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प्राची - अगस्त 2016 / अनोखा रिश्ता / कहानी / शिवकुमार कश्यप

कहानी

‘‘कब से उटपटांग बके जा रही हो. क्या समझ रखा है अपने आपको? क्या सभी आदमियों को एक जैसा समझ रखा है? हाथ-पैर सही सलामत हैं, बातचीत से पढ़ी लिखी मालूम होती हो, क्या और कुछ काम नहीं कर सकती? इस देह के अलावा तुम्हारे पास एक दिमाग भी तो है, उसकी कमाई खाने की कोशिश क्यों नहीं करती हो?’’ फिर मैं बिना एक पल रुके वहां से चला गया.

अनोखा रिश्ता

शिवकुमार कश्यप

भी एक सप्ताह पहले ही मैं ट्रांसफर होकर इस शहर में आया था. यह एक छोटा शहर है, जो मुख्यालय होने के कारण महत्वपूर्ण बन गया है. मैं उस छोटे शहर के एक बड़े होटल में बैठा था. मैं वहां रात का भोजन करने आया था. मैं मेनूकार्ड पढ़ने में तल्लीन था कि कोई आकर बड़ी बेतकल्लुफी से मेरे सामने बैठ गया था. मेरा ध्यान अब भी मेनूकार्ड पर ही था. तभी एक खनकती-मचलती आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘मैं कुछ हेल्प करूं?’’

मैंने चौंककर देखा, सामने लगभग उन्नीस-बीस वर्षीय एक युवती बैठी मेरी तरफ अपलक देख रही थी. मैं कुछ कहता, इससे पहले उसने ही फिर से बात का सिरा पकड़ा, ‘‘मेरा नाम रूमा है, रूमा डोरथी. मैं यहीं पास में रहती हूं. मैंने आपको पहले कभी यहां नहीं देखा, मैं तो यहां अकसर आती रहती हूं. आप शायद नए हैं या फिर टूर पर आए हैं. मैं आपकी कोई सेवा कर सकती हूं? कोई जरूरत हो तो बिना झिझक बताएं.’’ वह फिर मुस्कराने लगी.

अचानक एक साथ उसके परिचय और इतने सारे सवालों के बीच मैं उलझकर रह गया. इस परिस्थिति में इस अनजान शहर में पहले तो मैं थोड़ा डरा, फिर संभलकर बोला, ‘‘जी नहीं, मुझे किसी सेवा की जरूरत नहीं है.’’

‘‘चलो, सेवा न सही, अपना परिचय तो दे सकते हैं. क्या शुभ नाम है आपका? यहां कहां ठहरे हुए हैं?’’ उसने बड़ी बेबाकी से कहा.

उसकी तेज धारदार आवाज के बीच मेरा गला फंस गया था और कोई आवाज ही नहीं निकल पा रही थी. मैंने आस-पास नजर दौड़ायी. सभी लोग अपने में व्यस्त और मस्त. मैं उठकर जाने ही वाला था कि बेयरा आ गया ऑर्डर लेने. मैं अब किसी तरह यहां से निकल भागना चाहता था. इसलिए खाने का विचार छोड़कर उसे दो कॉफी का ऑर्डर देकर अपनी जान छुड़ायी.

‘‘ये दो कॉफी क्यों? क्या आप एक साथ दो कॉफी पियेंगे?’’ उसने मुझे चिढ़ाने के अंदाज में पूछा. ‘‘जी एक आपके लिए है, आप भी तो पियेंगी!’’ मैंने गला साफ करते हुए कहा.

‘‘मैं किसी अजनबी की कॉफी क्यों पिऊं? जिसका नाम तक अभी मुझे नहीं मालूम,’’ उसने थोड़ी रुखाई से कहा.

‘‘मेरा नाम पीयूष वत्स है. मुंबई से ट्रांसफर होकर यहां आया हूं. घर पर एक बीवी है, दो बच्चे हैं. मैं यहां संतोष नगर में रहता हूं. वो सामने जो बैंक दिख रहा है, उसमें मैं काम करता हूं. बस या और कुछ?’’ मैंने एक सांस में कहकर उसकी ओर देखा.

