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प्राची - जुलाई 2016 / लघुकथाएँ

  लघुकथाएँ

 

वेलेन्टाइन डे

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

वे सब नौजवान थे और संस्था के सक्रिय कार्यकर्ता. भारतीय संस्कृति के रक्षक. उन्होंने हाथ में डंडे, स्टिक लिए और चल पड़े प्रेम दिवस पर प्रेमी-प्रेमिकाओं को सजा देने. अपमानित करने वे सब बगीचों में पहुंचे. एकांत स्थानों पर गये. शहर की पहाड़ियों पर पहुंचे. जहां जो भी प्रेमी जोड़े मिले. उनके साथ अभद्रता की. मार-पीट की. उठक-बैठक लगवाई गई. उन्हें मर्यादा में रहने की सलाह दी. उनसे माफी मंगवाई. रात को वे सब अपनी-अपनी प्रेमिकाओं के साथ होटल के कमरे में इकट्ठे हुए. शराब के दौर चले. और सबने मिलकर वेलेंटाइन डे मनाया.

सम्पर्कः पाटनी कॉलोनी, भरत नगर, चंदनगांव

छिंदवाड़ा-480001 (म.प्र.)

मोः 9425405022

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छोटू का दर्द

सुरेश ''तन्मय''

धेड़ आयु का एक शराबी होटल में घुसते हुए, 'ए छोटू...एक प्लेट भजिया और कड़क काली चाय देने का इधर, फटाफट जल्दी से...'

'जी साब, अभी लाया,' फुर्ती से छोटू ने भजिये की प्लेट टेबल पर रखते हुए कहा- 'चाय बन रही है साब फिर लाता हूं.'

'क्यों बे, ये टेबल कौन साफ करेगा, तेरा बाप?'

'साब आप अपुन के बाप का नाम लेता है, मेरे को कोई मलाल नहीं इसका, अगर बाप ही ये काम कर लेता तो मैं अभी किसी सरकारी स्कूल में पढ़ रहा होता. अच्छा साब आपका बच्चा तो पढ़ता होगा ना?' टेबल पर पोंछा मारते हुए छोटू ने पूछा.

शराबी ने घूरते हुए कहा- 'हां, पर तू ये सब कुछ क्यों पूछ रहा है?'

'क्योंकि साब, स्कूल जाना तो मैंने भी शुरू किया था, किंतु बीच में ही बाप की दारू की लत के कारण पढ़ना छोड़ना पड़ा. अच्छा साब, आपका बच्चा तो आखिरी तक अपनी पढ़ाई करता रहेगा ना?'

'अबे छुटके, सवाल पे सवाल आखिर तेरा मतलब क्या है?'

'माफ करना साब, पर आपको ऐसी हालत में देखकर मुझे लगा, कहीं मेरे जैसे आपके बच्चे को भी स्कूल छोड़कर किसी होटल वोटल में...'

छोटू अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि शराबी का एक झन्नाटेदार हाथ उसके गाल पर पड़ा. 'साले छुटकू, तूने तो आज मेरा पूरा नशा ही उतार दिया रे,' यह कहते हुए फिर अचानक द्रवित हो छोटू के कंधे पर एक पल के लिए हाथ रखा और सिर झटकते हुए होटल से बाहर निकल कर अपने घर की राह पकड़ ली.

छोटा चांटा खाने के बाद भी खुश था, इसलिए कि शायद अब उस आदमी का बच्चा अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेगा.

सम्पर्कः 226, मां नर्मदे नगर, बिलहरी

जबलपुर-482020 (म.प्र.)

मो. 09893266014

 

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सूफी कहावत

चुनाव

वे तीन बूढ़े थे. तीनों एक गृहिणी के द्वार पर खड़े थे. गृहिणी को बताया कि हम तीनों भूखे हैं, भोजन करना चाहते हैं. गृहिणी ने कहा, 'महाराज! आप तीनों भीतर पधारें. मुझे आपको अपने आंगन में बिठाकर भोजन कराने में बड़ी प्रसन्नता होगी.'

तीनों ने इंकार करते हुए कहा, 'हम तीनों के बीच एक समझौता है, तीनों में से कोई एक ही किसी के घर जा सकता है.'

'ऐसा क्यों महाराज?' अचम्भित गृहिणी ने व्यग्रता से पूछा.

जवाब मिला, 'हम तीनों क्रमशः समृद्धि, सफलता और प्रेम हैं. तुम तीनों में से किसी एक को ही अपने घर में बुला सकती हो.'

सुन कर गृहिणी असमंजस में पड़ गयी. उसने थोड़ी-सी मोहलत मांगी. दरअसल वह अपने पति से मशविरा करना चाहती थी. पति-पत्नी ने अच्छी तरह सोच-विचार कर फैसला किया- प्रेम को घर में बुलाया जाए, ताकि उनका घर प्रेम से परिपूर्ण हो जाए.

गृहिणी बाहर आयी. उसने बड़ी मनुहार के साथ प्रेम को घर में आने का बुलावा दिया. गृहिणी ने देखा, प्रेम उसके घर की तरफ चला तो दूसरे दोनों बूढ़े भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े. गृहिणी ने उन्हें टोंका, 'हमने तो प्रेम को घर में बुलाने का फैसला किया है, तुम दोनों क्यों आ रहे हो?'

