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प्राची - अगस्त 2016 / दुबे जी की चिट्ठियाँ / व्यंग्य / विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’

व्यंग्य

दुबेजी की चिट्ठियां

विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’

जी सम्पादकजी महाराज,

आपने तो तकाजों के मारे ऐसा नाक में दम किया कि नाक हम समय फूली रहने लगी. नाक फूली देखकर लल्ला की महतारी ने मुंह फुलाया, बोली, ‘‘जब देखो तब नाक फुलाए रहते हैं, मानो किसी को खा जायेंगे-न जाने हर घड़ी नाक फुलाए रहने की आदत कहां से सीखी है.’’

खैर, जब मैंने उसे समझाया तब मानी. आप लिखते हैं कि लेख लिखो-खासे रहे. मैं आपकी तरह फालतू तो हूं नहीं. लेख लिखना तो आजकल बेकारों का काम है-कोई और काम नहीं तो चलो बैठे कागज ही रंगा करो-कागज रंगने की अपेक्षा यदि कपड़े रंगे जावें तो कुछ पैसे ही हाथ लगें. ये सब बातें समझते-बूझते हुए भी सम्पादकों से पिण्ड छुड़ाना बड़े वीर का काम है. लखनऊ के शोहदे बेचारे मुफ्त ही बदनाम हैं. तुम सम्पादक लोग तो उनके भी चाचा हो-बिना लेख लिये टलते ही नहीं. खैर, आपसे कुछ मित्रता का नाता भी है, इसलिए जी में आया कि कुछ सांप-बिच्छू लिखकर बला टालूं. लेख लिखने बैठा तो कागज नदारद. लल्ला की महतारी रसोई में बैठी रोटी बेल रही थी, मैंने उससे कहा-‘‘लल्ला की महतारी, दो आने पैसे हों तो दो.’’ लल्ला की महतारी आंखें चढ़ाकर बोली-‘‘क्या करोगे?’’ मैंने उत्तर दिया-‘‘लेख लिखने के लिए कागज लाऊंगा.’’ वह बोली-‘‘लेख...लेख क्या?’’ अब बड़ी कठिनता पड़ी. लेख के अर्थ कैसे समझाऊं. मैंने सिर खुजलाते हुए कहा-

‘‘लेख...लेख-यही लेख जो हुआ करते हैं.’’ बहुत ठीक-यही लेख जो हुआ करते हैं. कितना अच्छा अर्थ है, पर करता क्या, इसके अतिरिक्त समझाने का कोई और ढंग ही न सूझा. लल्ला की महतारी बोली-‘‘तो दो आने का क्या करोगे? दो पैसे का पोस्टकार्ड बहुत है-बहुत कुछ लिखना हो तो चार पैसे का लिफाफा ले आओ.’’ मैंने कहा-‘‘पोस्टकार्ड और लिफाफे से काम नहीं चलेगा, बहुत-कुछ लिखना है.’’ लल्ला की महतारी चिल्लाकर बोली-‘‘बहुत-कुछ क्या लिखना है, क्या अपनी जनम-पत्री लिखकर भेजोगे? मैं ये बातें सब समझती हूं-पैसे ले जाकर भांग खाओगे. तुम्हारी भांग खाने की आदत कभी छूटेगी थोड़ा ही.’’

इतना सुनते ही मुझे भी क्रोध आ ही गया, आखिर ब्राह्मण का पुत्र ही ठहरा. मैंने हृदय कड़ा करके कहा-‘‘मैं भांग खाता हूं, यह बिलकुल गलत बात है. महीने में यदि पन्द्रह-बीस बार खा ली तो यह भी कोई खाने में खाना है. हमारे पिताजी महीने भर में गिनकर 101 बार भांग खाया करते थे. इसीलिए लोगों में उनका बड़ा मान था और लोग उनके नाम के पहले 101 श्री लिखा करते थे. हमारे नाम के आगे तो कोई 1 श्री भी नहीं लिखता. सो लिखें कैसे, जब से तुम्हारे खुरार-बिन्द आए तब से भांग छूट ही गई. ईश्वर माताजी को चिरंजीव रक्खे-(सम्पादकजी, चौंकिए मत! माताजी को मरे बहुत दिन हो गए-मुझे विश्वास है कि उनका दूसरा जन्म हो गया होगा और इस समय से बाल्यावस्था में होंगीऋ. हां, तो ईश्वर उन्हें चिरंजीव रक्खे-वे स्वयं भांग की बड़ी शौकीन थीं-पिताजी ने भांग पीना उन्हीं से सीखा था-और एक तुम हो कि कभी दूसरे-तीसरे भी भांग नहीं पीतीं. यह मेरा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है!’’