उसने बड़ी स्निग्धता से मुझे निहारा. उसकी निगाहों की तरलता मेरे अंदर तक फैल गयी. फिर उसने अत्यंत धीमे किंतु सधे शब्दों में कहा, ‘‘फिलहाल, इतने से काम चल जाएगा. और अब मैं आपकी कॉफी पी सकती हूं.’’ और उसके सलोने चेहरे पर मंद मुस्कान तैरने लगी. फिर मेज पर हल्की-हल्की थपकी देती हुई बोली, ‘‘मैं आपको साहब बोलूंगी, चलेगा न!’’

‘‘चलेगा’’ मैंने संक्षिप्त जवाब दिया.

कॉफी पीने के बाद मैं बाहर आया तो वह भी पीछे-पीछे आ गयी. तब मैंने उससे कहा, ‘‘क्या बात है? देखिए, अब मैं जाना चाहता हूं.’’

मेरी उकताहट भांपने के बावजूद वह बोली, ‘‘साहब, यहीं पास में लॉज है, केवल सौ रुपए...’’

‘‘चुप रहो!’’ मैंने उसे जोर से बीच में ही डांटा.

‘‘कब से उटपटांग बके जा रही हो. क्या समझ रखा है अपने आपको? क्या सभी आदमियों को एक जैसा समझ रखा है? हाथ-पैर सही सलामत हैं, बातचीत से पढ़ी लिखी मालूम होती हो, क्या और कुछ काम नहीं कर सकती? इस देह के अलावा तुम्हारे पास एक दिमाग भी तो है, उसकी कमाई खाने की कोशिश क्यों नहीं करती हो?’’ फिर मैं बिना एक पल रुके वहां से चला गया.

अपने कमरे पर आकर जब मैंने शांत चित्त से पूरे घटनाक्रम पर गौर किया तो मुझे अपने पर आश्चर्य हुआ और ग्लानि भी. आश्चर्य इसलिए कि इस अंजान शहर में बिना किसी भय के मैंने किस तरह कठोरता से उसे फटकारा और ग्लानि इसलिए कि उस लड़की को फटकारने की बजाय मैं ऐसी सामाजिक व्यवस्था को क्यों नहीं फटकारता, जिसमें किसी स्त्री को अपनी आजीविका के लिए अपनी देह बेचनी पड़ती हो.

बहरहाल इस बात पर मैंने ज्यादा सोचना उचित नहीं समझा, क्योंकि परिणामशून्य सोच का क्या फायदा. हां, मैंने इतना जरूर किया कि उस दिन के बाद से उस होटल की तरफ पुनः रुख नहीं किया.

लगभग एक सप्ताह बाद की बात है. मैं ऑफिस के काम से बाहर गया था. दोपहर बाद जब लौटा तो वह मेरी मेज के सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी. उसे देखते ही मुझे बड़ा गुस्सा आया कि वह यहां तक पहुंच गयी. किंतु इसके पहले कि मैं कुछ कहता, वह उठकर खड़ी हो गयी और अत्यंत दीन आवाज में बोली, ‘‘साहब, मुझे एक सौ रुपये दे दीजिए, बहुत सख्त जरूरत है. मेरी छोटी बहन बहुत बीमार है. इलाज के लिए पैसे चाहिए, मेरे पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है. कई जान-पहचान वालों से निराश होने के बाद मैं आपके पास आयी हूं. मैं जानती हूं कि मैंने गलती की है, किंतु मेरे पास और कोई चारा नहीं था. इसलिए...’’ और उसका गला रुंध गया और आंखों के दोनों कटोरे जल से लबालब भर गये. मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो उसे देखता रहा. उस समय ऑफिस के लोग भी मेरी तरफ कनखियों से देख रहे थे. मैं बड़े असमंजस में था. अंत में मैंने ‘जो होगा देखा जाएगा’ का भाव मन में लाकर उसे दो सौ रुपये दे दिए और कहा, ‘‘जाओ, इलाज कराओ मैं शाम को आऊंगा.’’

