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प्राची - अगस्त 2016 / अदावत / कहानी / डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’

कहानी

विवाह को लगभग चार महीने बीत चुके थे. मैं और मल्लिका हीथ्रो विमान पत्तन पर खड़े थे. उसके माता-पिता को लेने आए थे. वे भारत से पहली बार आ रहे थे, हमसे मिलने. मल्लिका बहुत प्रसन्न थी. जैसे ही वे सामने आए, मल्लिका दौड़ कर अपनी मां से चिपट गई. मैंने हमउम्र ससुर के पैर छूने की बजाय हाथ मिलाना ही ठीक समझा. जैसे ही मैं मल्लिका और उसकी मां की तरफ मुड़ा, अभिवादन करने के लिए, मुझे काठ सूंघ गया. मल्लिका की मां...मल्लिका की मां तो वही लड़की थी जिससे मैं सगाई तोड़ कर भागा था तथा जिसकी वजह से मेरे जीवन में आमूल परिर्वतन आ गया था.

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नाम : डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’

जन्म : 28 अगस्त 1948, रोहतक

शिक्षा : M.B.B.S., FCGP

5तियां : अंग्रेजी, हिन्दी, पंजाबी व हरियाणवी में कुल प्रकाशित 22, चार उपन्यास, चार कहानी संग्रह, पांच कविता, एक दोहा सतसई, दो गजल संग्रह, अंग्रेजी उपन्यास Strong Women @2nd heaven.com

सम्पादन : मसि-कागद (साहित्यिक त्रैमासिकी 11 वर्ष), हरिगंधा मासिक हरियाणा साहित्य अकादमी पत्रिका 5 वर्ष

सम्मान

लोक साहित्य व लोक कला का सर्वोच्च सम्मान पंद्ग लखमीचन्द सम्मान (हरियाणा साहित्य अकादमी). विभिन्न अकादमियों द्वारा 5 पुस्तकें- अकथ, घणी गई थोड़ी रही (कथा संग्रह), समझणिये की मर (हरियाणवी उपन्यास), कोई फायदा नहीं (हिन्दी उपन्यास), इक सी बेला (पंजाबी कहानी संग्रह) तथा हिन्दी एवं पंजाबी की 10 कहानियां भी पुरस्कृत. राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राज्यों की संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मानों से अलंकृत.

विशेष : एक उपन्यास कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी एम.ए. (फाइनल) के पाठ्यक्रम में. रचना कर्म पर पीएच. डी. व 4 एम. फिल शोध कार्य सम्पन्न.

संप्रति : पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क : 703 GHS 88 sect. 20 पंचकूला-1341113 (हरियाणा)

ईमेलः shyamskha1973@gmail.com

घुमन्तू भाषः 09416359019

अदावत

डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’

न दिनों मैं ईन्टर्न था. ईन्टर्न माने एम.बी.बी.एस. के बाद की एक साल की प्रेक्टिस अस्पताल में. हमारे परिवार पर अचानक कहर टूट पड़ा था- बड़े भैया की एक्सीडेन्ट में मृत्यु हो गई. भाभी बच्चों को लेकर अपने मायके चली गई. धनवान घर की बेटी से अपेक्षित भी यही था. कहावत है ना कि वैर और रिश्ता बराबर वालों में ही निभता है. बड़े भैया एयर फोर्स में अफसर थे. इस नाते यह विवाह हो गया था, वरना स्कूल मास्टर के बेटे की नियति में ऐसा रिश्ता. खैर! बड़े भैया के जाते ही, हम लोग फिर छोटे हो गए.

