प्रयोग से लेखक ने कथावस्तु के भावनात्मक बहाव को सुरक्षा प्रदान की है. भीष्म स्वयं कहते हैं- मैं जहां घरेलू बोलचाल की हिंदी में अपनी बात नहीं कर सकता, वहां मैं पंजाबी भाषा का प्रयोग करता रहा हूं . पंजाबी शब्दों, वाक्यों आदि का प्रयोग करना मेरी समझ में सही रहा है क्योंकि इससे भावनात्मक बहाव बना रहता है.1

कथा का आरम्भ, मध्य एवं अंत तीनों के सम्मिश्रण को यथावत अनुभव किया जा सकता है. कहीं भी ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि कथा में कोई घटना संदर्भ जबरदस्ती डाले गए, बल्कि वे कथावस्तु की निरंतरता एवं प्रभावोत्पादकता के लिए सहज प्रतीत होते हैं.

कथा का आरम्भ भीष्म जी ने अपने बालपन के दिनों से कुछ इस तरह करते हैं- ''कहां से शुरू करूं? उन दिनों से, जब मैं छोटा-सा अबोध बालक, गली-गली, सड़क, आवारा घूमता-फिरता था. एक गली से दूसरी गली, निरुद्देश्य...

''वह मेरा सर अपने घुटनों में दबोचकर, मेरे मुंह में लाल मिर्च की चुटकी डालने के लिए मानो पहले से तैयार बैठी होती."

भीष्म चार भाई-बहनों में सबसे छोटे, नटखट घुमक्कड़ी स्वभाव के थे. इन्हें घूमने का लत ऐसा था कि वे स्वयं इधर-

उधर भटक जाते और घरवाले उन्हें ढूंढ़-ढूंढ़ कर वापस लाते. इस स्वभाव की वजह से उनके पिता ने उनके गले में ''बिल्ला" टांग देते थे. लेखक बताते हैं- आखिर मेरे पिताजी ने पीतल का गोल-सा बिल्ला मेरे गले में लटका दिया, जिस पर इस आशय के शब्द खुदे थे कि यह लड़का बाबू हरवंशलाल साहनी, छाछी मोहल्ला का बेटा है, जहां कहीं किसी को भटकता मिले, इसे घर पहुंचा दें.3

भीष्म जी का परिवार पेशावर का रहने वाला था, किन्तु वहां लूटपाट होने के कारण लगभग 20 वर्ष वहां रहने के बाद वे लोग रावलपिंडी में आ बसते हैं. जहां 5 बहनों के बाद उनके भाई बलराज साहनी तथा भीष्म का जन्म होता है. इनके पिता पुरुषार्थी, आशावादी एवं सादापन में विश्वास करने वाले व्यक्ति थे जिसका सीधा प्रभाव भीष्म जी पर पड़ता है. घर पर चार भाई-बहनों में भीष्म काफी दुबले, कमजोर एवं शैतानियों में आगे रहने वाले हैं. इन्हें बचपन से गुरुकुल में पढ़ने का बहुत शौक रहता है अतः इनके पिता दोनों भाई का दाखिला वहां करा देते हैं क्योंकि ''मेरे मन में बड़ा चाव था कि पीली धोती पहनूंगा...सपने देखता रहा था.''4

गुरुकुल की शिक्षा ज्यादा दिनों तक दोनों भाइयों को नहीं मिल पायी, क्योंकि वह घर से बहुत दूर था; अतः आर्य स्कूल में बलराज का चौथी तथा भीष्म का पहली कक्षा में दाखिला हो जाता है.

भीष्म के पिता आर्यसमाज के मंत्री थे, अतः आर्य समाज के वार्षिकोत्सव पर दोनों भाइयों को साथ लेकर जाया करते थे. वहीं पुस्तकों से सजे मेज लगे रहते थे और इन्हीं पुस्तकों के सम्पर्क में आकर भीष्म, प्रेम पच्चीसी, प्रेम द्वादसी, प्रेम प्रसून जैसी साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ते हैं तथा सुदर्शन के लिखे प्रहसन ''आनरेरी मजिस्ट्रेट'' को पढ़कर तो उनके मन में साहित्य तथा साहित्यकार के प्रति श्रद्धा का भाव जग जाता है. उसी वार्षिकोत्सव के दौरान लेखन सुदर्शन का व्याख्यान होता है. जहां भीष्म की आंखें सुदर्शन के दर्शन के अभिलाषी बन जाते है. वे स्वयं कहते हैं- ''मैं सचमुच उन्हें हीरो की तरह देख रहा था...जो व्याख्यान उन्होंने दिया उसका तो एक शब्द भी मेरे पल्ले नही पड़ा, मैं दूर ही दूर से एक भक्त की तरह उन्हें निहारता रहा था.''5

इस प्रकार भीष्म को साहित्य ने एक ओर प्रेरित किया तो दूसरी ओर उनके चरित्र में आर्यसमाज के संस्कार ने भी अपना स्थान बनाया.

