विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

प्राची - अगस्त 2016 / व्यंग्य / बेचारा मर्द / अर्चना चतुर्वेदी

व्यंग्य

बेचारा मर्द

अर्चना चतुर्वेदी

वर्षों से बेचारी का ठप्पा औरतों पर लगा था. अब 21वीं सदी आ चुकी है और इस सदी की नारी तो सब पर भारी है. फिर मर्दों की क्या बिसात कि उनके सामने सीधे खड़े भी हो पायें. आज की नारियों का हर हुक्म बजाने के अलावा मर्दों के पास कोई चारा नहीं, सो आज का मर्द बेचारगी की तरफ काफी हद तक बढ़ चुका है. क्यों विश्वास नहीं आपको? वो कहावत है ना ‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या..’’

इसका जीता जागता उदाहरण आपको किसी मॉल में या बाजार में देखने को मिल जाएगा, जहां मैडम यानि पत्नी जी आराम से पर्स हिलाती एक दूकान से दूसरी दूकान पर घूमती नजर आएंगी और पीछे पीछे पतिदेव एक कंधे पर बैग और एक कंधे पर बच्चा लादे चलते दिख जायेंगे, जिससे मैडम आराम से शापिंग कर लें और शहरों में ये सीन आम है. यदि कहीं खाने जायेंगे तो पतिदेव बच्चा संभालेंगे, जिस से पत्नी जी आराम से खा लें. यदि फिल्म देखने जायेंगे और बच्चे कुछ चाहिए या सुशु जाना हो तो पापा ही जायंगे मम्मी नहीं( क्योंकि मम्मी को फिल्म बीच में छोड़ना पसंद जो नहीं.

अजी जनाब हमारे देश की औरतें तो आज भी आजाद हैं यानि कि हम औरतें अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ कर घर पर रह सकती हैं और पति की कमाई पर ऐश कर सकती हैं, किट्टी पार्टी कर सकती हैं, नित नई शोपिंग कर सकती है. पर बेचारे पतिरूपी मर्द को तो सर्दी, गर्मी, बरसात कमाना ही है सो वो कमा रहा है. वो यदि घर बैठे तो पड़ोसी और रिश्तेदार ही उसे परेशान कर डालेंगे ‘‘बीबी की कमाई खा रहा है’’, और तो पत्नी की कमाई पर रहने वाले मर्द को ऐसे हिकारत भरी नजरों से देखेंगे मानो उसने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर डाला हो ,बेचारा! अब ऑफिस में पति को कोई असिस्टेंट मिले ना मिले, पर हम औरतें तो भई बिना कामवाली के काम नहीं कर सकते और तो और घर का कोई सामान खत्म हो जाये तो पति को तुरंत फोन करेंगे, ‘‘जानू आते वक्त प्लीज मार्केट से फलां फलां सामान ले आना, मार्केट तो रस्ते में ही है.’’ अब इतने प्यार से कहा है, वो बेचारे मना तो कर ही नहीं सकते ना. अब तो सरकार भी मर्दों को बेचारा बना कर ही दम लेगी. बहुत कर लिया हम औरतों पर राज ‘‘अब आया ऊंट पहाड के नीचे’’ औरतों ने शोर मचा मचा कर मेट्रो में पूरा एक डिब्बा अपना बना लिया. उसके बाद भी मर्दों के डब्बे में घुसेंगी, जबकि पहले मर्दों से ही परेशानी थी. पर वो भी जानती हैं, परेशान करने वाले तो कुछ ही परसेंट होते हैं, पर बदनाम तो सब होते हैं. गाली तो बेचारे सारे मर्द ही खाते हैं, औरतें पूरे कांफिडेंस के साथ ये बयान देती अक्सर सुनी जाती हैं ‘‘सारे मर्द एक जैसे होते हैं’’ हां, तो दूसरे डिब्बे में घुसेंगी वहां भी बुजुर्ग और महिला आरक्षित सीट है. वैसे तो किसी ृ0 साल की महिला को भी आंटी बोल दो चिढ़ जाएँगी ’’मैं तुम्हें आंटी दिखती हूँ‘‘ पर मेट्रो की सीट हथियाने के लिए तो 40 में भी बुजुर्ग बन जाएंगी. और तो और 18-19 साल की जवान लड़की जो दोस्तों के साथ घूम फिर कर आ रही होगी किसी बेचारे थके मांदे मर्द को सीट पर तुरंत उठा देगी, ‘‘एस्क्यूज मी, ये महिलाओं की सीट है जी.’’ मर्द तो घर बाहर हर जगह बेचारा ही है. यदि बेचारा नहीं है, तो घर पर अपनी पसंद का टीवी प्रोग्राम देख कर दिखाए. जब पत्नी जी अपना पसंदीदा टीवी सीरियल देख रही हों, उस वक्त तो बेचारा चूं भी नहीं कर सकता, चैनल बदलना तो बहुत दूर की बात है. अजी ये मर्द यदि पति रूप में हैं तब तो अपनी पसंद का खाना तो क्या बेचारे अपनी पसंद के कपडे भी नहीं पहन सकते हैं, वो भी श्रीमती जी ही डिसाइड करेंगी.