इतना सुनते ही लल्ला की महतारी ने रोटी की तरह मुंह फुलाकर बेलन खींच मारा. वह तो कहिए मेरी खोपड़ी ने बेलन को बीच ही में रोक लिया, नहीं तो पानी का घड़ा फूट जाता-बड़ा नुकसान होता. अजी, खोपड़ी तो अपनी चीज ठहरी-कुछ किराए की थोड़ा ही है, परन्तु यदि घड़ा फूट जाता तो दो आने के माथे जाती. खैर साहब-लल्ला की महतारी का व्यवहार देख जी में तो आया कि मैं बिगड़ जाऊं, परन्तु फिर यह सोचकर कि इस समय लल्ला की महतारी का मिजाज तवे की तरह गरम है-बिगड़ने से अपनी ही खराबी होगी-अर्थात् इच्छा न रहते हुए भी व्रत रखना पड़ेगा. यदि एकादशी होती तो कोई बात न थी-अवश्य ही बिगड़ जाता. यदि व्रत भी रखना पड़ता तो कुछ चिंता न थी, एक पन्थ दो काज हो जाते, परन्तु उस दिन चैत सुदी प्रतिपदा थी, इसलिए मैंने चुप रहना ही अच्छा समझा. और क्या, एक चुप सौ बलाएं टालती है.

कागज के लिए पैसे न मिले, अब क्या करूं. इसी चिंता में बड़ी देर तक बैठा रहा. अंत में आपकी चिट्टियों का ध्यान आया. सब चिट्टियां निकालकर गिनीं-कुल 221 चिट्टियां निकलीं-इनमें पोस्टकार्ड भी मिले थे. पोस्टकार्ड निकाल देने पर लगभग 1ृ0 ऐसे पत्र निकले जो हल्दी, मिर्चों की पुड़िया बनाने का काम बहुत ही सुन्दरतापूर्वक दे सकते थे. बस, फिर क्या था. झट पड़ोस के पन्सारी के पास पहुंचा. उसने सब चिट्टियों के दस पैसे लगाए. मैंने कहा-‘‘ये बड़े मूल्यवान पत्र हैं. मैं इन्हें कदापि न बेचता, पर क्या कहूं, मुसीबत में फंसकर बेचे डालता हूं.’’ पन्सारी ने पूछा, ‘‘क्यों दुबेजी, इनमें कौन-सी ऐसी बात है जो आप इन्हें इतना मूल्यवान बता रहे हैं?’’ मैंने उनमें से आपका एक पत्र जिसमें आपने मेरे एक लेख की प्रशंसा करते हुए मुझे उसके लिए धन्यवाद दिया था, उसे पढ़कर सुनाया. पन्सारी सुनकर बोला-‘‘क्यों दुबेजी, आप जो यह सब लिखकर भेजते हैं तो अखबारवाले आपको कुछ देते भी होंगे?’’ मैंने कहा-‘‘अजी, देना-लेना क्या, मुहब्बत अजब चीज है.’’ पन्सारी बोला-‘‘मेरे साले के साले का मामा भी लिखकर भेजा करता है-उसे तो अखबारवाले कुछ दिया करते हैं. आपको क्यों नहीं देते?’’ यह सुनते ही मुझे क्रोध आ गया-जी में तो आया कि एक चपत मारकर भाग जाऊं, परन्तु सोच-समझकर क्रोध को दबाया और बोला-‘‘वह कोई थर्ड क्लास लेखक होगा, हमारे लेख अमूल्य होते हैं, उनका मूल्य कोई क्या दे सकता है. जितने थर्ड क्लास लेखक होते हैं. उन सबको लेख के बदले में कुछ मिलता है, क्योंकि वे कुछ के लिए ही लिखते हैं. हम लिखते हैं अपना चित्त प्रसन्न करने के लिए और सम्पादक जी के प्रेम-पाश में फंसे होने के कारण. हमारी और उन थर्ड-क्लास लेखकों की क्या तुलना है?’’

खैर, इस वार्तालाप के पश्चात् जब पन्सारी को यह मालूम हो गया कि वास्तव ही में ये पत्र मूल्यवान हैं, तब उसने दो पैसे अधिक दिए. अर्थात् तीन आने दिए. उन तीन आने में से दो आने की तो भांग छान डाली और चार पैसे का कागज लिया. उसी कागज पर यह पत्र लिख रहा हूं.