भाभी, दहेज के सामान के साथ-साथ, भैया का खरीदा गया फर्नीचर, कलर टी.वी, फ्रिज आदि सब उठा के ले गई थी. बाबू जी और मां को तो न इनकी पहले जरूरत थी न अब. वे भैया की मौत से टूट गए थे और अब पोते तथा पोती की जुदाई ने और ज्यादा तोड़ दिया था. हो सकता है कि उनके टूटने में भाभी तथा उनके परिवार वालों का यह अमानवीय क5त्य रहा हो. पर शायद नहीं है. उन सबका तेरहवीं से पहले चले जाना खला तो बहुत था मुझे. मैं शायद कुछ बोल भी जाता, पर बाबूजी ने जिस अनुशासन से हमें पाला, उसमें उनके सामने होते हुए कुछ कह पाने की गुंजाइश मुझ में कहां थी?

फिर अचानक मां को कैन्सर हो गया. मां को पीड़ा तो बहुत होती थी. पर वह भगवान का अक्सर धन्यवाद करती रहती थी कि उसने उसके दुःख जल्दी मिटाने का इन्तजाम कर दिया. अब मां का चलना-फिरना बहुत कम हो गया था. घर में कोई काम करने वाला नहीं था. भैया की म5त्यु को एक साल हो जाने पर बाबू जी ने कहा, ‘‘सुदर्शन अब तुम्हारा विवाह करना होगा.’’ मैं आगे पढ़ना चाहता था, पर घर की परिस्थितियां ऐसी थीं कि कुछ कहते नहीं बना.

बाबूजी के कहने पर, पास के कस्बे में जहां बड़ी बहन की ससुराल थी, बहन के साथ, एक एस.डी.ओ. साहिब की कन्या देख आया. बहन को वह पहले ही पसंद थी. जीजा जी के सहकर्मी की बेटी थी. बात पक्की हो गई.

मुझे न बहुत खुशी हुई न खास दुःख. कोई खास आस भी नहीं जगी जो अक्सर इस उम्र में जग ही जाती है. लड़की एम.ए. थी, शायद हिन्दी या सोशल स्टडीज में. किन्हीं ज्योतिषी कारणों से विवाह अभी दो-तीन महीने नहीं हो सकता था. विवाह की जो भी छोटी-मोटी तैयारी थी बहन ही कर रही थी. मां और बाबूजी को तो शायद यह सब कुछ अच्छा नहीं लग रहा था.

मेरी बहन मुझ से काफी बड़ी थी. उनके दो बेटे थे. नरेश उस वक्त इन्जिनियरिंग के सेकण्ड इयर में था. एक दिन वह मेरे होस्टल में आ गया- ‘‘मामा जी नमस्ते’’ और पसर गया मेरे बिस्तर में. मैंने कहा, ‘‘क्यूं, नरेश ठीक तो हो.’’ वह कुछ बोला नहीं, बस छत घूरता रहा.

मैंने हॉट प्लेट पर उसके लिए चाय बनाने को पानी रख दिया. चाय के दो प्याले लेकर मैंने स्टूल पर रख दिए.

नरेश बड़ा ही चालू किस्म का लड़का था. डोनेशन देकर दाखिला दिलवाया गया था. पर उसमें तो एक जीवन्त मस्ती भरी रहती थी जिससे अक्सर मुझे वित5ष्णा होती थी. पर वह मस्ती आज गायब थी.

मैं अक्सर वैसे ही कम बोलता हूं. फिर ऐसे अवसरों पर मेरी जिह्वा और भी भारी हो उठती है. काफी देर तक कमरे में खामोशी थी.

‘‘मामा’’ नरेश ने खामोशी तोड़ी, ‘‘तुम यह सगाई तोड़ दो.’’ यह कहकर वह चुप हो गया, हक्का-बक्का मैं उसका मुंह ताकने लगा।

‘‘मामा, वह लड़की बदचलन है,’’ नरेश फिर कहने लगा. उसे लग रहा था कि उसकी बातों का मनचाहा असर मुझ पर नहीं हो रहा है. इधर मेरा दिमाग सुन्न हुआ जा रहा था. मैं चुपचाप बैठा था.