सरकार की तो छोडो ये फिल्म वाले भी मर्दों के दुश्मन हैं. बताओ डायलोग बनाया ‘‘मर्द के दर्द नहीं होता’’ बताओ ये भी कोई बात हुई! मर्द क्या जीता जागता नहीं है, दर्द तो जानवर के भी होता है, और वैज्ञानिकों के अनुसार तो पेड़ पौधों के भी होता है, फिर ये बेचारा मर्द क्या जानवर या पेड़ पौधों से भी गया गुजरा है, या भगवान है? लो बच्चू और ले लो मजे..तुम्हें ही तो पति परमेश्वर बनने का शौक था, अब भुगतो. तुम मर्द लोग तो इतने बेचारे हो कि रो भी नहीं सकते, सब हंसी जो उड़ायेंगे, ‘‘अबे तू औरत है क्या जो रो रहा है?’’

हम औरतों का अच्छा है, जब मर्जी बुक्का फाड़ के रो लें. मजाल है कोई हंसी उड़ा दे. अरे हम तो चलती सड़क पर स्कूटर किसी मर्द में दे मारे और गिर जाएं तो भी तुम ही पिटोगे बच्चू. हमें तो उठाने वाले भी बहुतेरे आ जायेंगे, तुम ही उठना लंगडाते हुए खुद ब खुद और सुनना ‘‘देख कर नहीं चलता क्या?’’

हम शहरी औरतें और लड़कियां तो इतनी बोल्ड हैं कि सास ज्यादा चूं चपड़ करे तो दहेज के केस में अंदर ही करा दें, भले ही शादी बिना दहेज के हुई हो. हमारी मर्जी, हम जब चाहें पति पर घरेलू हिंसा का केस कर दें. भले ही वो बेचारा हमारे सामने मुंह भी ना खोल सके. हमें तो मर्द को बेचारा बना कर ही छोड़ना है. अरे हमारा मन भर जाये तो हम उस पर झूठा मुकदमा करके तलाक भी मांग लेंगे, आधी जायदाद तो हमारी है ही. खर्चा भी वही देगा.

किसी मर्द ने जरा भी औरतों के खिलाफ कुछ बोला तो नारी शक्ति जाग जायेगी और मुकदमा कर देगी. मर्दों की इतनी हिम्मत कि नारियों के बारे में कुछ बोलें. मर्दों के बारे में जितना मर्जी बोलो पर किसी जाति, किसी प्रदेश और किसी औरत के बारे में मत बोलना. इस देश में तो कतई नहीं. अब बताओ हुए ना मर्द बेचारे, हम नहीं हा हा हा खबरदार! आगे से किसी महिला को बेचारी कहा तो...

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget