प्राची - अगस्त 2016 / व्यंग्य / मैं बपुरा बूड़न डरा / सुशील यादव

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

व्यंग्य

मैं बपुरा बूड़न डरा

सुशील यादव

‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ.

मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ...!’

इन पंक्तियों को पढ़ के संत कबीर के बाद, मुझे अपने पर लानत भेजने का जी करता है.

‘बपुरा’ जिन्दगी भर डूबने से डरते रहा, लानत है.

वैसे बपुरे का नाती ‘यू एस’ में फकत छः साल की उम्र में, तैरने में, यूं जी रमा बैठा है कि पानी से बाहर खींच के लाना पड़ता है. अपनी तैराकी का रिकार्ड सुनाते हुए, खांटी-इंग्लिश में कहता है, ‘नाना, आई हेव ब्रोकन रिकार्डस इन स्वीमिंग...आई स्विम ऐवरी डे, डू यू नो स्वीमिंग...?

मैं उससे कहता हूं, अपने स्वीमिंग इंस्ट्रक्टर से कहना, मुझे भी सिखा दें स्वीमिंग...’

वो कहता है, ‘यूं आर ओल्ड मैन नानू, ओनली चिल्ड्रेन्स आर अलाउड हियर...’

फोन काल खत्म होने के बाद, सोने की तैयारी में कई ख्याल, तैराकी को ले कर जबरदस्ती घुसने लगते हैं. गर्मी के दिन हों तो पानी का ख्याल ही सुकून दे जाता है. हरे भरे लॉन, बगीचे स्वीमिंग-पूल, या देहाती स्टाइल के सुबह-सुबह के ताल-तल्लैये में, बपुरे को सीधे घुस जाने का मन करता है.

हम जैसों की स्वीमिंग सेफ्टी प्वाइंट गइय्या माता की पूंछ में, पुराणों में वैतरणी पार कराते हुए दिखाया गया है.

पन्द्रहवीं शताब्दी में जब पश्चिमी देश, समुद्री मार्ग से भारत ढूंढ़ने की कोशिश में थे, पुर्तगाली नाविक श्रीमान ‘वास्को डी गामा’ आठ जुलाई 1497 को 170 अन्य नाविकों सहित चार जहाज में इधर से निकले और 20 मई 1498 को पच्चास के करीब नाविक कालीकट बन्दरगाह तक पहुंचने में सफल हुए. ये हिन्दोस्तान को पानी जहाज मार्फत ढूंढ़े जाने का ‘दर्ज’ इतिहास है.

अपना देश एक छोटे नक्शे से उठकर, बड़े नक्शे का हिस्सा करीब छः सौ सालों से बन गया है. एटलस नए तरीके से छपे-छापे जाने लगे.

मुझे सारे नाविकों के काल्पनिक चेहरे, न जाने क्यों तैराकी सीखते हुए नजर आने लगते हैं, कारण कि तैराकी सीखे बिना कोई ‘‘गहरे पानी पैठ’’ वाला रिस्क ले ही नहीं सकता था. उनके हर एक के, गांव-कस्बों में पोखर-तालाब रहे होंगे, कोई डांटने-डपटने वाला शायद न रहा हो. डांटने-डपटने से प्रतिभाएं उभर के सामने नहीं आ पाती. अपनी तरफ प्रतिभाओं की कमी होने में ये भी एक बुनियादी कारणों में से एक हो सकता है? तैराकी में, एक-आध स्वर्ण पदक की उम्मीद तभी की जा सकती थी, जब कोई तरीके से पानी में घुटने भर, उतरने का रिस्क तो लिया होता.

अपनी कमी को, आदमी जब आंकने में, टूटने लगता है तो दूसरों की कामयाबियां, उसमें नया जोश, नई उमंग पैदा करती हैं.

तैराकी को लेकर मैंने बड़े चेहरों को याद करने की कवायद की. वीर सावरकर को याद कर लिया. कैसे काले पानी को तैरकर पार किया होगा...? पनामा नहर तैरने वाला भी कोई इंसान ही था.

पानी से एलर्जी रखने वाले, हम जैसे लोगों को छोड़ दें तो दुनिया में कारनामे बाजों की कमी नहीं?