साहित्य के साथ-साथ भीष्म स्कूलों में होने वाले नाटको में भी हिस्सा लेने लगते हैं. इन संपर्कों व छोटी-छोटी घटनाओं से इनका मानसिक विकास भी होने लगता है. परिणामस्वरूप लापरवाह, मस्तमौला भीष्म धीरे-धीरे भीरु स्वभाव के बन जाते हैं. एक ओर निरंतर बलराज से भीष्म की तुलना करने से इनके अन्दर हीनभावना भर जाती है. इस बात को पुष्ट करते हुए वे कहते हैंः

''अब सोचता हूं, इससे मेरे शुभचिंतकों का भी अच्छा-खासा योगदान रहा था, जो बात-बात पर मेरी तुलना बलराज से करते रहते...न जाने कब से और क्यों एक प्रकार की हीनभावना मेरे अन्दर जड़ जमाने लगी.''6

किन्तु यही हीनभावना धीरे-धीरे कुछ सीखने की और लगातार प्रेरित कर रहा था. और भाई बलराज के प्रति श्रद्धाभाव भी मन में भर रहा था क्योंकि भीष्म जी का मानना था कि मैं उसका अनुसरण करने लगा था और चूंकि वह मुझसे प्यार करता था, बड़े भाई का सारा वात्सल्य मुझ पर लुटाता था...इस नए रिश्ते को मेरे प्रति उसके स्नेह ने ओर भी मजबूत किया.7

अर्थात भीष्म की मानसिकता दूसरों की विशिष्टता को स्वीकारते हुए अपने को नगण्य मानने वालों जैसी होती जा रही थी. कथा में आगे इस बात की जानकारी दी गई है कि भीष्म जी को साहित्य लेखन उनके वंशजों से विरासत में मिली है. क्योंकि उनकी फुफेरी बहन जो कश्मीर में रहती थी, अक्सर छुट्टियों में रावलपिंडी आती थीं, जहां साहित्य का समां बंध जाता था तथा 18 वर्ष की अवस्था में भाई बलराज भी शेरो-शायरी करने लगे थे. अतः घर के साहित्यिक माहौल के कारण ही भीष्म का रुझान और अधिक साहित्य की ओर हुआ. इसके पश्चात् गवर्मेंट कॉलेज लाहौर में ही भीष्म दाखिला लेते हैं, जहां निरंतर नाटक आदि में हिस्सा लेते हैं जो उनके जीवन को काफी प्रभावित करता है. कुछ दिनों बाद भीष्म को अपने बहनोई श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकार के साथ लाहौर में रहने का मौका मिला. जहां उनका सम्पर्क अज्ञेय, देवेन्द्र सत्यार्थी, अश्क तथा प्रेमचंद जैसे लेखकों से होता है. इस प्रकार साहित्य के प्रति रुचि और जग जाती है. वहां रहते हुए प्रेमचंद की मृत्यु की खबर मिलती है, जिससे भीष्म काफी आहत होते हैं. इसके बाद एम.ए. की पढ़ाई खत्म कर वे रावलपिंडी लौट आते हैं. जहां पिता तथा भाई बलराज के साथ व्यापार में हाथ बंटाने लगते हैं. इस क्रम में गुलाम भारत जिस प्रकार गुलामी का दंश झेल रहा था और गहरे असंतोष से घिरा था. इसी प्रकार भाई बलराज साहनी अपने जीवन से काफी असंतुष्ट थे. भीष्म का मानना था कि ''यह असंतोष उस कालखंड की देन था. दिल में उठने वाली बलवती अभिव्यक्ति के लिए आतुर थे. साथ ही साथ किसी बड़े ध्येय के साथ जुड़ने की छटपटाहट थी. वह व्यक्तिगत जीवन के तंग घेरे में नहीं बने रहना चाहते थे. यह असंतोष किसी बड़े क्षेत्र में...अभिव्यक्ति के लिए छटपटा रहा था.''8

