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प्राची - अगस्त 2016 / काव्य जगत

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कविता डॉ . अनीता कपूर अब अब तुम्हारे झूठे आश्वासन मेरे घर के आंगन में फूल नहीं खिला सकते चांद नहीं उगा सकते मेरे घर की दीवार की ईंट ...

कविता

डॉ. अनीता कपूर

अब

अब

तुम्हारे झूठे आश्वासन

मेरे घर के आंगन में फूल नहीं खिला सकते

चांद नहीं उगा सकते

मेरे घर की दीवार की ईंट भी नहीं बन सकते

अब

तुम्हारे वो सपने

मुझे सतरंगी इंद्रधनुष नहीं दिखा सकते

जिसका न शुरू मालूम है न कोई अंत

अब

तुम मुझे कांच के बुत की तरह

अपने अंदर सजाकर तोड़ नहीं सकते

मैंने तुम्हारे अंदर के अंधेरों को

सूंघ लिया है

टटोल लिया है

उस सच को भी

अपनी सार्थकता को

अपने निजत्व को भी

जान लिया है अपने अर्थों को भी

मुझे पता है अब तुम नहीं लौटोगे

मुझे इस रूप में नहीं सहोगे

तुम्हें तो आदत है

सदियों से चीर हरण करने की

अग्नि परीक्षा लेते रहने की

खूंटे से बंधी मेमनी अब मैं नहीं

बहुत दिखा दिया तुमने

और देख लिया मैंने

मेरे हिस्से के सूरज को

अपनी हथेलियों की ओट से

छुपाए रखा तुमने

मैं तुम्हारे अहं के लाक्षागृह में

खंडित इतिहास की कोई मूर्ति नहीं हूं

नहीं चाहिए मुझे अपनी आंखों पर

तुम्हारा चश्मा

अब मैं अपना कोई छोर तुम्हें नहीं पकड़ाऊंगी

मैंने भी अब

सीख लिया है

शिव के धनुष को तोड़ना

संपर्क : anitakapoor.us@gmail.com

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जीवन क्या है ?

डॉ. सुधा ओम ढींगरा

प्रसून है या कांटा?

हंगामा है कि सन्नाटा?

उल्लास है या आभास?

संघर्ष है या उत्कर्ष?

कोई नहीं जानता

वस्तुतः

जीवन का रंग, रूप, आयु और भेद क्या है?

इसमें अस्थि, मज्जा, रक्त या स्वेद क्या है?

बस...

एक चाह के लिये हजारों कष्टों से गुजरना

और लाखों पड़ाव पार करना

शायद

प्रकृति का नियम यही है

हंसी खुशी चलते रहना

सांसों की डोरी खींचना

और, अन्ततः

मृत्यु का निमंत्रण स्वीकार करना

Email: ceddlt@yahoo.com

---.

 

 

दो गजलें

रशीद कैसरानी

यूं तो इक बज्म-ए-सदा1 हमने सजायी पहरों.

कान बजते रहे, आवाज न आई पहरों.

लम्हे भर के लिए बरसी तिरी यादों की घटा,

हमने भीगी हुई चिलमन2 न उठायी पहरों.

वो तो फिर गैर था गैरों से शिकायत क्या हो,

नब्ज अपनी भी मिरे हाथ न आयी पहरों.

आंख झपकी तो रवां थी वो हवा के रुख पर,

हमने जो रेत की दीवार बनायी पहरों.

लौट कर आये न भटके हुए राही दिल में,

आग इस दश्त में हमने तो जलायी पहरों.

1. ध्वनि की सभा, 2 चिक

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राशिद मुफ्ती

जो कर्ज मुझपे है वो बोझ उतारता जाऊं.

कोई सुने न सुने मैं पुकारता जाऊं.

जो मेरे पास है अपने लिए बचा रक्खूं,

जो मेरे पास नहीं तुझपे वारता जाऊं.

कदम-कदम पे नये लोग सामने आएं,

कदम-कदम पे नये रूप धारता जाऊं.

कहीं बने न अना1 मेरी राह में दीवार,

ये तौक2 अपने गले से उतारता जाऊं.

मुकाबला तो करूं राशिद अपने दुश्मन से,

ये और बात है जीतूं कि हारता जाऊं.

1. अहम, 2. हंसली

 

दोहे

पावस के अनुबंध

अशोक ‘अंजुम’

शब्द-शब्द बूंदें गिरें, यत्र-तत्र सर्वत्र.