वह चली गयी. फिर मेरा मन काम में नहीं लगा. मेरी सभी फाइलों-पेपरों में वही जल से लबालब दो आंखें दिखायी पड़ रही थीं.

शाम के समय, मैं ऑफिस से निकलकर थोड़ी दूर ही गया होऊंगा कि सामने से वह आती हुई दिखी. इस समय वह सवेरे से बिल्कुल अलग लग रही थी. हलके मेकअप और धुली हुई गुलाबी साड़ी में उसका सौंदर्य बड़ा मधुर लग रहा था. मैंने उसे भरपूर निगाह से देखा और फिर कहा, ‘‘यहां!’’

‘‘साहब, मैं घर पर किसी को कभी नहीं बुलाती. यह काम घर पर नहीं करती. आपने शाम को आने को बोला था, इसलिए आपके आने से पहले ही मैं यहां चली आयी ताकि मेरी बहन को यह सब मालूम न पड़े,’’ उसने अपनी सफाई दी.

मेरे ऊपर घड़ों पानी पड़ गया. मेरे शाम को आने का उसने जो अर्थ लगाया था, उससे मेरा माथा चकराने लगा. मैंने अपने आपको संभाला. मुझे उस पर क्रोध के बदले दया आ गयी. जिसे हमेशा देह के एवज में ही पैसा मिला हो, वह उस परिस्थिति में ‘‘शाम को आने’’ का और क्या मतलब निकाल सकती थी.

मैंने अत्यंत आत्मीयता से उससे कहा, ‘‘अरे रूमा, मैंने शाम को तुम्हारी बहन को देखने आने के लिए कहा था, इसके लिए नहीं. कैसी है तुम्हारी बहन? चलो मैं भी उसे देखना चाहता हूं.’’ इतना सुनते ही उसके चेहरे पर एक चमक आ गयी और आंखों के दोनों कोनों से दो बूंद भी टपक पड़े. उसने रुंधे गले से कहा, ‘‘चलिए, साहब!’’

उसका घर क्या था, एक झोंपड़ी थी, जिसकी दीवारें कच्ची ईंट की थीं. छत के नाम पर आधी दूरी टूटे टीन तथा आधी दूरी पर टूटे-फूटे खपरैल थे. अंदर एक चारपाई थी, जिस पर एक मैली दरी पड़ी थी. लकड़ी का एक पुराना स्टूल था, जिस पर उसने मुझे झिझकते हुए बिठाया.

उसकी बहन लगभग दस-बारह वर्ष की रही होगी. वह बीमारी और भूख से अत्यंत कमजोर एवं पीली लग रही थी.

रूमा ने परिचय कराते हुए कहा, ‘‘गुड्डी, ये पीयूष साहब हैं, इन्होंने ही तुम्हारे इलाज के लिए पैसे दिए थे. साहब बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

इस प्रकार के परिचय से मुझे थोड़ा संकोच हुआ. इसका प्रतिवाद भी करना चाहा, किंतु गुड्डी की हालत देखकर चुप रहना ही उचित समझा. बातों-बातों में रूमा ने बताया, ‘‘साहब, उस दिन के बाद से मैंने वह काम नहीं किया. इसलिए मेरा हाथ खाली हो गया. जिससे भी काम मांगती, वही मेरी देह को भूखी नजरों से देखता और जब थक हार कर वह काम करने को सोचती तो मुझे आपकी फटकार याद आ जाती.’’

मैंने कुछ नहीं कहा, बस अपलक उसकी ओर देखता रहा. उसकी आंखों की कोरों में आसूं की बूंदें झिलमिला रही थीं. मेरा सिर नीचा हो गया.

कुछ देर रुककर मैं चला आया.