दोनों ने एक साथ जवाब दिया, 'तुम और तुम्हारा पति, दोनों बड़े समझदार हो. तुमने समृद्धि या सफलता को न्योता दिया होता तो शेष दोनों बाहर ही बैठे रहते. लेकिन प्रेम का साथ हम कभी नहीं छोड़ते. वह जहां भी जाता है, हम दोनों उसके पीछे-पीछे चल पड़ते हैं.'

-मालचंद तिवाड़ी

 

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प्राण प्रतिष्ठा

सुरेश ''तन्मय''

वह पत्थर न जाने कब से गूढ़ों के ढेर के बीच कूड़े कचरे में पड़ा था. गांव में एक मूर्तिकार आया, उसकी नजर उस पत्थर पर पड़ी. उसने उसे बाहर निकलवा कर उस पर छैनी हथौड़ा चलाना शुरू कर दिया. कई महीने उस पर काम चलता रहा.

उस पत्थर को तराशने के दौरान उसके खुले मैदान में होने के कारण समय बे-समय पशु पक्षी, श्वान सियार आदि जीवन उस पर निःशंक अपनी गंदगी भी करते रहे. काम की तल्लीनता में मूर्तिकार भी उस पत्थर पर यहां वहां अपने मुंह से तम्बाखू की पीकें उगलता रहा था.

आखिर एक दिन मूर्ति पूर्ण रूप से तैयार हो गई और गांव के ही मंदिर में विधि विधान से पवित्र कर के ईश्वरीय रूप में उसकी प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई.

मंदिर में प्रवेश से वंचित सफाई कर्मी कलुआ बाहर सफाई करते हुए सोचता है- वर्षों से लावारिश पड़ी मल मूत्र की इतनी गंदगी से निकले निर्जीव पत्थर से मानव निर्मित मूर्ति को श्रीमंतों द्वारा भगवान का दजार्1 दिया जा सकता है तो ईश्वर के ही बनाये हम जीते जागते अछूते मनुष्यों को आज की परिवर्तित परिस्थितियों में किसी विधि से सामान्य इंसान का दर्जा क्यों नहीं?

सम्पर्कः 226, मां नर्मदे नगर, बिलहरी

जबलपुर-482020 (म.प्र.)

मो. 09893266014

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देवेन्द्र कुमार मिश्रा

गौरक्षा

समिति के लोग गौरक्षा अभियान के लिए टेंट लगाकर प्रदर्शन कर रहे थे. टेंट के पास बड़े-बड़े बैनर लगे थे. उन पर लिखा था ''गाय हमारी माता है.'' और टेंट के पीछे कचरे के ढेर पर खड़ी एक भुखमरी कमजोर-सी गाय पोलीथीन चबा रही थी.

बैल

गौरक्षा समित के लोगों ने रैली निकालते हुए नारा लगाया, ''गाय हमारी माता है''. उनके सामने से एक पागल-सा व्यक्ति निकला और जोर से बोला- ''तो आप मानते हैं कि आपके पिता बैल हैं.''

यह सुनकर गौरक्षा समिति के लोगों ने उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी.

सम्पर्कः पाटनी कालोनी, भरत नगर,

चन्दनगांव, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001

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अधिक मूल्यवान

क रात गोनू झा गाछी जा रहे थे. पत्नी ने मना करते हुए कहा, ''रात में मत जाइए, चोर-उचक्के कनौसी (कर्ण अंकुशिका) छीन लेंगे.''

उन्होंने हंसते हुए कहा, ''आपको मेरी जान की परवाह नहीं है कि कीड़े-मकौड़ काट सकते हैं. आपके लिए तो गहना ही मुझसे कीमती है.''

पत्नी झेंप गयी, किन्तु संभलती हुई बोली, ''नहीं, आपके सामने आभूषण के क्या मोल?''

गोनू झा को चुहल सूझी और बोले, ''तो ठीक है, जांच लूंगा.''

एक शाम उन्हें न जाने क्या हो गया? गोनू झा की मृत्यु से घर में कोहराम मच गया. रात अधिक न हो जाए, इसलिए झटपट श्मशान ले जपने की तैयारी होने लगी.

अरथी पर बांधन का काम शुरू होने को ही था कि पत्नी का ध्यान कनौसी पर गया. वह रुंधे गले से बोली, ''वे गहना तो पहने ही हुए हैं, उसे तो खोल लें. आधे तोले का है.''

इतना सुनते ही गोनू झा बैठ गये. सभी विस्मित! कहने लगे, ''हाय रे, दैव! यह आठ आने की कनौसी मुझसे भी मूल्यवान है!''

फिर पुरोहित की ओर मुखातिब होकर कहा- ''आज मैं समझ गया कि दुनिया कितनी स्वार्थी है. इसकी असली पहचान मरने के बाद ही होती है.''

साभारः वीरेन्द्र झा (गोनू झा की रोचक कथाएं)

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