बादल टाइप कर रहे, फिर पावस के पत्र.

बूढ़े हुए जवान फिर, देखा ऐसा हाल.

सावन में गदरा गए, फिर पोखर, फिर ताल.

नदिया बौराने लगी, छोड़ पुराने छोर.

मन में रख दुर्भावना, चली गांव की ओर.

मौसम से कुछ यूं हुए, पावस के अनुबंध.

गली-गली में बिछ गई, सोंधी-सोंधी गंध.

छनन-छनन-छन कर रही, आंगन वाली टीन.

बूंदें कत्थक कर रहीं, दिवस हो गए तीन.

दुखिया की छत कर रही, टप-टप, टप-टप रोज.

पखवाड़े से हो रही, कोलतार की खोज.

पावस का अद्भुत असर, देखा हमने मित्र.

चित्रकार ने रंग दिए, हरे-हरे सब चित्र.

बूंदों की अठखेलियां, प्रिये करें बेचैन.

मन में बादल याद के, बरसा करते नैन.

पल में बादल घिर गये, पल में तपती धूप.

नेताओं जैसा लगे, मौसम का ये रूप.

छम-छम बूंदें नाचतीं, बादल छेड़ें साज.

हरियाली रचने लगी, महाकाव्य फिर आज.

नदिया को यूं भा गई, बस्ती, मानव-गंध.

इस बारिश में एक दिन, तोड़ दिए तटबंध.

डरे-डरे से लोग हैं, चीख-पुकारें शोर.

इस बारिश में हो गई, नदियां आदमखोर.

नदिया फैली गर्व से, पाकर नीर अपार.

किसकी शामत आयगी, पता नहीं इस बार.

 

सम्पर्कः सम्पादक ‘अभिनव प्रयास’,

गली-2, चन्द्रविहार कॉलोनी (नगला डालचंद),

क्वारसी बाईपास, अलीगढ़-202201 (उ.प्र.)

मोः 9258779744, 9358218907

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गीत

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कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’

जीवन की झोली में खुशियां भरनी हैं हर पल की.

आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कल की.

घूम-घूम कर खुशियां बांटीं, बस मिल सांझ सकारे,

दीखे कोई नहीं पराया, मन से सभी दुलारे.

होंठों पर मुस्कानें दीखें, उनके हल्की-हल्की,

आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कल की.

कर्मक्षेत्र अद्भुत है अपना, संकल्पित हों सारे,

अब तक रहे अधूरे सपने, इन पर खूब विचारे.

सीमा, समय छोड़कर आगे गति होगी हलचल की,

आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कल की.

साथ हमारे हो जाएगा, समय ‘अचूक’ सुहाना,

आशाओं के दीप जलाओ, गीत सुरीले गाना.

हरियाली हर तरफ बिखेरे, हालत जो मरुथल की,

आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कल की.

 

सम्पर्कः 38-उ, विजया नगर, करतारपुरा,

जयपुर-30200श् (राजस्थान)

मो. 9983811506

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दो कविताएं

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तेजेन्द्र शर्मा

दरख्तों के साये तले

दरख्तों के साये तले

करता हूं इंतजार

सूखे पत्तों के खड़कने का

बहुत दिन हो गये

उनको गये

घर बाबुल के.

रास्ता शायद यही रहा होगा

पेड़ों की शाखों

और पत्तियों में

उनके जिस्म की खुशबू

बस कर रह गई है.

पत्ते तब भी परेशान थे

पत्ते आज भी परेशान हैं

उनके कदमों से

लिपट कर, खड़कने को

बेचैन हैं.

मगर सुना है

कि रूहों के चलने से

आवाज नहीं होती.

 

सुबह का अखबार

सुबह का अखबार

दोपहर से शाम तक

रद्दी बन जाता है.

और फिर एक दिन

वो रद्दी का ढेर

आवाज लगा कर

कहता है,

कि मुझे उठाओ

और बेच आओ!

तुम्हारी याद की इंतहा

ये है

कि हीरे से कांच तक

सोने से पीतल तक

और रद्दी से अनमोल तक

हर शै से जुड़ी है

तेरी याद.

मुझे याद है मेरी आदत

मेरे साथ है मेरी आदत

रद्दी के ढेर को उठाना

बैठक के कोने में रखना

और भूल जाना-

तुम्हारा उलाहना,

तुम्हारा डांटना.