अतः बलराज व्यापार छोड़कर अपनी पत्नी के साथ लाहौर चले जाते हैं. अंततः भीष्म को न चाहते हुए भी व्यापार संभालना पड़ता है किन्तु निरंतर उनके मन में कुछ बातें घर करने लगती हैं कि इतना पढ़ने के बाद जीवन में बदलाव लाना चाहिए. कुछ करना चाहिए. वे स्वयं महसूस करते हैं. उस समय मुझे मालूम नहीं था कि मेरा जिन्दगी का कांटा बदल रहा है. घंटे-दो-घंटे का सौजन्य अध्यापन बाद में मेरा व्यवसाय बन जाएगा और कॉलेज में खेला गया पहला नाटक एक श्रृंखला की पहली कड़ी साबित होगा और मुझे देशव्यापी सांस्कृतिक आन्दोलन की और खींच ले जायेगा.9

इसके पश्चात ही वे निरंतर दिल्ली में रहने वाली फुफेरी बहन सत्यवती से सम्पर्क बनाकर साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करते हैं. तथा जैनेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, बनारसीदास चतुर्वेदी, वात्स्यायन आदि से सम्पर्क भी स्थपित करते हैं. सन् 1944 में भीष्म जी के जीवन में बहुत बदलाव आता है. पहले तो उनका विवाह शीला से होता है और दूसरा भारत-पाकिस्तान विभाजन की बात सामने आती है. इस बंटवारे वाली बात को लेकर सारा परिदृश्य बदलता नजर आता है, क्योंकि ''सामान्य जीवन बाहर से ज्यों का त्यों चल रहा था पर अन्दर ही अन्दर से दूरियां बढ़ने लगी थीं. जगह-जगह छोटे साम्प्रदायिक विस्फोट होने लग गये.''10

यह तनाव 6 जून को पाकिस्तान अलग बनाए जाने के एलान से दंगे में बदल जाता है. लोग अपना घर छोड़कर पलायन कर रहे होते हैं. इस विभाजन से फैले दंगों का मर्मस्पर्शी चित्रण भीष्म ने किया है. भीष्म जी का परिवार जो इसका भुक्तभोगी था, काफी मुश्किलों का सामना करने के बाद इनका व्यापार कार्य बंद हो जाता है. भीष्म जी बिल्कुल खाली महसूस करने लगते हैं. अर्थव्यवस्था की जुगत नहीं लग पा रही होती है. अतः देश की आजादी तथा पुनः विभाजन से इन्हें ऐसा महसूस होता है, जैसे ''आजादी मिलने पर मैं भी एक तरह से आजाद हो गया था. व्यापार से आजाद, कॉलेज के अध्यापन से आजाद, कांग्रेस की सरगर्मियों से आजाद, रावलपिंडी की सभी व्यवस्थाओं से आजाद.''11 इसी बीच बड़े भाई बलराज बम्बई चले जाते हैं. जहां वे इप्टा जैसी संस्था से तो जुड़ते ही हैं तथा फिल्मों में भी काम करने लगते हैं. भीष्म जी भी अपने को खाली देखकर परिवार के साथ वहीं चले जाते हैं जहां वे तथा उनकी पत्नी इप्टा से जुड़ती है. वहां रहते हुए उन्हें एक तार मिलता है, जिसमें अम्बाला कॉलेज में अंग्रेजी अध्यापक के रूप में कार्य करने का आग्रह रहता है. भीष्म यह स्वीकारते हुए परिवार समेत वहां चले जाते हैं. यहां इनके पहल पर यूनियन बनाये जाते हैं. पूरे पंजाब में यूनियनों का कार्य सक्रिय हो जाता है. जिसका खामियाजा भीष्म को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य होकर भुगतना पड़ता है. वे वापस दिल्ली पिता के पास आ जाते हैं. जहां पूर्वी पटेल नगर में (करोलबाग के निकट) एक मकान खरीदा था जो विभाजन की त्रासदी झेलता शरणार्थियों के लिये बनाया गया था. यहां साहित्य पर खुल कर बात होती है. यहां आकर भीष्म जी के रहते हुए रविवार को होने वाली कल्चरल फार्म में हिस्सा लेने लगते हैं. जहां साहित्य के प्रति रुचि बढ़ती है. और रामकुमार वर्मा, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद जैसे साहित्यकारों से परिचय होता है. परिणामतः 1953 में इनका पहला कहानी संग्रह ''भाग्यरेखा'' छपता है. फिर दूसरा 1956 में ''पहला पाठ''. साहित्य अकादमी की स्थापना के बाद ही कहानी विधा को लेकर अनेक आन्दोलन जैसे चलते हैं जिसकी चर्चा आगे की कथा में भीष्म ने की है. इसके कुछ समय बाद वे बनारस जाते हैं. जहां ''डॉ. इन्द्रनाथ मदन के संरक्षण में हिंदी उपन्यास में नायक की अवधारणा" विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त करते हैं. वहां रहते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी के सम्पर्क में आते है. पुनः वहां से लौटकर दिल्ली लौटने के बाद उनके बेटे वरुण का जन्म होता है. कथावस्तु में आगे लेखक के मास्को प्रवास की कथा है. 1957 की क्रांति के बाद सांस्कृतिक क्षेत्र में सोवियत संघ ने जो नीति अपनाई थी, उसके अंतर्गत बड़े व्यापक स्तर पर अनुवाद कार्य किया जा रहा था. और उसी कार्य के लिए लेखक परिवार के साथ वहां प्रवास करते हैं. वहां रहते हुए लगभग 7 वर्षों में भीष्म का लेखन कार्य पीछे छूट जाता है तथा उपलब्धि के तौर पर ''हानूश'' नामक नाटक का मसौदा ही तैयार हो पाता है. पत्नी शीला काफी असंतुष्ट भाव से कहती हैं- यहां तुम क्या कर रहे हो? छः साल यहां रहते हो गए. तुमने केवल एक कहानी लिखी, वह भी मरियल सी. तुम्हें यहां क्या मिल रहा है?...बराबर बना रहा.12