उसके बाद हम प्रायः मिलते रहे. मैं उसके घर जाता, वह भी मेरे घर आती. हमारी अच्छी दोस्ती हो गयी. तभी मुझे पता चला कि रूमा हाई स्कूल पास है और वह भी प्रथम श्रेणी में. एक दुर्घटना में मां-बाप दोनों की मृत्यु हो जाने के कारण वह आगे न पढ़ सकी और कमाई का कोई स्रोत न होने के कारण, उसकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए सभ्य समाज ने उसे कमाई का यह रास्ता दिखा दिया था.

मैंने उसे प्रोत्साहित करके शिक्षिका के प्रशिक्षण में प्रवेश दिलाया तथा मेरे प्रोत्साहन से उसकी बहन ने भी स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया. शिक्षिका की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उसे सरकारी प्राथमिक विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी मिल गयी. उसका विद्यालय शहर से दूर एक कस्बे में था. मेरी सलाह पर उसने वहीं पर दो कमरे का एक सेट किराये पर ले लिया और अपनी बहन के साथ वहीं रहने लगी.

अब उसकी जिंदगी में निखार आने लगा और उसके अंदर की सुघड़ नारी बाहर झांकने लगी थी.

विद्यालय में पढ़ाते हुए उसने आगे अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. धीरे-धीरे उसने स्नातक परीक्षा पास कर ली और फिर राज्य की सिविल सेवा परीक्षा में बैठने लगी. दूसरे ही प्रयास में उसका चयन तहसीलदार के रूप में हो गया. कोई व्यक्ति किसी बात से इस हद तक प्रभावित हो सकता है, प्रेरित हो सकता है, इसका अनुमान रूमा को प्रत्यक्ष जाने बगैर नहीं लगाया जा सकता.

इस घटना को गुजरे कई वर्ष बीत गए हैं. अब रूमा डोरथी हैं श्रीमती रूमा खन्ना, तहसीलदार. किंतु आज भी रूमा के वे शब्द मेरे कानों में गूंजते हैं, जो उसने तब कहे थे, जब आर्य महाविद्यालय के प्रोफेसर नवीन खन्ना ने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि आपके जो बुजुर्ग हों, रिश्तेदार हों, उनसे समझ-बूझकर इस कार्य को जल्द से जल्दी पूरा कर लेना ठीक रहेगा. संयोग से मैं भी उस समय वहीं पर था. रूमा ने मि. खन्ना से कहा, ‘‘इस दुनिया में मेरा वैसा कोई सगेवाला, रिश्तेदार या बुजुर्ग नहीं है, जैसा आपके कहने का आशय है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मेरा कोई सरंक्षक नहीं है.’’

मेरी तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, ‘‘पीयूष साहब मेरे सगेवालों से बढ़कर हैं, इनका निर्णय ही मेरे लिए अंतिम आदेश होगा.’’

मैंने उनके रिश्ते को अपनी मंजूरी दे दी. मि. खन्ना ने भाव विभोर होकर कहा, ‘‘पीयूष साहब, मैं आपका यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा. भगवान आपको हमेशा खुश रखें.’’

मैंने कहा, ‘‘खन्ना जी, आप जानते हैं कि मैं एक बैंकर होने के साथ-साथ एक लेखक भी हूं. और एक लेखक के लिए उसकी रचना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है. मैं अपने जीवन की सबसे प्रिय रचना आपको सौंप रहा हूं. यदि आप वास्तव में मुझे खुश रखना चाहते हैं तो रूमा को हमेशा खुश रखना.’’

उस घटना को बीते दस वर्ष से भी अधिक हो गये. मैं कब का मुंबई वापस आ चुका हूं. फिर भी हमारा यह अनोखा रिश्ता आज भी कायम है. मैं जब कभी परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते निराश होता हूं तो कुछ पल के लिए रूमा को याद कर लेता हूं.

सम्पर्कः 15-बी, पौर्णमी अपार्टमेंट

पांच पाखाड़ी, नामदेव बाड़ी,

ठाणे (पश्चिम)-400602, (महाराष्ट्र)

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