रद्दी का ढेर आज भी है

बैठक का कोना आज भी है

मेरा भूलना आज भी है

मगर कहां गया

तुम्हारा उलाहना,

तुम्हारा डांटना,

तुम्हारा प्यार,

तुम स्वयं!

 

ahanikar@gmail.com

kathauk@gmail.com

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कविता

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पर्यावरण

प्रेम बिहारी शुक्ल

वायु प्रदूषित जल है दूषित, हम खोएं सुन्दर वन उपवन

कैसा हमें फितूर चढ़ा है,, आज बने हम अपने दुश्मन

खेत हटा कर महल बनाएं, पेड़ कटा कर लकड़ी लाएं

उनसे हम आगार सजाएं, त्यागी हमने पुष्प लताएं

कूड़ा करकट और प्रदूषण, जगह जगह हम डाल रहे हैं

खुद अपने ही बच्चों को हम, जहर पिला कर पाल रहे हैं

जहर हवा में, जहर दवा में, अब पानी भी जहरीला है

सांसों में अब जहर घुला है, हर तन मन गांठ गंठीला है

भाई मेरे कुछ तो सोचें, इतना जग में जहर न घोलें

अपने ही खुद पांव न काटें, जागें अपनी आंखें खोलें

मां समान है मान प्रकृति का, ना इस पर पाषाण उगाएं

नदियों में दूषण ना डालें, हरियाली धरती पर लाएं

आओ मिल कर शपथ उठाएं, कहीं प्रदूषण ना फैलाएं

जन्म-दिवस, शादी हर अवसर, सबसे पहले पेड़ लगाएं

संपर्कः सी-501, चित्रकूट अपार्टमेंट्स

प्लाट-9, सेक्टर-22, द्वारका, नई दिल्ली-110077

मो. 09711860519

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दोहे

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साधू संगति कीजिये

मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’

जीवन की गाड़ी सदा, नेक राह ले जायं.

गलत राह पर जब चले, जीवन भर पछतायं.

साधू संगति कीजिये, तन मन सब सध जायं.

कभी न संकट आ सकें, जीवन भर मुस्कायं.

मान और सम्मान का, रखें सदा ही ध्यान.

शांति और सुख साथ में, मिले जगत में मान.

जो विवेक से काम लें, नहीं फंसेंगे आप.

मुश्किल के हर दौर में, दूर भगें सन्ताप.

संकट जब भी आ पड़े, कभी न विचलित होंय.

धीरज साहस साथ रख, आपा कभी न खोय.

मन में यदि ऊर्जा रहे, जीवन सुखमय होय.

थके हुये मन का नहीं, संगी साथी कोय.

जीना तो सब चाहते, जीने का हो ढंग.

अनपढ़ होकर जो जिये, वह जीवन बेढंग.

उत्साहित मन ही सदा, घर को रखे निहाल.

बिगड़े कारज सब बनें, सभी रहें खुशहाल.

रखो याद मन में सदा, स्वाभिमान का पाठ.

जीवन में तब देखना, बदलेंगे सब ठाठ.

सम्पर्कः 58, आशीष दीप,

उत्तर मिलौनी गंज,

जबलपुर (म.प्र.)

---.

 

मोहिनी मिश्रा की दो कविताएं

1

‘शब्द’

वो-

बेहद बृहत

विराटतत्व विराट

तेजपुंज हैं,

वो -

‘ब्रह्म’ ही है,

तो इसका

अपव्यय करना

कभी भी

ज्ञानी का लक्षण

नहीं हो सकता है!

2

मन की डायरी में

उभरे कुछ शब्द

होंठों के द्वार से

निकल बोले मुस्कुराते

‘‘तुम्हारी याद आ रही बड़ी जोर से’’

अप्रत्याशित आशा

जिसका जन्म ही न

हो पाया हो

सहज अंदाज में डूबा पल

खिलखिलाया और बोला

खैर-नवाजिश में

हुई कमी में अपनी

जरूरत बताइए

सजदे में हजूर

हम अब भी

वही हैं आपके!!

सम्पर्कः द्वारा श्री महेश मिश्रा, ए-202, एरिस अपार्टमेंट, एरिस लिओ सैगिटेरियस ग्रुप हाउसिंग सोसायटी, जन कल्याण नगर, मलाड (प.), मुंबई-400095

टिप्पणियाँ

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,49,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु 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रचनाकार: प्राची - अगस्त 2016 / काव्य जगत
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