एक दूसरे सन्दर्भ में अपने बजरंगबली भी याद आये. बिन तैरे समुद्र को लांध के पार करने की टेक्नीक ईजाद करने वाले, इस महान (?) को, रहती दुनिया तक हिंदोस्तां कभी भूल नहीं पायेगा.

पानी के जहाज से जाने कब मैं राजनीति के ड्राई पोर्ट पर उतर आया.

पानी में तैरना और जमीन में पांवों से चलना, एक्सरसाइज करने वालों की दुनिया में, बराबर के महत्त्व वाले अभ्यास हैं.

दोनों के समान महत्त्व को देखते हुए कुछ राजनीति के समुंदर में, डूबने उतराने वाले नाविकों-तैराकों पर नजर घुमा लें.

सोमनाथ से अयोध्या तक, सांसदों के दो से दो सौ के आंकड़े तक ले जाने वाले भारतीय शूरवीर, जनतंत्र के ‘वास्को डी गामा संस्करण’ अडवानी जी आजकल पता नहीं कहां अपने पाल तम्बू समेट रहे होंगे?

एक अन्ना जी ने आधी दूर का सफर किया और बिना अपनी बात मनवाए अपना दम आप फुला बैठे.

योग-बाबा अपने अनुलोम-विलोम के टब में कितनों को तैराने लगे थे.

‘मफलर लेस मैन’ तैरने के लायक पानी न होने के बावजूद, हर किसी को अथाह जल समाधि का सपना दिखा-दिखा के दिल्ली लूट ले गए. जल शून्य शहर में सबको उम्मीद के टैंकर से सराबोर कर गए.

एक जनाब ने ‘गंगा मैया’ की साफ सफाई का वादा क्या किया और मैय्या ने क्या मतलब निकाला कि कांग्रेस की

धुलाई-सफाई साथ-साथ हो गई. अब देखना है, खुद तैरने लायक फुरसत विदेश दौरे के बाद कब निकाल पाते हैं?

सब की अपने अपने तरीकों से तैराकी चल रही है. गहरे पानी पैठ की जगह गहरे मतदाता पैठ की संगत चल रही है. जो मतदाता के जितने गहरे घुस रहा है, उसकी बांछें उतनी कलफदार खिल रही हैं. मूंछ में ताव देने का मजा भी तभी है, जब मूंछ कड़कदार फौजी स्टाइल की हो.

मियां...! आर्कमिडीज ने जब तैरने का नियम बनाया नहीं था, तब लोग कैसे तैरा करते रहे होंगे, ये प्रश्न उतना ही कठिन है जितना गुरुत्वाकर्षण की खोज के पहले, सेब जमीन पर ही क्यों गिरता रहा, वाला है. अगर दोनों वैज्ञानिक, एक साथ खोज का बीड़ा उठाये होते, तो आदमी तैरते-तैरते सेब का स्वाद, मजा और आनन्द एक साथ चख सकता था.

मैं, भले मानुष की तरह उलजलूल बहुत सोचे रहता हूं. कहां की बात कहां ले जाता हूं. ज्यादातर ये गूगलेरिया के लक्षण प्रतीत होते हैं. आदमी गूगल-बाज होने लगे तो ऊपर वाला ही मालिक है. ये हलके-फुल्के विचार आ-आ के, मेरी नींद चुरा ले जायंगे, ये तय लगता है.

मैं जानता हूं जवानी के दिन लद जाने के बाद सठियाये हुए विचार इसी किसम के हुआ करते हैं.

मुझे ये भी पता है, पकी-अधपकी नींद में बार-बार ‘ग्रेन्डसन’ मुझे चिढ़ाता रहेगा, ‘नानू यूं डोंट नो स्वीमिंग, शेम...शेम...’

बपुरे को, कम से कम घुटने भर पानी में उतरने का रिस्क जरूर लेना चाहिए था. कुछ इधर-उधर छपछपाना था. लगता है जिन्दगी में कहीं कुछ चूक हो गई...?

डूबने का डर मन से निकालना तब की जरूरत भले न रही हो, अब की जरूरत जरूर दिखती है.

सम्पर्कः न्यू आदर्श नगर, जोन-1,

स्ट्रीट 3, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

मोः 09408807420

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "प्राची - अगस्त 2016 / व्यंग्य / मैं बपुरा बूड़न डरा / सुशील यादव"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.