नरेश ने मेरा कन्धा पकड़कर हिलाया और कहा, ‘‘मामा मजबूरी है. पर मुझे कहना पड़ रहा है कि वह तो मेरे साथ भी.’’

उसका इतना कहना था कि मेरा झन्नाटेदार तमाचा उसके मुंह पर पड़ा. वह चुपचाप उठकर चला गया.

मैं कितनी देर जस का तस खड़ा रहा, कुछ मालूम नहीं. पर मुझ पर जैसे आसेब छा गया था. मैं उठा, जाकर बस स्टैंड से बस पकड़ी और दिल्ली चला आया. घर में क्या हुआ विवाह वाले दिन, मुझे कुछ मालूम नहीं.

दिल्ली दस-पन्द्रह दिन रहकर मैंने गल्फ जाने का इन्तजाम कर लिया. उन दिनों वहां डॉक्टरों की बहुत जरूरत थीं. मैं ईरान के अबादान शहर में आ गया. सारा दिन गुमसुम काम करता रहता और फिर आकर दो कमरों के फ्लेट में पड़ जाता. पहली बार एयर कन्डीशण्ड में रह रहा था. शराब और सिगरेट जिन्हें मैंने पहले कभी छुआ भी नहीं था दिल्ली के प्रवास में शुरू कर दी थी. शाह रजा पहलवी का राज था ईरान में उन दिनों. अतः काफी खुला समाज हो गया था, ईरान.

जब कभी मां और बाबू जी की याद आती तो सिर फटने लगता और मैं शराब की बोतल खोलकर बैठ जाता.

एक दिन, लगभग साल भर बाद, हिम्मत करके बहन के घर, फोन मिलाया. किस्मत से नरेश ने ही फोन उठाया. वह लगभग चीख पड़ा- ‘‘मामा’’ पर मैंने उससे कहा, ‘‘चुप, मुझे बतलाओ बाबूजी और मां कैसे हैं?’’

उधर से काफी देर कोई आवाज नहीं आई. फिर नरेश के सुबकने की आवाज आती रही. वह बीच-बीच में बड़बड़ा रहा था.

‘‘मामा, मैं इस सब का जिम्मेदार हूं. मामा मुझे माफ कर देना.’’ उसकी अनगिनत बातों के बीच मुझे पता चला कि पिता जी का देहान्त तो मेरी शादी वाले दिन ही हार्ट अटैक से हो गया था तथा मां ने भी महीने के भीतर प्राण त्याग दिए थे. मैंने चुपचाप फोन रख दिया.

मुझे खुद से ज्यादा, उस लड़की पर गुस्सा आ रहा था, जिसकी वजह से, यह सब कहर टूट पड़ा था. पर मैं क्या कर सकता था!

मैं चार साल ईरान रह कर इंग्लैण्ड आ गया. यहां कुछ पुराने दोस्त मिल गए. उन्होंने मुझे काफी सम्भाला. शराब मैं अब भी पीता था पर सीमा में. यहां पर मैं पढ़ाई में लग गया. एफ.आर.सी.एस और फिर एम.सी.एच. करने के बाद प्लास्टिक सर्जरी में कन्सल्टैन्ट भी हो गया.

मै कविताएं, खासकर गजलें, लिखने लगा था. उससे मेरे भीतर के दर्द को काफी सकून मिलने लगा था. विधाता की दी हुई मीठी आवाज में, जब मैं दर्द भरी अपनी गजल सुनाता तो लोग झूम जाते थे.

लन्दन के उन्मुक्त माहौल में, मेरे सम्बन्ध अनेक सुन्दर लड़कियों और महिलाओं से हो गए, पर विवाह के बंधन में ना बंधने का मेरा इरादा अटूट था.

सभी कुछ तो था मेरे पास, धन दौलत शोहरत, और क्या चाहिए! दोस्त मेरी जिन्दगी, मेरी आजादी पर ईर्ष्या करते थे. अपनों से ईर्ष्या मनुष्यों का मानवीय गुण ही है ना.

