गुरुवार, 11 अगस्त 2016

रचना समय - अप्रैल मई 2016 / संपादकीय

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संपादकीय

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यह अंक

बड़े विषय को आधार बनाकर क्या बड़ी रचना बन पाती है इस नुक्ते पर विचार करें तो स्पष्ट होता है- बड़े विषय रचना को बड़ा नहीं बना पाते। विश्वयुद्धों की विभीषिका को आधार बनाकर शीर्षस्थ रचनाकारों ने रचनाएँ लिखीं- लेकिन वो युद्ध की विभीषिका के आगे बहुत अल्प रहीं। हिन्दी में, अगर कवि पंत का उदाहरण लें तो उन्होंने बड़े विषय को आधार बनाकर कई रचनाएँ लिखीं- ‘निष्ठुर परिवर्तन’ उनमें से एक है- बहुत बड़े विषय से प्रारंभ हुई यह कविता बहुत छोटे बिन्दु पर आकर सिमट जाती है, वहीं छोटे विषय या कहें, ग़ैरमालूमी-से विषय को लेकर लिखी गई निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ कविता है- जो छोटे से बिन्दु से प्रारंभ होकर बहुत बड़े कैनवास का सृजन करती है। इसी तरह विचार से रची गई रचना में क्या व्यापकता के संकेत होते हैं रचना तो वह बन जाएगी लेकिन उसमें जीवंतता- गहराई- जीवन की हलचल की हरारत नहीं आ पाती है- यशपाल की बहुत सारी रचनाएँ विचार को केन्द्र बनाकर सृजित की गईं- लेकिन उनमें जीवन की सरगर्मी नहीं है। बहरहाल, यहाँ यह बात इसलिए कि मिलान कुंदेरा भी रचना को विनोद से जोड़ता है- जैसे यह कि उपन्यास सिद्धान्त से नहीं बल्कि विनोद की चेतना से जन्म लेता है, तो कहीं न कहीं वह जीवन का पक्षधर है जिसमें से विचार की विराटता आकार लेती है।

‘रचना समय’ का प्रस्तुत अंक हम मिलान कुन्देरा के व्याख्यान से प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें वह उपन्यास के बहाने समय की आत्मा की पड़ताल पर ज़ोर देता है जिसमें वह कहता है कि उपन्यास क्या है कुन्देरा एक यहूदी लोकोक्ति प्रस्तुत करते हैं- ‘आदमी सोचता है, ईश्वर हँसता है’- वह कहता है- दुनिया में उपन्यास की कला का अवतरण ईश्वर के ठहाके की प्रतिध्वनि के रूप में हुआ है। ईश्वर क्यों हँसता है सोचते हुए आदमी पर क्योंकि आदमी सोचता है और सत्य उसके हाथ से फिसल जाता है। क्योंकि आदमी जितना अधिक सोचते हैं, एक का सोच दूसरे के सोच से उतना ही अलग होता है। और, क्योंकि आदमी कभी भी वह नहीं होता, जो वह सोचता है। तात्पर्य कि मिलान कुन्देरा मानव नियति से रचना की निष्पत्ति और उसकी सैद्धान्तिकी की निर्मिति को कला का पर्याय मानते हैं- तभी वह कहते हैं- उपन्यास व्यक्तियों का काल्पनिक स्वर्ग है। यह वह लोक है जहाँ सत्य पर अपने कब्जे का दावा कोई भी नहीं करता- लेकिन जहाँ हरेक को अपने समझे जाने का हक़ है- एक युग की आत्मा की पड़ताल, उस युग की कला, ख़ासकर उपन्यास को समझे वगैर, महज़ उसके विचारों और सैद्धान्तिक अवधारणाओं के सहारे नहीं की जा सकती। उन्नीसवीं शताब्दी ने इंजन का आविष्कार किया और हेगेल ने मान लिया कि उसने सकल इतिहास की असल नब्ज को पकड़ लिया है। लेकिन फ्लाबेयर ने ‘मूढ़ता’ की खोज की। मैं यह कहने का दुस्साहस करता हूँ कि यह उस शताब्दी की महानतम खोज है- उतनी ही गर्वीली जितना उस शताब्दी का वैज्ञानिक चिन्तन। क्योंकि आधुनिक मूढ़ता का अर्थ, अज्ञान नहीं, गृहीत धारणाओं की विचार-निरपेक्षता है। दुनिया के भविष्य की ख़ातिर फ्लाबेयर की खोज, फ्रायड या मार्क्स के भड़कीले विचारों से कहीं अधिक महत्त्व की है...

बहरहाल, प्रस्तुत अंक में जैक लंडन और फ्लेनरी ऑक्नर की कहानियों के साथ अंजली काजल की कहानी है जो आज की स्त्री के अस्तित्त्व पर कई सवाल खड़ा करती है। कह सकते हैं कि स्त्री की कहानी स्त्री की ज़ुबान से कही गई है। राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई के साथ हम यहाँ युवा कवियों को प्रस्तुत कर रहे हैं- यथा बसंत त्रिपाठी, मणि मोहन, ब्रज श्रीवास्तव और प्रतिभा गोटीवाले जिनकी कविताओं के कहन का अंदाज़ नया है। अफ़गानी कविताएँ हैं जिनके अनुवाद अशोक कुमार पाण्डेय ने किये है- कविताएँ स्त्री पर हो रहे जुल्म के ख़िलाफ़ एक आवाज़ है जिसे शासन की बंदूक भी नहीं रोक सकती। इसी के साथ जर्मन उपन्यासकार अब्बास खिदर के उपन्यास ‘ग़लत हिन्दुस्तानी’ और आरती के काव्य संग्रह ‘मायालोक से बाहर’ पर समीक्षाएँ अंक को विशिष्ट बनाती हैं।

- हरि भटनागर

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