अब आप कृपा करके लेख के लिए सौ-सवा सौ चिट्ठियां न लिखकर केवल एक पोस्ट कार्ड लिखा करें, और साथ में एक दस्ता कागज भेज दिया करें-इससे आपको लेख शीघ्र मिल जाया करेगा. और यदि आपको यह बात स्वीकार न हो तो कम से कम डेढ़ सौ चिट्ठियां-पोस्टकार्ड नहीं-एकदम से लिख दिया करें, जिससे उन्हें बेचकर कागज खरीद लिया जाया करे. आशा है, आप प्रसन्न होंगे.

अजी सम्पादकजी महाराज,

परसों मेरी एक व्यक्ति से झोड़ हो गई. हिन्दी-साहित्य पर बातचीत हो रही थी. उसी में हिन्दी कवियों का जिक्र आ गया. इस पर वह दुष्ट कहता क्या है कि हिन्दी में अभी तक कोई कवि उत्पन्न नहीं हुआ. इतना सुनना था कि मेरे बदन में आग ही तो लग गयी. आप जानिए. अपने राम नाक पर मक्खी नहीं बैठने देते. मैंने कहा-‘‘आजकल तो बरसाती मेंढक की तरह गली-गली कवि उछलते फिरते हैं, ये क्या आपको दिखाई नहीं देते? यदि यही दशा है तो आपको दिन में ऊंट काहे को सूझता होगा?’’ वह महाशय बोले-‘‘इन्हें आप कवि कहते हैं?’’ मैंने कहा-‘‘इससे आपको क्या मतलब कि मैं इन्हें क्या कहता हूं? आप जो कुछ कहते हों, वह बताइए.’’ वह बोले-‘‘इन लोगों को मैं तुक्कड़ कहता हूं.’’ मैंने कहा-‘‘आप झख मारते हैं. वह कहने लगे-‘‘यह क्या, आप बात करते हैं या गालियां बकते हं? मैंने उत्तर दिया-‘‘बस, आपकी योग्यता का पता चल गया. जिस प्रकार आप झख मारने को गाली समझते हैं, उसी प्रकार कवियों को तुक्कड़ समझते हैं. कहिए, कैसी दलील पेश की? अब आपको बोलने की गुंजाइश नहीं रही.’’ उन्होंने कहा-‘‘दलील क्या खाक पेश की, बेवकूफी की बातें...’’ मैं चिल्ला उठा...‘‘हाय-हाय, यह क्या? जरा समझ बूझकर मुंह से बात निकालिए, क्योंकि मैं भी आप से किसी बात में कम नहीं हूं.’’ वह बोले-‘‘अच्छा, न हम आपकी मानें, न आप हमारी. चलिए, मैं आपको एक साहित्य-मर्मझ के पास लिये चलता हूं-वह जो कुछ कह दें वही ठीक माना जाए.’’ मैं झट कमर कसकर बोला-‘‘चलिए, मैं क्या किसी से डरता-दबता हूं.’’

खैर साहब, वह मुझे लेकर एक महोदय के पास पहुंचे. वह महोदय उस समय हजामत बनवा रहे थे. उन्होंने मेरे साथ के सज्जन को देखते ही मुसकराकर कुछ कहना चाहा( पर उसी समय नाई ने उनका मुंह दबा दिया, इसलिए उन्होंने हाथ से बैठने का इशारा किया. मुझे नाई की इस धृष्टता पर क्रोध आया, परन्तु फिर यह सोचकर कि नाई ने कुछ मेरा मुंह तो दबाया नहीं, मैं चुप हो रहा.

जब वह महाशय हजामत बनवा चुके, तब मेरे साथी से बोले-‘‘कहिए शर्माजी, कैसे पधारे-सब कुशल तो है?’’ वह बोले-‘‘हां, आपकी कृपा से सब कुशल है. इस समय आपके पास झगड़ा लेकर आया हूं. आप उसका फैसला कर दीजिए.’’

वह बोले-‘‘कैसा झगड़ा?’’

मेरे साथी ने मेरी ओर संकेत करके कहा-‘‘ये सज्जन कहते हैं कि हिन्दी में असंख्य कवि हैं और मैं कहता हूं कि हिन्दी में अभी तक कोई कवि ही उत्पन्न नहीं हुआ. आपकी इस संबंध में क्या राय है?’’

वह सज्जन कहने ही को थे कि मैं बीच में बोल उठा. मैंने कहा-‘‘ठहरिए महाशय, पहले मुझे यह ज्ञात हो जाना चाहिए कि आप इस विषय पर कुछ कहने के अधिकारी हैं यह नहीं?’’

मेरे साथी ने कहा-‘‘इससे आपको क्या?’’

मैंने कहा-‘‘इससे मुझे सब कुछ है. पहले मेरे-तीन चार प्रश्नों का उत्तर मिलना चाहिए.’’