सर्जरी में भी मेरा हाथ काफी सधा था. प्लास्टिक सर्जरी करते समय मेरे हाथ ऐसे चलते थे जैसे उस्ताद शायर, किसी मुश्किल बहर में, आसानी से गजल कह रहा हो.

इधर कुछ दिनों से, बड़े तीखे नयन नक्श्ा व सुदर्शन देहयष्टि की, एक हिन्दुस्तानी लड़की, मेरी यूनिट में रेजिडेण्ट लगी थी. हमारे ही प्रान्त की थी. मुश्किल से, चौबीस साल की रही होगी. पर ईश्वर की बनाई सुन्दरता पर संसार की नजर लग गई थी शायद. उसका सारा चेहरा चेचक के दागों से भरा था. पर बाकी शरीर, जाने कैसे अछूता रह गया था.

बड़ी जहीन लड़की थी. जाने ज्ञान प्राप्त करने की कैसी ललक थी उसमें, जैसे समन्दर को ही पी जाएगी. उसे दो साल हो गए थे. अपने कई सीनियरों को पीछे छोड़ गई थी. हस्पताल में पिरामिड प्रणाली थी. यानि, हर सेमस्टर के बाद, अंक तालिका के अनुसार चयन होता था. यह लड़की मल्लिका, सबसे ऊपर चल रही थी. अब जब साल खत्म हुआ, इम्तिहान का रिजल्ट आया तो वह सबसे अव्वल नम्बर पाकर, एफ.आर.सी.एस. में उत्तीर्ण हो गई थी.

एक शाम मुझसे मिलने, मेरे ऑफिस आई. कहने लगी, ‘‘सर मैं एम.सी.एच. करना चाहती हूं.’’ मैंने कहा, ‘‘जरूर करो.’’ वह मेरा बहुत आदर करती थी. मुझे भी, बड़ी भली लगती थी. उसके बारे में कुछ ऐसा वैसा नहीं सुना था. छुई-मुई सी बच्ची का चेहरा देखकर मुझे लगता कि जैसे उसे पौधों के पत्तों पर होने वाली बीमारी मरोडिया हो गई हो जिससे पत्तों में ‘सिलवट’ पड़ जाती है और वे मुड़ जाते हैं. मेरा कई बार दिल किया कि उससे कहूं कि अपने चेहरे की सर्जरी क्यों न करवा ले? पर सभ्यता व संकोचवश कभी कह नहीं पाया.

पर आज जाने क्या हुआ? मैंने उससे कहा, ‘‘तुम क्यों इन दागों को लिए घूमती हो? चलो तुम्हारा आप्रेशन करते हैं.’’

उसकी आखों से चुपचाप आंसू बह निकले, जैसे झरना फूट पड़ा हो.

मैंने कहा, ‘‘मल्लिका आई एम सॉरी. मेरा यह मतलब नहीं था.’’ फिर मैं उठकर उसके पास सोफे पर बैठ गया. मैंने उसके आंसू पोंछे. जाने कब वह मेरी बांहों में आ गई थी? पर मुझे उसे बांहों में लेना ऐसा लगा कि मैंने किसी शिशु को गोद में उठा रखा हो. और कोई भाव नहीं तैरा मेरे तन मन में.

उसने चुपचाप अपने आंसू समेट लिए थे. फिर कहने लगी, ‘‘ठीक है सर! कब करेंगे आप्रेशन?’’

मैं उसकी सहजता पर चकित था, पर मुझे अच्छा लगा. मैंने पहले भी देखा था कि उसमें बहुत स्त्रिायोचित अवगुण नहीं हैं.

उसका आप्रेशन सफल रहा. बहुत सुन्दर हो गई थी वह, जैसे घने काले बादलों में से होकर चांद और निखर आया हो.

वह फिर अपने काम में लग गई और मैं अपनी दिनचर्या में. मैं पचासवें वर्ष में पहुंच गया था. पर कदकाठ ठीक होने से अपनी उम्र से काफी छोटा लगता था.

