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प्राची - जुलाई 2016 / उषा प्रियवंदा के कथा साहित्य में आधुनिकता का बोध कराते नारी पात्र / डॉ. विरल पटेल

 

शोध आलेख

उषा प्रियवंदा के कथा साहित्य में आधुनिकता का बोध कराते नारी पात्र

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डॉ. विरल पटेल

हिंदी कथा-साहित्य में आधुनिकता का बोध कराते हुए नवीन दिशा की ओर ले जाने में उषा प्रियवंदा का विशेष योगदान रहा है. अपने रचना संसार में आधुनिक नारी जीवन की विसंगतियों को स्थान देते हुए नारी मन की मनःस्थितियों एवं भारतीय संस्कारों के मध्य उठने वाले अन्तर्द्वन्द्वों को बड़ी सफलता से उकेरा गया है. अकेलापन, ऊब, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, कुण्ठा, पलायनवादी प्रकृति, असंतोष, घुटन, संत्रास जैसी मनोवृत्तियां उषाजी के साहित्य में विद्यमान हैं.

जो भी हो उषाजी के नारी पात्र शिक्षित, स्वच्छन्द विचारों के साथ, आत्मनिर्भर और बोल्ड होकर जीने में विश्वास करते हैं. ''रुकोगी नहीं राधिका'' उपन्यास की ''राधिका'' स्वतंत्र विचारों वाली शिक्षित नारी है और स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है. वह विदेशी पत्रकार (डैन) से विवाह संबंध स्थापित करना चाहती है. इसके लिए वह अपने पिता से भी विरोध कर लेती है- ''जो आप चाहते हैं वही हमेशा क्यों हो? क्या मेरी इच्छा कुछ भी नहीं है?...अब मैं बड़ी हो चुकी हूं और मैं जो चाहूंगी वही करूंगी.''1

''पचपन खम्भे लाल दीवारें'' उपन्यास में ''सुषमा'' जो कि मध्यमवर्गीय नौकरी करने वाली युवती है, जीवन में ऊब, घुटन, अकेलापन का अनुभव करती है. उसके मन में प्यार की उमंग है. वह जीवन साथी की कल्पना करती है और ''नील'' के प्रति वह समर्पित है. लेकिन विवाह के सन्दर्भ में उसके विचारों में

आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखती है. ''जीवन में बहुत महत्वपूर्ण काम हैं, सिर्फ विवाह ही नहीं! और देशों में देखिए, बिना विवाह किए सारी औरतें कैसे मजे से रहती हैं."2

''जाले'' कहानी की ''कौमुदी'' जो कि स्त्री-पुरुष की समानता में विश्वास करती हैं, पुरुषों से स्वतंत्र रूप से मिलती हैं पर अनैतिक संबंध नहीं रखती. वह विवाह को बंधन मानती है. किसी पुरुष की देखभाल, कमीज में बटन हैं, कि खाना बन गया है, कि कमरे साफ-सुथरे हैं...इन सबसे ठहरावदार यौवन छोटा-सा घर और स्वतंत्रता कौमुदी को अधिक प्यारी और मूल्यवान लगती है.''3

''मोहबंध'' कहानी में ''अचला'' और ''नीलू'' दोनों शिक्षित हैं, मगर दोनों में चारित्रिक अंतर हैं. जहां एक ओर ''अचला'' मुक्त विचारों के साथ पुरानी मान्यताओं को भी आत्मसात करती है, वहीं ''नीलू'' केवल मुक्त विचारों की पोषक है तथा उसमें आधुनिकता का गहरा प्रभाव भी देखने को मिलता है. वह प्रेम को महज समय गुजारने का जरिया मानती है. उसके लिए प्रेम, प्रेमी, विवाह सब अलग-अलग हैं. वह कई पुरुषों को अपने प्रेम जाल में फंसाती है, यहां तक कि अचला के पति (देवेंन्द्र) को भी. इतना ही नहीं वह अपने पति से कहती है- "तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते राजन. में एक दायरे में

बंधकर नहीं रह सकती.''4

''कंटीली छांह'' कहानी की ''राजी'' पर तो आधुनिकता इतनी हावी है कि वह अनैतिक सम्बंधों को भी सही ठहराती है उसका मानना है- ''जीवन की राह पर चलते हुए यदि कोई राही किसी पेड़ की छांह में खड़ा हो जाए तो मैं उसे बुरा नहीं समझती.''5

''सम्बंध'' की ''श्यामला'' विदेश में एक विवाहित डॉक्टर से प्रेम करती है और विवाहित पुरुष से अनैतिक सम्बंध को वह गलत नहीं मानती. साथ ही वह प्रेम और विवाह की पुरानी मान्यताओं का खण्डन करती है. प्रेम का अन्तिम परिणाम विवाह हो यह आवश्यक नहीं. तभी तो वह विदेश में अपने प्रेमी (डॉक्टर) जो कि अपने परिवार को छोड़कर विवाह करने को तैयार होता है तो वह कहती है- ''प्रेम करती है पर किसी बंधन में बंधना नहीं चाहती और शर्त भी रखती है कि एक-दूसरे पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे, कोई डिमाण्ड नहीं करेगें, दोनों में से कोई एक दूसरे के प्रति जिम्मेदार नहीं होगा.''6

''जिन्दगी और गुलाब के फूल'' में नारी पुरुष से श्रेष्ठ है, बेटा और बेटी में अन्तर जैसी मान्यताओं पर भी आधुनिकता का प्रभाव साफ झलकता है. वृन्दा आत्मनिर्भर है, इसलिए मां भी बेटे की अपेक्षा बेटी को अधिक महत्व देती है और वृन्दा कमाऊ लड़कों की तरह रौब जमाती है. वह भाई से कहती है- ''काम न धंधा, तब भी दादा (भाई) से यह नहीं होता कि ठीक वक्त पर खाना खा लो. तुम कब तक जाड़े में बैठी रहोगी. मां उठाकर रख दो, अपने आप खा लेगें."7

उषाजी के कथा-साहित्य में नारी-पात्रों पर आधुनिक परिवेश एवं पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव वर्तमान है. चाहे वह अकेलेपन से जूझ रहे, चाहे ऊब का शिकार. वह मुक्त जीवन व्यापन में विश्वास करती है. विवाह-बंन्धन को अधिक महत्व न देते हुए पारिवारिक तनावों के मध्य आधुनिक शिक्षित नारी की आत्मनिर्भरता एवं आने वाली पीढ़ी की नारी कैसी होगी इसका इतना सुन्दर एवं सफल चित्रण उषाजी की महान उपलब्धि है.

संदर्भ-

1. रुकोगी नहीं राधिका, पृष्ठ 51

2. पचपन खम्भें लाल दीवारें, पृष्ठ 10

3. जिंदगी और गुलाब के फूल, पृष्ठ 30

4. वही पृष्ठ 22

5. वही पृष्ठ 93

6. कितना बड़ा झूठ, पृष्ठ 13

7. जिंदगी और गुलाब के फूल, पृष्ठ 148

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