उन सज्जन ने कहा-‘‘पूछिए.’’ मैंने पूछना आरम्भ किया-

पहला प्रश्न-आप स्वयं कवि हैं या नहीं?

उत्तर-मैं स्वयं कवि नहीं, परन्तु मैंने सैकड़ों कवि बना डाले. मैं कवि नहीं हूं, परन्तु कविकार अवश्य हूं.

दूसरा प्रश्न-काव्य के संबंध में आपका ज्ञान कहां तक है?

उत्तर-मेरा ज्ञान काव्य में बहुत बढ़ा-चढ़ा है. मैंने पिंगल का नाम सुना है, छन्दशास्त्र भी एक दिन पुस्तक-विक्रेता के यहां रखा देखा था.

तीसरा प्रश्न-अलंकारों के संबंध में भी कुछ ज्ञान है कि नहीं?

उत्तर-(हंसते हुए) अजी, अलंकार तो मैंने अनेकों अपनी पत्नी के लिए गढ़ा डाले, उनका यहां क्या प्रसंग?

चौथा प्रश्न-भाव आप समझ लेते हैं?

उत्तर-हां, जिन चीजों का घर में नित्य खर्च रहता है, उनका भाव तो हरदम जबान की नोक पर है, आजकल का भाव सुनिए-घी साढ़े आठ छटांक, गेहूं नौ सेर, चावलों में कई भाव हैं-जैसा लीजिए, वैसा भाव.

पांचवां प्रश्न-उर्दू के शेर भी कभी देखे या सुने हैं?

उत्तर-शेर मैंने सरकस में कई बार देखे पर यह नहीं मालूम कि उर्दू के थे या हिन्दी के.

छठा प्रश्न-कुछ बगला-काव्य का भी ज्ञान है?

उत्तर-बंगला मिठाई तो बहुत खायी, पर बंगला-काव्य भी होता है-यह आप ही के मुंह से सुना.

सातवां प्रश्न-शेक्सपियर या टेनीसन की पुस्तकें पढ़ी हैं?

उत्तर-भई, हाथरस के नत्था-चिरंजी की पुस्तकें तो बहुत सुनीं( पर शेक्सपियर-टेनीसन का नाम नहीं सुना. ये क्या कोई नये पुस्तकवाले पैदा हुए? जरा पता बता दीजिए, मैं इनके यहां से भी पुस्तकें अवश्य ही मंगाऊंगा.

मेरे साथी ने पूछा-‘‘बस, अब संतोष हुआ कि नहीं? अब तो मान गए कि यह काव्य पर राय देने के अधिकारी हैं?’’

मैंने कहा-‘‘बिल्कुल मान गया. ऐसे विद्वान आदमी राय न देंगे तो फिर कौन देगा?’

मेरे साथी ने उन सज्जन से कहा-‘‘हां, तो अब आप बताइए कि हिन्दी में कोई कवि है या नहीं?’

वह सज्जन बोले-‘‘भई, मैंने तो आज तक किसी का नाम सुना नहीं. होते तो मेरे कान में उनके नाम की भनक जरूर ही पड़ती. अभी तक एक ही कवि है.’’

मैंने पूछा-‘‘वह कौन हैं?’’

वह बोलो-‘‘वही, जिसने पूरनमल बेला का ब्याह और न जाने किसका गौना लिखा है.’’

मैंने उस कवि का नाम पूछा. उन्होंने कहा-‘‘नाम तो उसका आज तक सुना ही नहीं.’’

मेरे सारी उछल पड़े, बोले-‘‘बस इससे यह प्रमाणित हो गया कि हिन्दी में कोई कवि नहीं है. जिसका नाम नहीं मालूम वह भी न होने ही के बराबर है. कहिए, अब आप हार गए?’’

सम्पादकजी, मैंने देखा ये दोनों तो मेरे भी चाचा हैं, जहां जरा कुछ चीं-चपड़ की तो वे बे-भाव के पड़ेंगे कि कम से कम छह महीने तक हजामत बनवाने की आवश्यकता न रहेगी. इसलिए मैंने कहा-‘‘जी हां, जी हां, आप बिलकुल ठीक कहते हैं-मैं आपकी बात मान गया.’’ यह कहकर मैं वहां से रस्सियां तुड़ाकर भागा और सीधे आकर लल्ला की महतारी की गोद में दम लिया.

सम्पादकजी, उस दिन मुझे ज्ञात हुआ कि ईश्वर सेर के लिए सवा सेर भेज ही देता है. आशा हे आप प्रसन्न होंगे.

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