मल्लिका का एम.सी.एच. थीसिस समाप्ति की ओर था. उसका मेरे पास आना बढ़ गया था. मैं यंत्रवत् काम करने का आदी था, दफ्तर तथा अस्पताल में.

इधर कुछ दिनों से, मुझे मल्लिका में कुछ परिर्वतन लग रहा था. वह जान बूझकर अपने आप को, मेरे पास अटकाने लग गई थी. मैं उसके शोध पत्र उसे वापिस करता तो वह इधर-उधर की बातें करने लगती.

उसका एम.सी.एच. पूरा हुआ, तो जो हुआ, मेरे लिए अनपेक्षित था. वह दौड़ी हुई मेरे दफ्तर में घुसी होगी, क्योंकि उसकी सांस फूली हुई थी. दफ्तर काफी बड़ा था. उसका एक रास्ता प्रयोगशाला में से होकर आता था. वह उसी से आई थी लगभग भागती हुई. उस वक्त मैं वहां अकेला था.

इससे पहले मैं उससे कुछ कहता, वह आकर मुझ से चिपट गई, ‘‘ओह! सर इट इज ब्यूटीफुल, इट इज रियली ब्यूटीफुल.’’ वह कह रही थी, ‘‘सर! मैंने अपना चेहरा मात्र आज ही देखा है आइने में.’’ मैं हैरान था. उसने बांहों में कसकर मुझे चूम लिया. मुझे वह एक बच्ची सी लगी.

वह किसी अजीब जोश में थी. कहने लगी, ‘‘सुनिये सर! अब आपकी नां-वां नहीं चलेगी. आपको विवाह करना पड़ेगा, परसों इतवार है. हम दोनों उसी दिन विवाह करेंगे, मैं और आप. सुन रहे हैं ना आप?’’

मैं पूरे दो दिन उसे समझाता रहा. अपनी और उसकी उम्र का हिसाब, जमा घटा करके, कितनी बार समझाया- उसके परिवार, उसके माता-पिता की बात की. पर वह अड़ी रही.

हमने रजिस्ट्रार के यहां जाकर विवाह कर लिया. इसमें एक शर्त थी मेरी कि मैं कभी भारत नहीं जाऊंगा, जो उसने शायद आवेश में मान ली.

सब कुछ अचानक हो जाने की वजह से विवाह में हम दोनों के रिश्ते नाते के लोग भी शामिल नहीं हो पाए थे. वैसे भी मेरा तो नाता कब का टूट चुका था, अपने सम्बन्धियों से. इधर मल्लिका भी, अपने मां-बाप की इकलौती सन्तान थी.

विवाह को लगभग चार महीने बीत चुके थे. मैं और मल्लिका हीथ्रो विमान पत्तन पर खड़े थे. उसके माता-पिता को लेने आए थे. वे भारत से पहली बार आ रहे थे, हमसे मिलने. मल्लिका बहुत प्रसन्न थी. जैसे ही वे सामने आए, मल्लिका दौड़ कर अपनी मां से चिपट गई. मैंने हमउम्र ससुर के पैर छूने की बजाय हाथ मिलाना ही ठीक समझा. जैसे ही मैं मल्लिका और उसकी मां की तरफ मुड़ा, अभिवादन करने के लिए, मुझे काठ सूंघ गया. मल्लिका की मां...मल्लिका की मां तो वही लड़की थी जिससे मैं सगाई तोड़ कर भागा था तथा जिसकी वजह से मेरे जीवन में आमूल परिर्वतन आ गया था.

‘‘अरे! मिलो ना मां से,’’ मल्लिका ने मुझे टोका. मेरे हाथ यथावत् अभिवादन की मुद्रा बना बैठे, पर दिल पर एक चट्टान सी आ पड़ी थी. मुझे लगता है कि अदावत मेरा पीछा मरते दम तक नहीं छोड़ेगी.

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