''मास्को में रहते हुए भीष्म जी ने उपभोक्ता वस्तुओं की कमियों जैसी त्रुटि को तथा सोवियत संघ द्वारा पहला स्पुन्तिक छोड़े जाने जैसे उपलब्धि का चित्रण किया है. 1963 में भीष्म जी भारत लौट आते हैं. भारत आकर पुनः भीष्म लेखन से जुड़ना चाहते हैं, ऐसे समय में जब नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी का दौर चल रहा था, जिसका विभाजन भीष्म के लिए दुरूह था. उसी समय नई कहानियों की पत्रिका का संपादन का कार्य इन्हें मिला किन्तु वह भी सही रास्ते नहीं चल सका. अतः पत्रिका अमृतराय के हाथ सौंप दी गई.

कथावस्तु में आगे भीष्म ने अपनी उत्कृष्ट कृतियों जैसे ''तमस'', ''हानूश'', ''कबीरा खड़ा बाजार में'', ''माधवी'', ''मश्यादास की माड़ी'' आदि का वर्णन किया है. साथ ही साथ अफ्रो-एशियाई लेखक संघ एवं प्रगतिशील लेखक संघ के सन्दर्भ में लेख लिखकर महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी दी है. तथा अंत में लेखक ने अपने जीवन के अपने शुरुआती क्षणों के यादगार पलों को याद करते हुए अंतिम पड़ाव के महत्वपूर्ण पलों का जिक्र सारांश रूप में किया है. तथा वे अंत में निष्कर्षतः कहते हैं- ''क्या खोया, क्या पाया, इसका लेखा-जोखा करता रहूंगा.'' अपने भाग्य को सराहता कोसता भी रहूंगा, साथियों-सहकर्मियों के साथ उलझता भी रहूंगा, ताकि किसी न किसी तरह जिन्दगी के अखाड़े में बना रहूं. ऐसा ही मन करता है. पर इस सबके रहते भी कभी कभी यह भी आवाज कानों में पड़ जाती है."

रात सारी तो हंगामा गुस्तरी में कटी,

सेहर करीब है, अल्लाह का नाम ले साकी.13

संदर्भ ग्रन्थ-

1. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 244

2. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 7

3. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 7

4. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 23

5. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 36

6. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 46

7. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 47

8. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 92

9. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 98

10. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 128

11. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 139

12. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 199

13. भीष्म साहनी ''आज के अतीत.'' पृष्ठ संख्या 311

 

सपर्कः पटेल नगर रोड नम्बर 8

निफ्ट के सामने, हटिया रांची-(झारखण्ड) पिन 834003

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